Thursday, May 28, 2015

वो कौन थी


बीकॉम की पहले साल की परीक्षा समाप्त हो गई। रिजल्ट आने और दूसरे साल में दाखिले तक विश्वविद्यालय के नियमों के अनुसार हॉस्टल को खाली करना था। राजा अपने घर मंडी गोबिंदगढ़ चला गया। दिल्ली और मंडी गोबिंदगढ़ में बहुत अंतर है। दिल्ली एक महानगर, पूरा दिन सारा शहर भागता दौड़ता रहता है। किसी को किसी से कोई मतलब, सरोकार नहीं। सभी अपनी धुन में मस्त और व्यस्त हैं। विश्वविद्यालय परिसर में छात्रों की मस्ती और पढ़ाई। मेट्रो में दोस्तों के समूह में मस्ती, सिनेमा, मॉल और लाइब्रेरी। यह सब मंडी गोबिंदगढ़ में कहां, एक स्टील टाउनशिप जहां सिर्फ फॅक्टरियां और मकान ही है। दिल्ली से विपरीत एक ठहरा हुआ नगर। पुराने मित्रों से मुलाकात हुई। सुबह जल्दी उठ कर खाली मैदान में तीन घंटे क्रिकेट खेलना, फिर बिस्तर पर बैठे बैठे टीवी देखना, बस यही दिनचर्या राजा की हो गई। राजा के पिता बैंक अधिकारी और माता स्कूल अध्यापिका। राजा खुद हैरान हो गया कि जिस मंडी गोबिंदगढ़ में सत्रह वर्ष बिताए, अब एक महीना नहीं कट रहा। दिल्ली का बुखार जब चढ़ गया तो आसानी से नहीं उतरता। जो दिल्ली गया, बस दिल्ली में बस गया। राजा का भी मन दिल्ली में अटक चुका था।

एक महीने बाद रिजल्ट आया। प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होने पर परिवार में सभी गर्व से हर्षित हो गए और राजा का दिल्ली जाने का समय गया। दूसरे वर्ष में दाखिला लेना और हॉस्टल में भी रहने के लिए आवेदन देना। राजा को रेलगाड़ी में सफ़र करना पसंद है। हालांकि अधिकांश लोग बस का सफ़र करते है परन्तु राजा ने रात की रेल में आरक्षण करवाया। आराम से सो कर सफ़र करने का आनंद ही कुछ और है, वो बस के सफ़र में कहां। बैठे बैठे कमर अकड़ जाती है। बस के झटके अलग। रात के दस बजे की रेल थी। खाना खाने के बाद पिता ने रेलवे स्टेशन छोड़ा। एक बैग बड़ा और एक छोटा बैग। छोटा सा मंडी गोबिंदगढ़, पिता ने स्कूटर निकाला। राजा ने छोटा बैग पीठ पर टांग लिया। बड़ा बैग आगे रख लिया। पांच मिनट में रेलवे स्टेशन गया। स्कूटर को ठीक प्लेटफार्म पर ले गए। सामान बेंच पर रखा और राजा रेलगाड़ी का इंतज़ार करने लगा। पिताजी वापिस चले गए। छोटे शहर का यह सुख तो है, स्कूटर को सीधा प्लेटफार्म पर चढ़ा लिया। रात को कोई कुली नहीं। दो चार यात्री और थे, जिन्होंने रेलगाड़ी पकड़नी थी। रेलवे स्टेशन पर यात्री गाड़ी कम और मालगाड़ी अधिक रूकती थी। आखिर व्यापारिक केंद्र है मंडी गोबिंदगढ़। स्टील मिलों में बना सामान पूरे भारत वर्ष जाता है।

राजा प्लेटफार्म के बेंच पर आराम कर रहा है और साथ रेलगाड़ी का इंतज़ार। रेलगाड़ी लेट थी। कम से कम डेढ़ घंटे। तभी एक युवती हाथ में एक सूटकेस लिए आई और राजा के साथ बेंच पर बैठ गई। राजा ने युवती को देखा। एक खूबसूरत युवती, उम्र बीस इक्कीस के आस पास। राजा सोचने लगा कि क्या यह युवती मंडी गोबिंदगढ़ में रहती है। कभी देखा नहीं, कहां रहती होगी। किसी अभिनेत्री के कम नहीं, उनसे भी अधिक खूबसूरत। लंबा कद, गोरा रंग, लंबे बाल जो नितंबो को छू रहे थे। आधे चेहरे पर बाल आगे करके युवती बैठ गई। इसको कभी मंडी गोबिंदगढ़ में नहीं देखा। बाहर की होगी। पिछले एक साल से वह दिल्ली में रह रहा है। राजा युवती को देख रहा था। उसके चेहरे और जिस्म से उसकी आंखें हट नहीं रही थी। युवती भी राजा को देख रही थी। उसको इस बात का अहसास था कि राजा लगातार घूरता हुआ उसको देख रहा था। प्लेटफार्म पर गिने चुने चंद लोग ही थे जो विभिन्न बेंचों पर बैठे रेलगाड़ी का इंतज़ार कर रहे थे। एक पुलिस का सिपाही ड्यूटी पर चक्कर लगा रहा था। उसने राजा को युवती के साथ बैठा देखा, कुछ पल रुक कर देखा फिर आगे बढ़ गया। कुछ आगे जाकर पीछे मुड़ कर फिर देखा। राजा का पुलिस वाले का उसको और युवती को देखना अजीब नहीं लगा। जब वह खुद उस युवती पर से नज़र नहीं हटा सक रहा तो पुलिस वाला भी तो एक इंसान है, उसके शरीर में एक धड़कता दिल होगा। कोई भी उस युवती को देख कर उस पर मुग्ध हुए बिना नहीं रह सकता। राजा की सोच के विपरीत पुलिस का सिपाही सोच रहा है कि राजा क्या पागल है जो एक तरफ़ा खुद से ही बातें कर रहा है।

राजा खामोश चुपचाप बैठ कर युवती को ताक रहा था। चुप्पी उस युवती ने तोड़ी।
"आपने कौन सी ट्रेन पकड़नी है?"
"अभी जो आएगी।"
"ट्रेन लेट है।"
"हां, डेढ़ घंटा देरी से चल रही है।"
"आप कहां जा रहे हैं?"
"मैं दिल्ली जा रहा हूं।"
"दिल्ली में कहां रहते हैं?"
"मैं दिल्ली विश्वविद्यालय से बीकॉम कर रहा हूं। सेकंड इयर में, यहीं मंडी गोबिंदगढ़ रहता हूं। दिल्ली में हॉस्टल में रहता हूं।"
"यहां मंडी गोबिंदगढ़ में कहां रहते हैं?"
"अमलोह रोड पर मकान है।"
"आपके परिवार में कौन कौन है?"
"मेरे पिता, माता और छोटी बहन।"
"आपके पिता क्या करते हैं?"
"मेरे पिता बैंक अधिकारी हैं।"
"माता गृहणी है?"
"नहीं, माताजी स्कूल मैं अध्यापिका है।"
"छोटी बहन क्या करती हैं?"
"छोटी बहन अभी स्कूल में पढ़ रही है।"
"कौन सी कक्षा मैं?"
"दसवी में पढ़ रही है।"

दोनों बातें करते रहे। राजा युवती की खूबसूरती पर फ़िदा हो चुका था। उसने युवती से कुछ नहीं पूछा। युवती उससे पूछती रही और राजा सर्फ उत्तर देता रहा। काफी देर तक दोनों बातें करते रहे। युवती ने सिर्फ इतना ही बताया कि वह बुलंद शहर जा रही है।

"यह गाडी तो बुलंद शहर नहीं जाती।"
"हां, मालूम है। दिल्ली से बस पकड़ कर बुलंद शहर जाऊंगी। ढाई तीन घंटे बस में लगते है दिल्ली से बुलंद शहर के।"
"आप किससे मिलने जा रही हैं?"
"मेरा मायका है बुलंद शहर में, वहीँ जा रही हूं।"
"आप अकेले जा रही हैं, आपके साथ कोई नहीं?" राजा ने आश्चर्यचकित होकर पूछा।
"कौन से जंगल में जा रही हूं। आज की लड़कियां तो स्पेस में जा रही हैं। कल्पना चावला को तो जानते होंगे।" उस युवती ने मुस्कुरा कर कहा।
"हां यह तो ठीक है। देश की प्रधान मंत्री रह चुकी हैं, इंदिरा गांधी।" राजा ने झेंपते हुए कहा।
"आपका आरक्षण किस डिब्बे में है?" युवती ने पूछा।
"बी 1 में।" राजा ने बताया और पूछा, "आपका किस डिब्बे में आरक्षण है?"
"मेरा भी बी 1 में है बर्थ नंबर 15, आपकी बर्थ कौन सी है?"
"मेरी बर्थ 54 है।"

तभी रेल गाडी गई। राजा के अतिरिक्त तीन चार ही दूसरे यात्री थे। सभी सामान के साथ खड़े हो गए। गाडी ने सिर्फ दो मिनट रुकना था। बी 1 डिब्बे में सिर्फ राजा और वो युवती चढे। अपनी बर्थ नंबर 54 पर सामान रख कर राजा बर्थ नंबर 15 में गया परंतु बर्थ नंबर 15 खाली थी, वहां कोई युवती नहीं थी। बाकी सीटों पर यात्री सो रहे थे। यात्रियों में कोई युवती नहीं थी। राजा आश्चर्यचकित हो कर सोचने लगा कि युवती उसके साथ रेलगाड़ी के डिब्बे में चढ़ी थी। युवती आगे अपनी बर्थ के लिये गई और राजा ने अपनी बर्थ पर सामान रखा और युवती की बर्थ पर मिलने गया। कहां गई वो युवती, कहीं नीचे उतर तो नहीं गई। रात को डिब्बे का एक दरवाज़ा ही खुला था, दूसरा बंद था। बंद दरवाज़े से उतर नहीं सकती। कहां है वो? विचलित हो कर राजा सोचने लगा। तभी राजा ने देखा कि टिकट चेकर उसकी बर्थ के पास खड़ा उसे खोज रहा है। राजा अपनी बर्थ पर गया और अपनी टिकट दिखाई। टिकट दिखाने के बाद उसने टिकट चेकर से पूछा कि बर्थ नंबर 15 में एक युवती थी, उसे देखा है? टिकट चेकर ने चार्ट देख कर कहा कि बर्थ नंबर 15 खाली है। उसपर कोई आरक्षण नहीं है। बर्थ 15 दिल्ली से बुक है।

"यह कैसे हो सकता है कि बर्थ खाली है। वो युवती मेरे साथ डिब्बे में चढ़ी थी।" राजा बड़बड़ाया।
"तुम पहले यात्री नहीं हो जो बर्थ नंबर 15 का पूछ रहे हो। पिछले छः महीने से हर आमस्या की रात पता नहीं क्यों यह गाडी लेट हो जाती है और बर्थ नंबर 15 खाली रहती है, परन्तु किसी और बर्थ का यात्री ज़रूर इसके बारे मैं पूछता जरूर है। स्टेशन पर उसे एक युवती मिलती है, उसके साथ डिब्बे में चढ़ती है, परन्तु बर्थ खाली रहती है। इसका कारण मुझे नहीं मालूम है। मुझे हर वो यात्री पागल लगता है जो बर्थ नंबर 15 की पूछताछ करता है। कह कर टिकट चेकर चला गया। टिकट चेकर तो चला गया और राजा की नींद भी चली गई। बोझिल आंखों से पूरी रात का सफ़र कटा। बार बार आंखों के आगे उस युवती का चेहरा आता और राजा व्याकुल हो जाता। दिल्ली पहुंच कर दूसरे वर्ष और हॉस्टल में दाखिला लिया परन्तु उस युवती को नहीं भूल सका। इंटरनेट में खोज की पर कोई सफलता नहीं मिली।

दशहरे की छुट्टियों में राजा घर गया और अपने परिवार को उस युवती के बारे में बताया।
"तुम्हे उसने कोई नुकसान तो नहीं पहुंचाया?"
"नहीं पापा, वो मेरे साथ रेलगाड़ी के डिब्बे में चढ़ी पर वहां नज़र नहीं आई। बर्थ खाली थी।"
"बेटे मैंने ध्यान नहीं दिया कि तुमने जिस दिन की टिकट बुक करवाई थी, वो आमस्या की रात थी। मैं तुम्हे जाने नहीं देता।"
"ऐसी क्या बात है पापा?"
"बेटे, वो युवती नहीं थी, भूत थी, हर आमस्या को रेलवे स्टेशन पर इसी रेलगाड़ी के लिए नज़र आती है। गाडी में चढ़ती है पर बर्थ खाली होती है।"
"पापा, ऐसे कैसे हो सकता है?" राजा की उत्सुकता बढ़ती जा रही थी।
"बेटे भूतों, प्रेतों की दुनिया ही अलग होती है, हम साधारण मानव क्या जाने, यह रहस्य है।"
"पापा और क्या जानते हैं, बताओ पापा?"
"जो सुना है, बताता हूं। सुना है कि लड़की बुलंद शहर की रहने वाली थी। बहुत ही खूबसूरत, जैसा तुमने वर्णन किया है। लुधियाना के एक अमीर परिवार में हुई।  सुनने में आता है कि उसके पति का अपनी सेक्रेटरी से संबंध थे। उस युवती को यह बात पता चली। पति से झगड़ कर मायके चली गई। ससुराल वालों से मांफी मांगी और वापिस घर ले आये पर कहते हैं कि उसके पति का अपनी सेक्रेटरी से संबंध जारी रहे और जग जाहिर हो गए। अपने रास्ते से हटाने का प्लान उसके पति ने बना लिया। वो आमस्या की रात थी, उसने घर छोड़ा और दिल्ली जाने की बस में सवार हुई। मंडी गोबिंदगढ़ स्टेशन के पास बस ख़राब हो गई, उसने ट्रेन पकड़ी। कहते हैं कि उसके पति ने उसके पीछे गुंडे लगा दिए और ख़त्म करने की सुपारी दी। वह युवती ट्रेन में तो चढ़ी, परन्तु दिल्ली नहीं पहुंची। वो कहां गई, किसी को आज तक नहीं पता। सुना है कि उसके पति के भेजे गुंडों ने, जो उसका पीछा लुधियाना से कर रहे थे, उसको ठिकाने लगा दिया, पर आज तक यह रहस्य है कि युवती कहां गई। आज तक उसकी लाश नहीं मिली। हां हर आमस्या की रात वो ट्रेन में चढ़ती है परन्तु बर्थ खाली होती है।"

राजा को विश्वास अभी भी नहीं हो रहा था। उसके मन, दिल और दिमाग पर युवती का चेहरा छप चुका था, हटने का नाम नहीं ले रहा था।


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