Monday, December 28, 2015

नई कंपनी



नई कंपनी बनाने की शुरुआत अगले दिन से हो गई। इंद्रजीत ऑफिस में काम कर रहा था कि गुरुस्वामी ने उसे अपने चैम्बर में बुलाया। कनोडिया पहले से ही गुरुस्वामी के चैम्बर में बैठे थे।

"आओ इंद्रजीत, बैठो।" गुरुस्वामी ने उसे बैठने को कहा।

इंद्रजीत कुर्सी पर बैठा। उसके बैठते गुरुस्वामी ने कहा। "इंद्रजीत अब तुम अपने पिछले काम छोड़ कर नई कंपनी में पूरा ध्यान दो। हफ्ते दस दिन में सारा काम कर्नल ग्रोवर को सौंप दो और नई कंपनी का काम देखो। अब तुमने सारे निर्णय स्वतंत्र रूप से लेने है। कनोडिया तुम्हारे साथ हैं, परंतु वो हर रोज़मर्रा के काम काज नहीं देखेंगे। वो अब तुम्हारा काम है।"

इंद्रजीत चुपचाप सुनाता रहा और फिर हां कहा।

गुरुस्वामी ने आगे बात बड़ाई "कनोडिया, नई कंपनी का ऑफिस कहां बनाया जाए।"
"बिल्डिंग में सबसे ऊपर वाली मंज़िल खाली है, वहीँ बना लेते हैं। अपने ग्रुप की सभी कंपनियों के ऑफिस एक छत के नीचे हो जाएंगे।" कनोडिया ने सुझाव दिया।
"कनोडिया तुम्हारा विचार तो अच्छा है, मगर मैं सोच रहा हूं कि हमारी दूसरी बिल्डिंग खाली है, वहीँ नई कंपनी का ऑफिस बनाते हैं। इस बिल्डिंग में अपने वर्तमान कार्यों को रखते हैं। हम दूसरी कंपनियों में क्या करते हैं और कैसे करते है, उनको भनक नहीं लगनी चाहिए। उनका नई कंपनी में हिस्सा है उसको अलग बिल्डिंग में रखें तो अच्छा होगा।" कह कर गुरुस्वामी ने कनोडिया और इंद्रजीत की प्रतिक्रिया जानी तब दोनों ने गुरुस्वामी के निर्णय और दूरदर्शिता का स्वागत किया।

"चलो नई कंपनी का ऑफिस कहां बनाना है इसका तो निर्णय हो गया, अब हमें स्टाफ का सोचना है। कुछ स्टाफ इंदु और स्टीफंस अपना रखेंगे। इसलिए मेरा मत यह है कि बाकी स्टाफ हमारा विश्वासपात्र होना चाहिए। अगर हम नई नियुक्ति करते हैं तब शंका यह है कि वह इंदु और स्टीफंस क़ी ओर झुक जाएं। इसलिए मैं चाहता हूं कि हमारी कंपनियों में से चुनिंदा स्टाफ नई कंपनी में ट्रांसफर करें और उनके स्थान पर नई नियुक्तियां की जाएं।"

इंद्रजीत गुरुस्वामी की सोच और बुद्धिमत्ता का कायल हो गया कि उनकी सोच बहुत जुदा और अग्रणीय है, तभी वे इतनी ज्यादा कंपनियां चला रहे हैं और देश के प्रमुख उद्योगपतियों में एक है।

"इंद्रजीत तुम आज से ही नए ऑफिस का काम शुरू कर दो। आर्किटेक्ट से बात करो और ऑफिस आधुनिक होना चाहिए परंतु उसमे भारतीयता पूरी झलकनी चाहिए।"

इंद्रजीत और कनोडिया ने सहमति जताई। गुरुस्वामी ने मार्गदर्शन दिया और इंद्रजीत उस मार्ग पर गुरुस्वामी के स्वपन को साकार करने के लिए चल पड़ा।

जब तक नया ऑफिस बन कर तैयार नही हो जाता, तब तक पुरानी बिल्डिंग के सबसे ऊपर वाली मंजिल पर काम चलाऊ ऑफिस शुरू हो गया। इंदु और स्टीफंस दो दिन ऑफिस आए फिर दोनों भारत में दूसरे जॉइंट वेंचर करने चेन्नई, मुम्बई और कोलकाता के टूर पर चले गए। दस दिनों के भीतर तीन और जॉइंट वेंचर को अंतिम रूप दे दिए और कुछ दिनों के लिए वापिस अमेरिका चले गए।

इंदु और स्टीफंस ने कंपनी में पूंजी निवेश के लिए रकम भेजनी शुरू की। चार जॉइंट वेंचर उन्होंने किये, जिसमे सबसे पहले इंद्रजीत की कंपनी ने कार्य आरम्भ किया। उनके पास जरुरी ढांचा पहले से ही तैयार था और जॉइंट वेंचर एग्रीमेंट पर साइन करते ही इंद्रजीत ने काम शुरू कर दिया।

एक महीने बाद कंपनी का नया ऑफिस बन कर तैयार हो गया। इंद्रजीत ने अपनी टीम चुन ली और नए ऑफिस से काम आरम्भ कर दिया।

इंदु और स्टीफंस एक महीने बाद भारत आए। कंपनी का ऑफिस देख कर खुश हुए और अपनी विश्वासपात्र फ़रज़ाना इंजीनियर को लाए। फ़रज़ाना इंजीनियर मूलतय भारतीय थी जो काफी वर्षो से अमेरिका में बसी थी। मुम्बई में उसका जन्म हुआ और पढ़ाई की। पढ़ाई के बाद अमेरिका बस गई और पिछले आठ वर्षो से स्टीफंस के कारोबार से जुडी हुई थी और इंदु की खास विश्वासपात्र थी। भारत की कंपनी में अपनी ओर से सबसे ऊंचे पद पर फ़रज़ाना को रखा। गुरुस्वामी की और से इंद्रजीत और इंदु की ओर से फ़रज़ाना दोनों महत्वपूर्ण थे। इंद्रजीत और फ़रज़ाना में एक अंतर था। जहां इंद्रजीत सिर्फ एक कंपनी को देख रहा था, वहीँ फ़रज़ाना भारत में सभी चार कंपनियों को देख रही थी, जहां इंदु और स्टीफंस ने जॉइंट वेंचर किये थे। सभी कंपनियों की रिपोर्टिंग फ़रज़ाना ने इंदु और स्टीफंस को देनी है।

फ़रज़ाना की उम्र पैंतीस वर्ष, रंग गोरा और आकर्षक दिल को छूने वाला। फ़रज़ाना को दिल्ली में इंद्रजीत के साथ कंपनी में नियुक्त किया। फ़रज़ाना की ख्वाहिश मुम्बई में रहने की थी क्योंकि मुम्बई में उसका जन्म हुआ था और सारे रिश्तेदार और दोस्त मुम्बई में अभी भी रहते हैं। फ़रज़ाना की नानी और नानी का पूरा परिवार मुम्बई में बसा हुआ था, परंतु इंद्रजीत के कारण इंदु और स्टीफंस ने फ़रज़ाना की नियुक्ति दिल्ली में की। कारण था इंद्रजीत के नेतृत्व और कंपनी के संस्थापक गुरुस्वामी के इंद्रजीत पर अटूट विश्वास और भरोसा। इंद्रजीत पर नज़दीकी नज़र रखने और उसकी महीन से महीन बातों और काम की जानकारी के लिए फ़रज़ाना को दिल्ली तैनात किया गया।

इंद्रजीत इंदु और स्टीफंस की इस हरकत से अनजान अपने कार्यों को आगे बढ़ाने और कंपनी के हित को सुरक्षित रखने की खातिर कार्यरत रहा। उसने कभी भी इस तरह की बातों में विश्वास नहीं किया। सीधे सच्चे रास्ते पर सीधा चलना ही उसकी फितरत रही। वह कभी भी छल कपट में विश्वास नहीं रखता था। टेढ़े इंसानों के साथ भी वह सीधा व्यवहार करता था। इंदु ने उसके इस गुण को कभी नहीं सराहा, किन्तु गुरुस्वामी की पारखी नज़रों में इंद्रजीत की अटूट बेइंतहा संपति थी। कर्म में विश्वास रखने वाला इंद्रजीत इसी विशेषता के कारण गुरुस्वामी का विश्वासपात्र बना और आज इंदु के साथ कंपनी का डायरेक्टर बन काम कर रहा है।



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