Monday, September 28, 2015

खरौंच



सरदार जोगिन्दर की उम्र सतर की हो रही है, लगभग रिटायरमेंट की सी ज़िन्दगी व्यतीत कर रहे हैं। व्यापार बच्चे संभालते हैं, ऑफिस दो तीन घंटे के लिए चले जाते हैं, आखिर घर भी बैठ कर क्या करें, समय नहीं कटता है। सुबह सैर करने पार्क जाते हैं फिर थोड़ी सा समय ध्यान में। कई सारे समाचार पत्र पढते है, फिर दोपहर के खाना खाने के बाद थोड़ी सी झपकी और शाम के चार बजे ऑफिस जाना। बच्चे कहते हैं कि चार बजे ऑफिस कर औपचारिकता पूरी करने की क्या आवश्कयता है, घर आराम करें, परंतु सरदार जोगिन्दर हंस कर कहते कि घंटे दो के लिए ही सही, ऑफिस आने से मना करें। ऑफिस कर दिमाग चलता है, हाथ पैर तो सुबह बाग़ में जा कर खोल लेते हैं, दिमाग ऑफिस में खुलता है जब वे एकाउंट्स को देखते है और बच्चों को सलाह मशवरा देते हैं। जब वो ऑफिस चलाते थे, तब और आज जब बच्चे चलाते हैं, बहुत अंतर आया है। नए तौर तरीके, इंटरनेट, -कॉमर्स ने काम करने का तरीका ही बदल दिया है। सब कुछ बदल जाए, व्यापार की दो चीजे नहीं बदलेगी। सरदार जोगिन्दर मूंछो को ताव दे कर रौब से कहते हैं, कि व्यापार में पूंजी और श्रम हमेशा चाहिए। बिना पूंजी के व्यापार नहीं चलता वहीँ बिना श्रमिकों के भी व्यापार नहीं होता। मालिक का होना ज़रूरी है तो नौकरों का भी। पूंजी लाभ के द्वारा बढ़नी चाहिए और श्रमिकों से काम करवाना भी मालिक को आना चाहिए। इसीलिए सब पर नज़र रखने ऑफिस जाते हैं।

सुबह बगीचे की सैर करने सरदार जोगिन्दर पैदल ही जाते थे। घर के समीप ही था छोटा सा बाग, जहां अड़ोस पड़ोस के आदमी आते थे। सबका अपना अपना ग्रुप बना हुआ है। बच्चे अपना एक तरफ खेल रहे हैं। कुछ बैडमिंटन तो कुछ वॉलीबॉल। कुछ स्केटिंग कर रहे हैं। एक लड़कों का समूह क्रिकेट पार्क के कोने में खेलने लगा। पार्क के बीच बेंच पर सरदार जोगिन्दर ग्रुप के साथ राजनीति पर चर्चा कर रहे थे। अखबार में से खबरे पढ़ते हुए चर्चा हो रही थी। एक पेड़ के नीचे चार बुजुर्ग ताश खेल रहे थे।

राजनीति पर चर्चा होते हुए अचानक एक सज्जन गर्म हो गए "प्रजातंत्र में सरकार हमारी नहीं सुनेगी तब चुनाव करवाने का क्या मतलब? हमारे वोट का कोई अर्थ नहीं। सरकार अपनी मनमानी करती है। उसकी सारी नीतियां जनता के अहित में हैं। अपनी जेबें भर रहे हैं नेता।"

"हम यहां पर राजनीति पर चर्चा ऐसे कर रहे हैं, जैसे देश के नेता हमारी सुन लेंगे और हमारी बातों को अमल में ले आएंगें।" दूसरे सज्जन ने उनको चुप करवाने के लिए कहा।

सरदार जोगिन्दर समझ गए कि यह चर्चा झगडे में भी बदल सकती है। सैर ख़त्म करके घर जाने में उन्होंने भलाई समझी। चलते चलते कह गए "उनको देखो, एकांत में सारे जहां से बेखबर पत्तों की बाजी में व्यस्त हैं। लगता है तकिये के नीचे ताश की गड्डी रख कर सोते है।" सरदार जोगिन्दर का इशारा ताश खेलने वाले ग्रुप की और था।

गर्म होती चर्चा एकाएक समाप्त हो गई। सरदार जोगिन्दर के साथ कुछ और भी गोष्ठी से उठ गए। सरदार जोगिन्दर का मानना है कि सुबह की सैर सेहत सुधारने के लिए करते है, आपस में बहस करके सेहत ख़राब होगी। कुछ देर बाद घर पहुंचे। कोठी के दरवाज़े पर तीनों ड्राईवर चाय पी रहे थे। अंदर देखा कि कारें अभी साफ़ नहीं हुई थी।
सरदार जोगिन्दर ने तेज आवाज़ में तीनों ड्राईवर को डांट लगाई।  "कार कौन साफ़ करेगा, चाय की चुस्कियों में बातें, गपशप हो रही हैं। काम करके कोई राजी नहीं। निठल्लों की तरह बिठा कर आरती उतारो इनकी। मालिक हम हैं, मज़े नौकर करते हैं। हरामखोर कहीं के।"

सरदार जोगिन्दर के कोठी के अंदर जाने पर तीनों ड्राईवर खुसर फुसर करने लगे कि सुबह सुबह बुड्ढे का दिमाग गर्म है। ज़रा बच कर रहना। चाय के कप एक कौने में रख कर ड्राईवर कार साफ़ करने में लग गए।

बच्चे भी सरदार जोगिन्दर से बहस नहीं करते थे, आखिर वे अपने तबुर्जे से बात करते थे। इतना बड़ा व्यापार खड़ा किया और बच्चों को सौंप दिया फिर भी अपनी पैनी नज़र हर किसी पर रखते हैं। यह जरुरी भी है कि बच्चों का हर मोड़ पर मार्गदर्शन किया जाए।

डांट खाने के बाद ड्राईवर सरदार जोगिन्दर से बचते फिर रहे थे। उनकी नज़र में सरदार जोगिन्दर का दिमाग गर्म था। हर ड्राईवर की मंशा थी कि उसकी ड्यूटी सरदार जोगिन्दर के साथ लगे, किन्तु किसी एक की तो ड्यूटी लगनी ही थी।

सरदार जोगिन्दर शांत थे। वे किसी को खाली नहीं देख सकते थे। हर किसी को काम में व्यस्त देखना चाहते थे। आराम शाम के बाद। दिन में काम के समय काम और शाम के बाद आराम। अपनी दिनचर्या के बाद चार बजे सरदार जोगिन्दर ऑफिस के लिए रवाना हुए। कुछ काम देखा और पुराने कर्मचारी सम्पूर्ण के साथ हंसी ठट्ठा करते रहे। ड्राईवर परेशान कि सुबह डांट लगा दी और अब हंसी ठट्ठा हो रहा है। ड्राईवर की नज़र में सरदार जोगिन्दर का दिमाग सरक गया है।

सात बजे सरदार जोगिन्दर कार में बैठे। नारायणा फ्लाईओवर पर ट्रैफिक जाम था। बम्पर से बम्पर सटा हुआ था कारों का। सरदार जोगिन्दर ट्रैफिक जाम में समय का सदुपयोग कर रहे थे।  जपजी पढ़ कर सुकून पा रहे थे। तभी पीछे से एक कार ने थोड़ी सी टक्कर मारी। ड्राईवर ने कार रोकी और नीचे उतर कर कार को देखने लगा। ट्रैफिक बम्पर से बम्पर चल रहा था जिस वजह से पिछली कार का बम्पर सरदार जोगिन्दर की कार से लग गया। दो बम्पर आपस में मिल कर चुम्बन ले रहे थे। ड्राईवर गर्म हो गया और हर्जाना मांगने लगा। ट्रैफिक जाम में कोई और नहीं कार से उतरा। हॉर्न पर हॉर्न बजने लगे। पिछली कार में एक पचास वर्ष के सज्जन थे। कार से उतर कर दोनों कारों का मुआयना किया। उसकी कार का अगला बम्पर सरदार जोगिन्दर की कार के पिछले बम्पर से टकरा कर चुम्बन ले रहा था। दोनों बम्पर सही सलामत थे। अधिक से अधिक खरौंच गई थी। उसने अनुरोध किया कि ट्रैफिक के कारण सिर्फ बम्पर से बम्पर लग गए हैं। कार में कोई डेंट नहीं लगा है, इसलिए हर्जाना नहीं बनता, लेकिन क्योंकि ड्राईवर ने सुबह डांट खाई थी इसलिए वह गर्म हो गया और हर्जाना मांगने लगा। पीछे वाली कारें दूसरी लेन में जाने लगी, एक नज़र उन पर डालते और आगे बढ़ जाते। इस भाग दौड़ की दुनिया में कोई किसी की परवाह नहीं करता। अपने आप सुलट लेंगे।

पिछली कार वाले सज्जन ने अनुरोध किया कि कार में यदि मालिक हैं तो एक बार कार को देख लें, जो वो कहेंगे मंजूर होगा। ड्राईवर ने डरते हुए सरदार जोगिन्दर से बात की। सरदार जोगिन्दर नीचे उतरे और देखा कि कोई डेंट नहीं लगा है। आपस में दोनों बम्पर मिले हुए हैं। मुस्कुरा कर सरदार जोगिन्दर ने कहा ट्रैफिक जाम में हलकी खरौंच लग जाती हैं। लड़ाई में क्या रखा है। ड्राईवर को कार चलाने को कहा कि ख़ामख़्वाह लड़ने वाली बात नहीं है। पिछली कार वाले सज्जन ने सरदार जोगिन्दर का शुक्रिया अदा किया। दोनों करें चल पड़ी और पीछे वाली कारों के हॉर्न बजने बंद हो गए।


ड्राईवर सोच रहा था कि लगता है बूढ़ा सठिया गया है। सुबह चाय पी रहे थे, डांट मार दी और अब कार में खरौंच लग गई तब छोड़ दिया। लेकिन सरदार जोगिन्दर का मानना था कि बात का बतंगड़ नहीं बनाना चाहिए। झगड़ा कम और काम अधिक होना चाहिए। खरौंच के कारण झगड़ा नहीं, बिलकुल नहीं।

बुढापा

कुछ उम्र में बढ़ गया कुछ जिस्म ढल गया कुछ पुराना हो गया कुछ बुढापा आ गया कुछ अनुभव आ गया कुछ कद्र भी पा गया...