Monday, November 30, 2015

तुम्हें पा कर मैंने

तुम्हें पा कर मैंने

तुम्हें पा कर मैंने जहान पा लिया है।
जमीन तो जमीन, आसमान पा लिया है।।
निराशा के बादल अब छट गए हैं।
आशा की किरणें अब उदित हो गई है।
न उजड़ेगा अब कभी वह आशियाँ पा लिया है।
घोसला घर तुम्हे पा कर मैंने जहान पा लिया है।
तुम्हें पा कर मैंने जहान पा लिया है।
जमीन तो जमीन, आसमान पा लिया है।।


अब न तूफ़ान का भय है, न मंजिल की चिंता।
न डूबने का डर है और न मंजिल का खटका।
वह सच्चा गुरुवर मैंने अब पा लिया है।
तुम्हे पा कर मैंने जहान पा लिया है।
जमीन तो जमीन, आसमान पा लिया है।।

सतायेगी अब मुझे न गर्मी की तपन, और न जाड़े का ठिठुरना।
न वर्षा की टपतपन और न पतझड़ की पीड़न।
वह रहबर अज़ीम (महान मार्गदर्शक) मैंने अब पा लिया है।
तुम्हे पा कर मैंने जहान पा लिया है।
जमीन तो जमीन, आसमान पा लिया है।।

न मन में रहेगा अब किसी के प्रति ईर्षा और द्वेष-भाव।
और न घृणा, न छुआ-छूत और न कोई भेद-भाव।
बहती रहेगी सदा मन में दया, करुणा की बयार।
और रहेगा सब प्रणियों के प्रति सदा प्रेम और प्यार।
वह देव तुल्य सद्गुरु मैंने अब पा लिया है।
तुम्हे पा कर मैंने जहान पा लिया है।
जमीन तो जमीन, आसमान पा लिया है।।

रहेगी कभी न अब वह चित्त की चंचलता।
सतायेगी कभी न मुझे इस जग की ममता।
थी जुस्तजू (तलाश) जिस की वर्षो से मुझ को।
तुम्हे पा कर मैंने जहान पा लिया है।
जमीन तो जमीन, आसमान पा लिया है।।

खोजता रहा था दर दर वृन्दावन की गलियों में जिसको।
वह कन्हैया सा काबिल गुरु मैंने अब पा लिया है।
तुम्हे पा कर मैंने जहान पा लिया है।
जमीन तो जमीन, आसमान पा लिया है।।

जो रहता है प्राणियों में विद्यमान।
जो देता है सब को बल बुद्धि और ज्ञान।
जो रखता है प्रतिपल सब जीवों का पूर्ण ध्यान।
जो निर्बलों का बल है और बेजुबानों की जबान।
उस करुणामय दीनबंधु का जानन हार अब मैंने पा लिया है।
तुम्हे पाकर मैंने जहान पा लिया है।
जमीन तो जमीन, आसमान पा लिया है।।

जो जड़ और चेतन सब जीवों में विद्यमान है।
जिसके हैं रूप अनगिनत सर्वदा एक दूसरे से भिन्न-भिन्न।
पत्ता भी नहीं हिलता जिसकी इच्छा के बिन।
उस परम सत्य का मार्ग दर्शक अब मैंने पा लिया है।
तुम्हे पाकर मैंने जहान पा लिया है।
जमीन तो जमीन, आसमान पा लिया है।।

जो है सृष्टि का कर्ता धर्ता और उसका जीवन आधार।
जिस की लीला और महिमा का नहीं कोई अंत।
जिसका न होता जन्म है और न होता कभी विनाश।
पाते हैं वे नर उसे जो करते हैं उसे पाने का सत् प्रयास।
उस परम तत्व का पारखी अब मैंने पा लिया है।
तुम्हे पाकर मैंने जहान पा लिया है।
जमीन तो जमीन, आसमान पा लिया है।।


Monday, November 23, 2015

मैं बलिहारी दाता

मैं बलिहारी दाता

मैं बलिहारी दाता मेरे सतगुरु आयो मेरे वेडे।
नी मैं मन विच मन्दिर बना लिया,
नी मैं गुरूजी दा आसान ला लिया,
आन विराजो दाता मेरे सतगुरु आयो मेरे वेडे।

नी मैं गुरूजी नूं कौल बिठा लिया,
नी मैं दिल वाला हाल सुणा लिया,
बड़े दयालु दाता मेरे सतगुरु आयो मेरे वेडे।

ऐं दे दर उत्ते मौज बहारा,
संगत खड़ी हे बन के कतार,
झोलियां भर दो दाता मेरे सतगुरु आयो मेरे वेडे।

नी मैं नैना विच नीर बहा लिया,
नी मैं गुरूजी दा दर्शन पा लिया,
दर्श दिखायो दाता मेरे सतगुरु आयो मेरे वेडे।

जेरे सवेरे-शाम दर उत्ते आन दे ने,
उन्हां दे बिगड़े काम बण जान दे ने,
काज सवारी दाता मेरे सतगुरु आयो मेरे वेडे।
मैं बलिहारी दाता मेरे सतगुरु आयो मेरे वेडे।।


जब भी जन्म मिलेगा

जब भी जन्म मिलेगा

जब भी जन्म मिलेगा, सेवा करेंगे तेरी।
करते हैं तुम से वादा, शरण रहेंगे तेरी।
हर जीवन में बनकर साथी, देना साथ हमारा।।

दुनिया बनाने वाले, ये सब तेरी माया।
सूरज चांद सितारे, सब कुछ तूने बनाया।
फंस ना जाऊं माया में, रहे आर्शीवाद तुम्हारा।।

जब से होश संभाला, तब से हमने जाना।
तेरी भक्ति ना मिले, जीवन व्यर्थ गंवाना।
बनवारी इंसान जगत में, फिरता मारा-मारा।।

करेंगे सेवा हर जीवन में, पकड़ो हाथ हमारा।।

Friday, November 20, 2015

रानी

पापा, पापा शब्द सुन कर रितेश के पैर ठिठक गए। मुस्कुरा कर रितेश सलोनी को गोद में उठा कर प्यार करने लगा और सलोनी से खेलने लगा। सलोनी ने फिर से पापा कहा। रितेश पूरे दिन की थकान भूल गया और सलोनी के साथ खेलने लगा और रितेश की गोद में सलोनी किलकारी मार कर हंसने लगी।

सलोनी एक वर्ष की चुलबुली लड़की, बोलना अभी आरम्भ ही किया है। दो चार शब्द ही बोलती है। आज पहली बार पापा बोला है। बैठक में सलोनी की मां सुकन्या यादों में खो गई। सलोनी के पापा बोलने और रितेश को पापा समझने पर वह क्या प्रतिक्रिया दे क्या सोचे और क्या करे? कुछ नहीं सूझ रहा था। उसकी आंखें छलक गई। दुपट्टे से आंखों को ढक कर अंदर कमरे में चली गई और भभक कर रोने लगी।

सुकन्या बिस्तर पर धम से गिर गई। मालूम नहीं कब तक तकिये भिगाती रही। रात हो चुकी थी। अंधेरे को दूर करने की कोई दिलचस्पी नहीं थी सुकन्या में। सलोनी के पापा शब्द उसके दिमाग में गूंजते रहे।

सलोनी एक घंटे तक रितेश के साथ खेलती रही, फिर उसे भूख लगी और रितेश की गोद से नीचे उतर भागी। सलोनी की दादी सलोनी के पीछे सुकन्या के कमरे गई। बत्ती जलाई। बत्ती जलते सुकन्या चौंक गई। फटाफट बिस्तर से उठी और सलोनी को गोद में लिया।

"मैं सलोनी के लिए दाल बनाती हूं। इसका खाने का समय हो गया है।"

सुकन्या को रोते देख सलोनी की दादी ने कहा "तुम सलोनी के साथ बैठो, दाल बनी हुई है। मैं दे जाती हूं।"

रात शयन कक्ष में सलोनी के दादा और दादी के बीच वार्तालाप होता है कि आज सलोनी ने रितेश को पापा कहा। रितेश की उम्र विवाह योग्य है। ऑफिस का काम भी अच्छी तरह संभाल रहा है। सलोनी ने आज रितेश को देख कर पहली बार पापा कहा। सलोनी ही रितेश को पापा समझती है। उसी के साथ खुश रहती है। अगर रितेश की शादी सुकन्या के साथ हो जाए, सबके हित में रहेगा।

सलोनी के दादा ने कुछ सोच कर कहा "बात तो उचित है कि घर की बात घर में रहे। इज़्ज़त बाहर जाए, परंतु क्या रितेश और सुकन्या इस पर राजी होंगे? उन दोनों की रज़ामंदी तो चाहिए।"

"उनको मनाना पड़ेगा। घर की सुख, शांति और इज़्ज़त के लिए बात करनी पड़ेगी। हो सकता है कि पहले ना नुकुर करेंगे, बाद में सब मान जाते हैं। कुदरत और समाज भी इज़ाज़त देता है। भाई की मृत्यु के बाद छोटा भाई भाभी के साथ विवाह करता है। उनको मनाना पड़ेगा। बड़े बूढ़ों के साथ उनको बिठाना पड़ेगा। समाज की ऊंच-नीच बतानी पड़ेगी। वो बच्चे हैं, उनको हर कीमत पर इस फैसले के लिए रज़ामंद होना ही पड़ेगा।" दादी ने तो अपना फैसला दादा को सुना दिया।

"भाग्यवान, तेरी बात ठीक है। यह हमारे वाला पुराना समय नहीं है कि जब बच्चे चुपचाप अपने अभिभावकों की बात मानते थे। विवाह के लिए बड़े बूढे ही लड़का-लड़की देखते थे। लड़का-लड़की एक दूसरे को विवाह के समय ही देखते थे। आज वो बात नहीं है। यदि रितेश की पसंद कोई और है, क्या उस पर अपना फैसला थोपना उचित होगा?"

दादी ने पलट कर कहा "तुम अपनी जायजाद, संपति, प्रॉपर्टी का बटवारा कर दोगे। सुकन्या इस घर में नहीं रहेगी तो उसका हिस्सा तो है। जवान है, रितेश की हमउम्र है। सलोनी उसको पापा समझती है। तुमको पहल करनी है। सुकन्या के मां-बाप के पास कल सुबह सन्देश भेजो। सुकन्या से मैं बात करती हूं। उसके मां-बाप से उसपर दबाव डलवाना तुम्हारा काम है। रितेश से हम दोनों बात करेंगे। अपने छोटे मामा की बात बहुत मानता है। भाई से मैं बात करती हूं।"

दादा और दादी का रितेश के साथ सुकन्या के विवाह के पीछे मुख्य कारण परिवार की अटूट संपति है, जिसका वे बटवारा नहीं चाहते। उनका बड़ा बेटा पिछले वर्ष एक सड़क दुर्घटना में परलोक रवाना हो गया। उसके विवाह को केवल एक वर्ष हुआ था। सुकन्या गर्भ से थी। सलोनी ने शुरू से रितेश को ही देखा, उसी को पापा समझती है। हम उम्र रितेश और सुकन्या के विवाह में उनको कोई आपत्ति नहीं नज़र आई। धर्म और समाज ने ऐसे विवाह को मान्यता दे रखी है।

रितेश और रानी कॉलेज से ही एक दूसरे के नज़दीक थे। नज़दीकियां प्यार में बदल चुकी थी। दोनों अपने परिवार से विवाह की अनुमति मांगते, तभी रितेश के भाई के निधन के कारण शोकाकुल वातावरण में बात नहीं हो सकी। बरसी के बाद ही कुछ हो सकता है। पिछले महीने बरसी भी हो गई।

इधर रितेश के मां-बाप रितेश और सुकन्या के विवाह पर चर्चा कर रहे थे और उसी रात उसी समय रितेश और रानी भी अपने विवाह के लिए सपने देख रहे थे। अपने परिवारों से अनुमति लेने की बात कर रहे थे। सपने तो सपने ही होते है, हर कोई देखता है लेकिन साकार तो किसी विरले के ही होते हैं। हाथ की लकीरें कुछ जुदा होती हैं सपनों से मिलाप नहीं होता। नदी के दो किनारे होते हैं सपने और हकीकत जो साथ साथ चलते हैं पूरी उम्र परंतु एक नहीं होते। दूर से देखते रहते है जुदा जुदा। हसरत मिलने की सपने में उत्पन्न होती है और हकीकत में छिन-भिन हो जाती है। फिर भी सपने देखते हैं। कुछ खुद को भी अहसास होता है, सपना हकीकत में परिवर्तित नहीं होगा, देख कर दिल खुश हो जाता है और दिमाग तरोताजा। यही सपने ज़िन्दगी के कठिन रास्तों पर चलने की प्रेणना देते हैं। चलते चलते सपने देखते जाते हैं। कुछ ऐसा ही रितेश और रानी सोच रहे थे।

अगली सुबह का सबको इंतज़ार था। रितेश से पहले उसके मां-बाप बिस्तर छोड़ काम में जुट चुके थे। रितेश का छोटा मामा तड़के ही बहन-बहनोई की सेवा में हाज़िर था। दादी ने रात सोने से पहले ही छोटे भाई को फ़ोन कर दिया था। सुबह चाय की चुस्कियों में भाई को समझा दिया कि यह विवाह उनके लिए कितना महत्वपूर्ण है। घर की संपति और इज़्ज़त किसी की हालात में दहलीज़ पार नहीं जानी चाहिए।

समय की नज़ाकत देखते हुए छोटे मामा फटाफट सुकन्या के मायके पहुंच गए। सुबह सुबह बिना कोई इतल्ला के अचानक छोटे मामा को देख सुकन्या के मां-बाप सोच में गए। झट से नाश्ते का इंतज़ाम में जुटे तो छोटे मामा ने बिना किसी औपचारिकता के सुकन्या और रितेश के विवाह का प्रस्ताव रखा। कुछ चुप्पी के पश्चात उन्होंने छोटे मामा से पूछा कि क्या सुकन्या से बात की?
"पहले तो आपकी रज़ामंदी होनी चाहिए, फिर सुकन्या से बात आप कीजिये। वक़्त का तकाजा है, आप सुकन्या की उम्र देखो, मात्र पच्चीस में विधवा। पूरी ज़िन्दगी है, एक वर्ष की बच्ची है। कुछ जिस्मानी जरूरते होती है। प्रकृति के नियम है, जिनको दबाना कुदरत के विरुद्ध है। हमारे समाज में एक विधवा का दूसरा विवाह आज भी लगभग असंभव है। अमेरिका, यूरोप की बात और है, परंतु हमारा समाज, हमारी मान्यताएं भिन्न हैं। इन सबको ध्यान में रख कर जवान विधवा भाभी के साथ कुंवारे देवर के विवाह की प्रथा है। हमारे परिवार को कोई आपत्ति नहीं है। आपको भी नहीं हो सकती, मुझे ऐसा प्रतीत होता है। सुकन्या की रजामंदी आप लीजिये। लेकिन उसको समझाना आपका कर्तव्य है।" छोटे मामा के कथन में आदेश था।

चलते चलते छोटे मामा ने कहा कि इस शुभ कार्य में विलम्ब नहीं होना चाहिए। यदि संभव हो तो मेरे साथ चलिए और लगे हाथ सुकन्या से भी बात कर लीजिये। छोटे मामा कोई समय नहीं देना चाहते थे, जिससे कोई विघ्न पड़े। सुकन्या के मां-बाप कुछ सोचें, उससे पहले छोटे मामा ने कहा "कार में बातें कर लेंगे। चलिए।"

शून्य भाव से सुकन्या के मां-बाप छोटे मामा के साथ कार में बैठ गए। सुकन्या के रितेश के साथ विवाह का प्रस्ताव उनको भी भाया। विधवा बेटी के पुर्न-विवाह में अड़चन सकती है। आज तो उसके सास-ससुर खुद विवाह को राजी हैं। यदि वे प्रस्ताव ठुकरा देते हैं तब हो सकता है कि उसको मायके जाने को कह दे। सुकन्या के भाई-बहन क्या पूरी ज़िन्दगी उसका साथ दे सकेंगे? कार में बैठे सुकन्या के मां-बाप इस निर्णय पर पहुंच गए कि सुकन्या के सुखमय भविष्य के लिए सुकन्या और रितेश के विवाह का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया जाए। सुकन्या के घर पहुंच कर उसके सास-ससुर से औपचारिकता पूर्ण बात हुई। सुकन्या की मां सुकन्या से बात करने उसके कमरे में चली गई और पिता रितेश के पिता से बातचीत करते रहे।

सुकन्या प्रस्ताव सुन कर असमंजस में पड़ गई कि क्या उत्तर दे? आखिर बेटी सलोनी की खातिर उसने हां कर दी। मात्र पच्चीस की उम्र में विधवा होना किसी श्राप से कम नहीं है। पिता की कमी सलोनी को रहेगी। उसके सास-ससुर के बाद रितेश और उसका परिवार क्या उसको घर में मान सम्मान देगा?  उसकी घर में क्या हैसियत होगी? क्या दूध में मक्खी की तरह उसको निकाल दिया जायेगा? उसकी इस घर में और अपने घर में क्या स्थिति होगी? उसकी अपनी जरूरते, क्या सारी ज़िन्दगी मन मार कर बितानी पड़ेगी? अनिश्चित भविष्य से अच्छा इस विवाह के प्रस्ताव को कबूल करना ही ठीक रहेगा। जब दोनों परिवार इस मिलन को स्वीकृति दे रहे हैं, तब उसको इस रिश्ते में बंध जाना चाहिए। हालांकि उसने कभी रितेश को पति के स्थान पर नहीं देखा। प्रकृति और समय के आगे चाहे अनचाहे कभी उन कार्यो को पूरी उम्र करना पड़ता है और रिश्तों को निभाना पड़ता है। शुरुआत भले अनचाहे हो, कुछ समय बाद रिश्तों की गहराई में ड़ूब जाता है। हर गम को भूल कर नए रिश्ते बनाता चला जाता है और समर्पण के साथ निभाता जाता है। मानव प्रवति को खुद मानव नहीं जान सका है।

दोनों परिवारों ने रितेश और सुकन्या के रिश्ते को मान्यता दे दी।

रितेश जब नाश्ते के लिए अपने कमरे से निकल कर बैठक में आया तो छोटे मामा सोफे पर बैठे चाय की चुस्कियों के साथ अखबार पढ़ रहे थे।

"मामा कब आये?" कहता हुआ रितेश अपने प्रिय मामा की बगल में बैठ गया। छोटा मामा और रितेश लगभग एक ही उम्र के हैं। सिर्फ पांच वर्ष का अंतर है दोनों की उम्र में। छोटे मामा सिर्फ पांच वर्ष बड़े है रितेश से, अतः दोनों में अच्छी और पक्की दोस्ती थी और एक दूसरे से घुले मिले थे।

"मुबारक हो रितेश, बहुत बहुत बधाई। बहुत क्या, लख लख बधाइयां।" कहते हुए छोटे मामा ने रितेश का हाथ पकड़ कर ज़ोर से हिलाया।

"किस बात की बधाई दे रहे हो? रितेश ने छोटे मामा के हाथ से अखबार लिया और सुर्खियां पढ़ने लगा।
"भाई तुम्हारी शादी की बधाई दे रहा हूं।"
"मामा मजाक करने के लिए सुबह और कोई नहीं मिला।"
"मजाक नहीं, सही कह रहा हूं। हमने तुम्हारी शादी पक्की कर दी है।"
"शादी मेरी और मुझे नहीं मालूम। मामा मुझे खीचों मत।"
"लो, इसमें खींचने की बात नहीं है, सचमुच में हमने तुम्हारी शादी तय कर दी है।"
"मेरे से बिना पूछे।" रितेश अभी भी छोटे मामा का मजाक ही समझ रहा था।

तभी रितेश के माता-पिता भी बैठक में गए और सुकन्या को नाश्ता लगाने को कहा। इससे पहले रितेश कुछ समझ सकता उसके माता-पिता दोनों एक साथ बोले "छोटे मामा तुमसे मजाक नहीं कर रहे थे। यही हमने सोचा है और दोनों परिवारों की रज़ामंदी भी इसी में है। हमने तुम्हारा विवाह सुकन्या के साथ तय किया है।"

सुकन्या सुन कर रितेश सतब्ध रह गया।

"पर मां वो तो मेरी भाभी है और आपने मेरे से पूछा भी नहीं।" रितेश ने विरोध जताते हुए कहा।
"रितेश कुछ बाते घर के बड़े तय करें, उसमें सबकी भलाई होती है। विवाह जैसे गंभीर मामले में बड़ों की राय सदा गुणकारी और लाभदायक होती है। हमारे परिवार में शादियां हमेशा बड़े बूढ़ों ने तय की हैं।" पिताजी की आवाज़ में एक तरह से आदेश था।

"परंतु आजकल हर कोई अपनी पसंद से विवाह करता है। चाहे लड़का हो या लड़की। दोनों से पसंद पूछी जाती है।"

"लव मैरिज में ही सबसे अधिक तलाक होते है। जहां मां-बाप शादी तय करते हैं। जोड़े निभाते हैं और पूरी ज़िन्दगी का सफ़र मिल कर तय करते है। कहीं झगड़ा होता भी है तो बड़े बूढे मार्ग दर्शन करते है और सुलह हो जाती है। लव मैरिज में जरा सी खट-पट हुई नहीं, तलाक की नौबत हो जाती है। दोनों में सुलह कराने कोई बीच में नहीं पड़ता।"


"पापा मैं किसी और से प्यार करता हूं और आप से उसके बारे में बात करना चाहता हूं।"
"प्रेम शादी से पहले नहीं बाद में होता है। जिसे तुम प्यार कहते हो, वह सिर्फ आकर्षण होता है। मेरा और तुम्हारी मां का प्रेम आज तक कायम है और हर रोज़ गाड़ा होता है। तुम अपने चहेते छोटे मामा से पूछो कि क्या वो तुम्हारी छोटी मामी से प्यार नहीं करता है।"
छोटे मामा ने हां में हां मिलाई। "रितेश जीजा जी बिलकुल ठीक कहते हैं। असली प्रेम क्या होता है उसकी अनुभूति विवाह के बंधन में बंधने के बाद होती है। हर रोज़ एक नया और ताज़ा प्रेम। भांजे जीजा जी की बात में दम है। जीजा जी की सुझाई थी तुम्हारी मामी। एक दम शुद्ध देसी घी है तेरी मामी।"

"मामा तुम भी पापा की हां में हां मिला रहे हो। मेरी तो सुनो।"

"हमने सबके भले की सोच कर ही यह निर्णय लिया है। तुम और सुकन्या एक उम्र के हो। दोनों सुन्दर हो और सलोनी तुम्हे अपना पिता समझती है।"

"लेकिन मैं सुकन्या को भाभी की तरह देखता हूं।" रितेश ने रिश्ते को नकारने के लिए कहा।

"रितेश तुम पत्नी की तरह देखो सुकन्या अब तुम्हारी पत्नी है। बस शुभ मुहूर्त निकलवा कर तुम दोनों की शादी होनी है। तब तक समय है पत्नी की तरह देखना आरम्भ करो, क्योंकि यही हमारे परिवार के हित में है। हम बिलकुल नहीं चाहते कि हमारी इज़्ज़त और दौलत कहीं बाहर जाए। कभी कभी अपना जीवन परिवार के लिए कुर्बान करना पड़ता है। हर ख्वाहिश पूरी हो यह ज़रूरी नहीं। आज तुम किसी से शादी करना चाहते हो, यदि तुम्हारा भाई जीवित होता तब जरूर तुम्हारी चाहत सम्पूर्ण होती परन्तु अब हालात कुछ जुदा हैं। अपना नहीं परिवार का सोचना है तुम्हे।" रितेश के मां-बाप ने अंतिम शब्द कह दिए। रितेश मज़बूर हो गया। वह गुमसुम रहने लगा। माता-पिता समझते थे कि एक बार शादी हो गई तब धीरे धीरे समय के साथ सब ठीक हो जाएगा। शादी की तैयारियां शुरू हो गई।

रितेश का मन किसी भी काम में नहीं लग रहा था। उसके दिल दिमाग में रानी बसी हुई थी। कैसे उसके स्थान पर भाभी सुकन्या को बिठाए। रानी को भूलना आसान नहीं था। रानी से एक दो बार मिला। रानी कहती रही, रितेश सुनता रहा। घर छोड़ कर रानी के साथ भाग कर अगल दुनिया बसाने का ख्याल आया परन्तु रानी ने समर्थन नहीं दिया।

"जब हमने प्यार किया है तो डरे क्यों। सबके साथ सबके सामने विवाह के बंधन में बंधेंगे। पूरी ज़िन्दगी भगोड़ा नहीं बनना।" रानी घर छोड़ कर भाग कर शादी करने के पक्ष में नहीं थी। "रितेश मेरे परिवार की इज़्ज़त और प्रतिष्ठा है। मैं भाग कर अपने परिवार की मान, प्रतिष्ठा और इज़्ज़त पर बट्टा नहीं लगाउंगी।"


रानी उसके साथ भागने को तैयार नहीं थी। रितेश के माता-पिता सुकन्या के साथ विवाह को आतुर थे। वे रानी को बहू बनाने को तैयार नहीं थे। उनकी अपनी मजबूरी थी। रानी का साथ मिलने पर मज़बूर रितेश भाभी सुकन्या के साथ पवित्र अग्नि के समक्ष सात फेरे लेकर विवाहित हो गया। सात फेरे और सात वचन सुकन्या के साथ ले रहा था लेकिन उसकी आंखों के आगे रानी का खूबसूरत चेहरा रहा था। उसे ऐसा अहसास हो रहा था कि वह सात फेरे सुकन्या के साथ नहीं बल्कि रानी के साथ ले रहा है। वास्तविकता कुछ जुदा थी, विधिवत रूप में उसने सुकन्या को पत्नी स्वीकार किया। घर में सभी प्रसन्न थे कि घर की इज़्ज़त घर में रही और व्यापार का भी बटवारा नहीं हुआ। रितेश के माता-पिता और छोटे मामा सबसे अधिक प्रसन्न थे। रितेश का मन कहीं और तन कहीं। वो क्या कर रहा है उसे खुद अहसास नहीं। बस जैसा परिवार चाह रहा था करता रहा। एक रानी का आसरा था, वो भी साथ निभाने को तैयार नहीं हुई लेकिन मन मष्तिक से भूल जाना भी इतना आसान नहीं था और जो जीवन संगिनी बनी उसे दिल में बसाना आसान नहीं था।


रात कमरे में रितेश पंखे को टकटकी लगा कर देख रहा था। करवट बदली और जिस्म सुकन्या के जिस्म से मिला। मन में रानी के ख्वाबों के साथ सुकन्या को बाहों में लिया। तन सुकन्या के साथ मिल गया परन्तु मन रानी में उलझा हुआ था। उसे इस बात का इल्म नहीं था कि प्रेम के पलों में वह रानी बुदबुदा गया। एक पल को रानी शब्द सुन कर सुकन्या का जिस्म सुन्न हो गया। उसका मन भी विचलित हो गया कि रितेश के मन में आज भी रानी बसी है। क्या उसकी शादी महज औपचारिकता है? तन जुड़ गया है। मन में क्या है, क्या रानी के साथ मन का रिश्ता है? एक सफल विवाहिक जीवन में तन और मन दोनों का जुड़ना ज़रूरी है। अभी तो तन ही जुड़ा है। मन कब जुड़ेगा? सुकन्या ने समय के लिए छोड़ दिया। समय ही घाव देता है और मरहम भी वोही लगता है। शादी के एक साल बाद विधवा हो गई और अब फिर सुहागन। समय की ताकत का उसे अंदाज़ा बखूबी से इस छोटी उम्र में हो चुका था। उसने रितेश से कभी इस बात का जिक्र नहीं किया कि प्रेम में रितेश रानी बुदबुदाता है। वह समझ गई कि रानी अभी भी रितेश के दिल में है। रितेश के साथ तन का सम्बन्ध तो गाड़ा हो गया है परन्तु मन एक होने में समय कुछ और लगेगा।

एक वर्ष बीत गया। रानी का भी विवाह हो गया। सलोनी के भाई सोलन ने प्रदापर्ण किया। परिवार में खुशियां छा गई। माता-पिता की खुशियों का कोई ठिकाना नहीं था। एक पौत्री और एक पौत्र के साथ परिवार सम्पूर्ण हो गया। उससे अधिक ख़ुशी इस बात की थी कि रितेश सुकन्या के करीब गया था। उसका ध्यान अपने से अधिक रखता था। हर छोटी बड़ी बात की फ़िक्र रखता। सुकन्या भी आश्वत थी कि रितेश देर से सही मन से भी उसके समीप रहा है। बीतते समय के साथ रितेश का मन सुकन्या में रम गया। तन के साथ मन भी जुड़ गए। सुकन्या ने कभी रितेश से रानी का जिक्र नहीं किया। अपने दांपत्य जीवन और गृहस्थी में कोई विघ्न नहीं लाना चाहती थी। अब उसने रानी कहना भी छोड़ दिया था। विवाह के पहले साल कई बार प्रेम में रानी शब्द रितेश ने बुदबुदाया परन्तु रानी के भी विवाह के बाद रितेश को रानी से कभी मिलने की उम्मीद समाप्त हो गई थी और मन भी सुकन्या के साथ जुड़ गया।

विवाह के बाद विचलित मन के कारण रितेश सुकन्या के साथ हनीमून नहीं गया। फिर अगले वर्ष पुत्र सोलन के जन्म के कारण वर्ष बीतते गए। इन पांच वर्षो में छोटे बच्चों के कारण कभी घूमने नहीं निकले। पहले रितेश की मनोदशा और फिर कभी छोटे बच्चों के कारण या फिर काम की व्यस्तता।  आज पांच साल बाद रितेश ने सुकन्या के साथ हिल स्टेशन घूमने का प्रोग्राम बनाया। सुकन्या ख़ुशी से झूम उठी कि उसकी तपस्या और मौन रहने का फल मिल रहा है। लंबी कठिन परीक्षा का रिजल्ट आया है, एक सौ प्रतिशत अंको के साथ।


सुबह के साढे पांच बजे ट्रेन देहरादून पहुंच गई। ट्रेन से उतर कर प्लेटफॉर्म पर सुकन्या बच्चों और सामान के साथ खड़ी थी। रितेश टैक्सी वाले से बात कर रहा था। सुकन्या की नज़र कुछ दूर खडे एक ग्रुप पर पड़ी जो अपनी कार के आने का इंतज़ार कर रहा था। उनको लेने आने वाली कार लेट हो गई थी और एक युवक कार के ड्राईवर से लड़ रहा था कि उसने ख़ामख्वाह सुबह सुबह प्लेटफॉर्म पर परेड करवा दी और खड़े खड़े इंतज़ार करवा रहा है। ग्रुप में एक लड़की पर नज़र पड़ी और दिल धड़कने लगा। यह तो रानी लग रही है। घूर कर देखा, बिलकुल ठीक पहचाना। यह रानी ही है। क्या यह भी मसूरी जा रही है? सोच कर सुकन्या परेशान हो गई कि कहीं आमना सामना हो गया फिर क्या होगा? रितेश क्या करेगा? जिस मन का जुड़ाव बहुत मुश्किल से हुआ, उसका क्या होगा
तभी रितेश ने सुकन्या का हाथ पकड़ा "अरे सुबह सुबह नींद नहीं खुली क्या? क्या सोच रही हो? टैक्सी में बैठो। सामान रख दिया और बच्चे भी टैक्सी में बैठ गए हैं।"

रितेश और सुकन्या टैक्सी में बैठे और टैक्सी मसूरी की ओर रवाना हो गई। सुकन्या ने चैन की सांस ली कि रितेश ने रानी को नहीं देखा। एक घंटे के भीतर मसूरी के रिसोर्ट में पहुंच गए। खूबसूरत छोटी छोटी कॉटेज बनी हुई थी। एक छोर की कॉटेज में रितेश और सुकन्या ठहरे। थकान के कारण दोनों बच्चे सो गए। कॉटेज के बाहर लॉन में रितेश बैठ गया और सामने प्रकृति के सौंदर्य निहार कर मुग्ध हो गया। एक लंबे अरसे के बाद सुकून के साथ रितेश छुट्टियां व्यतीत करने आया। सुकन्या नहा कर लॉन में आई और रितेश के गले बाहें डाल कर उसपर झुक गई। काले घने बाल उसके मुख पर बिखरा दिए। रितेश ने सुकन्या का मुख नीचे कर चूम लिया। चुम्बन के बाद खिलखिला कर सुकन्या पीछे हट गई।

"क्या हो गया। खुले में कोई देख लेगा।"
"यहां हमारे सिवा और कोई नहीं।"
"मूड में लग रहे हो।"
"मैं सोच रहा हूं कि पहले क्यों नहीं आए। प्रकृति का सौंदर्य, सफ़ेद आते जाते बादल, गुलाबी ठंडक के मौसम से रोमांस दिल में अपने आप उमड़ने लगता है।"
"जनाब को फुरसत ही नहीं मिली तो कोई बात नहीं। अब गए हैं तो मौसम, प्रकृति के सौंदर्य का लुत्फ़ लीजिये।"
"लुफ्त सिर्फ तुम्हारे प्यार का। खुले बालों में कयामत ढा रही हो।"

दोनों के प्रेम वार्तालाप में ब्रेक बच्चों के उठने के साथ लगा। दोनों कमरे में मम्मी-मम्मी पापा-पापा चिल्लाने लगे। सुकन्या भाग कर बच्चों के पास गई। रितेश भी नहाने के लिए गुसलखाने चला गया। रितेश के बाद दोनों बच्चे सलोनी और सोलन भी नहा कर तैयार हो गए। वे सब नाश्ता कर रहे थे कि पास की कॉटेज से शोर आने लगा, जैसे कोई लड़ रहा हो। वो आपस में बात कर रहे थे कि किस बेवकूफ ने इंतज़ाम किया। पहले देहरादून रेलवे स्टेशन पर कार देर से पहुंची, फिर रास्ते में ख़राब। दो घंटे बाद दूसरी कार आई। दो कारें और दोनों ख़राब हो गई। सारा मूड ख़राब कर दिया। एक घंटे का सफ़र पांच घंटे में पूरा हुआ। एक पैसा नहीं देंगे। ट्रेवल एजेंसी से लड़ रहे थे कि कोई पेमेंट नहीं करेंगे। टैक्सी वालों के साथ पेमेंट देने के कारण झगड़ा हो रहा था। रिसोर्ट के मैनेजर बीच बचाव कर रहे थे।

"क्या अनपढ़ गंवार और फूहड़ लोग साथ के कॉटेज में गए है। सारे रोमांटिक मूड को ख़राब कर दिया।" रितेश ने टोस्ट पर मक्खन लगाते हुए कहा।
"छोड़ो तुम उनकी बातें, हम अपना मूड क्यों ख़राब करें।" सुकन्या ने चाय का प्याला रितेश को देते हुए कहा।
"तुम ठीक कह रही हो। चलो केम्पटी फॉल चलते हैं। पहले तो काफी सीढ़ियां थी, अब सुना है कि रोपवे है। अच्छी जगह है। बच्चों को भी अच्छा लगेगा।"


नाश्ता करने के बाद कॉटेज से बाहर आये तब तक पडोसी कॉटेज का झगड़ा सुलट गया था। पन्द्रह बीस जनो का समूह लग रहा था जो अब लॉन में चाय पी रहा था। रितेश ने उन पर नज़र डाली। ग्रुप में रानी भी थी। रितेश ने एक नज़र से रानी को देखा और पैर रुक गए। रितेश को रुका देख सुकन्या चौंक गई क्योंकि रितेश रानी को देख रहा था। सुकन्या का दिल तेजी से धड़कने लगा। वह सोचने लगी क्या रितेश फिर रानी की तरफ आकर्षित होगा, उसकी याद में फिर लिप्त होगा? उसकी सोच तब टूटी जब रितेश ने सुकन्या का हाथ पकड़ कर कहा "चलो सुकन्या देर हो जाएगी।"
टैक्सी में रितेश खिड़की से बाहर पहाड़ियों को देख रहा था। "क्या सोच रहे हो। वो रानी थी ?"
"हां, रानी थी।" रितेश ने हौले से जवाब दिया।
"फिर।" सुकन्या के स्वर में चिंता थी।
"फिर कुछ नहीं, जहां जा रहें हैं। उसके बारे में सोचो। रानी कल थी। आज किसी और की है और मैं और तुम आज हैं। हमें आज देखना है। तुम दिमाग पर अधिक दबाव मत डालो।" कह कर रितेश ने बात को समाप्त किया।

पूरा दिन केम्पटी फॉल में पिकनिक में हंसी ख़ुशी के साथ बीता। दोनों बच्चों सलोनी और सोलन ने खूब मौज मस्ती की। पानी में धमा चौकड़ी मचाते रहे। रितेश बच्चों के साथ बच्चा बन हंसता खेलता रहा।

रात को जब बच्चे सो गए तब रितेश कमरे से बाहर लॉन में कुर्सी खींच कर बैठ गया।

"बाहर ठंड है। अंदर जाओ।" सुकन्या ने रितेश को कहा।
"अधिक ठंड नहीं है। ऐसा मौसम दिल्ली में कहां मिलता है। आयो तुम भी बैठो।" रितेश ने सुकन्या को कुर्सी पर बैठने को कहा।
"मैं शॉल लेकर आती हूं।" कह कर सुकन्या ने शॉल निकाली और रितेश को पहना दी।
"सुकन्या, चांद को देखो कैसे बादलों में से निलकता है और छुप जाता है। हलकी-हलकी ठंड के बीच दूर पहाड़ियों पर से झिलमिलाती रौशनी मूड को रोमांटिक बना रही है।"
"हां रितेश वो तो है।" सुकन्या की धीमी आवाज़ पर रितेश ने सुकन्या को देखा और अपनी ओर खींचा। "क्या बात है, कुछ उलझी सी लग रही हो।"
'तुम बुरा मानो तो एक बात पूछूं।" सुकन्या ने डरते हुए पूछा।
"पूछो, पत्नी पति से कुछ भी पूछ सकती है।"
"वो रानी को क्या अब भी याद करते हो?"
"नहीं, परन्तु तुम यह क्यों पूछ रही हो। क्या तुमको लगता है कि मैं रानी को अभी तक नहीं भूला?" कह कर रितेश ने सुकन्या के गाल पर चुम्बन अंकित कर दिया।
"जैसे तुम आज सुबह रानी को देख रहे थे, मुझे लगा कि?
"क्या लगा?"
"कुछ नहीं।"
"कुछ तो जरूर बात है जो तुम छुपा रही हो।"
"जब शादी हुई थी तब तुम अक्सर प्रेम में रानी बुदबुदाते थे। इसलिए पूछ लिया।"
रितेश कुछ सोचने लगा। "परन्तु इस बात का तुमने कभी जिक्र नहीं किया। आज अचानक से क्यों?"
"रानी को देख कर ङर गई कि कहीं फिर से मेरे से दूर