Monday, August 31, 2015

दुविधा



इंद्रजीत ऑफिस में फाइलों में उलझा हुआ था। तभी मैनेजिंग डायरेक्टर कनोडिया ने बुलवाया। इंद्रजीत मैनेजिंग डायरेक्टर के केबिन पहुंचा। केबिन में मैनेजिंग डायरेक्टर के साथ वरिष्ठ सहयोगी कर्नल ग्रोवर भी बैठे थे।

"गुड़ मॉर्निंग सर।" इंद्रजीत ने केबिन में प्रवेश करते हुए कहा।
"बैठो, इंद्रजीत।" कनोडिया ने बैठने को कहा।

इंद्रजीत के बैठते ही कनोडिया ने बात आरम्भ की "कर्नल और इंद्रजीत तुम दोनों को एक साथ बुलाने का मेरा मकसद यह है कि हमारी कंपनी एक अमेरिकन कंपनी के साथ जॉइंट वेंचर करने जा रही है। में और हमारे संस्थापक गुरुस्वामी इस अमेरिकन कंपनी स्टीफंस ग्लोबल कारपोरेशन से तीन चार बार मिल चुके हैं और सिंद्धान्तिक रूप से सहमत हैं। अगले सप्ताह मिस्टर स्टीफंस इंडिया रहे हैं और भारत में चार जॉइंट वेंचर करने जा रहे हैं। उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम भारत में एक एक जॉइंट वेंचर करेंगे। हमारे साथ उत्तर भारत के लिए जॉइंट वेंचर होगा। कर्नल तुम कॉन्ट्रैक्ट में महारत रखते हो और इंद्रजीत तुम कानून, लीगल के विशेषक हो। कंपनी के लीगल एडवाइजर शॉ एंड शॉ के साथ मिल कर मैं तुम्हारी टीम बना रहा हूं। तुम्हे क़ानूनी और कॉन्ट्रैक्ट के हर पहलू पर नज़र रखनी है, जिससे हमारे हितों की रक्षा हो।

मैनेजिंग डायरेक्टर के केबिन से बाहर आकर इंद्रजीत और कर्नल ग्रोवर ने कुछ देर तक जॉइंट वेंचर से जुड़े दस्तावेज देखे और फिर शॉ एंड शॉ लीगल एडवाइजर से अगले दिन मिलने का समय तय किया।

इंद्रजीत को स्टीफंस नाम कुछ जाना सुना सा लगा। याद करने की कोशिश करने लगा, परंतु याद आया। इंटरनेट में खोजने पर स्टीफंस ग्लोबल कारपोरेशन के बारे में पता चला। बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स में इंदु का नाम और फ़ोटो देख इंद्रजीत चौंक गया। अभी चार दिन पहले इंदु से मेट्रो में मुलाकात हुई थी। उसने बताया था कि जॉइंट वेंचर करने आई है। स्टीफंस अगले सप्ताह रहे हैं। यह ज़िन्दगी भी क्या इत्तफ़ाक़ है, किस मोड़ पर कब और कैसे मिले, नहीं मालूम। बारह वर्ष पहले इंदु से तलाक हुआ। अमेरिका चली गई, कभी सोचा नहीं था कि मिलना मेट्रो में होगा। अब दूसरी मुलाकात जॉइंट वेंचर मीटिंग के लिए होगी। कभी एक थे, अब मिलेंगें विरोधियों की तरह। तलाक के समय विचार अलग थे परंतु बिना किसी विरोध के सहमति से तलाक हो गया। अब मीटिंग में भी विचार अलग होंगे। इंदु की विचारों से सहमति अनिवार्य नहीं। उसने अपनी कंपनी के हित देखने हैं। योद्धाओं की भांति मिलना होगा।

दो दिन बाद इंदु का फ़ोन आया और बताया कि स्टीफंस इंडिया चुके हैं और दिल्ली में जॉइंट वेंचर के लिए मीटिंग है। इस दौरान कुछ समय निकाल कर मिलेगी। इंद्रजीत ने इंदु को अपनी कंपनी के बारे में नहीं बताया। उसने इंदु से पूछा कि क्या वो उसे स्टीफंस से मिलवाएगी। इंदु ने हंस कर कहा, जरूर मिलवाएगी।

सोमवार दोपहर तीन बजे जॉइंट वेंचर की मीटिंग थी। सुबह इंदु ने इंद्रजीत को फ़ोन किया कि रात का डिनर पर मिल सकते हैं। तीन बजे मीटिंग हैं, उसके बाद होटल में डिनर पर मिलते हैं। इंद्रजीत ने कहा कि देर रात के डिनर पर मुलाकात संभव नहीं हो सकती। वह जल्दी सोने और सुबह जल्दी उठने की आदत बना चुका है। कोशिश कर सकता है पर वादा नहीं करता।
बोर्ड रूम में इंद्रजीत और कर्नल ग्रोवर तीन बजे से पहले ही बैठ गए। ठीक तीन बजे मैनेजिंग डायरेक्टर कनोडिया और संस्थापक गुरुस्वामी स्टीफंस, इंदु और छः और व्यक्तियों के साथ आए।

"सर, ये आठ और हम चार।" इंद्रजीत ने कर्नल ग्रोवर के कान में धीरे से कहा।
"घबराओ मत इंद्रजीत, नाम तुम्हारा इंद्रजीत है। जीतोगे, हिम्मत और साहस से जंग जीती जाती है। छोटी फ़ौज़ बड़ी पल्टन को भी हरा देती है। आत्मविश्वास मत खोना।" कर्नल ग्रोवर ने इंद्रजीत को कहा।

सब अपनी सीट पर बैठ गए। गुरुस्वामी ने सबका परिचय करवाया। इंदु और इंद्रजीत ने आज अखाड़े में उतारे दो पहलवानों की तरह कुश्ती से पहले हाथ मिलाया। इंदु सोचने लगी कि उसे यह उम्मीद नहीं थी कि इंद्रजीत इतने ऊंचे पद पर काम कर रहा है और जॉइंट वेंचर की डील में आमने सामने बात होगी। वह आज भी इंद्रजीत को एक छोटा अफसर समझ रही थी, किन्तु उसकी भूल थी। इंद्रजीत से बारह वर्ष बाद मिल रही थी। अपनी कर्तव्य निष्ठा, काम के प्रति लगन से इंद्रजीत कंपनी के शीर्ष पद तक पहुंच सका।

लगभग सभी बातों पर सहमति बन गई, आर्थिक मुद्दों पर इंद्रजीत ने दो आपतियां जताई। पहली कि जॉइंट वेंचर में उनकी कंपनी का प्रॉफिट में हिस्सा अधिक होना चाहिए। भारतीय कंपनी का दो और विदेशी कंपनी का एक हिस्सा होना चाहिए क्योंकि भारतीय कंपनी का नाम है जमा जमाया काम है। काफी सम्पति है, स्टाफ अनुभवी है। विदेशी कंपनी को आते ही जमा जमाया बुनियादी ढांचा मिल जायेगा। थोड़ी सी पूंजी और तकनीक से पहले दिन से लाभ की स्थिति में विदेशी कंपनी रहेगी। अतः बुनियादी ढांचे को भारतीय कंपनी की पूंजी मानी जाए। दूसरी आपत्ति लाभांश को बाटने पर थी। इंद्रजीत लाभ के दो हिस्से चाहता था।

इंदु और स्टीफंस को यह मंज़ूर था। वे बराबर की हिस्सेदारी चाहते थे और पूंजी में नकद निवेश के हक़ में थे। इन दो मुद्दों पर तकरार को देखते हुए गुरुस्वामी ने सोच विचार के लिए समय मांगा और मीटिंग अगले दिन तीन बजे के लिए स्थगित हो गई। मीटिंग के बाद काफी देर तक गुरुस्वामी, कनोडिया, कर्नल ग्रोवर और इंद्रजीत विचार विमर्श, चर्चा करते रहे। गुरुस्वामी ने सलाह दी कि पूंजी और लाभांश में दो, एक हिस्से की ज़िद छोड़ कर बराबरी के हिस्से पर सहमति उचित है। इंद्रजीत की दूसरी सलाह कि बुनियादी ढांचे को पूंजी माना जाए, उचित और नेक सलाह है।

इंदु इंद्रजीत को डिनर पर बुला कर इन दो मुद्दों पर अपनी बात मनवाने का दबाव डालने के लिए फ़ोन किया, लेकिन इंद्रजीत अपनी रणनीति के व्यस्त था, उसने फ़ोन नहीं उठाया। रात नौ बजे इंद्रजीत मीटिंग से मुक्त हुआ। मीटिंग समाप्त होने पर इंद्रजीत बोला "सर में एक बात बताना चाहता हूं। इंदु मेरी पत्नी थी, बारह वर्ष पहले हम जुदा हुए। पिछले हफ्ते मेट्रो में मुलाकात हुई। उसने बताया था कि जॉइंट वेंचर के लिए आई है, परंतु मुझे अपनी कंपनी के साथ जॉइंट वेंचर की बात नहीं पता थी। इसलिए में कल की मीटिंग से अलग होना चाहता हूं।"

इंद्रजीत की बात सुन कर दो मिनट तक चुप्पी रही फिर गुरुस्वामी ने कहा "इंद्रजीत, हमें तुम्हारी निष्ठा पर पूरा यकीन है। कल की मीटिंग में तुम शामिल होंगे। कल का अतीत आज पर हावी नहीं होना चाहिए। इंदु तुमसे झुकने की अपेक्षा रखती है परंतु खुद समझोते के लिए तैयार नहीं। तुमने झुकना नहीं है। तुम्हारी आज एक अलग पहचान है, अलग अस्तित्व है, जिसका इंदु से कोई सरोकार नहीं है। कल इंदु और तुमने अलग जीना है, जो पिछले बारह वर्षों से हो रहा है। जॉइंट वेंचर के बाद भी तुमने एक अहम भूमिका निभानी है। समझौता क्या तुम रोज रोज करोगे? कदापि नहीं। तुम विवाह के बंधन से मुक्त हो। यदि तुम दोनों आज भी विवाहित होते, तब अलग बात और स्थिति होती। आज तुम इंदु के बंधन से मुक्त हो। अपने कर्तव्य का पालन करो। कर्म तुम्हारी नियति है। फल श्री प्रभु के हाथ में है।"

"जी सर, आपने मेरी दुविधा दूर कर दी।"
"जाओ उसने तुम्हे डिनर पर बुलाया है। उससे मिलो और डिनर का आनंद लो। हमारी रणनीति से उनको अवगत करा सकते हो। श्री प्रभु ही सब कार्य करवाते है। तुम बस अच्छे कर्म करते चलो।"

इंद्रजीत आज अर्जुन की दुविधा में था जिसको कृष्ण के रूप में गुरुस्वामी ने दूर किया।


अकेलापन

सुबह के सात बजे सुरिंदर कमरे में समाचारपत्र पढ़ रहे थे उनके पुत्र ने एक वर्षीय पौत्र को सुरिंदर की गोद मे दिया। ...