Thursday, September 24, 2015

मेरे बाबा ने दरबार



मेरे बाबा ने दरबार लगाया दर्शन कर लैण दे,
मैनू नच लैण दे, मेनू नच लैण दे।

दीवाना हो गया मैं जब ये श्रृंगार देखा,
मेरा मन झूम उठा जब ये दरबार देखा,
गुरूजी बागा पहने बाबा मुस्कुरा रहे हैं,
और मस्ती में झूमे यही समझा रहे हैं,
जमकर प्यार बरसता देखा बाबा के दो नैनों से,
मैनू नच लैण दे, मेनू नच लैण दे।

तुम्हारे दर पे सतगुरु जो भी आया सवाली,
झोलियां भरी उसकी गया ना कोई खाली,
द्वार सा चाहे तेरा चाहू में डंका बजता,
जिसे भी सतगुरु चाहे नसीब पल में बदलता,
मुझ को भी इनकी चौखट पे मत्था टेक लैण दे,
मैनू नच लैण दे, मेनू नच लैण दे।

भक्त जितने भी आए तेरी जयकार करते
और मेरे दाता तुमसे बड़ा ही प्यार करते,
सभी बाबा के दर पे खज़ाना लूटते हैं,
मैं भी आया बड़ी दूर से झोली तो भर लैण दे,

मैनू नच लैण दे, मेनू नच लैण दे।
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