Tuesday, June 09, 2015

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पुलिस की नौकरी से सेवा निवृति के बाद विक्रम आहूजा नवगांव में बस गए। सेवा के वक़्त विक्रम आहूजा ने लगभग दस वर्ष नवगांव में बिताये। न्यूसमर हिल की तलहटी पर बसा नवगांव, एक छोटा सा शहर, जिसके बाद पहाड़ियां शुरू हो जाती हैं। पांच किलोमीटर के बाद घुमावदार रास्ता आरम्भ हो जाता है और कुल मिला कर तीस किलोमीटर की दूरी है नवगांव और न्यूसुमर हिल के बीच। एक छोटा सा खूबसूरत हिल स्टेशन, जहां बारह महीने मौसम खुशमिजाज़ रहता है। गर्मियों में न अधिक गर्मी और सर्दियों में न अधिक ठण्ड। नवगांव में गर्मी के दिन कुछ गर्म रहते हैं। निवासी सुबह पिकनिक मनाने अपने स्कूटर, बाइक और कार में न्यूसमर हिल चले जाया करते है। छुटी वाले दिन तो ऐसा लगता है कि पूरा नवगांव उजड़ गया है और न्यूसमर हिल में जाकर बस गया हो। मुश्किल से पौना घंटे में नवगांव से न्यूसमर हिल पहुंच कर पूरा दिन पिकनिक में और शाम को नवगांव वापिस।

विक्रम आहूजा ने जब दस साल नवगांव में बिताए तो जहां नवगांव की सीमा समाप्त होती है और न्यूसमर हिल के लिए घुमावदार रास्ता आरम्भ होता है, वहीँ पर एक पांच सौ गज का प्लाट लेकर तीन कमरों का मकान बनवाया। आगे, पीछे लॉन, बगीचा और फलदार पेड़। अमरुद, जामुन और आम के पेड़ लगाये। निम्बू के झाड़ और टमाटर की क्यारियां। सेवा निवृति के पश्चात विक्रम और पत्नी विनीता अकेले ज़िन्दगी बसर कर रहें हैं नवगांव के बड़े से मकान में। एक पुत्री वृन्दा है, जिसका विवाह हो चुका है। दिल्ली में रहती है। छुट्टियों में नवगांव सपरिवार आती है। जमाई डॉक्टर है।

विक्रम आहूजा पुलिस से सब-इंस्पेक्टर के पद पर रिटायर हुए। अपनी नौकरी का एक लंबा हिस्सा इसी पद पर बिता दिया। कई महत्वपूर्ण केसों को सुलझाने में विक्रम ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, परन्तु कुछ केसों को सुलझाने में असफल रहे, इस कारण पद की उन्नति नहीं मिली। विक्रम को इसका अफ़सोस नहीं है, परन्तु पत्नी विनीता को है, बात होती है तो कह देती है कि जानबूझ कर केस नहीं सुलझाए। विक्रम भी हंस कर कहता कि रिश्वत भी तो लेनी थी, पुलिस की तनख़्वाह में मकान नहीं बनता, सिर्फ दाल रोटी मिलती है।

गर्मी कुछ अधिक पड़ने लगी। जून का महीना था, पुत्री वृन्दा, जमाई विनोद और नातिन शौर्य, दर्पण नवगांव छुटी में रहने आए। विक्रम ने न्यूसमर हिल जाने का कार्यकर्म तय किया।
"यहां गर्मी अधिक हो गयी है विनीता। तुम्हे नहीं लग रही।"
"अब जून के महीने में लू चलेगी, गर्मी पड़ेगी। ठण्ड लेनी है तो न्यूसमर हिल जाओ।"
"जाओ का क्या मतलब है, चलो, चार पांच दिन न्यूसमर हिल के सुहाने मौसम का लुत्फ़ उठाते हैं। बच्चे भी हैं। खूब मज़े आएंगे।"

अगली सुबह सब न्यूसमर हिल रवाना हुए। पौने घंटे में लाइब्रेरी के पास पुलिस रेस्ट हाउस में दो कमरे लिए और आराम करने लगे। विक्रम रिसेप्शन पर टीवी देख रहे थे। बच्चे आराम कमरे में कर रहे थे। तभी रिसेप्शन पर बैठे सिपाही ने उठ कर जोरदार सैलूट मारा "जय हिन्द साहब जी"
"जय हिन्द, सामान कमरे में रख दो। कमरा ठीक ठाक दुरुस्त कर दो।"
"कमरा एक दम फर्स्ट क्लास है। मैं सामान रख देता हूं।"
"ठीक है, न्यूज़ पेपर भी रख देना।" कह कर साहब जी सोफे पर बैठ गए। विक्रम को देख कर कहा "माय प्लीजेंट सरप्राइज, विक्रम आहूजा, एक अरसे बाद मिल रहे है।"
विक्रम ने उठ कर साहब जी से हाथ मिलाया "गुड मॉर्निंग भंडारी, वर्दी पर लगे तमगे देख कर विक्रम ने आगे कहा डीसीपी मोहन भंडारी।"

"याद करो कितने वर्षों बाद मिल रहे हैं?"
"मैं तो दो साल पहले रिटायर हो गया हूं, तुम तो सर्विस में हो?"
"तुम दो साल पहले हो गए, मैं दो साल बाद रिटायर हूंगा।" कह कर मोहन भंडारी ने जोर से ठहाका लगाया। "वैसे यह बताओ, आजकल कहां हो।"
"नवगांव में रह रहा हूं। गर्मी अधिक हुई, आज सुबह ही सपरिवार आया हूं। तुम अकेले आये, किसी काम से या फिर मौज मस्ती? विक्रम ने पूछा।
"काम से आया हूं, इसलिए अकेला आया हूं। शाम को मिलेंगे।"

मोहन भंडारी अपने कमरे में चला गया और विक्रम अपने कमरे में। विक्रम और मोहन ने एक साथ बहुत समय साथ साथ बिताया। बहुत जटिल केस सुलझाए। मोहन विक्रम का सीनियर था पर विक्रम की काबिलियत की हमेशा तारीफ करता था। यह बात अलग है कि कुछ केसों में विभाग ने विक्रम की लापरवाही मानी और पद की उन्नति में रोड़ा बनी।

नाश्ता करने के बाद और शाम के समय विक्रम आहूजा सपरिवार पिकनिक करते रहे। मॉल रोड के समीप लोअर बाजार में नातियों के लिए आइस क्रीम खरीद रहे थे विक्रम आहूजा, तभी पीछे से आवाज़ आई "जय हिन्द साहब जी" जय हिन्द सुन कर विक्रम ने मुस्कुराहट के साथ गर्दन घुमाई "लता कैसी हो?"
"ठीक साहब जी।"
"यहां कैसे?"
"यहां दुकान खोल ली है, आइये अंदर। मेरे पति से मिलिए।"
विक्रम सपरिवार दुकान के अंदर गए। दुकान पर बोर्ड लगा था "लता बुटीक"। कपडे और रेडीमेड, महिलाओं और पुरुष दोनों के लिए। दुकान छोटी थी पर हर चीज़ तरीके से सजी हुई रखी थी।
"दुकान अच्छी है। अपनी है?"
"जी अभी तो किराये पर है।" लता ने जवाब दिया।
विक्रम ने लता के पति से पूछा "आपका नाम?"
शरमाते हुए उसने कहा "चांद कुमार।"
"तुम तो लड़कियों से भी ज्यादा शर्मा रहे हो। लता की बहादुरी मालूम है ना?"
"उससे अधिक आपकी दरियादिली की। हम तो आपके अहसानमंद है।"
"चांद पुलिस के साथ एक इंसान भी हूं। मैंने सिर्फ इंसानियत के धर्म का पालन किया था।"
"जी कुछ देखिए?"
विनीता और वृन्दा लेडीज सूट देखने लगे। विक्रम ने पूछा "हमारे दिल के टुकड़ो शौर्य और दर्पण के लिए भी कुछ है।"
"साहब जी जो कहें, बना देंगे। एक दम फ्री।" लता ने कहा।
"फिर तो एक नहीं दो बना दो।" विक्रम ने मजाक में हंसते हुए कहा।
"आपके अहसान के आगे रूपया, पैसा की कोई कीमत नहीं। तमाम उम्र आपके अहसान नहीं भूल सकेंगे।" कहते हुए लता रुआंसी हो गई।
विनीता ने लता के आंसू पोंछते हुए कहा "पगली रोते नहीं हैं। इंसानियत का फ़र्ज़ भी निभाना था। बेकसूर को सजा न मिले, बस इसी का ख्याल रख कर छानबीन करते हैं आहूजा साहब।"

उदासी के माहौल को बदलने के लिए विक्रम ने एक चुटकला सुनाया।
"भगवान आदमी से: तुझे क्या चाहिए? आदमी भगवान से: नौकरी, पैसों से भरा कमरा, सुकून की नींद और गर्मी से छुटकारा। भगवान: तथास्तु। और आज वो आदमी एटीएम में गार्ड है। हा हा हा"
चुटकुला सुन कर सभी हंस पड़े।
"लता कपडे कब तक दोगी?"
"साहब जी, आप यहां कब तक हैं?"
"अभी चार दिन और हैं।"
"कोशिश पूरी है नहीं तो नवगांव आकर दे दूंगी।"
आर्डर देने के बाद सभी रेस्टौरेंट में खाना खा कर वापिस रेस्ट हाउस आये। मोहन भंडारी बाहर गेट पर मिल गए। भंडारी और विक्रम ने काफी समय एक साथ काम किया था, इसीलिए दोनों के परिवारों में मेलजोल बहुत था। सभी एक साथ बैठ गए। भंडारी गंभीर था।

"डीसीपी साहब, तुझे हुआ क्या है, आखिर इस मर्ज़ की दवा क्या है?" विक्रम ने मोहन भंडारी को गंभीर मुद्रा में बैठे देख कर कहा।
"विक्रम, आज मै सोचता हूं कि कई बार तुमने सही निर्णय लिया अपराधी को न पकड़ कर। मैं मानता हूं और समझता हूं कि कई बार तुम केस की तह तक पहुंचे, परन्तु तुमने उनको जानबूझ कर छोड़ दिया।"
"भंडारी तुम सही कह रहे हो, इसीलिए तरक्की नहीं हुई, पर आज उदास दिख रहे हो?"
"विक्रम आज मैं दोराहे पर हूं, तुम जैसे। ऊपर से आदेश है कि पकड़ लो, मंत्री के खास आदमी है, मंत्री दबाव बना रहे हैं। अपराधी कोई और है, एक बेकसूर को बलि का बकरा बनाया जा रहा है। तुम बताओ, मुझे क्या करना चाहिए। उम्र में बड़े हो, दोस्त भी, कुछ समाधान बताओ।"

"भंडारी तुम्हें एक केस सुनाता हूं। सुन कर फैसला खुद करना। अपने विवेक का इस्तेमाल करना, फिर फैसला लेना।"

विक्रम आहूजा ने केस सुनना आरम्भ किया। पत्नी विनीता, पुत्री वृन्दा, जमाई विनोद, नातिन शौर्य और दर्पण के साथ मोहन भंडारी विक्रम आहूजा को बड़े ध्यान से सुनने लगे।

यह बात बहुत पुरानी है। मेरी नवगांव में पोस्टिंग थी। एक छोटा सा शहर लगभग पंद्रह वर्ष पुरानी बात होगी। आज भी नवगांव छोटा सा शहर है। एक छोटा सा पुलिस स्टेशन जो आज है, वही उस समय था। नवगांव में छोटी मोटी चोरी, मार पीट की ही वारदात की पुलिस में शिकायत होती थी। कोई बड़ी घटना कभी घटी नहीं, इसलिए छोटा सा थाना था। दिल्ली से नवगांव तुम्हे भंडारी मालूम है कि मुझे सजा के तौर पर भेजा था। एक महत्वपूर्ण केस में मेरे से चूक हो गई थी और मेरे सीनियर अफसर ने मेरी शिकायत कर दी कि मेरे कारण केस बिगड़ गया। मैं कुछ दिन अकेले रहा फिर यहां का वातावरण और आसान ज़िन्दगी पसंद आई। मैंने प्लाट लिया और परिवार के साथ रहने लगा। मेरा मकान तो नवगांव की सीमा पर है। नवगांव के ठीक बीच में नवाब साहब की बड़ी हवेली है। उस समय नवाब साहब रहा करते थे। अब तो हवेली बिक बिका गई है। नीचे दुकाने बन गई हैं। ऊपर की तरफ मकान में कई परिवार रह रहे हैं। नवाब साहब रंगीन तबियत के इंसान थे। उनकी रंगीन बातों का बाजार गर्म रहता था। आज भी हवेली के पास जाओ, आपको नवाब की रंगीन ज़िन्दगी के किस्से सुनने को मिल जाएंगे। गर्मियों के दिन थे। नवाब साहब दोपहर के समय अपनी मोटर कार से हवेली आ रहे थे। मोटर कार से उतरे तो सामने एक बारह तेरह साल की लड़की आती देख कर नवाब साहब की तबियत मचल गई। लड़की गरीब परिवार की थी। यौवन चढ़ाव पर था। लड़की एक दर्ज़ी की पुत्री थी और पिता का हाथ बटाती थी। उस की मां की मृत्यु हो चुकी थी। गरीब की लड़कियां कम उम्र में समझदार हो जाती हैं। कुदरत अपने आप सबको रक्षा करना सिखा देती है। वह लड़की किसी के घर सिले हुए कपड़ों को ठीक करने के लिए गई थी। उसके थैले में कैंची, फीता और सुई धागे थे। वह मस्ती में कोई गाना गुनगुनाते हुए जा रही थी। नवाब साहब की बुरी नज़र से बेखबर गाना गाते जब नवाब के आगे से गुज़री तब नवाब ने उसे कपडे ठीक करने के बहाने हवेली में बुलाया। नवाब साहब नवगांव की हवेली में कम रहते थे। कभी कभी रंगीन रातों को एकान्त में बिताने के लिए आते थे। हवेली में सिर्फ एक नौकर रहता था, जो देखभाल करता था। उस दिन नवाब साहब का नवगांव में आने का कोई कार्यक्रम नहीं था। नौकर सामान लाने शहर गया था। नवाब साहब की पसन्द का काफी सामान नवगांव में नही मिलता था। अचानक से नवाब साहब का कार्यक्रम बना और दोपहर में आ गए। उनकी महिला मित्र ने शाम को आना था। उस लड़की को देख नवाब की तबियत मचल गई। रंगीन दोपहर भी करनी चाही। कमरे का दरवाज़ा बंद कर लिया और अश्लील हरकते शुरू कर दी। लड़की समझदार थी। वह नवाब के इरादे समझ गई। नवाब की उम्र पचास के करीब थी। उनके बदन में वो फुर्ती नहीं थी जो बारह तेरह साल की लड़की में थी। नवाब ने लड़की से जबरदस्ती करने की कोशिश की। लड़की ने बचाव में थैले में रखी कैंची निकाल ली और नवाब के सीने की ओर चला दी। कैंची नवाब के सीने में घुस गई। नवाब ने कैंची को निकालने की कोशिश की तो लड़की ने फिर कैंची चला दी। नवाब साहब ढेर हो गए। लड़की ने कैंची नवाब के सीने से निकाली और अपने थैले में डाल कर हवेली से बाहर निकली। वह बदहवास थी, उसे कुछ सूझ नहीं रहा था। वह भागती हुई झरने की ओर गई। वहां झरने के समीप बैठ कर सोचने लगी। अपने को शांत करने के लिए वह झरने में नहाईं। नहाने के बाद उसने कैंची को धोया। दोपहर के समय गर्मियों के दिन झरने पर कोई नहीं था। नहा कर वह शांत हो गई और अपने घर चली गई। शाम को उसने रात का खाना बनाया और पिता के साथ खाया। पिता ने उससे पूछा कि उसने कपडे ठीक कर दिए थे। उसने हां में जवाब दिया।

देर शाम नवाब का नौकर शहर से सामान लेकर आया तो उसने देखा कि नवाब साहब की मोटर कार हवेली के बाहर खड़ी है। नौकर हैरान हो गया कि आज नवाब बिना बताये किसी इतला के आ गए। उसने नवाब साहब को आवाज़ दी, पर कोई उत्तर नहीं मिला। नौकर ने सोचा कि नवाब साहब आराम कर रहे होंगे, इसलिए वह उनके कमरे में नहीं गया। थोड़ी देर बाद नवाब साहब की हवेली के बाहर एक मोटर कार रुकी। उन दिनों गिनी चुनी मोटर कार नवगांव में होती थी। नौकर ने हवेली का दरवाज़ा खोल। नवाब साहब की महिला मित्र आई थी। नौकर समझ गया नवाब साहब के बिना किसी इतला के आने का कारण। महिला मित्र नवाब के कमरे में सीधी गई। कमरे का दरवाज़ा बंद था। महिला मित्र ने नवाब को आवाज़ दी परन्तु कोई उत्तर नहीं आया। उसने नौकर से दरवाज़ा खटखटाने को कहा। नौकर ने जैसे दरवाज़ा खटखटाया कि दरवाज़ा खुल गया। बत्ती जलाई तो देखते ही दोनों के होश उड़ गए। नवाब साहब की लाश फर्श पर पड़ी थी। नौकर ने नब्ज़ टटोली। नब्ज़ नहीं चल रही थी। सांस बंद थी। उसने नवाब साहब को कार में डाला और अस्पताल ले गए, जहां उन्हें मृत्य घोषित कर दिया। पुलिस को सूचना अस्पताल से मिली। नवगांव में यह शायद पहली और आखिरी वारदात थी। जब मुझे सूचना मिली तब लगभग साढे आठ का समय रहा होगा। मैं खाना खा कर हाथ धो रहा था। फ़ौरन अस्पताल पहुंचा। लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया। रिपोर्ट दर्ज़ हुई और पहले बयान डॉक्टर, नौकर और महिला मित्र के दर्ज़ किये। महिला मित्र को बिना इज़ाज़त नवगांव नही छोड़ने के लिए कहा।
अगले दिन सुबह से पूरा नवगांव हवेली पर एकत्रित था। अटकलों का बाजार गर्म था। लोंगों की राय थी कि अपनी रंगीन तबियत के कारण नवाब की हत्या हुई, पर हत्यारा कौन है, उसको ढूंढना पुलिस का काम है। मैं सुबह नवाब की हवेली गया और सबूत ढूंढने की कोशिश की। सिर्फ नवाब के कमरे में कुछ सामान तितर बितर जरूर था परन्तु गायब कुछ भी नहीं था। चोरी तो बिलकुल नहीं थी। क़त्ल की और क्या वजह हो सकती है। महिला मित्र क्या कातिल है? इस विषय पर भी सोचा, परन्तु बिना वजह किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सका। महिला मित्र बहुत घबराई हुई थी। उसने अपने शारीरिक सम्बन्ध नवाब से स्वीकार किये और अनुरोध किया कि उसे जाने दिया जाए क्योंकि वह एक ऊंचे परिवार से ताल्लुक रखती है कोई बाज़ारू महिला नहीं है। मैंने उसे जाने दिया। वह दिल्ली की रहने वाली थी।

घटना स्थल पर मुझे कांच की कुछ टूटी हुई चूड़ियां मिली। कांच की चूड़ियां अमीर लड़कियां या औरतें नहीं पहनती, अतः मैंने उस महिला मित्र को छोड़ दिया। मैंने चूड़ी बेचने वालों से पूछताछ कि और एक बात मालूम हुई कि चूड़ी का साइज़ छोटी लड़की या पतली महिला का है। अतः महिला मित्र पर से संदेह हट गया क्योंकि उसका हाथ मोटा था। चूड़ियों के टुकड़े दर्शा रहे थे कि छोटी लड़की या पतली छोटे कद की महिला के हो सकते हैं जो ज्यादा अमीर न हो। यह रहस्य सुलझाने के लिए मैं नवगांव में पैदल घूमना शुरू किया। नौकर पर भी शक नहीं था क्योंकि वह घर पर नहीं था। पोस्ट मार्टम की रिपोर्ट के अनुसार हत्या दोपहर के समय हुई जब घर कें कोई नहीं था। कैची से हत्या हुई और कैची मिली नहीं। कैंची दर्जियों के पास होती है। मैंने दर्जियों पर नज़र रखनी शुरू कि किस दर्ज़ी के पास महिला कारीगर हैं। एक दर्ज़ी की लड़की मुझे देख कर मुंह फेर लेती थी। यदि बाजार में मिलती तो तेज क़दमों से इधर उधर हो जाती। बाकी दर्जियों की लड़कियां या महिला कारीगर ऐसा नहीं करती थी। मैंने उस लड़की पर नज़र रखनी शुरू कर दी। शायद वो भी जान गई थी। एक दोपहर मैंने उसे झरने की ओर जाते देखा। मैं दूर से देखता रहा। लड़की झरने के पास कुछ देर तक गुमसुम बैठी सोचती रही। फिर झरने में नहा कर मुड़ी तो मैंने उसको रोक लिया। मुझे देखते उसने भागने की नाकाम कोशिश की, परन्तु मैंने उसका हाथ पकड़ा। उसने हाथ छुड़ा लिया। हाथ छुड़ाने की कोशिश में उसकी कांच की कुछ चूड़ियां टूट गई। चूड़ियों का साइज़ उन टूटी चूड़ियों से मिलता था जो नवाब साहब की हवेली में मिली थी। मैंने उसे भाग कर पकड़ लिया और सच बताने को कहा तो वो फूट कर रोने लगी और गुनाह कबूल कर लिया। उसने सिर्फ अपना बचाव किया था, किसी इरादे से हत्या नहीं की थी। अपने बचाव के लिए कैंची आगे की और वो नवाब के सीने में उतर गई। मैंने उसे छोड़ दिया और हिदायत दी कि इस बात को किसी को नहीं बताये। अगर किसी को भनक भी लग गई तो फिर बचाना मुश्किल हो जाएगा।

इतना सुन कर मोहन भंडारी ने पूछा कि लड़की को क्यों छोड़ा। विक्रम ने आगे बताना शुरू किया कि उस लड़की की उम्र बारह तेरह की थी। अगर केस में उसे बंद करता तो उसको सुधार गृह में भेज दिया जाता, जहां सुधार कम होता है और मुजरिम ज्यादा बन कर निकलते हैं। यही सोच कर मैंने उसे छोड़ दिया। अगर इस छोटी सी उम्र में आरोपी बना दिया तब इसका भविष्य चोपट हो जायेगा इसलिए मैंने उसे छोड़ दिया कि किसी मासूम के भविष्य से खिलवाड़ नहीं करना, क्योंकि उसने सिर्फ अपना बचाव किया था। उस दिन के बाद मुस्कान उसके चेहरे पर लौट आई।

नवाब रसूकदार था। उसके मर्डर में मैं किसी को पकड़ नहीं सका तो मेरा तबादला हो गया और तुम जानते हो कि मेरी तरक्की भी रुक गई परन्तु मुझे संतोष था कि एक मासूम की ज़िन्दगी बच गई। नवगांव छोड़ने से पहले मैं उस लड़की से मिला और पूरी तरह से समझाया कि भूल कर भी किसी से इस बात का जिक्र न करे क्योंकि दीवारों के भी कान होते हैं और यदि नए पुलिस अफसर को बात पता चल गई तो वह फंस सकती है। उस लड़की ने मेरी बात का पूरा मान रखा।

इतना सुन कर मोहन भंडारी ने कहा कि कहीं तुम कोई कहानी तो नहीं सुना रहे। विक्रम आहूजा ने हंस कर कहा कि किस्सा अभी समाप्त नहीं हुआ क्योंकि यह सच्चा किस्सा है और तुम नवगांव पुलिस स्टेशन की फाइलें देख सकते हो। हां अब आगे की सुनो। तबादले के बाद मेरे पौ बारह हो गए। पांचों उंगलियां घी में और मुंह में शक्कर। मेरी पोस्टिंग जहां हुई वहां नदी किनारे रेत और मिटटी का माफिया काम कर रहा था। हर ट्रक के पीछे रिश्वत। उसी रिश्वत के पैसों से नवगांव का मकान बन गया। तुम तो जानते हो पुलिस की तनख्वाह में बस गुज़ारा ही होता है। ज़मीन मकान नहीं बनते। रिश्वत ज्यादा ही हो गई थी। एक अखबार वाला माफिया की रिपोर्ट छापने लगा और मेरा एक बार फिर से तबादला। छोटा सा क़स्बा था, नवगांव से भी छोटा। वहां एक गारमेंट फैक्ट्री थी। अब वो लड़की जो नवगांव में बारह तेरह वर्ष की थी, अब युवती हो गई थी। उम्र लगभग बीस वर्ष। उसके पिता का देहांत हो गया तो वह नवगांव छोड़ कर उस गारमेंट फैक्ट्री में काम करने लगी। वहां एक सहपाठी से प्रेम हो गया। लड़की अब युवती थी और यौवन सर चढ़ कर बोल रहा था। गारमेंट फैक्ट्री के मालिक की नज़र उस पर पड़ी और एक दिन उसने काम के बहाने शाम को रोक लिया। सब कारीगर जा चुके थे। वह युवती काम कर रही थी। गारमेंट फैक्ट्री के मालिक ने उससे जबरदस्ती करने की कोशिश की। इतिहास अपने को दोहराता है। अपने बचाव में उसने कैंची आगे की और वह उस लम्पट मालिक के सीने में उतर गई और वो ढेर हो गया। युवती भाग गई। वह भाग कर अपने प्रेमी के पास गई और उसे पूरा किस्सा बताया। रात के अंधेरे में वो दोनों भाग कर नवगांव आ गए।

सुबह जब कारीगर फैक्ट्री पहुँचे, तब मालिक की लाश देख पुलिस को फोन किया। पोस्ट मार्टम के बाद कैची से मौत का पता चला तब मेरा अनुभव काम आया, मुझे नवाब के मर्डर केस की याद आई। मैंने महिला कारीगरों से पूछताछ की। गारमेंट फैक्ट्री छोटी थी, टैक्स बचाने के चक्कर में फैक्ट्री मालिक कच्चा हिसाब रखता था। कोई राजिस्टर नहीं मिला। कारीगरों की उपस्थिति वह एक डायरी में लिखता था और उनका काम भी। काम के हिसाब से मजदूरी मिलती थी। डायरी देखने के बाद पता पता चला कि एक महिला और पुरुष कारीगर गायब है, जिनसे पूछताछ नहीं हुई। जहां वो रहते थे, वहां भी नहीं मिले। मैं पूछताछ के लिए नवगांव गया। घर पर वह युवती मिल गई। मुझे देख कर वह रौ पड़ी और सच सच पूरी घटना की जानकारी दी। वह युवती और युवक शादी करने वाले थे कि यह घटना हो गई। मैंने वहीँ निर्णय लिया कि युवती को छोड़ देना है। उसके चेहरे पर सच्चाई लिखी हुई थी। सच और झूठ की पहचान हम पुलिस वालों को होती है। मैंने उन्हें अपना खुद का काम करने की सलाह दी और वचन लिया कि किसी से इसका जिक्र नही करेंगें। किसी दूसरे को भनक भी लग गई तो वे फंस सकते है। हत्या का सबूत कैंची युवती के पास थी और फैक्ट्री मालिक की डायरी मैंने वहीँ उनकी रसोई में जला दी। अब कोई सबूत नहीं रहा। फैक्ट्री मालिक एक छोटा आदमी था अतः कोई अधिक हंगामा नहीं हुआ और थोड़े दिन बाद मामला शांत हो गया। मैं किसी बेकसूर को बंद नहीं करना चाहता था। बंद करता, जेल जाती, मुकदमा होता, खुद के बचाव में अगर छूट भी जाती तब भी उसकी ज़िन्दगी में दाग रहता और वह बर्बाद हो जाती। गरीब को अच्छा वकील नहीं मिलता, न्याय प्रक्रिया में देरी होती है। ज़िन्दगी समझो बर्बाद हो जाती है। अगर सजा नहीं हुई तब भी जेल की हवा कितने साल खानी पड़े, आप तो अच्छी तरह से जानते हो भंडारी साहब।

"फिर कभी मिले उससे।" मोहन भंडारी ने उत्सुकता से पूछा।
"हां मिलता रहता हूं। उसकी उस लड़के से शादी हो गई और उसके बच्चे भी हैं। खुशहाल ज़िन्दगी व्यतीत कर रही है।"
"कहां रहती है?"
"भंडारी यह नहीं बताऊंगा। उसे बचाया उसका नाम पता किसी को नहीं बताऊंगा। उसकी पहचान नहीं बताऊंगा। मेरे अलावा विनीता उसे जानती है।"
"विक्रम तू हिम्मत वाला है। ऐसे कई केस किये। मुझमें हिम्मत नहीं है, इसलिए दबाव में आ जाता हूं।"
"लगता है कि आज भी दबाव में आ गए?"
"ठीक समझे। अब मैं चलता हूं।" कह कर मोहन भंडारी चले गए।
मोहन भंडारी के जाने के बाद वृन्दा और विनोद ने पूछा "मम्मी आप उसको जानती हो?"
"विनीता बता दो।" विक्रम ने कहा
"एक शर्त है कि किसी को उसकी पहचान नहीं बताओगे।"
"मंजूर है।"
"वो है लता, लता बुटीक वाली, जिसकी दुकान में हम सब गए थे।"

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