Wednesday, December 23, 2015

प्रस्ताव

गतांक से आगे
ऑफिस की पिकनिक के लिए उर्वशी ने मसूरी का चुनाव किया और एक हॉलिडे रिसोर्ट पर कॉर्पोरेट छूट लेकर काफी किफायती रेट पर बुकिंग करवा ली। कंपनी मैनेजमेंट ने पिकनिक का पूरा खर्च उठाने की मंज़ूरी दे दी। पूरा खर्च कंपनी के खाते में सुनते ही सभी कर्मचारियों ने पिकनिक में जाने की मंज़ूरी दे दी। स्वयं, पति या पत्नी और दो बच्चों का खर्च कंपनी के खाते में। सभी पिकनिक का इंतज़ार करने लगे। पिकनिक के लिए शुक्रवार रात बस से चल कर शनिवार सुबह मसूरी पहुंच कर शनिवार का दिन, रात और रविवार दोहपर तक मसूरी में। रविवार लंच करके वापिस दिल्ली के लिए रवाना होकर शाम के आठ, नौ बजे तक वापिसी, ताकि सोमवार सुबह सब ऑफिस तरोताज़ा काम पर लग जाएं।

आखिर वो दिन ही गया। शुकवार सभी जल्दी अपने घरों के लिए निकल पड़े। सबने परिवार के साथ नौ बजे तक ऑफिस पहुंचना था। नौ बजे रात के खाने का प्रबंध किया था। गुरुदत्त ऑफिस में ही रुके रहे। अपना कपड़ों का छोटा बैग सुबह ही ऑफिस ले आये थे। उर्वशी घर चली गई। ऑफिस में गिनती के कुछ जने रह गए जो अकेले ही पिकनिक जा रहे थे।

साढे आठ बजे उर्वशी ऑफिस आई तब गुरुदत्त अपने केबिन में टेलीफोन पर बात कर रहे थे। उर्वशी समझ गई कि वे अपने घर बात कर रहे थे।
"घर बात कर थे सर आप?"
"अपने पौत्र से बात कर रहा था। हम हर रोज़ रात का खाना एक साथ करते हैं। आज जब मेरी पुत्रवधु ने उसे बताया कि मैं दो दिन के लिए मसूरी ऑफिस के काम से जा रहे हैं, वह उदास हो गया। मैं उससे बात कर रहा था कि पापा-मम्मी के साथ डिनर कर ले।"
"लगता है, आप के साथ काफी घुला मिला है।"
"हां, जब मैं घर पहुंचता हूं, वह मेरे साथ दस बजे तक रहता है। एक साथ डिनर करते हैं, फिर मेरे से कहानियां सुनता है।"
"कौन सी कहानियां सुनाते हैं आप?"
"कहानियां पंचतंत्र की छोटी छोटी कहानियां सुनाता हूं, कुछ रामायण और कृष्णा की छोटी छोटी कहानियां सुनाता हूं। कम से कम दस, पंद्रह कहानियां सुनता है।"
"यह तो अच्छी बात है कि दादा और पौत्र की अच्छी दोस्ती है।"
"बच्चों के साथ उनकी उम्र के अनुसार हमें आचरण करना पड़ता है, तभी उनकी नज़दीकियां बड़ों के साथ बढ़ती है।"
"मैं देखती हूं कि आप हर उम्र और वर्ग के लोगों के साथ बहुत जल्दी घुल मिल जाते हैं।"
"उर्वशी, मैं घुलने मिलने की पहल नहीं करता। परंतु जब दूसरे को अपनी रूचि के मुताबिक देखता हूं, तब आसानी से घुलना मिलना हो जाता है।"

दोनों की बातचीत में विराम आया क्योंकि स्टाफ परिवार समेत एकत्रित हो गए और उर्वशी डिनर के प्रबन्ध के लिए कैफेटेरिया चली गयी। कैफेटेरिया में सभी एक दूसरे के साथ मेल मिलाप करने लगे। डिनर करते करते ग्यारह बज़ गए। दो बसें आ गई और सब अपना सामान बस में रखने लगे। ठीक बारह बजे बसें मसूरी के लिए रवाना हो गई। उर्वशी और गुरुदत्त एक बस में थे। सबसे आगे वाली सीट पर दोनों बैठे। स्टाफ पूरी मस्ती में था। अंताक्षरी खेलने में दो घंटे लगा दिए। गुरुदत्त पहले तो अंताक्षरी आधे घंटे तक खेलता रहा, क्योंकि गुरुदत्त को जल्दी सोने की आदत थी, वह सीट पर सुस्ताने लगा। गुरुदत्त को देख उर्वशी बढ़चढ़ कर अंताक्षरी खेलती रही। बस के सफ़र में गुरुदत्त को नींद आती रही और थोड़ी देर में खुल जाती। अंताक्षरी के बाद सभी सो गए। रात के सन्नाटे में बस फराटे भरती हुई दौड़ रही थी। सुबह छः बजे बस मसूरी के रिसोर्ट पर पहुंच गई। सभी सो रहे थे। बस ड्राईवर और कंडक्टर ने आवाज़ दी कि मसूरी आ गया। सभी अलसाये हुए बस से उतरने लगे।

रिसोर्ट के मैनेजर ने सब का स्वागत किया। बस से सामान उतारा और सभी को कमरे आवंटित किये।

सितम्बर का महीना, सुबह के समय हलकी गुलाबी ठण्ड थी। गुरुदत्त ने एक घंटा आराम किया, फिर दांत ब्रश करके चाय पी और बाहर लॉन में टहलने लगा। हलकी ठण्ड की वजह से शाल ओढ़ रखी थी। टहलते हुए पूरा रिसोर्ट घूम लिया। मसूरी से थोडा हट कर रिसोर्ट बेहद खूबसूरत था। एक तरफ सड़क, दूसरी ओर दूसरा रिसोर्ट और दो छोर से खुला दूर पहाड़ियों का खूबसूरत नज़ारा। गुरुदत्त प्रकृति के सौंदर्य को निहार रहा था, तभी उर्वशी वहां आ गई।

"सर आपने आराम नहीं किया। पहाड़ियों को देख रहे हैं।"
"हिल स्टेशन आने पर प्रकृति की अतुल्य खूबसूरती देखने को मिलती है जो दिल्ली में नहीं मिलती। रिसोर्ट अच्छा बना हुआ है। छोटे छोटे कॉटेज, झरना, पार्क, रेस्टॉरेंट अच्छी जगह का चुनाव किया है उर्वशी।"
"थैंक यू सर। आप पहले मसूरी आये हैं।"
"मसूरी मेरा मन पसंद हिल स्टेशन है। कई बार यहां आया हूं। दिल्ली से अधिक दूर भी नहीं है। पत्नी के साथ अक्सर आता था। मुझे मॉल रोड और कैमल बैक रोड पर घूमना अच्छा लगता था। वापिसी में देहरादून में सहस्त्र धारा, ऋषिकेश और हरिद्वार। पूरे एक सप्ताह का टूर रहता था हमारा। बच्चे जब छोटे थे तो हमारे साथ आते थे, फिर कॉलेज जाने लगे तब हम अकेले आते थे। अब की बार लगभग दस वर्षो बाद मसूरी आया हूं, पुरानी बातें याद आ रही है। पत्नी के साथ हाथ में हाथ डाले घंटो मॉल रोड और कैमल बैक रोड पर रोमांटिक बातो का लुत्फ़ उठाया हुआ है।"

उर्वशी गुरुदत्त की बातें सुनती रही। "सर मॉल रोड और कैमल बैक रोड घूमना चाहोगे।"
"नहीं, समय नहीं मिलेगा। डेढ़ दिन यहां हैं, आपके साथ सबके साथ कुछ अलग से मसूरी के मौसम का आनंद लेना है। वैसे भी अकेला दिल नहीं लगेगा। पुरानी बातें याद आती रहेंगी। यह टूर ऑफिस का है। ऑफिस के साथ मिल कर टूर का आनंद लेना है।"

टूर में उर्वशी गुरुदत्त को बहुत गौर से देखती रही। उसकी नज़रें गुरुदत्त के आस-पास ही रहती। उसे एक सम्पूर्ण व्यक्ति की जो तलाश थी, गुरुदत्त पर समाप्त हुई। उसने अंतिम फैसला ले लिया कि पति के रूप में गुरुदत्त का चुनाव अंतिम और उत्तम है। पहल उसे करनी होगी होगी और गुरुदत्त से बात करने के लिए उचित मौके को तलाशने लगी।

दोपहर बाद सभी ने ख्वाहिश व्यक्त की थोडा समय मसूरी घूमा जाए तभी पिकनिक सार्थक होगी। लौट कर रात में रिसोर्ट पर जश्न मनाने का आनंद अधिक होगा। लंच के बाद सभी मसूरी के मॉल रोड पहुंच गए। सभी को हिदायत दे दी कि सात बजे सभी बस स्टॉप पर मिले ताकि समय पर रिसोर्ट पहुंच जाएं। सभी छोटे छोटे ग्रुप में घूमने निकल पड़े। उर्वशी गुरुदत्त के साथ चल रही थी।

"सर कैमल बैक रोड मुझे दिखाइए। आपसे तारीफ सुनी है, प्रकृति का आनंद मुझे भी लेने दीजिये।"
"पहले कभी मसूरी आई हो?"
"मैं पहली बार मसूरी आई हूं।"
"तो फिर मॉल रोड घूमते है और लाइब्रेरी की ओर से कैमल बैक रोड चलते है।"

मॉल रोड की दुकानों पर नज़र मारते हुए बातें करते-करते आगे बढ़ते चले।
"उर्वशी, यहां से देखो, नीचे की घाटी नज़र आ रही है। रात के समय यदि मौसम साफ़ हो, बादल या धुंध न हो, तब देहरादून की लाइट्स नज़र आती हैं। रौशनी की झिलमिल माला बहुत खूबसूरत लगती है। अभी तो धूप है, वो लुत्फ़ नहीं मिलेगा जो शाम और रात का नज़ारा देख कर आता है।"

लाइब्रेरी के पास एक रेस्टॉरेंट में दोनों ने कॉफ़ी पी। कॉफ़ी पीने के बाद कैमल बैक रोड पर चले। जहां मॉल रोड पर लोगों का रेला-पेला था। कैमल बैक रोड पर अपेक्षाकृत कम भीड़ थी। खिली धूप में दोनों प्राकृतिक सौंदर्य निहारते चल रहे थे। उर्वशी का मन दुविधा में था कि वह गुरुदत्त से विवाह के बारे में बात आरम्भ कैसे करे। मालूम नहीं गुरुदत्त की क्या प्रतिक्रिया हो। पहले उसके मन की बात को समझा जाए कि विवाह के बारे में गुरुदत्त की सोच क्या है। अंत में सीधे-सीधे न पूछ गुरुदत्त के मन और दिल को कुरेदने के लिए बात की।

"सर, आप अकेलापन महसूस कर रहे होंगे?"
"पत्नी के देहांत के बाद जीवन में सूनापन आ गया है। बच्चों की शादी हो गई और वे अपनी ज़िन्दगी में व्यस्त रहते है। थोडा समय पोते के साथ बीत जाता है। शनिवार और रविवार ज़रूर कभी कभी एकांत काटता है। संगीत सुनता हूं और पुस्तकें पढ़ता हूं। यही ज़िन्दगी है। कुदरत और समय के आगे बेबस हूं, लेकिन अफ़सोस नहीं है। ज़िन्दगी का कटु सत्य है, समझता हूं।"
"आप दूसरा विवाह कर लीजिये। जीवन साथी मिल जायेगा। ज़िन्दगी में सूनापन समाप्त हो जाएगा।" उर्वशी ने बात की और गुरुदत्त को देखा।
"उर्वशी हिन्दू धर्म में मनुष्य के जीवन में चार आश्रम बताये हैं। ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास। सौ वर्ष की आयु मान कर चार भागों में आश्रम बांटें है। ब्रह्मचर्य और गृहस्थ मैं जी चुका हूं, अब वानप्रस्थ का समय व्यतीत कर रहा हूं।" कहते कहते गुरुदत्त ने उर्वशी की और देखा जो उसके दिल को पढ़ने की कोशिश कर रही थी, फिर सामने एक व्यक्ति को देख कर उर्वशी से कहा।
"उस व्यक्ति के पास दूरबीन है। इस सड़क पर कुछ जगह ऐसी हैं जहां से ऊंट दिखता है। जिस कारण इस सड़क का नाम कैमल बैक रोड पड़ा है। ऊंट के पीछे वाली सड़क।"

गुरुदत्त और उर्वशी ने दूरबीन से देखा। ऊपर की ओर कैमल यानि ऊंट बना नज़र आता है। आगे बढ़ते हुए उर्वशी ने फिर से विवाह का जिक्र छेड़ा।

"उर्वशी तुम आज विवाह की बातें कर रही हो। मैं तुम्हे यह सुझाव देता हूं कि तुम विवाह की सोचो। उम्र के हिसाब से अभी तुम्हे गृहस्थ जीवन में होना चाहिए।" गुरुदत्त ने उर्वशी की ओर देखा और फिर कहा "कुछ देर बेंच पर बैठ कर सामने पहाड़ियों पर धुंध और बादलों का नज़ारा देखें, अच्छा लग रहा है। दोनों बेंच पर बैठ गए।

"हां उर्वशी मैं तुमसे विवाह की बात कर रहा था। कुछ सोचो, विवाह के बारें में।"
"जी सर, कोई अच्छा आदमी मिलेगा, तब ज़रूर कर लूंगी। इस उम्र में दिलों का मिलना अति आवश्यक है।"
"तुम सुशील, सुन्दर हो। तुम्हे तुम्हारा जीवन साथी मिलेगा।"
उर्वशी के मन में विचार आया कि कह अपने और गुरुदत्त के विवाह के बारे में बात करे, परंतु विचार जुबान पर नहीं ला पाई। दिल की धड़कनों को पेश नहीं कर सकी।

"आप ने सुझाव दिया और मैंने विवाह के बारे में सोचना आरम्भ कर दिया। अब मैं आपको सुझाव देती हूं कि आप भी मेरी बात माने और विवाह की सोचें।"
गुरुदत्त हंस पड़ा। "मेरी और तुम्हारी बात में फर्क है। मैं तुमसे 15 वर्ष बड़ा हूं और मैंने अपना वैवाहिक जीवन को भरपूर जिया है। तुम अभी जिओगी। मेरे दिल और मन में अब विवाह की कोई इच्छा नहीं है, जबकि तुम अब गृहस्थ जीवन में प्रवेश करोगी। मेरा परिवार अब तीसरी पीड़ी में है। दादा और नाना बनने के पश्चात अब मैं इस बारे में सोच नहीं सकता। मैं कोई गलत परंपरा नहीं शुरू करना चाहता। अपनी पत्नी के साथ सताईस वर्ष बिताये। हम एक दूसरे पर समर्पित थे। मैं सोच नहीं सकता फिर से विवाह करने के लिए।" कह कर गुरुदत्त चुप हो गया। "मैं अपने बारे में कहता जा रहा हूं। तुम अपने बारे में कहो, विवाह के बारे में क्या सोचा है।"
"मेरी सकारात्मक सोच है।"
"बहुत बढ़िया, उर्वशी।" अब चलते हैं। मॉल रोड से कुछ शौपिंग कर लेते हैं। हालांकि यहां मसूरी में कुछ नहीं बनता, सारा सामान नीचे से आता है। दिल्ली में भी वही सब कुछ मिल जाएगा, फिर भी यादगार होती है कि वहां गए थे, ये वहां से लाए थे।"

गुरुदत्त और उर्वशी मॉल रोड आ गए और शौपिंग के लिए घूमने लगे। गुरुदत्त ने अपने पोते के लिए स्वेटर लिया और पुत्रवधू के लिए शाल। उर्वशी ने भी अपनी मां के लिए शाल खरीदी।

रात को रिसोर्ट में अभूतपूर्व दृश्य था। डिनर का प्रबंध बाहर खुले लॉन में किया। रात की हलकी ठण्ड से बचाव के लिए थोड़ी थोड़ी दूर छोटी छोटी अंगीठियां रखी हुई थी। छोटे छोटे ग्रुप में सब अंगीठियों के पास कुर्सियां लेकर बैठ कर गपशप कर रहे थे और वहीँ डिनर का प्रबन्ध किया हुआ था।

गुरुदत्त और उर्वशी दोनों एक साथ डिनर कर रहे थे।
"सर, यदि मेरे जैसी कोई लड़की मिल जाए, तब विवाह के बारे में सोचोगे।" उर्वशी ने गुरुदत्त के दिल को कुरेदने की कोशिश की।

"उर्वशी दोपहर में कैमल बैक रोड पर भी तुम्हे कहा था कि मैं शादी का कोई इरादा नहीं रखता। विवाह के लिए मन और तन दोनों चाहिये। गृहस्थी में धन भी चाहिए, लेकिन मैं उसे अधिक महत्त्व नहीं देता, क्योंकि लक्ष्मी चंचल है, वो आती जाती रहती है। धनवान भी धन गवां देते हैं। जब मेरा विवाह हुआ तब मेरे पास कुछ नहीं था। संतोष के साथ हम दोनों ने गृहस्थी चलाई। थोडा था तो थोड़े में गुज़ारा कर लिया। अधिक महत्व तन और मन का है जो एक होने चाहियें। हम दोनों के तन और मन एक थे और सफल गृहस्थी रही। अब पचपन की उम्र में यदि एक बार मन से सोच भी लूं विवाह का तो तन हो सकता है साथ न दे। आज तन साथ दे सकता है, परंतु अधिक समय तक नहीं। दो साल, चार साल। साल दो, चार के लिए मैं किसी के साथ बेईमानी नहीं करूंगा। मेरा तन साथ न दे, उसके तन की आवश्यकताएं कैसे पूरी होंगी। एक उम्र के बाद तन ढीला हो जाता है। आज मैं दौड़ नहीं सकता। उच्च रक्तताप रहता है। हर रोज़ ब्लड प्रेशर की दवा लेता हूं। दो मंज़िल से ऊपर सीढ़ियों से चढ़ नहीं सकता, क्योंकि सांस फूलता है। यही सोच कर मैं दूसरा विवाह नहीं कर सकता और तुम्हारा प्रस्ताव स्वीकार नहीं कर सकता।" कह कर गुरुदत्त चुप हो गया और उर्वशी की आंखों में देखा।

गुरुदत्त की बात सुनकर उर्वशी सकपका गई। कुछ पल मौन रह कर हिम्मत करके उसने पूछा। "सर आपने कैसे जानी मेरे दिल की बात।"
"उर्वशी, यह अनुभव की बात है। बहुत दिनों से तुम्हारे आचरण को देख रहा था और समझ रहा था कि तुम मुझमें दिलचस्पी ले रही हो। तुम्हारे निर्णय को मैं गलत नहीं कहूंगा। तुम्हारे नज़रिये से एकदम उचित और सही है, परंतु मेरे हालात तुमसे जुदा हैं। मैं तुम्हे सलाह देता हूं कि तुम विवाह अवश्य करो। अपने विवाह की इच्छा को दफ़न मत करो। तुम कोशिश करो। यथासंभव मैं भी तुम्हारी मदद करूंगा। अपने रिश्तेदारी में और जान पहचान में तुम्हारे विवाह के लिए बात अवश्य करूंगा।"

गुरुदत्त के जवाब ने उर्वशी को विचलित कर दिया और उसका उत्साह समाप्त हो गया। शून्य मन से वह अपने कमरे में सोने के लिए उठी। उर्वशी को जाते देख गुरुदत्त ने कहा। "उर्वशी, अपने को शांत रखो और ठंडे दिमाग से शांति में दिल्ली जा कर इस बारे में सोचना। यहां पिकनिक में एक दम सामान्य रहो। किसी को यह बात पता नहीं चले कि तुम उदास हो।"

उर्वशी को गुरुदत्त की बात पसंद आई और पिकनिक में सामान्य रही। दिल्ली वापिसी के समय गुरुदत्त ने उर्वशी से कहा "हम दोनों का आचरण एक दूसरे के लिए पहले जैसा होना चाहिए। ऑफिस से घर जाते समय एक साथ पहले जैसे जाएं, मुझे अच्छा लगेगा।


उर्वशी ने गुरुदत्त की बात मानी और शाम को मेट्रो या कार में गुरुदत्त के साथ जाना जारी रखा। बातें अब भी होती थी, परंतु विषय बदल गया। निजी बातों को उर्वशी ने छोड़ दिया और ऑफिस अथवा राजनीति पर चर्चा करने लगी।
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