Thursday, October 08, 2015

गायत्री मन्त्र

गायत्री मन्त्र
ओम् भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यम् ।
भर्गो देवस्य धीमहि धियो न: प्रचोदयात् ।।

अक्षरब्रहम – प्रणव (ओंकार) सहित तीन व्याह्यतियों (भू:, भुव:, स्व:) से युक्त (पवित्रीकृत) सविता (प्रसविता – स्त्रष्टा, जगदुत्पति – स्थिति – लयकर्ता) के वरेण्य (वरणीय. ज्ञेय एवं उपास्य के रूप में सम्भजनीय) भर्ग (अविद्या – अज्ञान एवं उसके कार्यभूत प्रपज्ञात्मक जगत तो भूनने की सामर्थ्य वाला, स्वयंज्योति परब्रह्मात्मक) उस तेज का हम ध्यान करते हैं जो हमारी बुद्धियों को सत्कर्मों की ओर प्रेरित करता है।

Gayatri Mantra


Indivisible & Syllabled Brahman Pranava (Omkara) along with the three Vyahrtis (Bhuh, Bhuvah, Svah) renders sanctity to Savita’s (responsible for creation, existence and desolution of the whole apparent creation His) most sought after affulgent “Varenya Bharga” (the auto-light of the Parabrahaman that helps to fryup the ignorance as also its effects in the form of phenomenal existence) that (bharga, again) directs our intellects in right direction.
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