Saturday, May 30, 2015

मवाना



मवाना छोड़े लगभग बीस वर्ष हो गए सतपाल को। आज भी याद है सतपाल को कि दो वर्ष फसल ख़राब होने पर और बड़ी बहन के विवाह पर क़र्ज़ चढ़ गया। मुश्किल से अठारह की उम्र थी सतपाल की, जब मवाना छोड़ दिल्ली काम धंधे की तलाश में आना पड़ा। एक फैक्ट्री में लग गया और दिल्लीवाला बन गया। छोटा भाई रामपाल वहीँ मवाना की चीनी मिल में नौकरी पर लग गया। दादा और पिता जमीन से जुड़े रहे और गन्ने की खेती करते रहे। वृद्धावस्था में दादा जी तो आराम करते हैं, कुछ ओडिसा से कामगार आते है और खेती चल रही है। पिता जी तो बस देख भाल ही करते हैं।

कुछ वर्ष तक फैक्ट्री में काम किया, फिर फैक्ट्री बंद हो गई। मवाना कुछ समय रहा, परन्तु खेती नहीं कर सका, वापिस दिल्ली आकर साप्ताहिक बाज़ारों में कपड़ों की दुकान लगा ली। कॉलोनी के अगल अलग सेक्टर कें अगल अलग दिन बाजार लगते हैं। शाम पांच बजे से रात दस बजे तक। नौकरी से अधिक कमाई होने लगी। थोक दुकानदार खुद कपडे सप्लाई कर जाते हैं। जीन्स, टॉप्स, टी शर्ट्स, नाइटी हर क्वालिटी में। खूब चल पड़ी दुकान। हर रोज़ दुकान शाम को, दिन में आराम। सामान ढोने और रखने के लिए एक ऑटो रिक्शा रख लिया और एक सहायक भी रख लिया। जीवन की गाडी पटरी पर सरासर दौड़ रही थी। एक पुरानी मारुती वैन खरीद ली। हर छः महीने बाद एक बार गर्मियों में और एक बार सर्दियों में मवाना सपरिवार जाते। दादा जी के हुकुम का पालन करना भी ज़रूरी है। दादा जी ने पूरा परिवार बांध रखा है।

छोटा भाई रामपाल भी समय के साथ चीनी मिल में नौकरी करने लगा। सतपाल अपना गुज़ारा बसर ठीक ठाक कर रहा था। रामपाल की आर्थिक स्थिति सतपाल से बेहतर रही। सतपाल ने कभी गहराई में जाने की कोशिश नही की। वह अपने में खुश था, कि गुज़र बसर ठीक हो रही है और सिर पर कोई क़र्ज़ नहीं है।

गर्मियों में स्कूल की छुट्टियां हो गई। सतपाल सपरिवार मवाना अपनी मारुती वैन में रवाना हुआ। सबके लिए कपडे नए डिज़ाइन वाले रखे। खरीदने की कोई आवशयकता नहीं, घर की दुकान है। खूब सारे रख लिए। सुबह सुबह छः बजे दिल्ली छोड़ी, सुबह के समय सड़के खाली होती है। ढाई घंटे में मवाना पहुंच गए। सुबह सुबह से तेज गर्मी पड़ रही थी। सभी परिवारजनों से मिलने और उन्हें कपडे देने के बाद सतपाल सुस्ताने के लिए आंगन मे पड़ी चारपाई पर लेट गया। तभी रामपाल बच्चों समेत आया और सतपाल से बोला "सतू, चारपाई तोड़ेगा क्या? इतवार है, चल खेत चलेगा। ट्यूबवेल पर नहाएंगे। बात सुन कर सतपाल को बचपन याद गया। अक्सर खेत जाते और वहीँ ट्यूबवेल पर नहाते। सतपाल ने अपने बच्चों को आवाज़ लगाई और सभी को खेत चलने को कहा। रामपाल ने सैंट्रो कार उठाई।

"रामू नई गाडी कब ली?" नई चमचमाती कार को देख कर पूछा।
"सतू, अभी पिछले महीने ली है। दिल तो होंडा सिटी लेने को था, पर सोचा, सबकी नज़रों में आने से अच्छा है, छोटी कार ली जाए।" कह कर रामपाल ने कार स्टार्ट की।
खेत पहुंच कर सतपाल ने देखा कि गन्ने लहलहा रहे हैं। "रामू, इस साल अच्छी फसल है।"
"पिछले दो साल से बारिश अच्छी रही तो फसल भी बढ़िया है। वैसे भी आधे खेत में गन्ना उगाते हैं। बाकी में गेहूं और सब्ज़ियों की खेती करते है।" ट्यूबवेल पर एक बड़ा सा हौद बना हुआ है और दो नालियां खेत के दो हिस्सों में सिचाई के लिए जा रही है।
"रामू, मवाना में कुछ बदला नहीं, सब कुछ वही है। बस लोगों के पक्के मकान बन गए। आज भी हर काम के लिए मेरठ या दिल्ली भागना पड़ता है।"
"सतू यह तो ठीक है पर लोगों की तरक्की हो गयी है। ज़मीनों के दाम बढ़ गए हैं। मेन रोड की ज़मीनों के रेट आसमान छू रहे हैं। लगभग सब बिक गई हैं। कोई इक्का दुक्का ज़मीन बची हैं। सब बिल्डर्स खरीद रहे है। ऊंची बिल्डिंग में फ्लैट बनेगे, मॉल बनेगें। अब तो अंदर के खेत भी बिकने शुरू हो गए हैं। दादा जी नहीं मानते हैं। मैं तो कहता हूं कि बेच दो ज़मीन। खेती में जहां पच्चीस वर्ष में नहीं कमा सकते, एक मुस्त एक बार में ज़मीन दे जायेगी। पिता जी तो राजी हैं, पर दादा जी कहते हैं कि जीते जी नहीं बेचूंगा।"

सतपाल ट्यूबवेल के नीचे मोटी पानी की धार में नहाने लगा और बचपन याद गया। रामपाल उसे ज़मीन बेचने के लिए दादा जी और पिता जी से बात करने के लिए कह रहा था कि दो के कहने से दबाव होगा। क्या पड़ा है खेती में, एक बार में ही मोटी रकम हाथ सकती है। कोई काम करने की ज़रूरत नहीं है। आराम से रहो परन्तु सतपाल की सोच दूसरी थी कि मुर्गी से रोज़ अंडा लिया जाए, वही अच्छा है। मुर्गी मर गयी, एक मुस्त रकम मिल जायेगी पर अंडे नहीं मिल सकेंगे हर रोज़। रामपाल ट्यूबवेल में नहाने का आनन्द उठा रहा था। सतपाल के बच्चे भी ट्यूबवेल की मोटी पानी की धार में प्रफुल्लित हो गए। दिल्ली में पानी को भर कर रखा जाता है। घंटे भर के लिए आया है, फिर नल की टूटी मुंह लटकाये सारा दिन पड़ी रहती है। आधी बाल्टी में नहाना पड़ता है। यहां तो पानी की कमी नहीं। छमा छम पानी में नहा कर सब आनंदित हो गए, परन्तु सतपाल रामपाल की बात पर सोच विचार कर रहा था कि ज़मीन बेच दी जाए। रामपाल की बातों से उसे यह अहसास हो गया कि दादा जी के जीते जी तो यह संभव नहीं होगा पर बाद में रामपाल को रोकना मुश्किल होगा। रविवार का दिन था, रामपाल की छुट्टी थी। मवाना में घूमने की कोई जगह नहीं है, वैसे भी गर्मियों में लू चल रही है। सभी अपने घरों में थे। कूलर चल रहे है। गर्मियों से राहत के लिए आदमी क्या परिन्दे भी अपने अपने घोसलों में दुबके हुए थे। सतपाल फर्श पर चटाई बिछा कर लेट गया। चलते पंखे को देखते सोच रहा था कि रामपाल अब बदल गया है। वो भाई नहीं रहा जो देखते ही दौड़ कर मिलने चला आता था। जब भी सतपाल मवाना आता तो घंटो बातें करते। इस बार वो उमंग, उत्साह नहीं नज़र रहा, जितने देर तक साथ रहे, ज़मीन बेचने की बातें करता रहा। जो कपडे रामपाल, भाभी और बच्चों के लिए लाया, सतपाल महसूस कर रहा था कि दादा जी और पिता जी के सामने कुछ कहा नहीं, पर बेमन से स्वीकार किया। यदि वो नहीं होते तब शर्तिया सतपाल को वापिस कर देता। रामपाल, भाभी और बच्चे ब्रांडेड कपडे पहनने लगे है। आखिर सतपाल दुकान तो पटड़ी पर ही साप्ताहिक बाजार में लगता है। कपडे घटिया नहीं, पर माध्यम दर्जे की क्वालिटी वाले बेचता है। एक एक दो दो करोड़ की कीमत वाले फ्लैट में रहने वाले उससे कपडे खरीदते है। अपनी तरफ से तो बढ़िया उपहार दिए परन्तु रामपाल की दृष्टि बदल गई है, उसकी नज़र में सिर्फ पैसा ही सब कुछ है। रात के समय रामपाल ताश ले कर आया। दोनों भाई ताश खेलने लगे। बच्चे टीवी देख रहे थे। कुछ पुरानी बाते और आज कल की बातें करते करते दोनों भाई ताश में मशगूल थे।

"आजकल गन्ने का क्या दाम चल रहा है? सतपाल ने ताश की गड्डी फैटते हुए पूछा।
"दाम दस से तीस के बीच है। क्वालिटी के ऊपर होते हैं दाम।"
"आजकल कौन करता है दाम तय?"
"पिछले दो साल से मेरे ऊपर जिम्मेदारी है। गन्ने का रेट और खरीद मैं ही कर रहा हूं। बड़ी मुश्किल से पोस्ट मिली है। फिफ्टी फिफ्टी होता है, तभी दो साल से कोई चूं नहीं कर सका। जब तक सक्सेना मैनेजिंग डायरेक्टर का सेक्रेटरी है, मुझे कोई कुछ कह नहीं सकता। तीस रुपये में खरीद दिखाते हैं। खरीद दस, पंद्रह रुपये में करते हैं। बाकी का आधा मेरे और सक्सेना के बीच में।"
"कोई शिकायत कर दे तब? सतपाल ने पत्ता फैंकते हुए पूछा।
"कोई किसान शिकायत नहीं कर सकता, उन्हें भी खुश रखते है। पूरा गन्ना किसका होता है, आधा तो मिटटी का वजन होता है। हर कोई खुश, हमारी पांचों घी में हैं।" कह कर रामपाल ने ताश की गड्डी पैक की। "रात अधिक हो गई है, चल सोते हैं, सुबह मिल जल्दी जाना है।

रामपाल चला गया और सतपाल सब समझ गया। इतने कम समय में इतना धन अर्जित करने का तरीका। सतपाल को अपने छोटे काम में गर्व महसूस हुआ। कोई गलत काम नहीं कर रहा है। मेहनत से कम सही, परिवार का लालन पालन ठीक ठंग से हो रहा है। रात चैन की नींद सोता है, किसी का कोई क़र्ज़ नहीं। सोचते हुए सतपाल को नींद गई।

सतपाल एक सप्ताह मवाना रहा, परन्तु इस बार दोनों भाइयों में थोड़ी दूरी रही। रामपाल ने दादा जी और पिता जी से ज़मीन बेचने का ज़िक्र किया। सतपाल ने निर्णय पिता और दादा पर छोड़ दिया। जो उनका निर्णय होगा, उसे मंज़ूर होगा। इस बात से रामपाल सतपाल से नाराज़ हो गया। सतपाल वापिस दिल्ली अपनी साप्ताहिक बाजार की दुकानदारी में व्यस्त हो गया। एक रात सतपाल दुकानदारी के बाद घर सपरिवार खाना खा रहा था कि पिता जी का फ़ोन आया और रामपाल से बात करवाने को कहा।

"पापा रामपाल तो नहीं आया।"
"वो तो दो दिनों से दिल्ली में है, अभी दो दिन तक और रहना है उसने। कह कर गया था कि मिल का काम है। तेरे पास नहीं आया। दादा की तबियत ठीक नहीं है। डॉक्टर ने अस्पताल में भरती करने को कहा है।"
"पापा मैं जाता हूं और रामपाल के मोबाइल पर बात करता हूं।"
"उसका फ़ोन लग नहीं रहा है, इसलिए तुझे फ़ोन किया।"

पिता जी से बात करने के बाद उसने रामपाल से बात करने की कोशिश की पर सफलता नहीं मिली। उसका फ़ोन बंद था। अगली सुबह सतपाल अकेला मवाना गया और मेरठ के अस्पताल में दादा जी को दाखिल करवाया। दादा जी की उम्र अधिक थी। वो दो दिन बाद चल बसे। दादा जी की अंत्येष्ठि की, परन्तु रामपाल का कोई पता नहीं था। यह चिंता की बात थी। दादा जी के उठाले के बाद रामपाल की खोज में गन्ना मिल गए, वहां जानकारी जो मिली, सतपाल और पिता जी दंग रह गए। गन्ने की खरीद घोटाले में रामपाल और सक्सेना दोनों को पुलिस के हवाले कर दिया। रामपाल दिल्ली नहीं गया था। पुलिस जांच के लिए पुलिस स्टेशन पहुंचा और उसे पूछ ताछ के बाद सक्सेना के साथ मेरठ जेल भेज दिया। सतपाल ने कहा जो जैसा करेगा, वैसा भरेगा। कुछ दिन बाद रामपाल जमानत पर छूट गया। घर कर उसने पिता पर ज़मीन बेचने के लिए दबाव बढ़ाया। रामपाल के जेल जाने से उसके परिवार की इज़्ज़त मिटटी में मिल चुकी थी। ज़मीन बिक गई। घपले की आदत से मज़बूर रामपाल ने बड़ी रकम खुद हड़प ली और पिता और सतपाल के हिस्से कम रकम दी। सतपाल रामपाल का विरोध नहीं कर सका। जेल में शातिर मुलजिमों से मित्रता हो गई। किसी गिरोह ने ज़मीन खरीदी। पूरा भू माफिया सक्रिय था, वही ज़मीन को किसी बड़े बिल्डर्स के लिए खरीद कर रहे थे। ज़मीन के साथ मकान भी बिक गया। पिता जी सतपाल के साथ दिल्ली गए। सतपाल ने दो मंज़िल का मकान बना लिया। मवाना सदा के लिए छूट गया। मवाना की खुली हवा, खेत और मकान से एकदम जुदा दिल्ली की ट्रैफिक वाली सड़के, भागते लोग पिता जी को नहीं भाए। सतपाल के साथ उसकी साप्ताहिक दुकानदारी में सहयोग करते। इस उम्र में कहां जाया जाए। ज़िन्दगी का साथ निभाना है आखिरी सांस तक, बस चाहे ख़ुशी से या बेदिल्ली से। दो साल बाद हालात से समझोता कर पिता जी ने ख़ुशी से सतपाल के साथ दिल्ली में जीना सीख लिया।

रामपाल ने एक बार जो कदम बढ़ाया, मुड़ कर नहीं देखा। घपले में दो साल की जेल काटी। अपराधियों से संपर्क और नज़दीकियां हो गई। रामपाल के कदम जुर्म की दुनिया में आगे तक चले गए। भू माफिया का एक अहम सदस्य बन गया।

सतपाल अपने घर और दुकानदारी तक सीमित था। दुनिया से कोई मतलब नहीं। कुछ दिनों से उसके घर और साप्ताहिक बाजार की दुकान के आस पास दो पुलिस के सिपाही सादी वर्दी में निगरानी कर रहे थे। सतपाल ने कोई ध्यान नहीं दिया। अड़ोस पड़ोस में पूछ ताछ करनी शुरू की। पडोसी खुसर पसर करने लगे। शंकित पत्नी ने सतपाल से बात की। अभी दोनों इस विषय में बात कर ही रहे थे कि डोरबेल बजी। सतपाल ने दरवाज़ा खोला, दो पुलिस वाले दनदनाते घर में घुस गए। सतपाल कुछ समझ सकता दो महिला पुलिस भी पीछे पीछे घर में प्रवेश कर चुकी थी।

"रामपाल कहां है?" कड़कती आवाज़ में पुलिस ने पूछा।
"कौन रामपाल?" सतपाल के गले से बहुत मुश्किल से आवाज़ निकली।
"तेरा भाई और कौन?" कह कर सतपाल को एक तमाचा जड़ दिया। सतपाल गिर पड़ा और पत्नी डर गई।
"हम नहीं जानते रामपाल कहां है। पिछले पांच साल से हम नहीं मिले।" तभी पिता जी भी शोर सुन कर दूसरे कमरे से गए। सबने बताया कि मवाना की ज़मीन और घर बेचने के बाद वे कभी मवाना नहीं गए और रामपाल से कोई संपर्क नहीं रहा। पुलिस की बात सुन कर पिता जी और सतपाल सकते में गए कि रामपाल ज़ुर्म की दुनिया का बादशाह बन चुका है और ज़मीनों पर कब्ज़ा करने के लिए दो क़त्ल के केस उसपर चल रहे हैं। वह फरार है। पुलिस ने उसे ढूंढने के लिए इनाम की घोषणा भी की है। पुलिस को रामपाल की तलाश है। पुलिस हर संभव ठिकाने पर उसे तलाश रही थी। रामपाल अपने भाई सतपाल और दूसरे रिश्तेदारों से दूर रहा। वह जानता था कि पुलिस वहां उसे दबोच सकती है। पुलिस के आने से पिता जी की सेहत लुडक गई। उन्होंने बिस्तर पकड़ लिया।
दोनों भाइयों की राह जुदा थी। चाहे वर्षो बीत गए मिले हुए परन्तु बचपन के सखा, भाई को कैसे भूल सकता है। कभी कभी याद ही जाती है। बचपन जिसके साथ बिता, हमेशा याद रहता है। पिता जी गुजर गए। रामपाल से कोई संपर्क हो सका। पुलिस का डर, कहीं सतपाल को ही ना अंदर बंद कर दे।

वर्षो बीत गए, सतपाल बूढ़ा हो गया। बच्चों की शादी हो गई। दादा नाना की पदवी मिल गई। सतपाल अपने बच्चों के साथ आज भी साप्ताहिक बाजार में विभिन्न सेक्टरों में दुकान लगाता है। भाई रामपाल को भूल चुका था, परन्तु समय भूलने नहीं देता। एक रात सपने में रामपाल आया। वैसा गबरू जवान, जैसा वर्षो पहले था। बेचैनी से नींद खुली, घबराहट महसूस हुई। पानी पिया, बिस्तर पर लेटा पर नींद नहीं आई। रात के दो बज रहे थे। डोरबेल बजी। इतनी रात कौन हो सकता है। आवाज़ लगाई "कौन है?"
"पुलिस, दरवाज़ा खोलो।" दूसरी तरफ से उत्तर आया।
पुलिस सुन कर सतपाल डर गया, पत्नी और बच्चों को जगाया फिर दरवाज़ा खोला। सतपाल कुछ नहीं बोला।
"सतपाल कौन है?"
"मैं हूं।"
पुलिस के अफसर ने कहा "बूढे हो गए, पर पहचान लिया, तुम ही सतपाल हो। याद करो बरसो पहले मैं तुम्हारे घर की निगरानी करता था रामपाल के चक्कर में।"
"मैं पहचान नहीं सका।" सतपाल ने जवाब दिया।
"कोई बात नही, अगर हम भूल जाए तो पुलिस अपराधियों को कैसे पकड़ेगी।"
"आप का कैसे आना हुआ?"
"सतपाल तुम्हे हमारे साथ चलना होगा। रामपाल के साथ अभी रात में मुठभेड़ हुई। रामपाल मर गया है। हमें मालूम है कि वह रामपाल है, तुम्हारी शिनाख्त पक्की रहेगी।"

सतपाल पुलिस के साथ चला। उसने रामपाल का शव देखा। गोलियों से शरीर छलनी था। सतपाल ने शिनाख्त की और भरी मन से अगले दिन अंत्येष्ठि की। सतपाल की आंखों के आगे मवाना, खेत की ज़मीन, घर, दादा जी, पिता जी और रामपाल सभी आते रहे। आंखे नम हो गई। सतपाल ने आंसुओं को छलकने नहीं दिया।
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