Wednesday, December 23, 2015

प्रस्ताव

ऑफिस का समय सुबह साढे नौ बजे से शाम : बजे का है। गुरुदत्त सबसे पहले ऑफिस आते है। अक्सर नौ बजे ऑफिस आते है। यदि देर भी होती है तब भी साढे नौ बजे से पहले ऑफिस में अपनी सीट पर मिलते हैं। हर रोज़ का नियम, आते एक गिलास पानी पीना, फिर पांच मिनट आंख बंद करके ध्यान में बैठना और काम आरम्भ करना। जनरल मैनेजर गुरुदत्त टैक्स विभाग के हेड है। उनका स्टाफ भी ऑफिस के बाकी स्टाफ की तरह दस बजे तक ही आता है। आधे घंटे की जो रियायत मिलती हैं, उसका हर कोई फायदा उठाना चाहता है। हर किसी के पास कहें तो बहाना तैयार होता है, जैसे ट्रैफिक जाम, बच्चों के स्कूल जाना, उनकी स्कूल बस नहीं आई या छूट गई या फिर तबियत ख़राब। हां शाम को साढे पांच बजे से सब ऑफिस से जाने के लिए तैयार रहते हैं कि छः बजे और दो मिनट में पूरा ऑफिस खाली। गुरुदत्त भी साढे छः बजे तक निकल जाते थे, परन्तु कभी जल्दबाज़ी नहीं करते। गुरुदत्त का स्वभाव हंसमुख और आकर्षक व्यक्तितव। जवान से बूढे सभी सहपाठियों से हंस कर बात करते। काम में पूरी तरह समर्पित गुरुदत्त की हर जन तारीफ करता था। गुरुदत्त का एक मूलमंत्र है काहू से दोस्ती काहू से बैर, सब एक समान। हमेशा काम में डूबे रहना और सबको प्रेरित करना।

उम्र पचपन की परन्तु लेकिन दिखते अपनी उम्र से 10 वर्ष छोटे। पहली बार मिलने और देखने से कोई कह नहीं सकता कि उम्र पचपन की, बेटा-बेटी है जिन्होंने दादा-नाना की पदवी भी दे दी। मजाक में कहते थे कि बाल विवाह हुआ था और बच्चों का भी बाल विवाह कर दिया। बाल आधे काले, आधे सफ़ेद खिचड़ी नुमा और थोड़े उड़े हुए भी। ये तो उम्र के साथ हुए है। आजकल तो जवान लड़कों के बाल शादी से पहले सफ़ेद हो जाते हैं और गंजे भी। गुरुदत्त प्रकृति में विश्वास रखते है, अतः कभी भी बालों में रंग नहीं लगाया।

ऑफिस में नई एचआर हेड उर्वशी नियुक्त हुई। उर्वशी ने देखा कि कमाल का ऑफिस है, कोई समय पर आता नहीं, चला जरूर जाता है। उसने मैनेजिंग डायरेक्टर से इस विषय पर बात की कि ऑफिस में समय निष्ठा की अति आवश्कयता है। जिसकी जब मर्जी होती है आता है और चला जाता है। मैनेजिंग डायरेक्टर ने उर्वशी को नियम बनाने और सख्ती के साथ पालन करने और करवाने को कहा। उर्वशी ने नियम बना दिए।

"स्टाफ को सूचित किया जाता है कि ऑफिस का समय सुबह साढे नौ बजे से शाम छः बजे का है। सुबह सिर्फ पंद्रह मिनट की रियायत दी जायेगी उसके बाद आने पर आधे दिन की छुट्टी काट ली जायेगी। ऑफिस के काम से बाहर जाने पर एचआर को सूचित करना अनिवार्य है।"

सूचना पढ़ कर पूरे ऑफिस में खलबली मच गई। सबको देर से आने की आदत थी। गुरुदत्त शांत रहे और अपने नियमानुसार ऑफिस सबसे पहले आते रहे। गुरुदत्त ने सूचना पढ़ कर अपने स्टाफ को हिदायत दी कि जब घर से सीधे बैंक, इनकम टैक्स ऑफिस जाना हो तब शाम को जाने से पहले -मेल से गुरुदत्त को सूचित करेंगे। गुरुदत्त उसे एचआर को भेज देंगे। एचआर को सूचना से मतलब है कि कोई घर बैठा है या फिर छुट्टी पर हो और ऑफिस में उपस्थिति लगी है। गुरुदत्त की सूझ-बूझ से एचआर से टकराव की स्थिति नहीं बनी लेकिन दूसरे जल-भुन गए कि उन्हें अब समय से आना पड़ता है जबकि पहले मनमाने समय से आते थे। मैनेजिंग डायरेक्टर खुश हो गए और एचआर हेड उर्वशी की छः महीने बाद ही वेतनवृद्धि कर दी। ऑफिस में एक व्यवस्था की सख्त ज़रूरत थी जिसे उर्वशी ने लागू करवा दिया।

जहां ऑफिस के दूसरे जने उर्वशी से जलते भुनने लगे थे जिसका अहसास उर्वशी को भी था लेकिन उसके हर उस काम जो कंपनी के हित में होता, मैनेजिंग डायरेक्टर उसका समर्थन करते और पूरा ऑफिस इस बात को समझ गया कि पुराने दिन अब बदल चुके हैं।

गुरुदत्त ने हमेशा बदलाव का समर्थन किया। उर्वशी इस कारण गुरुदत्त की तारीफ करती और इज़्ज़त भी। ऑफिस नियमों के अनुसार चलना चाहिए। गुरुदत्त बेकार की गपशप में अपना समय कभी भी खर्च नहीं करते थे। कर्म ही पूजा है गुरुदत्त के लिए। काम में हमेशा डूबे रहते देखती थी उर्वशी।

देर से आने पर छुट्टियां कटने लगी तब पीड़ित मैनेजिंग डायरेक्टर के पास समाधान के लिए गए लेकिन निराशा ही हाथ आई। उन्होंने दो टूक कह दिया कि ऑफिस को दुरुस्त करने के लिए उर्वशी को नियुक्त किया है, जिसमें वो सफल हुई है। गुरुदत्त को देखो, कुछ उससे सीखो। हमेशा नियमों के दायरे में चलता है और समय से पहले ऑफिस आता है। सबको सुविधाएं चाहियें लेकिन दायित्व कोई नहीं समझता। सुबह समय से पहले घर से निकलना सीखो।

धीरे-धीरे सभी समय से ऑफिस आने लगे और ऑफिस में कार्यशैली को सुधारने के लिए कई नए नियम बनाये गए और ऑफिस व्यवस्था में सुधार किये।

गुरुदत्त ऑफिस में अब भी सबसे पहले आते थे। उर्वशी कोशिश करके भी गुरुदत्त से पहले ऑफिस नहीं पाती थी। हमेशा दूसरे नंबर पर रहती। ऑफिस में जहां दूसरा स्टाफ काम के बीच अपने घर, परिवार और रिश्तेदारों  की बातें करते रहते पर उर्वशी ने गुरुदत्त को अपने परिवार के बारे में बात करते कभी नहीं सुना।

सोमवार की सुबह उर्वशी ऑफिस पहुंची। गुरुदत्त ऑफिस में नहीं थे। उनके केबिन की बत्ती बंद थी। एक साल बाद में गुरुदत्त से पहले आई हूं। यह सोच कर उर्वशी खुश हुई, लेकिन ख़ुशी दो पल की थी। जैसे कंप्यूटर खोला, पहली -मेल गुरुदत्त की थी कि आवश्यक काम से दो दिन की छुट्टी का आवेदन था। उफ़ गुरुदत्त से पहले ऑफिस आने का सपना ही रह गया। अगले दिन गुरुदत्त के सहायक विनय कुमार ने एलान कर दिया कि गुरुदत्त साहब नाना बन गए है और इस ख़ुशी में मिठाई बांटने को कहा है। थोड़ी देर में मिठाई बंटने लगी। ऑफिस में यही मुद्दा छा गया कि गुरुदत्त इतनी छोटी उम्र में नाना बन गए। विनय कुमार बताने लगे कि सर जी दादा तो पहले से हैं, अब नाना बन गए है। इतनी छोटी उम्र में दादा और नाना बनने पर उर्वशी को कौतुहल हुआ। सभी मिठाई खाते हुए हंसी-मज़ाक कर रहे थे कि गुरुदत्त का बाल विवाह हुआ था और अपने बच्चों का भी बाल विवाह किया है। पचपन की उम्र में हमारे बच्चे तो अभी स्कूल, कॉलेज में पढ़ रहे हैं। दो दिन बाद गुरुदत्त का एक और -मेल आया और उन्होंने अपनी छुट्टी एक सप्ताह तक बढ़वा ली।

विनय कुमार ने कहा कि वह पिछले पांच वर्षो से इस ऑफिस में काम कर रहा है। इतनी लंबी छुट्टी सर जी सिर्फ एक बार ली थी जब वे दादा बने थे और अब नाना बनने पर लंबी छुट्टी ली है।

हालांकि गुरुदत्त छुटी पर थे लेकिन फ़ोन पर अपने सहायकों से बात करते रहे। एक सप्ताह की छुटी के बाद जब गुरुदत्त ऑफिस आए तब सभी ने गुरुदत्त के केबिन में एक साथ धावा बोल दिया कि सूखी मिठाई से छुटकारा नहीं होगा, पार्टी चाहिए। दादा-नाना बन गए। सभी मुरादे पूरी हो गई छोटी सी उम्र में। और क्या तमन्ना हो सकती है किसीकी।

"ज़रूर दावत दूंगा सबको। आज शाम को नाश्ता मेरी तरफ से।" गुरुदत्त ने उर्वशी से कहा "आप मेन्यू बना लें और कैफेटेरिया में नाश्ते का प्रबंध कीजिये। एटीएम से रकम निकाल कर अभी थोड़ी देर में देता हूं।"

उर्वशी ने आज पहली बार देखा कि गुरुदत्त ने कोई काम नहीं किया, अपने सहायकों से बात-चीत की और कुछ फ़ोन और शाम के नाश्ते के मेन्यू पर उर्वशी से चर्चा।

शाम को नाश्ते के समय उर्वशी सबसे बातें कर रही थी कि ऑफिस में पिकनिक नहीं होती। काम के अलावा कुछ नहीं सूझता। परिवारो  को एक दूसरे के साथ मिलने का मौका मिलता है। नई ऊर्जा और उत्साह उत्पन्न होता है। काम करने की क्षमता बढ़ती है।

"उर्वशी जी, आप एचआर हेड हैं। सुझाव मैनेजमेंट को दीजिये। जब आपके अच्छे सुझाव के निर्णय कंपनी ने माने हैं, आपका यह सुझाव भी कंपनी मानेगी, मेरा ऐसा सोचना है।" गुरुदत्त ने उर्वशी को कहा।

"पिकनिक दो या तीन दिन की शहर से बाहर हो तब एक अच्छी सैर बनेगी और यादगार रहेगी, एक दूसरे के परिवार से मिलने जुलने का एक अच्छा अवसर मिलेगा। हम अपने सहपाठियों को मित्र नहीं बनाते। बाहर जाने से मित्रता के अवसर मिलते हैं।" उर्वशी ने कहा और गुरुदत्त की प्रतिक्रिया का इंतज़ार करने लगी।

कुछ पल सोच कर गुरुदत्त ने उर्वशी को कहा "उर्वशी, आपका विचार अच्छा है। दो दिन की पिकनिक तो संभव है। शनिवार और रविवार ऑफिस बंद रहता है। दो दिन की पिकनिक आयोजित कीजिये। ऑफिस एक अतिरिक्त दिन शुक्र या सोम की अनुमति नहीं दे सकेगी। कोई ज़रुरी काम हो सकता है। मैं भी इसके पक्ष में नहीं हूं।"

कुछ सोच कर उर्वशी ने बात आगे बड़ाई "यदि शुक्रवार की रात को हम चले और रवि की रात वापिस जाएं तब आप सुझाव दें।"

"उर्वशी यह विचार सोचने योग्य है। ऑफिस छः बजे बंद होता है। हम यहां एकत्रित हो सकते है। मसूरी एक अच्छा विकल्प हो सकता है। रात बारह बजे बस में चले, सुबह छः बजे तक मसूरी पहुंच जाएंगे। शनि पूरा दिन और रवि का आधा दिन। रवि दोपहर बाद वापिसी के लिए चले तो सात आठ बजे तक वापिसी संभव हो सकती है और अगले दिन सब ऑफिस सकते हैं। आप और कोई जगह जिसका सफ़र पांच, छः घंटे तक है, चुन सकती है। मुझे आप पर पूरा भरोसा है। आपका चुनाव अच्छा होगा और पिकनिक प्रबंध उत्तम रहेगा।"

उर्वशी ने पिकनिक के लिए उचित स्थान चुने और ऑफिस में -मेल से सबको सूचित किया और सुझाव मांगे ताकि सबकी सहमति से पिकनिक के स्थान का चुनाव हो सके। शुरू में किसी ने रूचि नहीं दिखाई। दो छुट्टी के दिन ऑफिस पिकनिक में व्यतीत हो जायेंगे और खर्च अलग से। इस कारण कोई विशेष रूचि किसी में उत्पन्न नहीं हुई।
पिकनिक में अरुचि देख उर्वशी ने एक दिन गुरुदत्त से बात की। गुरुदत्त ने परामर्श दिया कि इस विषय पर मैनेजमेंट से बात की जाए। पिकनिक का पूरा या आधा खर्च कंपनी सहन करे तब स्टाफ की अवश्य रूचि उत्पन्न होगी। पुरानी कंपनी में पिकनिक का पूरा खर्च कंपनी का होता था। उर्वशी बात करे, यदि सहायता की आवश्कयता हो तो वह भी बात करेगा।

पूरे ऑफिस में उर्वशी को सिर्फ गुरुदत्त की सोच सकारात्मक लगी। वह गुरुदत्त के साथ अधिक समय व्यतीत करने के अवसर ढूंढने लगी।

"आप कहां रहते हैं?"
"रोहिणी, और आप उर्वशी।" गुरुदत्त ने उर्वशी से उसका घर भी पूछ लिया।
"जनकपुरी।"
"कैसे आती हो, मेट्रो पर या कार से?" गुरुदत्त ने उर्वशी से पूछा।
"कार से। ट्रैफिक के कारण समय पर ऑफिस पहुंचने में दिक्कत होती है। शाम को अधिक ट्रैफिक होता है। आप कैसे आते है सर?"
"कभी कार से तो कभी मेट्रो से। मेट्रो में भीड़ जरूर होती है, परंतु नियत समय पर ऑफिस पहुंच जाता हूं। मुझे तो कश्मीरी गेट पर मेट्रो भी बदलनी पड़ती है। यदि कार में आता हूं तब सुबह जल्दी घर से निकलता हूं। शाम को तो कुछ नहीं कर सकते। लंबा सफ़र है, कहीं कहीं बम्पर से बम्बर का ट्रैफिक मिल ही जाता है।"
"मेट्रो में भीड़ बहुत होती है ?" उर्वशी ने गुरुदत्त से पूछा।
"होती तो है सुबह और शाम के समय ऑफिस आने-जाने के समय, परंतु कुछ अच्छा है कि ट्रैफिक का कोई झंझट नहीं और समय पर ऑफिस पहुंच जाते है। कभी-कभी एक दो अधिक भीड़ वाली मेट्रो छोड़ देता हूं। एक बात और कार के पेट्रोल और रख रखाव से सस्ती मेट्रो पड़ती है। एक दो बार आइए, माफिक आए तो शुरुआत में सप्ताह में एक दो दिन आने की कोशिश कीजिये, जैसा मैं करता हूं। तीन दिन मेट्रो में और दो दिन कार मैं।"

गुरुदत्त का सुझाव उर्वशी को पसंद आया। अगले ही दिन वह मेट्रो से ऑफिस आई और शाम को जाने के समय गुरुदत्त से पूछा "सर आप आज कैसे जा रहे हैं, कार से या मेट्रो से?"
"आज तो कार है।"
"आप मुझे रास्ते में छोड़ सकते हैं? उर्वशी ने गुरुदत्त के साथ जाने का आग्रह किया।
"जरूर, जहां आप कहे, परंतु आप जनकपुरी रहती हैं। वहां तो नहीं जा सकता। रिंग रोड से जाता हूं। आपको नज़दीक कहां पड़ेगा?"
"सर राजा गार्डन से आप जाएंगे, वही मेट्रो स्टेशन के नीचे छोड़ देना, वहां से मेट्रो पकड़ लूंगी।"
"बिलकुल ठीक। राजा गार्डन से जनकपुरी नज़दीक है। आपको कोई परेशानी नहीं होगी।"
"आपको भी सर।"
कार में बैठते गुरुदत्त ने म्यूजिक की सीडी लगा दी।
"आपको संगीत का शौक लगता है।"
"संगीत के बिना जीवन अधूरा है। दो फायदे होते हैं। एक तो सफ़र अच्छा बीत जाता है और शौक भी पूरा होता है।"
"किस किस्म का म्यूजिक पसंद करते हैं आप?"
"मैं हर किस्म का संगीत सुनता हूं। फ़िल्मी गीत, भजन, कव्वाली, ग़ज़ल सब सुनता हूं।"
पहले दिन तो संगीत के ऊपर चर्चा होती रही।
"अपनी पसंद आप पर थोप रहा हूं। पुराने गाने अधिक है। कहो तो एफएम रेडियो लगा देता हूं। आजकल युवा एफएम रेडियो अधिक पसंद करते हैं।"
"आपकी संगीत की पसंद अच्छी है। गीतों का चुनाव अच्छा है।"
बातों बातों में गंतव्य गया और उर्वशी राजा गार्डन उतर गई। अगले दिन शाम को उर्वशी ने गुरुदत्त से फिर पूछा कि कैसे जाएंगे?”
"आज तो मेट्रो से।"
"क्या मैं भी आपका साथ मेट्रो में दे सकती हूं?"
"कैसे लगा मेट्रो का अनुभव?" गुरुदत्त ने उर्वशी से पूछा।
"कुछ खट्टा मीठा रहा। आदत नहीं है न।"
"आपको राजीव चौक से जनकपुरी की मेट्रो बदलनी पड़ेगी। मैं कश्मीरी गेट से रोहिणी की मेट्रो बदलता हूं।"

उर्वशी अब हर रोज़ गुरुदत्त के साथ शाम को या तो कार में या फिर मेट्रो में जाने लगी। पूरे रास्ते वह गुरुदत्त से बातचीत करती रहती। कभी ऑफिस की और कभी व्यक्तिगत। कुछ दिन बाद उर्वशी व्यक्तिगत बातें अधिक करने लगी। अपने बारे में बताती। गुरुदत्त के बारे में पूछती। गुरुदत्त शांति से उर्वशी के प्रश्नो के उत्तर देता।

उर्वशी की उम्र चालीस वर्ष। आकर्षक व्यक्तित्व, लंबा कद पांच फीट आठ इंच की लंबाई अधिक ही मानी जाती है। भारत वर्ष में लड़कियों की लंबाई पांच फ़ीट से पांच फ़ीट चार इंच तक रहती है। पांच फ़ीट आठ इंच की लंबाई की लड़कियां ऊंची कहलाती हैं। रंग सांवला पर नैन नक्श तीखे, कोई भी पहली नज़र में फ़िदा हो सकता है। उम्र चालीस परंतु तीस से ऊपर नहीं लगती थी। मेट्रो में भीड़ के कारण साथ साथ खड़े खड़े वह गुरुदत्त से सट जाती थी। भीड़ का कुछ बहाना होता था चाहत उर्वशी की गुरुदत्त को छूने की होती थी। मेट्रो में जब सीट मिलती तब भी गुरुदत्त से सट कर बैठती।

गुरुदत्त ने एक दिन कार में घर वापिस जाते हुए उर्वशी से पूछ लिया। "आपने शादी क्यों नहीं की?"
"सगाई हुई थी, घर की आर्थिक हालात सही नहीं थे। बड़ी बहन की शादी में रकम लगी, फिर पिताजी बीमार हो गए, इलाज़ में सारी जमा पूंजी समाप्त हो गई। दहेज़ के ऊपर सगाई टूट गई। पिताजी गुज़र गए। मम्मी के साथ रहती हूं। शादी कर ली तो उनको कौन देखेगा? इस कारण शादी नहीं की।"

"ऐसी बात नहीं है कि शादी के बाद देखभाल नहीं हो सकती। लड़का तुम्हारे घर रह सकता है और मम्मी की तरफ से बेफिक्र हो सकती हो। तुम्हारे सामने मां रहेगी।"
"बहुत मुश्किल होता है घर जमाई ढूंढना।"
"ऐसी बात नहीं है, तुम्हारे हालात को देख कर हर कोई घर जमाई बनने को राजी हो जायेगा।"
"उम्र भी हो गई है। लड़का भी आसानी से नहीं मिलेगा।"
"आजकल तो तीस बत्तीस में शादियां करते है युवा लोग। कोई दिक्कत नहीं होगी। तुम दिखने में सुन्दर और आकर्षक व्यक्तित्व की स्वामिनी हो। कोई दिक्कत नहीं होगी। सोचो इस विषय पर।"
"मेरी उम्र चालीस है। इस उम्र में शादी आसानी से नहीं होती।"
चालीस सुन कर गुरुदत्त एक पल के लिए चौंका। "उर्वशी, चालीस, मजाक तो नहीं कर रही हो। मैं तो तुम्हें तीस का समझ रहा था।"
"मजाक नहीं चालीस की हो गई हूं।"
"फिर भी हो जायेगी। चिंता करो। जहां चाह वहां राह। एक वार इरादा करो। सब रास्ते खुलते जाएंगे।"
"आप की छोटी उम्र में शादी हो गई थी। पचपन की उम्र में दादा और नाना बन गए। पचपन के आप लगते नहीं हो।"
"उम्र पचपन की है, लगने या ना लगने से कोई अंतर नहीं पड़ता। मुझे कोई शादी तो करनी नहीं।" कुछ हंसते हुए गुरुदत्त ने कहा।
बातों बातों में गंतव्य गया और उर्वशी राजा गार्डन मेट्रो स्टेशन पर उतर गई।

अगली बार कार में फिर उर्वशी ने गुरुदत्त से उसके निजी जीवन के बारे में पूछना चाहा। गुरुदत्त ने बताया कि बाइस वर्ष की उम्र में एलएलबी की डिग्री लेने के बाद उसने नौकरी शुरू की। तेईस की उम्र में विवाह हो गया और फिर चार साल में पूरा परिचार। एक पुत्र और पुत्री। ज़िन्दगी अपनी पटरी पर दौड़ रही थी कि अचानक उस समय ब्रेक लगी जब विवाह के पचीस वर्ष बाद पत्नी की सेहत बिगड़ने लगी। उसे कैंसर हो गया जिसके बारे में बहुत देर बाद पता चला। शुरू में पता चलता तो कुछ कर सकता। लेकिन कुदरत को कुछ और मंजूर था। पांच वर्ष पहले वो मुझे छोड़ गई। बच्चे अपने पैरों पर खड़े हो गए तब उनको विवाह की सलाह दी। पहले तो उन्होंने पच्चीस की उम्र में शादी के लिए मना किया पर मैंने उन्हें अपना उदहारण दिया कि मैंने तेईस में शादी की। चार साल बाद दोनों बच्चों का जन्म हुआ और मेरे पचास की उम्र में दोनो बच्चों की पढ़ाई पूरी हुई और अपने पैरों पर खड़े हो गए। मेरे रिटायरमेंट से पहले मैं चिंतामुक्त हो गया। अब कुछ पैसे अपनी रिटायर जिंदगी के लिए बचा लूंगा। यदि तीस पैंतीस की उम्र में शादी हो तो रिटायरमेंट की उम्र में बच्चों की पढ़ाई ही चल रही होगी, इसीलिए मैं तो सबको सलाह देता हूं कि पच्चीस सताईस में शादी कर लो। शुक्र है कि मेरे बच्चों ने मेरी बात का मान रखा।

उर्वशी और गुरुदत्त की उम्र में पंद्रह वर्षो का अंतर है। दोनों एकाकी जीवन बिता रहे हैं। फिर भी बहुत अंतर है दोनों की ज़िन्दगी में। उर्वशी गुरुदत्त में एक सम्पूर्ण व्यक्ति देख रही थी। बिना विवाह के वह अपने मां-बाप के साथ रही, वहीँ गुरुदत्त ने अपना वैवाहिक जीवन सुखमय जिया और चिंता मुक्त जीवन की सांझ को अकेला व्यतीत कर रहा था। उर्वशी अपने पैरों पर खड़ी थी, वो कल गुज़र चुका था, जब आर्थिक कठिनाइयों के तहत विवाह नहीं कर सकी। पिछले दस वर्षो में नौकरी में सफलता की सीढ़ियां चढ़ती रही और आज धन की कोई कमी नहीं और कल की भी चिंता नहीं रही। गुरुदत्त की तुलना में उर्वशी अधिक संपन्न है क्योंकि गुरुदत्त की जमा-पूंजी पत्नी की बीमारी और बच्चों के विवाह में ख़र्च हो गए। गुरुदत्त वर्तमान में जी रहा है और उर्वशी भविष्य की और देखने लगी। विवाह में रूचि होने लगी। एक अच्छा जीवन साथी कौन हो सकता है। गुरुदत्त में उसे सभी खूबियां नज़र आई। उम्र अधिक है, परंतु अपने मन पसंद के जीवन साथी के चुनाव में उम्र का बंधन नहीं होना चाहिए। शादी के लिए कोई भी उम्र हो सकती है। अंतर भी कोई अर्थ नहीं रखता। सफल विवाह और सुखद वैवाहिक जीवन के लिए पति और पत्नी में आपसी समझ बूझ और एक दूजे के लिए समर्पण की आवश्कयता होती है।


जहां एक ओर उर्वशी गुरुदत्त में भावी पति देख रही थी वहीँ गुरुदत्त उर्वशी को सिर्फ एक सहपाठी की तरह देखता था। उर्वशी गुरुदत्त को अपनी तरफ खींचने के लिए प्रयास करने लगी। गुरुदत्त अपने एकाकी जीवन में कुछ पल उर्वशी के साथ बिता कर जीवन की नीरसता दूर करता था। गुरुदत्त का दूसरे विवाह का कोई इरादा नहीं था। वह उर्वशी से बात करने या नज़दीक आने की पहल नहीं करता, लेकिन उर्वशी को मना नहीं करता। जब भी वह नज़दीक आती या बाते करती। जीवन की शून्यता को दूर करने और खालीपन को मिटाने के लिए उर्वशी से मिलता रहता। दोनों का मकसद अगल था, परंतु एकाकी जीवन की नीरसता और खालीपन की चुभन दोनो की थी।

क्रमंश:
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कब आ रहे हो

" कब आ रहे हो ?" " अभी तो कुछ कह नही सकता। " " मेरा दिल नही लगता। जल्दी आओ। " " बस...