Wednesday, August 12, 2015

गपशप



आज कुछ अत्यावश्यक कार्य सम्पूर्ण करने में मोहन को अधिक समय लग गया, जिस कारण दोपहर का भोजन भी समय पर नहीं खा सका। लगभग चार बज रहे थे, भूख लग कर कुछ बुझ सी गई। टिफ़िन खोल कर मोहन ने खाना शुरू किया। मोहन अपने केबिन में खाना खा रहे थे, निर्मल ने केबिन का दरवाज़ा खोल कर देखा कि मोहन खाना खा रहा है, सामने की कुर्सी पर बैठ कर बिना किसी तक़ल्लुफ़ के बातचीत आरम्भ की।

"मोहन किसी ने सही कहा है कि हर खाने पर लिखा होता है खाने वाले का नाम।" कह कर निर्मल ने प्लेट से एक रोटी का कौर तोडा और छोले के साथ अपने मुंह में।
"निर्मल, थोड़ी और लो, चार बजे खाने की भूख ही समाप्त हो गई थी, मेरे से पूरा खाना खाया नहीं जायेगा।" मोहन ने निर्मल को कहा।
थोड़ी और रोटी छोलों के साथ खाते हुए निर्मल ने फिर कहा। "भाभी जी के हाथों में जादू है। क्या ग़ज़ब का खाना बनाती हैं। छोलों का तो जवाब नहीं। वाह वाह, क्या स्वाद है, बता नहीं सकता। तू मोहन बहुत ही खुशनसीब है कि इतनी अच्छी भाभी जी मिली।"

मोहन ने बात बदलते हुए कहा "मुद्दे पर , निर्मल कोई खास बात।"
"पहले पेट पूजा फिर कोई काम दूजा।" भोजन समाप्ति के बाद निर्मल ने कहना आरम्भ किया "मोहन तुमने सुना है या नहीं?" कह कर निर्मल मोहन की ओर देखने लगा।
"मुझे क्या पता कि तुम किस बारे में बात कर रहे हो?" मोहन ने टिफिन बंद करते हुए कहा।
"अरे वही, बोस और उसकी सेक्रेटरी की और कौन सी। आजकल तो गरमा गर्म खबर है सबकी जुबान पर।"
"निर्मल पहेलियां मत बुझाओ। बहुत सा अधूरा काम पड़ा है सम्पूर्ण करने को।" मोहन ने निर्मल से स्पष्ट बात की।
"सो टके की एक बात है कि बोस और उसकी सेक्रेटरी का जबरदस्त अफेयर चल रहा है, और तुम अनजान बने बैठे हो।"

"निर्मल तुम बेकार की बात सुना रहे हो, मुझे इन बातों में कोई किसी तरह की रूचि नहीं है।" मोहन ने निर्मल से छुटकारा पाने के लिए कहा परंतु निर्मल के पास कोई काम करने के लिए था नहीं, उसे केवल समय व्यतीत करना था इसलिए मोहन के सामने बातों का पुलिंदा खोल कर बैठ गया।

"मेरी बात पल्ले बांध ले मोहन, यह बोस सेक्रेटरी की सैलरी डबल कर देगा। इतनी नज़दीकियां है, पट्ठा रोज़ सुबह अपनी कार में लेकर आता है और शाम को भी घर छोड़ कर जाता है अपने घर। अरे यह तो कुछ नहीं भी नहीं, सीधे घर छोड़ने जाये, पट्ठा पहले सेक्रेटरी के साथ घूमता है, रेस्टॉरेंट में, कभी मॉल में, कभी सिनेमा। अरे मोहन मॉल में तो हाथ में हाथ डाल कर ऐसे घूमते हैं, जैसे मियां बीवी हों।"

"मॉल तुम भी घूमते हो, घर देर से पहुंचते होंगे। भाभी जी की नाराज़गी तो सहते कैसे हो?" मोहन ने चुटकी ली।
"अरे हम डरने वालों में नहीं हैं। मज़ाल है उसकी कि ऊंची आवाज़ में मेरे से कुछ बोले? निर्मल ने कड़क हो कर कहा।
"मैं यह सोच रहा हूं कि नीची आवाज़ में भी भाभी जी तुम्हारी खबर ले सकती हैं।" मोहन ने यह सोच कर कहा कि शायद निर्मल के कलेजे में बात सुई की तरह चुभ जाये और निर्मल रुक्सत ले ले परंतु निर्मल जाने का नाम ही नहीं ले रहा था।

"यार तुम तो अपनी बात मुझ पर थोप रहे हो। तुम डरते होगे बीवी से, हम नहीं डरते।"
"निर्मल, यह तो कटु सत्य है कि हर पति अपनी पत्नी से डरता है परंतु यह बात स्वीकार नहीं करता है। निर्मल तुम्हे चुटकला सुनाता हूं। एक बार अदालत में तलाक का मुक़दमा चल रहा था। वकील ने पति से पूछा अब जो मैं पूछूंगा उसका जवाब केवल हां या ना में देना। पति ने कहा ठीक है। वकील ने पूछा हां अब यह बताओ कि क्या तुम्हारी पत्नी ने तुम्हे मारना और पीटना बंद कर दिया है। अब तुम बताओ निर्मल कि इसका उत्तर क्या हो सकता है।"
"भाई यह प्रश्न तुमने पूछा, उत्तर भी दो, क्योंकि हम तो पिटते नहीं।"
"निर्मल सच यह है कि पति पत्नी एक जिस्म दो जान हैं। खट्टी मीठी बातें तो होंगी दोनों में। एक सिक्के के दो हिस्से हैं। कभी एक ऊपर तो कभी दूसरा। एक दूसरे की बात मानना झुकना नहीं है, दूसरे की भावनाओं की कद्र करना है। दो बातें अपनी मनवाओ और दो बातें दूसरे की मानों। यही सफल गृहस्थी का मूल मन्त्र है।"

"गुरु मोहन की जय हो, चरण स्पर्श करने को दिल करता है। जय हो।" निर्मल ने मोहन को चुप करवाते हुए कहा, लेकिन बात फिर बोस और उसकी सेक्रेटरी की गई। "कितने की शर्त लगाते हो?"
"बिना शर्त लगाए बात करो, तुम भूल रहे हो कि मैं जुआ नहीं खेलता।" मोहन की बात सुन कर निर्मल बोलने लगा "अंदर की खबर है, सैलरी डबल और प्रमोशन पक्की खबर है।"
"निर्मल जब अंदर की खबर रखते हो तब यह भी पता होगा कि मेरी कितनी बढेगी।"
"यह नहीं मालूम।"
"क्यों?"
"तुम नीरस व्यक्ति हो। कभी किसी से मेल जोल नहीं रखते हो। सारा दिन काम में डूबे रहते हो। कोई नहीं सिफारिश करेगा तुम्हारी सैलरी बढ़ाने के लिए। कुछ दूसरों का देखो, लोग तुम्हारा भी देखेंगे।"
"तुम कहना चाहते हो कि सिर्फ चापलूसों की सैलरी बढेगी।"
"ऐसे नहीं है। सबकी बढेगी, क्योंकि तुम जैसे दो चार जो काम के बुखार में लिप्त होते हैं, कंपनी उनके दम पर चलती है पर हर मालिक कच्चे कान का होता है, उसे चापलूसों की जरुरत होती है। उसे ख़ुशी होती है और दुनिया में सबको दिखता है कि मेरे पास विश्वास पात्रों की बहुत बड़ी फ़ौज़ है।"

मोहन ने मन ही मन सोचा कि निर्मल सत्य बोल रहा है कि सैलरी अधिक चापलूसों की बढ़ती है और काम वालों की कम। मोहन ने घडी देखी बज रहे है। उसने अपना कंप्यूटर बंद किया और चलने के लिए ब्रीफ़केस उठाया।

"तबियत तो ठीक है , तुम बजे जा रहे हो।"
"ठीक थी परंतु जो सैलरी इन्क्रीमेंट की बात बताई, ख़राब होने लगी है कि जो काम करता है उसकी सैलरी कम बढ़ती है और चापलूसों की अधिक। फिर रुक कर काम कौन करे। दूसरी नौकरी ढूंढते है।" मोहन कह कर अपने केबिन से निकल पड़ा।

मोहन के जाने के बाद निर्मल फ़ौरन मैनेजिंग डायरेक्टर के केबिन में मिलने गया। साब जाने की तैयारी में थे। एक सैलूट मार कर धीरे से कहा "सर जी, एक बात करनी है, बहुत जरुरी है।"
"मुझे जल्दी है, फटाफट दो मिनट में।"
"सर जी, मोहन की सैलरी बढ़ा दीजिये, जाने की सोच रहा है।"
"क्या कह रहे हो, चला गया तो काम कौन करेगा।"
"कुछ सोचो सर जी।"
"ठीक कह रहे हो। अगर बात सच्ची है तो बढ़ा दूं।"
"सच्ची खबर है। झूठ क्यों बोलूंगा और वो भी आप से। वह बात अलग है कि मैं काम नहीं करता परंतु कंपनी की चिंता तो करनी है।"
"ठीक है, इन्क्रीमेंट वाली फ़ाइल लाओ, इस काम में देर नहीं, उसकी ठीक ठाक सैलरी बढ़ानी चाहिए। आदमी काम का है।"

निर्मल फटाफट फ़ाइल ले आता है और मोहन की सैलरी बढ़ा दी जाती है। मोहन की सैलरी बढ़ाने के बाद निर्मल कान खुजाने लगता है। साब कान खुजाते देख निर्मल के मन की बात जान जाते हैं।

"कुछ कहना चाहते हो निर्मल?"
"सर जी, मेरा भी थोडा सा ख्याल रखो, कंपनी के बारे में चिंतित रहता हूं, तभी भागता हुआ आपके द्वार आया।"
"निर्मल, तुम्हारी तो बिना कहे कर दी थी, तुम्हे चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं है।"
"सर जी, थोड़ी और कर दीजिये ना।"
"निर्मल तू मानेगा नहीं, मेरे हाथों अत्याचार करवा के दम लेगा। चल तेरी भी थोड़ी और बढ़ा देते हैं।"

निर्मल आस्वस्त हो कर मैनेजिंग डायरेक्टर के केबिन से निकला। बाहर आते ही उसने मोहन को फ़ोन लगाया।
"मोहन बाबू, चिंता मत करना, मैंने पता लगा लिया है। आपकी सैलरी भी अच्छी बढ़नी वाली है। कल इन्क्रीमेंट लैटर मिल जायेगा। अब आपको कही भटकने की जरुरत है। नौकरी बदलने की चिंता छोड़िये।"

"जी शुक्रिया निर्मल जी। आपके मुंह में घी शक्कर। कल ऑफिस में मिल कर बात करते हैं। गुड नाईट निर्मल बाबू।"
"गुड नाईट मोहन बाबू।"

रात को खाना खाने के पश्चात मोहन फ्लैट के नीचे सोसाइटी के अंदर टहलने लगा। वैसे तो मोहन खाना खाने के बाद टेलीविज़न ही देखता था। कुछ देर देख कर जल्दी सोने वाले प्राणियों में शामिल था। सारा दिन काम करने के बाद शरीर को भी आराम चाहिए अगले दिन के लिए। एक तो आज मोहन ऑफिस से जल्दी गए थे और ऊपर से ऑफिस में चापलूसों की राजनीति से परेशान। कुछ मन भी उदास और उचाट हो रहा था, कि हर ऑफिस का यही हाल है, कहां जाएं। हर जगह 20 से 25 प्रतिशत लोग काम करते हैं, जिनकी बदौलत कंपनी क्या देश भी चलता है और बाकी चापलूसों को तनख्वाह इन्ही की बदौलत मिलती है। टहलते हुए बेंच पर बैठ गए। बेंच के समीप सोसाइटी के कुछ पुरुष गपशप कर रहे थे।

पहला - तुमने सुना तीस नंबर वालों की लड़की लिवइन में रह रही है।
दूसरा - कहां रह रही है।
पहला - गुड़गांव रह रही है अपने यार के साथ। वहीँ ऑफिस में काम करती है। सुना है अपने बॉस के साथ टांका सेट कर लिया है। मोटी तनख्वाह। मोटा बॉस। पांचों उंगलियां घी में हैं।
तीसरा - सर कड़ाई में।
सब हस पड़े।
दूसरा तीसरे से - तुम ठीक कह रहे हो। आज ऐश है। लिवइन का क्या भरोसा। कब अलग हो जाएं।
चौथा - तभी मैं सोचू कि इतने कम समय में तीस नंबर वाले के पास मोटी रकम कहां से आई। पिछले साल तक तो पट्ठे के घर टूटे सोफे होते थे। अब एक साल में घर की हर चीज़ नई गई। चमचमाती दो कारें गई। सब लिवइन का कमाल है। बच्चे तो हमारे भी नौकरी करते हैं। जैसे पहले रहते थे, वैसे आज भी रहते है।
पहला - बाय गॉड की कसम, मैं तो सोच नहीं सकता कि आज कल की पीढ़ी इतनी नीचे जा सकती है, कि लिवइन में खुले आम रहते हैं।
दूसरा - अब तो सुप्रीम कोर्ट ने भी मान लिया है कि लिवइन रह सकते है। बच्चे हुए तो पूरा हक़ मिलेगा।

मोहन उनकी बातें सुनता रहा। ऑफिस में चक्कर, हर जगह यही बात। निर्मल यही बात कर रहा था और यहां भी यही हाल है। सबको कम समय में तुरंत सफलता चाहिए। इंस्टेंट सक्सेस चाहिए। अपनी तो कोई देख नहीं रहा, जिसको देखो दूसरे की बात कर मजे ले रहा है। गपशप में अपना समय व्यतीत कर रहे हैं।  बातें सुन कर उसका मन और अधिक उचाट हो गया। वह घर कर बिस्तर पर लेट गया और नींद की गिरफ्त में गया।

अगले दिन ऑफिस में निर्मल मोहन के केबिन में दनदनाता आया और कुर्सी पर बैठते कहने लगा। "मुंह मीठा करवाओ, सैलरी बढ़ गई। मियां अब तो खुश होंगे।"
"रातों रात कायाकल्प कैसे हो गई। कल रात तक तो कुछ ऐसा नहीं था।"
"गुरु, कंपनी का नमक खाते हैं, कंपनी के हित की सोचते हैं। कल तुम्हारे जाने के बाद मेरा दिल बहुत उदास हुआ कि अगर मोहन जी की सैलरी नहीं बढ़ी तो कंपनी अपना होनहार हीरा खो देगा। गुरु तुम तो नाराज़ हो कर चले गए परंतु मैं समझ गया और मैनेजिंग डायरेक्टर से मिला और तुम्हारी सिफारिश की। इन्क्रीमेंट लैटर आता ही होगा।"
"निर्मल जी, बहुत बहुत शुक्रिया। हर कोई तनख्वाह के लिए काम करता है। घर भी तो चलाना है।"
"इसी लिए तो सिर्फ अपने दोस्त मोहन की खातिर कल रात बात की।"
कल शाम निर्मल बातों में लगा रहा और आज सुबह फिर निर्मल बातों में लगा हुआ है, जिस कारण मोहन की रूचि काम करने की नहीं हुई। थोड़ी देर बाद निर्मल चला गया लेकिन मोहन का मन उदास और उचाट रहा। दोपहर बाद उसे इन्क्रीमेंट लैटर मिल गया। उसके मन मुताबिक तो नहीं बढ़ी फिर भी ठीक ठाक बढ़ोतरी हो गई। कुछ प्रसन्ता चेहरे पर आई और निर्मल का केबिन में फिर से आना।

"गुरु मुंह मीठा करवाओ। ऐसे नहीं चलेगा।"
"निर्मल मैं तो रात का डिनर भी करवाने को तैयार हूं। मिठाई तुम खिलवाओ। मेरे से ज्यादा हुई है।"
"क्यों नहीं अभी मंगवाता हूं।" कह कर निर्मल खिसक गया। निर्मल को जाता देख मोहन समझ गया कि कंजूस निर्मल से छुटकारा पाना हो तो खर्चे की बात कर दो। निर्मल के जाने के बाद मोहन काम में व्यस्त हो गया।

आदत के अनुसार मोहन को ऑफिस की राजनीति, गपशप में कोई रूचि नहीं थी। उड़ती बाते कानों में पड़ जाती, लेकिन वह तुरंत निकाल देता। कभी सोचा या विचार नहीं करता। मोहन ने सैलरी इन्क्रीमेंट में पक्षपात देख कर समय पर ऑफिस से जाना आरम्भ कर दिया। छः साढ़े छः बजे तक ऑफिस से जाने लगा और रात के खाने के बाद सोसाइटी के पार्क में कुछ देर टहलने जाता। समय से घर पहुंचने के कारण पत्नी और बच्चों के साथ अधिक समय बिताने लगा। आदत के अनुसार सुबह समय से पहले ऑफिस पहुंच कर काम में व्यस्त हो जाता। किसी से कोई गपशप नहीं। ऑफिस में सिर्फ काम की बात। निर्मल के पास करने के लिए कुछ खास काम नहीं है। कंपनी ने उसे एक तरह से जासूस का पद दे रखा था, कि सब पर नज़र रखे और रिपोर्ट मैनेजिंग डायरेक्टर को दे।

कुछ दिन बाद निर्मल मोहन के केबिन में मिलने गया "मोहन बाबू, हमारे से कोई नाराजगी है क्या, मिलना ही छोड़ दिया।"
"पानी में रह कर मगर से बैर, तौबा तौबा।" मोहन ने सिर्फ मन ही मन कहा, इच्छा तो एक बार हुई कि कह ही दे, परन्तु सिर्फ मुस्कान के साथ स्वागत किया "बैठिये निर्मल बाबू।"

निर्मल को किसी औपचारिता की आवश्यकता नहीं होती। वह तो मोहन के कहने से पहले ही कुर्सी पर विराजमान हो चुके थे।

"मोहन तुम्हें पता है वो रंजीता दो दिनों से ऑफिस नहीं रही।"
"नहीं, वैसे यह रंजीता कौन से विभाग में कार्यरत है।"
"कौन सी दुनिया में रहते हो मोहन, सारे ऑफिस में हर जुबान पर रंजीता के चर्चे हैं और आपको मालूम नहीं।"
"कुछ बताओ तो पता चले कि क्या बात है, रंजीता कौन सी हुई, पहचान नहीं पा रहा हूं।"
"मार्केटिंग में वो मोटी सी, तुम्हारे पास भी तो काम के लिए आती थी।"
"अच्छा, समझ गया कि रंजीता कौन सी वाली, पर हुआ क्या जो मुझे नहीं मालूम।"
"आज सुबह उसके घर वाले आये और पूछताछ कर रहे थे कि रंजीता कहां है। दो दिन से तो ऑफिस नहीं रही थी, बिना छुट्टी लिए, कोई फ़ोन नहीं, कोई इत्तला नहीं। उसका फ़ोन भी बंद है। घर पर से तो दस दिनों से गायब है। घर पर कहा कि टूर पर है। दो दिनों से ऑफिस भी नहीं रही और फ़ोन भी बंद है। सारा ऑफिस रिसेप्शन पर जमा है। घर वालों ने हंगामा कर रखा है। पुलिस को भी फ़ोन कर दिया है।"
"इस में घबराने की क्या जरुरत है। बता दो कहां टूर पर गई है।"
"मोहन बाबू टूर पर भेजा हो तो बताएं, भाग गई घर से।"
"तुम्हे कैसे पता कि वो घर से भाग गई है?"
"मोहन बाबू उड़ती चिड़िया के पर पहचान लेते है। बाल धूप में सफ़ेद नहीं किये।"
"तुम्हारे तो काले हैं।"
"कलर का कमाल है। रंजीता लिवइन में रह रही है अपने यार के साथ। अब ऑफिस में नहीं आयेगी। चिड़िया उड़ गई है। घर वाले शादी के लिए दबाव बना रहे थे। इश्क और मुश्क छुपा नहीं सकते। ऑफिस में सब को पता था कि एक लड़के के साथ चक्कर है उसका। भाई खूबसूरत थी सारे ऑफिस के जवान पीछे थे कि शायद किसी का कोई चक्कर चल जाए परंतु उसका चक्कर तो कहीं और था।"
"निर्मल पूरे खबरी हो। यहां क्या कर रहे हो। किसी न्यूज़ चैनल में भर्ती हो जाओ।"
"मोहन, तेरी यह अदा मार गई।" कह कर निर्मल चलने के लिए उठा तो मोहन ने पूछ ही लिया "निर्मल तुम बोस और सेक्रेटरी का भी कुछ बता रहे थे कुछ दिन पहले।"
"छोड़ो यार पुरानी बात हो गई, हमने क्या करना है उनका, ताज़ा खबर रंजीता है।" कह कर निर्मल चला गया और मोहन सोचने लगा कि लोगों की आदत गपशप की है। दो चार दिन मसाले दार चटपटी बातों में गुज़ार देते हैं। उन्हें किसी से कोई तो हमदर्दी है और कोई अफ़सोस। समय बिताने के लिए गपशप। किसी की ज़िन्दगी चली जाए परंतु लोगों की गपशपग नहीं समाप्त होती। किसी से कोई सहानभूति नहीं। चटपटी बातों का बाजार गर्म रखते है गपशप वाले।

हर रात की तरह आज भी खाना खाने के बाद मोहन पत्नी के साथ सोसाइटी के पार्क में टहल रहे थे, वहीँ पांच आदमिंयों का एक झुण्ड बातों में लगा था। मोहन टहल रहा था उसके कानों में बात सुनाई दी। एक व्यक्ति कह रहा था
"अरे आज आठ नंबर वालों का लड़का एक लड़की को घर ले आया। बिना शादी के दोनों रह रहे हैं।"
दूसरा - मैंने तो सुना है, दोपहर में आया और माँ-बाप से कहा कि यह मेरे साथ रहेगी। शादी करेंगे नहीं। लिवइन में रहेंगे।
तीसरा - अरे आठ नंबर वाला वही है जिसने तीस नंबर वाले की लड़की की खबर सुनाई थी। खुद के घर लड़का खुले आम लड़की ले आया।
चौथा - तब तो मसाले दार चटपटी बातें सुनाता था, अब तो खुद सुननी पड़ेगी।
पांचवा - तभी पठ्ठा आज नीचे नहीं उतरा।
पांचो हंसने लगे और मोहन मंद मंद मुस्कान के साथ मन ही मन कहने लगा गरम गरम चटकारे दार बातों में लोग अपना समय बिता देते हैं। अपने बनियान को कोई देखता नहीं, औरों के बनियान में झांकते रहते हैं।


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कब आ रहे हो

" कब आ रहे हो ?" " अभी तो कुछ कह नही सकता। " " मेरा दिल नही लगता। जल्दी आओ। " " बस...