Wednesday, October 14, 2015

पुरानी दिल्ली



लगता है कुछ नहीं बदला यहां। वही पुरानी इमारते, सड़कें, वही पुराना ढांचा। जैसा छोड़ कर गया था बिलकुल वैसा ही है। वही भीड़-भाड़, सड़क पार नहीं कर सकते। रिक्शा, ठेला, टेम्पो सभी एक दूसरे में भिड़े हुए। पुरानी दिल्ली पुरानी ही रह गई। इन तीस सालों में तीस वर्ष और बूढ़ी हो गई। तीस वर्ष पहले पुरानी दिल्ली को अलविदा कह विदेश गया। आता रहा, पुराने मित्रों, रिश्तेदारों से मिलता रहा। पहले तो सभी आस पास पुरानी दिल्ली में रहते थे। पैदल ही गलियां पार करते मिलने चले जाते थे।

पुरानी दिल्ली का मेन रेलवे स्टेशन। एक सिरे से फव्वारे की ओर जाती सड़क, बहुत बड़ी दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी जहां बचपन में स्कूल की छुट्टियों बीतती थी। बस एक नई सुविधा पुरानी दिल्ली में नज़र आई जो पहले नहीं थी। मेट्रो के चलने से आना जाना सुविधाजनक हो गया। बाकी सब वैसा ही है। रिहाइश कम हो गई और व्यापार अधिक। फव्वारे तक की सड़क वैसे ही है। जुबली और मैजेस्टिक सिनेमा तो बंद हो गए। सामने का पार्क पार्किंग और मेट्रो में बदल गए। मैजेस्टिक सिनेमा गुरुद्वारा शीशगंज के समारक में बदल गया। कुमार सिनेमा भी बंद हो गया और सब कमर्शियल बन गया। चांदनी चौक का मुख्य बाजार वैसा ही मिला। लाल किले से फतेहपुरी मस्जिद तक। दोनों तरफ कटरे, पहले नीचे दुकान और ऊपर मकान की परंपरा टूट गई। स्कूल के मित्र इन्ही कटारों, कूचों में रहते थे। जाने पहचाने कूचे, कटरे और गलियां। कूचा बैजनाथ, कूचा घासी राम, हैदरकुली, कटरा नील, कटरा सुभाष, कटरा अशरफी, कटरा नागपुर, नई सड़क, कूचा पातीराम, गांधी गली, तिलक बाजार, क्लॉथ मार्किट, बाग दीवार, तेलियान गली, कटरा ईश्वर भवन, नया बाजार  सब वैसे के वैसे हैं परंतु कोई रहता नहीं है। जानी पहचानी सीढ़ियां, हिम्मत करके चढ़ गया। ऑफिस और दुकानों में परिवर्तित मकान कोई नहीं रहता। मालूम भी नहीं कहां चले गए। मालूम था कि कोई पुराना परिचित नहीं मिलेगा फिर भी उत्सुकता थी कि वे जगह अब कैसी हैं। हैं तो वैसी ही परंतु कोई परिचित नहीं। मकान तो नहीं मिले परंतु दुकाने वही परिचित वही खाने की वस्तुएं, लजीज, स्वादिष्ठ। सेंट्रल बैंक के पास नटराज भल्ले वाला। दरीबे के बाहर जलेबी की दुकान, कूचा घासीराम के बाहर शिव मिष्ठान की पूरी, जलेबी और हलवा। फतेहपुरी मस्जिद पर छैना राम की मिठाई की दुकान, गोले हट्टी के छोले भठूरे, फिर ज्ञानी का फालूदा और दाल का हलवा।

पुराने मित्र, रिश्तेदार नई कॉलोनियों में बस गए। अशोक विहार, पीतमपुरा, रोहिणी, जनकपुरी और द्वारका रहने लगे। कुछ तो गुड़गांव और नोएड़ा। इस कारण पुरानी दिल्ली आना ही छूट गया। क्लॉथ मार्किट के साथ नॉवल्टी सिनेमा बंद पड़ा है। अनगिनत फ़िल्में देखी थी। पैदल रास्ता था घर से, पीछे गली में रहते थे। श्यामा प्रसाद मुखर्जी मार्ग पहले भी था, आज भी है, पर कोई रहता नहीं। मकान के नीचे पैर ठिठक गए। कुछ देर सोचने के बाद सीढ़ियां चढ़ ऊपर मकान में गया। ऑफिस बन चुके थे। कभी रहते थे, जन्म हुआ, विवाह हुआ और बच्चा भी। देखने लगा कि कैसा है घर जहां जीवन के तीस वर्ष बीते। आज घर का स्वामी कौन है, पता नहीं। घर तो है नहीं। गोदाम और ऑफिस बन गया। बीचों बीच सीढ़ियां वैसे ही हैं। सीढ़ियों के ऊपर दूसरी मंज़िल पर जाने के लिए वैसे सीढ़ियां। पहले सीढ़ियों के दोनों और खुला दालान था, अब उस पर छत डल चुकी थी। कपडे की गांठें एक दूसरे के ऊपर लगी थी। दालान के बाद दो कमरे और रसोई थी। गांठों के बीच से थोडा सा रास्ता था, उसमें से निकलने की कोशिश की परंतु असफल रहा। तभी एक मजदूर चाय का गिलास हाथों में लिए आया और पूछने लगा कि क्या काम है और किस से मिलना है।
कभी इस घर में रहता था। आज लगभग तीस वर्ष बाद यहां से गुजरा तो बस देखने गया कि कैसा है अपना घर। काम तो कोई नहीं है बस मन में जिज्ञासा और उत्सुकता है उसको देखने कि यहां जन्म हुआ, बचपन बीता और यहां तक विवाह भी इसी घर में हुआ था।

कब रहते थे। चाय की चुस्कियां लेते हुए पूछा। मुस्कुरा के बताने लगा कि तीस साल पहले। इतना सुन कर हंसने लगा कि इतना पुराना आदमी तो कोई नहीं मिलेगा। मैं दस साल से यहां रहता हूं।
कोई बात नहीं, बस एक बार देख लूं।
हां देख लो, मुझे भी बताओ कि पहले कैसे था और अब कैसा है।
सीढ़ियों के दोनों और एक ही घर था।
अब तो अलग अलग ऑफिस हैं। नीचे ट्रांसपोर्ट का गोदाम है और ऊपर ऑफिस बने हुए है।
घर का पूरा नक्शा बदला हुआ था। सीढ़ियों के सामने शौचालय था और दूसरा उसके साथ। अब सिर्फ एक था दूसरे शौचालय के स्थान पर स्टोर रूम था। दोनों शौचालयों के बराबर स्नानघर थे, अब वो भी गोदाम में परिवर्तित थे। स्नानघर के बाद दोनों तरफ दो रसोई थी, वे भी गोदाम बन चुके थे। एक तरह बड़ी बैठक में एक दिवार पर मंहगी फूलों के डिज़ाइन वाली टाइल्स लगी थी जिनके बीच में एक बहुत बड़ा आइना था, जिस पर खूबसूरत नक्काशी की हुई थी। आईने के ऊपर खूबसूरत ताज महल बना हुआ था टाइल्स पर। विदेशी टाइल्स और ग्लास पूरी दीवार की शोभा बढ़ाते थे। अब गोदाम के लिए कोरी दीवारें थी। ऊपर कमरे और आगे खाली जगह थी परंतु एक इंच भी खाली जगह नहीं थी। मायूसी हुई लेकिन मालिक की मर्ज़ी कि अपनी जायजाद का उपयोग जैसे करे। हमने घर बेच दिया, खरीदार अपने हिसाब और सहूलियत से गोदाम और ऑफिस बना गए। पहले पूरे घर का एक मालिक था, अब हर कमरे का अगल ऑफिस और अलग मालिक। घर देख कर नीचे गया। बाहर से वैसे घर, जैसा छोड़ गए थे, परंतु अंदर से हुलिया जुदा जुदा। कोई परिचित नहीं मिला।

घर तो नहीं परंतु दुकाने पुरानी। फतेहपुरी मस्जिद चौराहे पर दातुन बेचने वाले, मोतिया के फूलों वाली माला, गजरे, फल वाले। पुरानी खाने पीने की वैसी और स्वाद भी वैसा पुराना। ठसा ठस भरी हुई। गोल हट्टी में बैठ कर छोले भठूरे और दही भल्ला खाया। वैसी पुरानी टेबल कुर्सी और सजावट। वैसी प्लेट चम्मच और वही स्वाद। बाहर कर मोतिया के फूलों की माला और फल ख़रीदे। मुझे और पत्नी को मोतिया की सुगंध से विशेष प्रेम था। बालों में कभी गजरा नहीं लगाया परंतु हमेशा खरीद कर मंदिर में ठाकुरजी को अर्पित करती थी। मंदिर में अर्पित फूलों की सुगंध पूरे घर में फ़ैल जाती थी और मन प्रफुल्लित हो जाता था। ज्ञानी की दुकान पर वही पुराने किस्म के गिलास और रबड़ी फालूदा। एक गिलास ले ही लिया। चलो एक बात से मन प्रफुल्लित हुआ कि घर नहीं रहे पर दुकाने आज भी वही हैं।

घर पहुंचा। हाथ में सामान और मोतिया के फूलों की माला देख पत्नी ने पूछ ही लिया कि पुरानी दिल्ली गए थे। पहले की तरह फूलों को मंदिर में ठाकुरजी को अर्पित किये। वही पुरानी सुगंध पूरे घर में फ़ैल गई।

पुरानी दिल्ली की बातें सुन कर पत्नी ने ख्वाहिश ज़ाहिर की। पौत्र साथ बैठ कर खिलौने से खेल रहा था। उसने भी कहा कि वो भी चलेगा जहां दादा दादी रहते थे।

बेटे वहां तो गोदाम और ऑफिस बने हुए हैं। लेकिन खाना खाने चलेंगे।  रविवार चलते हैं, जब बाजार बंद होंगे। भीड़ भाड़ धक्का मुक्का से बचेंगे। तुम्हे दिल्ली का लाल किला भी दिखलाएंगे।
रविवार पौत्र महाशय सुबह ही तैयार हो गए कि सैर सपाटे के लिए कब चलेंगे। नाश्ता करने के पश्चात दिल्ली की पुरानी यादें ताजा करने के लिए प्रस्थान किया। कार छोड़ मेट्रो पकड़ी, ताकि रिक्शा, ऑटो में सफ़र करने की चाह थी। रविवार छुट्टी के कारण मेट्रो में भीड़ कम थी। आराम के साथ रोहिणी से कश्मीरी गेट का सफ़र कट गया। कश्मीरी गेट मेट्रो स्टेशन पर चार मंजिल नीचे अंडरग्राउंड मेट्रो पकड़ी। अगला स्टेशन चांदनी चौक है। मेट्रो स्टेशन से बाहर निकले सामने गुरुद्वारा शीशगंज है, जहां माथा टेकते हुए लाल किले के लिए निकले। गौरीशंकर मंदिर में दर्शन करते हुए मंदिर के बड़े हॉल में जोड़ियां बनती देख पुरानी यादें ताजा हो गई। पत्नी के होंठों पर मुस्कान गई कि जोड़ियां भगवान के घर से बनती हैं। पहले भी लड़के लड़कियां एक दूसरे को देखते थे। आज भी मंदिर के बहाने जीवन साथी को तलाशा जाता है। एक मशहूर गीत भी है तुझसे मिलने आई मैं मंदिर जाने के बहाने। हॉल में सात आठ परिवार मिलाप के लिए तत्पर थे।

लाल किले की आन बान और शान में कोई अंतर नहीं है। पहले की भांति पुराना गौरव दिल्ली की शान। इस बार आगे के पार्क अधिक खूबसूरत लग रहे थे। लाल किले के अंदर का बाज़ार और भव्य प्राचीन लालकिले की परंपरा कायम है। पीछे रिंगरोड का खूबसूरत समां। दीवाने आम और खास के साथ लालकिले की खूबसूरती।

लालकिला देखने के बाद रिक्शा की शाही सवारी से फतेहपुरी मस्जिद पर उतरे। गोले हट्टी के पालक छोले, छोले भठूरे और दही भल्ला पत्नी की पुरानी पसंद रही थी, जब रहते थे। आज के मॉल संस्कृति में पल बढ़ रहे बच्चों को पुरानी दिल्ली पसंद आई। मुझे आश्चर्य भी हुआ और अच्छा भी लगा। वो गोले हट्टी की छोटी सी दुकान पर पुराने समय के बर्तन, प्लेट, चम्मच के साथ पौत्र को खाना पसंद आया।

यम्मी दादू। बहुत स्वाद है।

फिर सड़क पर खड़े होकर हाथ में रबड़ी फलूदे का स्वाद लेना भी पसंद आया। पत्नी को भी तसल्ली रही कि पुरानी दिल्ली आना सार्थक रहा। पुराना स्वाद जो आज मॉल में नहीं मिलता। पिज़्ज़ा, बर्गर भी इनके आगे फीके हैं।

दादू अब कहां चल रहे हैं।

अभी तो डेढ़ बज रहा है। चिड़िया घर घूमने चलते है। दिल्ली का चिड़िया घर बहुत बड़ा और अच्छा है। शेर, गैंडा, दरीयाई घोडा और बहुत किस्म के पंछी और जानवर मिलेंगे। चिड़िया घर के बराबर पुराना किला देखा, पुराने किले की बोटिंग की। एक अच्छे तरीके से विकसित चिड़िया घर में लगभग हर किस्म के जानवर हैं। जब खुद बच्चे थे। चिड़िया घर देखा था, फिर अपने बच्चों को और आज पौत्र को दिखाया। एक सुखद अनिभूति होती है, बच्चों के साथ समय बिताने और उनकी पसंद को ध्यान में रख कर उनके साथ घूमना। बच्चे अभिभावकों के निकट आते हैं और सम्बन्ध अधिक मजबूत होते हैं।

चिड़िया घर में पौत्र को सबसे अधिक आनंद आया। सफ़ेद शेर, चीता, दरीयाई घोडा, अजगर, सांप देख कर वह प्रफुल्लित हो गया।

शाम को चिड़िया घर बंद होने पर इंडिया गेट गए। अमर जवान ज्योती से राष्ट्रपति भवन तक राजपथ के दोनों ओर बाग। आइसक्रीम की ट्रॉलियां। परिवार पिकनिक मानते हुए, युवा एकांत में प्रेम करते हुए। खोमचे वाले चटपटी चीजें बेचते हुए, वही पुराना माहौल। इंडिया गेट के लॉन में घास पर टहलते हुए जवानी के वो सुहाने दिन याद गए जब में और पत्नी शाम के समय इंडिया गेट के लॉन पर घूमा करते थे। मैंने पत्नी की ओर देखा, उसने मेरी और देखा। दोनों मुस्कुरा दिए।


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