Friday, September 18, 2015

नही



रिहाना पढ़ने में होशियार थी। बी.. तक पढ़ाई पूरी करने के बाद उसे कैंपस प्लेसमेंट में नौकरी मिली। रिहाना नौकरी करने लगी। रिश्तेदारों में कानाफूसी होने लगी कि पढ़ाई तो ठीक है, नौकरी की क्या ज़रूरत है। अच्छे घर की है, पता नहीं घर वाले निकाह क्यों नहीं करते। कोई खोट तो नहीं। रिहाना के कान में ये बातें पड़ती तो मां बाप से झगड़ पड़ती कि अभी उसे शादी नहीं करनी। अपने पैरों पर खड़ा होना है।
अब्बा - मैं कभी भी दकियानूस नहीं रहा, इसलिए तुम्हे पढ़ाया, लिखाया। तुम्हारी नौकरी से भी कोई ऐतराज़ नहीं है।
लेकिन अम्मी को रिहाना के निकाह की जल्दी थी - अब मैं और नहीं रुक सकती। रिहाना के हाथ जल्दी पीले होने चाहिए। हमें इसके पैसों की ज़रूरत नहीं है। सुनो वो वसीम मुझे पसंद है। उसके घर से संदेश भी आया है। कब तक बैठे रहेंगे। अच्छे लड़के घर बैठे नहीं मिलते। उम्र बढ़ जाए, शादी नहीं होती।
रिहाना - इतनी जल्दी क्या है। अभी बीस की हूं। कौन सी बूढ़ी हो गई हूं।
अब्बा - बेटे यह तो कुदरत का बनाया नियम है। जिस्मानी जरूरतों के लिए निकाह की परंपरा शुरू हुई। प्राकर्तिक है। शादी ज़रूरी है। रुकने को साल दो रुक भी जाएं। इस बात का भी ख्याल रखना चाहिए कि यदि रिश्ता अच्छा मिले तो चूकना नहीं चाहिए। वसीम अच्छा लड़का है। घर देखा दिखाया है। यदि तेरी पसंद में कोई और है तो बता दे, तेरी पसंद को तवज्जो दी जाएगी।

रिहाना की पसंद या ना पसंद का कोई अर्थ नहीं था। वसीम को उसने देखा हुआ था। रिश्तेदारी थी। एक दूसरे के घरों में आना जाना था। वसीम देखने में सुन्दर था। आकर्षक व्यक्तित का स्वामी था। रिहाना भी उससे कम थी। ऊंचे कद के वसीम के साथ कद की बराबरी करती थी। खूबसूरत लंबा कद, छरछरा बदन। दोनों को देख कर ऐसा लगता था कि जैसे ऊपर वाले ने एक दूसरे के लिए बनाया है। आधुनिक विचारों और खुले वातावरण में पली बढ़ी रिहाना की शंका वसीम की मां थी, जो पुराने ख्यालों, विचारों की थी। शक्ल से पूरी खड़ूस लगती थी। खैर पांचो उंगलियां कभी बराबर नहीं होती। ख़ुशी ख़ुशी रज़ामंदी से पांच लाख मेहर की रकम के साथ रिहाना और वसीम का निकाह हो गया।

निकाह के बाद दो महीने हंसी ख़ुशी से कब बीत गए, रिहाना को इल्म भी नहीं हुआ। हनीमून लंबा होता नज़र आया तो वसीम की मां ने ताने कसने शुरू कर दिए कि काम धंधा भी देख वसीम, कब तक लुगाई की शलवार से बंधा रहेगा। ऑफिस का काम कौन देखेगा। नौकरों के भरोसे काम धंधे नहीं चलते। वसीम ने ऑफिस जाना शुरू कर दिया। रिहाना को सास के शब्द लुगाई और शलवार से बंधा रहना कलेजे को चीर गए। उसको पता था कि उसकी सास खड़ूस है परंतु ताने और बोली गंवारों वाली बोलेगी, इसकी उम्मीद नहीं थी। वसीम ऑफिस के काम में व्यस्त रहने लगा। रात देर से आता। रिहाना पूरा दिन वसीम के इंतज़ार में काटती। सास रसोई में रिहाना को पूरी तरह झोंकना चाहती थी। शादी से पहले कभी चाय, नूडल बना लिए, इससे अधिक रसोई का कभी काम नहीं किया। पहले पढ़ाई, फिर नौकरी में सारा दिन निकल जाता था। अब निकाह के बाद पूरे घर की रसोई उसके बस की बात नहीं थी। खाना अच्छा बनता नहीं था, सास रात को वसीम के आगे रोना धोना शुरू कर देती। हर रोज़ के तानों से वसीम और रिहाना चिड़चिड़े हो गए। प्यार के स्थान पर झगडे होने लगे।

एक दिन रिहाना ने वसीम को कह दिया कि रसोई उसके बस की बात नहीं है। वह काम करना चाहती है। सास का गुस्सा सातवे आसमान पर पहुंच गया कि हमारे घर की लड़कियां, बहुएं घर से बाहर नहीं निकलती है। नौकरी नहीं कर सकती। रिहाना ने कहा वह वसीम का ऑफिस में हाथ बटाना चाहती है। कहीं बाहर नौकरी की बात नहीं कर रही है। सास ने इनकार कर दिया कि मतलब ही नहीं। शादी से पहले बाप ने सर पर चड़ा रखा था, यहां नहीं चलेगा। औरत की औकात पैरों में है, चुपचाप पड़ी रहो।

रिहाना की इस बात पर बहुत बहस हुई कि आज लड़कियां अंतरिक्ष में पहुंच गई हैं। देश की प्रधानमंत्री बन देश चला रही हैं और यहां पैरों की जूती समझा जा रहा है। भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका और ब्रिटेन में महिलाएं प्रधानमंत्री बनी और बखूभी देश पर राज किया, क्या मैं एक ऑफिस नहीं चला सकती। मैं तो अपने शौहर का हाथ बटाने की बात कर रही हूं।

खैर दकियानूस और खड़ूस सास को यह तू तू मैं मैं पसंद नहीं आई और उसने रिहाना के मां-बाप को फ़ोन करके बुलवा लिया। शाम के समय वसीम का परिवार, रिहाना का परिवार और तीन रिश्तेदार बातचीत पर बैठे। आरोपों के बीच बात बिगड़ गई। वसीम हताश हो गया और गुस्से में बोल उठा कि ऐसी शादी का क्या मतलब जहां सिर्फ लड़ाई ही हो, दो पल चैन से नहीं बिता सके। तैश में वसीम की मां और रिहाना की सास ने कह दिया कि उसकी मति मारी गई थी कि रिहाना से वसीम का निकाह करवाया, वरना वसीम के लिए लड़कियों की लाइन लगी हुई थी। आज भी एक हां कर दूं, हाथ जोड़ कर लड़कियों के मां-बाप की लाइन लग जाएगी।

इतना सुन रिहाना ने कह दिया कि करवा लो दूसरी शादी। मैं भी देखूं कितनी लंबी लाइन लगती है।

बात को शांत करने के लिए एक रिश्तेदार ने कह दिया कि दूसरी शादी कोई मजाक नहीं है, पहले बीवी से रज़ामंदी ले लो।

हर कोई बोले जा रहा था, कोई किसी की नहीं सुन रहा था। वसीम ने झगडे में बोल दिया कि उसकी शादी की वजह से झगड़ा हो रहा है, वो ऐसी शादी नहीं चाहता। रिहाना को आज़ाद करता है। जहां जैसे रहे, वो आज़ाद, रिहाना आज़ाद। रिहाना को तलाक़ देता है।

तलाक़ तलाक़ तलाक़।

तीन बार तलाक़ बोल कर वसीम ने रिहाना को आज़ाद कर दिया। तलाक़ सुनते सब सतब्ध हो गए और सकते में गए। तलाक़ कह कर वसीम कमरे से चला गया। वसीम की मां ने हुक्म सुना दिया। आप अपनी लड़की को अपने साथ ले जाओ। तलाक़ के बाद रिहाना यहां नहीं रह सकती। मेहर की रकम इद्दत ख़त्म होते दे दी जायेगी। मुझे वसीम के लिए लड़कियों की कमी नहीं है। कल से ही लाइन लगी देख लेना।

वसीम के गुस्से और उसकी मां की अकड़ के बाद रिश्तेदार ने रुक्सत ली। रिहाना मायके गई। इद्दत का समय समाप्त हुआ। मेहर की रकम अदा हो गई।

गुमसुम बेटी को घर बैठे देख सके उसके अम्मी, अब्बू।
अब्बू - बेटे ऐसे ज़िन्दगी नहीं कटेगी। सदा चहकने वाली गुड़िया को उदास नहीं देखा जाता। जो हुआ, एक बुरा ख्वाब मान कर भूल जा। ज़िन्दगी की एक नई शुरुआत करनी है। फिर से घर से बाहर निकलो, रुकी हुई ज़िन्दगी को रफ़्तार दो बेटे। नौकरी करनी है, करलो। ज़िन्दगी को खत्म मत समझो। जहां रुकावट आए, एक नई ज़िन्दगी जियो वहां से।

अपने अब्बू की बात मान कर रिहाना ने नौकरी देखनी शुरू की। किस्मत से उसे पुरानी कंपनी में फिर से नौकरी मिल गईं। वक़्त सब ज़ख्मों को भर देता है। गम को भूलती गई, फिर से चहकने लगी।

उधर वसीम की मां की उम्मीदों पर पानी फिर गया। उसे जो लगता था, नहीं हुआ। तो लड़कियों की लाइन लगी ही कोई रिश्ता आया। जहां वह बात करती, लोग पीछे हट जाते। उसके उग्र स्वाभाव, खडूस पने और वसीम के गुस्से की वजह से कोई रिश्ता नहीं कर रहा था। रिहाना की याद आती परंतु जब चिड़िया खेत चुग गई, तब क्या हो सकता है। कोई कुछ भी कहे, पहला प्यार भुलाया नहीं गया। क्या कर सकता है।

वसीम का फूफा भाई आसिफ दुबई में रहता था। काम की वजह से आसिफ वसीम और रिहाना की शादी में शरीक नहीं हो सका था। आज एक साल बाद आसिफ इंडिया आया। उसे वसीम के तलाक़ का पता चला। उसने वसीम से दूसरा निकाह करने की सलाह दी।

वसीम - आसिफ कह तो तुम ठीक रहे हो, परंतु कोई लड़की तो मिले। मां के व्यवहार के कारण कोई रिश्ता करने को तैयार नहीं।

इतवार की छुट्टी थी। आसिफ ने कहा - वसीम घर बैठे रहोगे, दम घुटेगा। बाहर की हवा में तन और मन दोनों को सकून मिलेगा। चल कोई फ़िल्म देखने चलते है। डिनर बाहर करते है। दोनों भाई फ़िल्म देखने मूवी हॉल पहुंचे। रिहाना भी अपने ऑफिस की दो दोस्तों के साथ फ़िल्म देखने पहुंची। रिहाना को देख वसीम ने रिहाना को आवाज़ दी।

रिहाना सुनो।

रिहाना ने मुड़ कर देखा पर वसीम को अनदेखा कर दिया और अपनी दोस्त से कहा - स्नेहा जल्दी चलो, फ़िल्म स्टार्ट हो जाए।

रिहाना की दोनों दोस्तों स्नेहा और सलमा ने देख कर कहा - रिहाना वसीम है न।

रिहाना - मेरा उससे कोई मतलब नहीं। वो जो भी हो, मैंने क्या करना है। रिहाना ने तेज स्वर में कहा क्योंकि वह वसीम को सुनाना चाहती थी।

रिहाना की बात सुन कर वसीम चुप रह गया। वसीम का दिल और दिमाग दोनों रिहाना में उलझे रहे। फ़िल्म नहीं देख सका। फ़िल्म देखने के बाद वसीम और आसिफ रेस्टॉरेंट में डिनर कर रहे थे। वसीम का दिमाग रिहाना को देखने के बाद उलझा हुआ था। उलझे वसीम को देख कर आसिफ ने पूछा।

रिहाना थी
वसीम - हूं।
आसिफ - एक बात पूछूं। हूर जैसी रिहाना को छोड़ क्यों दिया।
वसीम - मां की बातों में आ कर पैरों पर कुल्हाड़ी मार दी। अब क्या कर सकता हूं। रिहाना को देखा कैसे मुझे नज़र अंदाज़ कर दिया।
आसिफ - क्या रिहाना ने फिर से निकाह किया है।
वसीम - शायद नहीं।
आसिफ - अगर उसने दूसरी शादी नहीं की तो एक बार बात करके देखो। दुबारा शादी कर लो।
वसीम - रिहाना ने मुझे नज़र अंदाज़ कैसे किया, तुमने देखा। कौन रिश्ता लेकर जायेगा।
आसिफ - मैं अपने अब्बू अम्मी से बात करता हूं। कोई रास्ता ज़रूर निकलेगा।

अगले दिन सुबह जब इस विषय पर चर्चा हुई तो वसीम के फूफा,आसिफ के अब्बू ने इनकार कर दिया - तुम दोनों जितना आसान समझ रहे हो। यह उतना ही पेचीदा मसला है। तलाक के बाद उसी बीवी से दुबारा निकाह एक ही सूरत में हो सकता है।

आसिफ - कौन सी सूरत, अब्बू।

वसीम के फूफा - पहले रिहाना का निकाह किसी और से होगा, उसका शौहर उसे तलाक़ दे, फिर इद्दत के बाद रिहाना और वसीम का निकाह हो सकता है।

कुछ देर सोच कर आसिफ ने कहा - अब्बू फिल्मो में भी नकली निकाह होता है। किसी से रिहाना का निकाह करवाके तलाक़ दिलवा देते है। आज निकाह, कल तलाक़। फिर वसीम भाई का निकाह रिहाना से करवा देते हैं।

फूफा - यह फ़िल्म नहीं है। हकीकत है। तुम इसे बच्चों का खेल मत समझो। रिहाना के परिवार वालों को भी विश्वास में लेना होगा, साथ में वो आदमी भी विश्वासपात्र होना चाहिए जो निकाह करके तलाक़ भी देदे। अगर उसने तलाक़ नहीं दिया तब मुसीबत समझो।

कुछ देर की चुप्पी के बाद विचार विमर्श हुआ और यह फैसला लिया गया कि आसिफ की शादी रिहाना से करवा देते है। आसिफ अगले दिन रिहाना को तलाक़ दे देगा, फिर इद्दत के बाद वसीम से निकाह हो जायेगा।

वसीम के फूफा जब इस बात के साथ रिहाना के परिवार से मिले, तब सबने इनकार कर दिया। फूफा ने यकीन दिलाया की आसिफ उसका लड़का है। निकाह के अगले दिन तलाक़ दे कर दुबई चला जायेगा। निकाह के बाद वसीम और रिहाना अगल मकान में रहेंगे, जहां वसीम की मां का कोई दखल नहीं होगा। दोनों सकून के साथ रहेंगे।
आज भी भारत में तलाक़ के बाद लड़की के दूसरे निकाह में अड़चने हज़ार आती है। हर किसी को एक साथी की आवयश्कता होती है। यही सोच कर रिहाना का परिवार मान गया और रिहाना को भी राज़ी कर लिया। फूफा ने निकाह के अगले दिन आसिफ की दुबई की टिकट भी बनवा लिया।

आसिफ का रिहाना का निकाह हो गया। दुल्हन के लिबास में रिहाना क़यामत ढा रही थी। आसिफ की नज़र रिहाना के चेहरे से हट नहीं रही थी। निकाह के बाद कमरे में घूंघट हटा कर आसिफ ने कहा - माशा अल्लहा, एक क़यामत का जिक्र सुना था कि आएगी, खुदा, आज वो मेरे सामने है।

रिहाना आसिफ को देखती रही। आज पहली बार बहुत गौर से देखा। उस दिन फ़िल्म हॉल में सरसरी निगाह डाली थी। आसिफ किसी फ़िल्मी हीरो से काम नहीं। लंबा कद, गोरा रंग, बलिष्ठ शरीर, तीखे नैन नक्श किसी भी लड़की को मदहोश कर दे। रिहाना आसिफ को देख कर अपना आपा खो रही थी। उधर आसिफ रिहाना को देख मदहोश था। दोनों मन्त्र मुग्ध एक दूसरे को देख रहे थे। रिहाना के मुखड़े को हाथों में लेकर आसिफ ने धीरे से कहा - ज़न्नत का सुना था, अगर कुछ और भी मांगता, तो शायद खुदा वो भी दे देता। जिसकी उम्मीद नहीं थी। खुदा ने झोली में अपने आप डाल दी। ज़न्नत की हूर मुझे दे दी और घर को ज़न्नत बना दिया।
रिहाना - शायरी सूझ रही है ज़नाब को।
आसिफ - हकीकत बता रहा हूं। तुम शायरी समझो, मेरा तो सच है।
रिहाना - मैं तो कुछ भी नहीं, तुमको हसीन क्यों लग रही हूं?
आसिफ - मेरी नज़रों से देखो, ज़न्नत की हूर ज़मीन पर उतर आई है।
रिहाना - वसीम ने तो आज तक ऐसा नहीं कहा।
आसिफ - उस निष्ठुर की बात मत करो। आदमी परखने की तमीज नहीं है उसमे। वरना फूल सी शहज़ादी, हुस्न परी को तलाक नहीं देता।
रिहाना - किस्मत भी एक चीज़ होती है, तलाक़ दिया, पछता रहा है, इसलिए तो फिर से निकाह कर रहा है।
आसिफ - कल तक तो मैं भी यही सोचता था, परंतु आज इस हूर का साथ पा कर सोच रहा हूं कि किस्मत का लिखा कोई बदल सकता।
रिहाना - हां, यह सत प्रतिशत सत्य है। किस्मत का लेखा जोखा हमें नहीं पता। हमारी डोर ऊपर वाले के हाथ में है। जो उसकी इच्छा होती है, हम करते रहते हैं।
आसिफ - आज भी किस्मत एक खेल खेलने जा रही है। मुझे अहसास है कि तुम नहीं बोलोगी। मैं ज़बरदस्ती नहीं करूंगा।
रिहाना - मैं समझी नहीं? आश्चर्यचकित हो उठी रिहाना।
आसिफ - खेल के नियम तय हुए कि मैं कल सुबह तुम्हे तलाक़ दे दूं मगर मैं नियम तोड़ रहा हूं। कल सुबह मैं तुम्हे  तलाक नहीं दूंगा। तुम्हारी रज़ामंदी चाहिए, कोई ज़बरदस्ती नहीं। तुम अपना समय लो। सोचो फिर बताना, तब तक तलाक नहीं होगा।

आसिफ की बात सुन रिहाना स्थिति का अवलोकन करने लगी। धीरे से आसिफ ने रिहाना का हाथ पकड़ा और चूम लिया। नजदीक आकर अपनी बाहों में भर लिया। रिहाना सुध बुध खोने लगी। गर्म सांसे दोनों की घुलने लगी। पूरी रात दोनों की आंखों में नींद थी।

सुबह तड़के वसीम आसिफ के घर रिश्तेदारों को लेकर पहुंच गया। उतावलापन था, पूरी रात वसीम भी नहीं सो सका था। उसने शोर मचाना शुरू किया - आसिफ भाई, जल्दी आयो। अपना वायदा पूरा करो।

वसीम के शोरगुल से आसिफ और रिहाना मदहोशी से होश में आये।
आसिफ - चलो रिहाना, सब गए हैं। बाहर चलते हैं। जब सब तलाक़ की बात करेंगें, मैं तुम्हारी आंखें देखूंगा, अगर झुकी आंखें मिली, मैं इशारा समझ जाऊंगा। तलाक़ को मना कर दूंगा।
रिहाना - मेरा दिल धड़क रहा है। तुम बस टाल दो। मुझे वक़्त दो।
आसिफ - ठीक है। फिर भी नज़र झुकी रखना। कुछ मत कहना। मैं संभाल लूंगा।

रात के थके आसिफ और रिहाना बैठक मैं आए, जहां वसीम रिश्तेदारों के साथ इंतज़ार कर रहा था।

वसीम - आसिफ भाई अपना वायदा पूरा करो। रिहाना को तलाक़ दो।

आसिफ ने रिहाना की तरफ देखा। उसकी निगाह झुकी हुई थी। आस्वस्त हो कर उसने कहा - मैंने कहा था, दुबई जाने से पहले तलाक़ दे दूंगा। दुबई जाने में दो दिन हैं। दो दिन बाद आना। मुझे मालूम है, मैंने कहा था। आप सब सुबह सुबह आए हैं। रिहाना चाय सबके लिए बनाओ।

बड़ी मासूमियत से रिहाना ने कहा - जी बनाती हूं। आपकी रसोई कहां है और सामान किधर है। जरा बता दीजिये।

आसिफ रिहाना के साथ रसोई में चला गया। चाय और बिस्कुट के साथ रिहाना बैठक में आई। वसीम ने रिहाना को देखा। हसरत भरी निग़ाहों से देखते वसीम को रिहाना ने अनदेखा कर दिया। झट से मुंह फेर कर आगे निकल गई। सबने रिहाना की बनाई चाय की तारीफ की। चाय पीने के बाद सब चले गए। आसिफ ने अपने अब्बू से कहा कि वे दोनों रिहाना और आसिफ नाश्ता करके फ़िल्म देखने जाएंगे। शाम को ही घर वापिस आएंगे।

रिहाना - मैं अभी नहा कर आती हूं। नाश्ता मैं बनाउंगी।

हालांकि रिहाना को अधिक रसोई की जानकारी नहीं थी फिर भी जो वयंजन उसने नाश्ते में बनाये, सबने तारीफ की। नाश्ते के बाद आसिफ और रिहाना फ़िल्म देखने के लिए निकले।

रिहाना - पहले कहीं बैठ जाते हैं। फ़िल्म दोपहर बाद खाना खाने के बाद देखेंगे। कुछ बात हो जाएगी।

आसिफ और रिहाना मॉल के पार्क में एक बेंच पर बैठ गए। आसिफ ने रिहाना का हाथ अपने हाथों में लिया और उसकी चूड़ियों से खेलने लगा।

रिहाना - आपने तलाक़ को मना क्यों कर दिया?

आसिफ - मुझे तुमसे प्यार हो गया है। कल रात को भी कहा, फिर उसी बात को दोहराते हुए कहता हूं, मैं वसीम नहीं आसिफ हूं। उसने तुम्हे प्यार नहीं दिया। मैं करता हूं। मेरी तरफ से कोई बंदिश नहीं। नौकरी करना चाहती हो, कल से ऑफिस जा सकती हो।  मैं भी दुबई नहीं जा रहा हूं। कंपनी बात करता हूं, दिल्ली वाले ऑफिस में पोस्टिंग के लिए कहता हूं। दिल्ली पोस्टिंग नहीं मिली तब दूसरी नौकरी ढूंढता हूं।

रिहाना - मैं डरती हूं कहीं खिलौना बन जाऊं। पहले वसीम ने खेला, दुत्कार दिया। तीन लफ़्ज़ों में दुनिया बदल दी। अब कहीं तुम फिर से दोहराहो।

आसिफ - तीन लफ्ज़ बड़े ज़ालिम हैं। हमें ज़ुबान पर भी नहीं लाने चाहिएं। हमारे धर्म में लिखा है। मजबूर हैं। परहेज़ रखे उसी में सबकी भलाई है। तुम जो यकीन के साथ कह सकता हूं, मैं आसिफ हूं, वसीम नहीं। कोई ज़बरदस्ती नहीं करूंगा। रज़मंदी तुम्हारी होगी। वरना जो तय था तलाक़ दे दूंगा। पर सोच विचार कर लो। पूरी ज़िन्दगी का सवाल है, तुम्हारी भी और मेरी भी।

रिहाना - सोचने के लिए वक़्त चाहिए।

आसिफ - जितना लो, तुम्हें दूंगा। पर अब खाना खाते है। फ़िल्म देखनी है।

रिहाना और आसिफ फ़िल्म देख रहे थे। आसिफ ने रिहाना का हाथ अपने हाथों में लिया हुआ था। सोच रहा था कि रिहाना का क्या जवाब होगा। रिहाना का मन सोच रहा था कि क्या करे, किस राह पर चले? फ़िल्म चल रही थी परंतु दोनों का मन विचलित था। आसिफ रिहाना को देखता। शायद वह उसे स्वीकृति देगी। कुछ मुस्कान उसके चेहरे पर छलकी। आसिफ को कुछ तसल्ली हुई और उम्मीद जगी।

रात को आसिफ ने रिहाना का हाथ पकड़ा। कमरे के दरवाज़े की ओर देखा। दरवाज़ा बंद था, कुण्डी लगी थी। रिहाना आसिफ के नज़दीक आई। धीरे से कहा - हां। और ख़ुशी में आसिफ ने रिहाना को बांहों में भर कर उसके गालों पर एक चुम्बन रख दिया। पल भर के बाद आसिफ और रिहाना दो जिस्म एक जान थे।

अगली सुबह वसीम फिर आसिफ के घर पहुंचा।

वसीम - आसिफ, अपना वायदा पूरा करो।
आसिफ - तुम भूल रहे हो, कहा था दुबई जाने से पहले तलाक़ दे दूंगा। जब दुबई जाऊंगा, दे दूंगा। अभी तुम घर जाओ।

आसिफ का यह जवाब सुन कर बिरादरी ने कहा कि आज के बाद वसीम के साथ नहीं आएंगे। वक़्त ख़राब करने के लिए उन्हें बुलाया जाए। तलाक़ हो हो, उनकी बला से। आसिफ जाने या वसीम। खुद मामला सुलट ले। बिरादरी नाराज़ हो गई। वसीम ने हौसला नहीं छोड़ा। हर रोज़ सुबह वसीम आसिफ के घर पहुंचता, आसिफ नहीं कह देता।

रिहाना ने ऑफिस जाना शुरू कर दिया। आसिफ का तबादला दुबई से दिल्ली ऑफिस हो गया। एक दिन इतवार की सुबह वसीम ने आसिफ को पकड़ा और झगड़ा करने लगा। तू तू मैं मैं के बाद हातापाई हुई। आसिफ ने कह दिया कि रिहाना उसकी बीवी है। तलाक़ को भूल जाये। तलाक़ नहीं देगा, नहीं देगा, नहीं देगा।

झगडे के बीच में रिहाना ने कहा - वसीम तुम चले जाओ। मेरी ज़िन्दगी में अब तुम्हारा कोई स्थान नहीं है। मेरा शौहर आसिफ है।
वसीम एक लुटे पिटे खिलाडी की तरह चला गया। उसके कानों में आवाज़ें गूंज रही थी


नहीं, नहीं, नहीं।
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