Friday, November 20, 2015

रानी

गतांक से आगे---

छोटे मामा ने हां में हां मिलाई। "रितेश जीजा जी बिलकुल ठीक कहते हैं। असली प्रेम क्या होता है उसकी अनुभूति विवाह के बंधन में बंधने के बाद होती है। हर रोज़ एक नया और ताज़ा प्रेम। भांजे जीजा जी की बात में दम है। जीजा जी की सुझाई थी तुम्हारी मामी। एक दम शुद्ध देसी घी है तेरी मामी।"

"मामा तुम भी पापा की हां में हां मिला रहे हो। मेरी तो सुनो।"

"हमने सबके भले की सोच कर ही यह निर्णय लिया है। तुम और सुकन्या एक उम्र के हो। दोनों सुन्दर हो और सलोनी तुम्हे अपना पिता समझती है।"

"लेकिन मैं सुकन्या को भाभी की तरह देखता हूं।" रितेश ने रिश्ते को नकारने के लिए कहा।

"रितेश तुम पत्नी की तरह देखो सुकन्या अब तुम्हारी पत्नी है। बस शुभ मुहूर्त निकलवा कर तुम दोनों की शादी होनी है। तब तक समय है पत्नी की तरह देखना आरम्भ करो, क्योंकि यही हमारे परिवार के हित में है। हम बिलकुल नहीं चाहते कि हमारी इज़्ज़त और दौलत कहीं बाहर जाए। कभी कभी अपना जीवन परिवार के लिए कुर्बान करना पड़ता है। हर ख्वाहिश पूरी हो यह ज़रूरी नहीं। आज तुम किसी से शादी करना चाहते हो, यदि तुम्हारा भाई जीवित होता तब जरूर तुम्हारी चाहत सम्पूर्ण होती परन्तु अब हालात कुछ जुदा हैं। अपना नहीं परिवार का सोचना है तुम्हे।" रितेश के मां-बाप ने अंतिम शब्द कह दिए। रितेश मज़बूर हो गया। वह गुमसुम रहने लगा। माता-पिता समझते थे कि एक बार शादी हो गई तब धीरे धीरे समय के साथ सब ठीक हो जाएगा। शादी की तैयारियां शुरू हो गई।

रितेश का मन किसी भी काम में नहीं लग रहा था। उसके दिल दिमाग में रानी बसी हुई थी। कैसे उसके स्थान पर भाभी सुकन्या को बिठाए। रानी को भूलना आसान नहीं था। रानी से एक दो बार मिला। रानी कहती रही, रितेश सुनता रहा। घर छोड़ कर रानी के साथ भाग कर अगल दुनिया बसाने का ख्याल आया परन्तु रानी ने समर्थन नहीं दिया।

"जब हमने प्यार किया है तो डरे क्यों। सबके साथ सबके सामने विवाह के बंधन में बंधेंगे। पूरी ज़िन्दगी भगोड़ा नहीं बनना।" रानी घर छोड़ कर भाग कर शादी करने के पक्ष में नहीं थी। "रितेश मेरे परिवार की इज़्ज़त और प्रतिष्ठा है। मैं भाग कर अपने परिवार की मान, प्रतिष्ठा और इज़्ज़त पर बट्टा नहीं लगाउंगी।"

रानी उसके साथ भागने की तैयार नहीं थी। रितेश के माता-पिता सुकन्या के साथ विवाह को आतुर थे। वे रानी को बहू बनाने को तैयार नहीं थे। उनकी अपनी मजबूरी थी। रानी का साथ मिलने पर मज़बूर रितेश भाभी सुकन्या के साथ पवित्र अग्नि के समक्ष सात फेरे लेकर विवाहित हो गया। सात फेरे और सात वचन सुकन्या के साथ ले रहा था लेकिन उसकी आंखों के आगे रानी का खूबसूरत चेहरा रहा था। उसे ऐसा अहसास हो रहा था कि वह सात फेरे सुकन्या के साथ नहीं बल्कि रानी के साथ ले रहा है। वास्तविकता कुछ जुदा थी, विधिवत रूप में उसने सुकन्या को पत्नी स्वीकार किया। घर में सभी प्रसन्न थे कि घर की इज़्ज़त घर में रही और व्यापार का भी बटवारा नहीं हुआ। रितेश के माता-पिता और छोटे मामा सबसे अधिक प्रसन्न थे। रितेश का मन कहीं और तन कहीं। वो क्या कर रहा है उसे खुद अहसास नहीं। बस जैसा परिवार चाह रहा था करता रहा। एक रानी का आसरा था, वो भी साथ निभाने को तैयार नहीं हुई लेकिन मन मष्तिक से भूल जाना भी इतना आसान नहीं था और जो जीवन संगिनी बनी उसे दिल में बसाना आसान नहीं था।

रात कमरे में रितेश पंखे को टकटकी लगा कर देख रहा था। करवट बदली और जिस्म सुकन्या के जिस्म से मिला। मन में रानी के ख्वाबों के साथ सुकन्या को बाहों में लिया। तन सुकन्या के साथ मिल गया परन्तु मन रानी में उलझा हुआ था। उसे इस बात का इल्म नहीं था कि प्रेम के पलों में वह रानी बुदबुदा गया। एक पल को रानी शब्द सुन कर सुकन्या का जिस्म सुन्न हो गया। उसका मन भी विचलित हो गया कि रितेश के मन में आज भी रानी बसी है। क्या उसकी शादी महज औपचारिकता है। तन जुड़ गया है। मन में क्या है, क्या रानी के साथ मन का रिश्ता है। एक सफल विवाहिक जीवन में तन और मन दोनों का जुड़ना ज़रूरी है। अभी तो तन ही जुड़ा है। मन कब जुड़ेगा। सुकन्या ने समय के लिए छोड़ दिया। समय ही घाव देता है और मरहम भी वोही लगता है। शादी के एक साल बाद विधवा हो गई और अब फिर सुहागन। समय की ताकत का उसे अंदाज़ा बखूबी से इस छोटी उम्र में हो चुका था। उसने रितेश से कभी इस बात का जिक्र नहीं किया कि प्रेम में रितेश रानी बुदबुदाता है। वह समझ गई कि रानी अभी भी रितेश के दिल में है। रितेश के साथ तन का सम्बन्ध तो गाड़ा हो गया है परन्तु मन एक होने में समय कुछ और लगेगा।

एक वर्ष बीत गया। रानी का भी विवाह हो गया। सलोनी के भाई सोलन ने प्रदापर्ण किया। परिवार में खुशियां छा गई। माता-पिता की खुशियों का कोई ठिकाना नहीं था। एक पौत्री और एक पौत्र के साथ परिवार सम्पूर्ण हो गया। उससे अधिक ख़ुशी इस बात की थी कि रितेश सुकन्या के करीब गया था। उसका ध्यान अपने से अधिक रखता था। हर छोटी बड़ी बात की फ़िक्र रखता। सुकन्या भी आश्वत थी कि रितेश देर से सही मन से भी उसके समीप रहा है। बीतते समय के साथ रितेश का मन सुकन्या में रम गया। तन के साथ मन भी जुड़ गए थे। सुकन्या ने कभी रितेश से रानी का जिक्र नहीं किया। अपने दांपत्य जीवन और गृहस्थी में कोई विघ्न नहीं लाना चाहती थी। अब उसने रानी कहना भी छोड़ दिया था। विवाह के पहले साल कई बार प्रेम में रानी शब्द रितेश ने बुदबुदाया परन्तु रानी के भी विवाह के बाद रितेश को रानी से कभी मिलने की उम्मीद समाप्त हो गई थी और मन भी सुकन्या के साथ जुड़ गया।

विवाह के बाद विचलित मन के कारण रितेश सुकन्या के साथ हनीमून नहीं गया। फिर अगले वर्ष पुत्र सोलन के जन्म के कारण वर्ष बीतते गए। इन पांच वर्षो में छोटे बच्चों के कारण कभी घूमने नहीं निकले। पहले रितेश की मनोदशा और फिर कभी छोटे बच्चों के कारण या फिर काम की व्यस्तता।  आज पांच साल बाद रितेश ने सुकन्या के साथ हिल स्टेशन घूमने का प्रोग्राम बनाया। सुकन्या ख़ुशी से झूम उठी कि उसकी तपस्या और मौन रहना का फल मिल रहा है। लंबी कठिन परीक्षा का रिजल्ट आया है, एक सौ प्रतिशत अंको के साथ।

सुबह के साढे पांच बजे ट्रेन देहरादून पहुंच गई। ट्रेन से उतर कर प्लेटफॉर्म पर सुकन्या बच्चों और सामान के साथ खड़ी थी। रितेश टैक्सी वाले से बात कर रहा था। सुकन्या की नज़र कुछ दूर खडे एक ग्रुप पर पड़ी जो अपनी कार के आने का इंतज़ार कर रहा था। उनको लेने आने वाली कार लेट हो गई थी और एक युवक कार के ड्राईवर से लड़ रहा था कि उसने ख़ामख्वाह सुबह सुबह प्लेटफॉर्म पर परेड करवा दी और खड़े खड़े इंतज़ार करवा रहा है। ग्रुप में एक लड़की पर नज़र पड़ी और दिल धड़कने लगा। यह तो रानी लग रही है। घूर कर देखा, बिलकुल ठीक पहचाना। यह रानी ही है। क्या यह भी मसूरी जा रही है? सोच कर सुकन्या परेशान हो गई कि कहीं आमना सामना हो गया फिर क्या होगा? रितेश क्या करेगा? जिस मन का जुड़ाव बहुत मुश्किल से हुआ, उसका क्या होगा?
तभी रितेश ने सुकन्या का हाथ पकड़ा "अरे सुबह सुबह नींद नहीं खुली क्या? क्या सोच रही हो? टैक्सी में बैठो। सामान रख दिया और बच्चे भी टैक्सी में बैठ गए हैं।"

रितेश और सुकन्या टैक्सी में बैठे और टैक्सी मसूरी की ओर रवाना हो गई। सुकन्या ने चैन की सांस ली कि रितेश ने रानी को नहीं देखा। एक घंटे के भीतर मसूरी के रिसोर्ट में पहुंच गए। खूबसूरत छोटी छोटी कॉटेज बनी हुई थी। एक छोर की कॉटेज में रितेश और सुकन्या ठहरे। थकान के कारण दोनों बच्चे सो गए। कॉटेज के बाहर लॉन में रितेश बैठ गया और सामने प्रकृति के सौंदर्य निहार कर मुग्ध हो गया। एक लंबे अरसे के बाद सुकून के साथ रितेश छुट्टियां व्यतीत करने आया। सुकन्या नहा कर लॉन में आई और रितेश के गले बाहें डाल कर उसपर झुक गई। काले घने बाल उसके मुख पर बिखरा दिए। रितेश ने सुकन्या का मुख नीचे कर चूम लिया। चुम्बन के बाद खिलखिला कर सुकन्या पीछे हट गई।

"क्या हो गया। खुले में कोई देख लेगा।"
"यहां हमारे सिवा और कोई नहीं।"
"मूड में लग रहे हो।"
"मैं सोच रहा हूं कि पहले क्यों नहीं आए। प्रकृति का सौंदर्य, सफ़ेद आते जाते बादल, गुलाबी ठंडक के मौसम से रोमांस दिल में अपने आप उमड़ने लगता है।"
"जनाब को फुरसत ही नहीं मिली तो कोई बात नहीं। अब गए हैं तो मौसम, प्रकृति के सौंदर्य का लुत्फ़ लीजिये।"
"लुफ्त सिर्फ तुम्हारे प्यार का। खुले बालों में कयामत ढा रही हो।"

दोनों के प्रेम वार्तालाप में ब्रेक बच्चों के उठने के साथ लगा। दोनों कमरे में मम्मी-मम्मी पापा-पापा चिल्लाने लगे। सुकन्या भाग कर बच्चों के पास गई। रितेश भी नहाने के लिए गुसलखाने चला गया। रितेश के बाद दोनों बच्चे सलोनी और सोलन भी नहा कर तैयार हो गए। वे सब नाश्ता कर रहे थे कि पास की कॉटेज से शोर आने लगा, जैसे कोई लड़ रहा हो। वो आपस में बात कर रहे थे कि किस बेवकूफ ने इंतज़ाम किया। पहले देहरादून रेलवे स्टेशन पर कार देर से पहुंची, फिर रास्ते में ख़राब। दो घंटे बाद दूसरी कार आई। दो कारें और दोनों ख़राब हो गई। सारा मूड ख़राब कर दिया। एक घंटे का सफ़र पांच घंटे में पूरा हुआ। एक पैसा नहीं देंगे। ट्रेवल एजेंसी से लड़ रहे थे कि कोई पेमेंट नहीं करेंगे। टैक्सी वालों के साथ पेमेंट देने के कारण झगड़ा हो रहा था। रिसोर्ट के मैनेजर बीच बचाव कर रहे थे।

"क्या अनपढ़ गंवार और फूहड़ लोग साथ के कॉटेज में गए है। सारे रोमांटिक मूड को ख़राब कर दिया।" रितेश ने टोस्ट पर मक्खन लगाते हुए कहा।
"छोड़ो तुम उनकी बातें, हम अपना मूड क्यों ख़राब करें।" सुकन्या ने चाय का प्याला रितेश को देते हुए कहा।
"तुम ठीक कह रही हो। चलो केम्पटी फॉल चलते हैं। पहले तो काफी सीढ़ियां थी, अब सुना है कि रोपवे है। अच्छी जगह है। बच्चों को भी अच्छा लगेगा।"

नाश्ता करने के बाद कॉटेज से बाहर आये तब तक पडोसी कॉटेज का झगड़ा सुलट गया था। पन्द्रह बीस जनो का समूह लग रहा था जो अब लॉन में चाय पी रहे थे। रितेश ने उन पर नज़र डाली। ग्रुप में रानी भी थी। रितेश ने एक नज़र से रानी को देखा और पैर रुक गए। रितेश को रुका देख सुकन्या चौंक गई क्योंकि रितेश रानी को देख रहा था। सुकन्या का दिल तेजी से धड़कने लगा। वह सोचने लगी क्या रितेश फिर रानी की तरफ आकर्षित होगा, उसकी याद में फिर लिप्त होगा? उसकी सोच तब टूटी जब रितेश ने सुकन्या का हाथ पकड़ कर कहा "चलो सुकन्या देर हो जाएगी।"

टैक्सी में रितेश खिड़की से बाहर पहाड़ियों को देख रहा था। "क्या सोच रहे हो। वो रानी थी ?"
"हां, रानी थी।" रितेश ने हौले से जवाब दिया।
"फिर।" सुकन्या के स्वर में चिंता थी।
"फिर कुछ नहीं, जहां जा रहें हैं। उसके बारे में सोचो। रानी कल थी। आज किसी और की है और मैं और तुम आज हैं। हमें आज देखना है। तुम दिमाग पर अधिक दबाव मत डालो।" कह कर रितेश ने बात को समाप्त किया।

पूरा दिन केम्पटी फॉल में पिकनिक में हंसी ख़ुशी के साथ बीता। दोनों बच्चों सलोनी और सोलन ने खूब मौज मस्ती की। पानी में धमा चौकड़ी मचाते रहे। रितेश बच्चों के साथ बच्चा बन हंसता खेलता रहा।

रात को जब बच्चे सो गए तब रितेश कमरे से बाहर लॉन में कुर्सी खींच कर बैठ गया।

"बाहर ठंड है। अंदर जाओ।" सुकन्या ने रितेश को कहा।
"अधिक ठंड नहीं है। ऐसा मौसम दिल्ली में कहां मिलता है। आयो तुम भी बैठो।" रितेश ने सुकन्या को कुर्सी पर बैठने को कहा।
"मैं शॉल लेकर आती हूं।" कह कर सुकन्या ने शॉल निकाली और रितेश को पहना दी।
"सुकन्या, चांद को देखो कैसे बादलों में से निलकता है और छुप जाता है। हलकी-हलकी ठंड के बीच दूर पहाड़ियों पर से झिलमिलाती रौशनी मूड को रोमांटिक बना रही है।"
"हां रितेश वो तो है।" सुकन्या की धीमी आवाज़ पर रितेश ने सुकन्या को देखा और अपनी ओर खींचा। "क्या बात है, कुछ उलझी सी लग रही हो।"
'तुम बुरा मानो तो एक बात पूछूं।" सुकन्या ने डरते हुए पूछा।
"पूछो, पत्नी पति से कुछ भी पूछ सकती है।"
"वो रानी को क्या अब भी याद करते हो?"
"नहीं, परन्तु तुम यह क्यों पूछ रही हो। क्या तुमको लगता है कि मैं रानी को अभी तक नहीं भूला?" कह कर रितेश ने सुकन्या के गाल पर चुम्बन अंकित कर दिया।
"जैसे तुम आज सुबह रानी को देख रहे थे, मुझे लगा कि?
"क्या लगा?"
"कुछ नहीं।"
"कुछ तो जरूर बात है जो तुम छुपा रही हो।"
"जब शादी हुई थी तब तुम अक्सर प्रेम में रानी बुदबुदाते थे। इसलिए पूछ लिया।"
रितेश कुछ सोचने लगा। "परन्तु इस बात का तुमने कभी जिक्र नहीं किया। आज अचानक से क्यों?"
"रानी को देख कर ङर गई कि कहीं फिर से मेरे से दूर चले जाओगे।" सुकन्या की आंखों में आंसू गए।
"चल पगली, अंदर चल, बिस्तर पर बात करते हैं।"
बिस्तर पर रितेश ने सुकन्या को बांहों में ले लिया और गालों पर चुम्बन अंकित करते हुए कहा।
"इसमें कोई छुपी हुई बात नहीं है कि मैं रानी से विवाह करना चाहता था परन्तु परिवार के दबाव में तुमसे शादी की। मैं रानी के साथ घर से भागने को तैयार था, परन्तु रानी नहीं भागी। मैं उसको भूल नहीं सका। यह भी सत्य है कि तुमसे प्रेम के समय मैं कई बार रानी के ख्यालों में होता था और इसी कारण हो सकता है कि रानी को याद करते हुए बुदबुदा जाता हूंगा। मुझे ऐसा लगता था कि जैसे मैं तुम्हे नहीं रानी को प्रेम कर रहा हूं। फिर रानी का भी विवाह ही गया और सोलन हमारे जीवन में गया। मुझे हकीकत मालूम हो गई कि अब रानी से कभी नहीं मिल सकता और धीरे धीरे रानी को भूल गया। आज रानी को देखा, परन्तु कोई पुराना अहसास वापिस नहीं आया। तुम विश्वास रखो, रानी और मैं नदी के दो छोर थे, जो कभी एक नहीं हो सकते।" कह कर रितेश ने सुकन्या को अपने से चिपका लिया। "लेकिन तुमने पहले यह बात क्यों नहीं कही थी।"

"मैं डरती थी। आपको खोना नहीं चाहती थी।"

"ङर दिल से निकाल दो। तन और मन दोनों जुड़े हुए है। जुड़े रहेंगे। कोई अगल नहीं कर सकता। पिताजी और छोटे मामा सही कहते थे कि विवाह के बाद जैसे जैसे साल बीतते है, प्रेम अधिक गाड़ा होता जाता है।"

फिर दोनों के तन मिले पूरे मन के साथ। प्रेम में सुकन्या की आंखों में आंसू गए। आंसू गालों पर लुढ़कने लगे। रितेश ने आंसुओं पर चुम्बन लेते हुए कहा।

"रानी, वो नहीं तू है मेरी रानी। आज से सुकन्या रानी। मेरी रानी सिर्फ तुम हो सुकन्या।"
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