Monday, December 28, 2015

जॉइंट वेंचर



इंद्रजीत डिनर के बाद घर गया और इंदु स्टीफंस के साथ होटल चली गई। इंद्रजीत का मन इंदु और स्टीफंस से मिलने के बाद  हल्का हो गया। उसने मैनेजमेंट का निर्णय इंदु और स्टीफंस को बता दिया था। कंपनी ने उस पर पूरा भरोसा जताया और विश्वास के साथ डिनर किया। सोचते सोचते उसे नींद गई।

होटल पहुंच कर इंदु सोच रही थी कि इंद्रजीत कितना बदल गया है। बारह वर्ष बाद मिले और एक नया इंद्रजीत पाया। वह कभी सोच नहीं सकती थी कि कोई इंसान इतना अधिक बदल सकता है। इंद्रजीत में बदलाव परिवर्तन नहीं कायाकल्प है।

स्टीफंस ने इंदु को गहन सोच में देख पूछा "क्या बात है?"
"इंद्रजीत बिलकुल बदल गया है, मैं सोच भी नहीं सकती थी। मैंने जब उसे छोड़ा था, उसमे विश्वास की कमी थी और आज वह आत्मविश्वास से ओतप्रोत है।"
"इंदु कंपनी उस पर भरोसा रखती है और हमारे साथ जॉइंट वेंचर के लिए उसका निर्णय अंतिम है। मैं समझता हूं कि जॉइंट वेंचर की उनकी शर्ते मान लें। लाभ में आधा आधा हिस्सा ठीक है और हमें उनका जमा जमाया बुनियादी ढांचा मिलेगा, जिसका हमें अपने पैर इंडिया में ज़माने के लिए अधिक मदद मिलेगी।"
"स्टीफंस, तुम ठीक कह रहे हो।"

अगले दिन सुबह ऑफिस में इंद्रजीत से कनोडिया और गुरुस्वामी ने रात डिनर के बारे में पूछा।

"सर, मुझे लगता है कि जॉइंट वेंचर की हमारी बात मान जाएंगे। उनके पास और कोई दूसरा चारा नहीं हैं। मैं पूरी तरह से आश्वस्त हूं।"

"वैरी गुड। मुझे इसी की उम्मीद थी। तुम निश्चिन्त हो कर काम करो। बाकी मीटिंग में देखते हैं। मुझे जरुरी काम है, मैं मीटिंग के समय पर आ जाऊंगा और मीटिंग में मिलते है।" कह कर गुरुस्वामी चले गए।

लंच के समय कनोडिया और गुरुस्वामी की फ़ोन पर लंबी बात हुई।

ठीक तीन बजे इंदु और स्टीफंस अपनी टीम के साथ ऑफिस आए। इंद्रजीत और कनोडिया अपनी टीम के साथ तैयार थे। मीटिंग आरम्भ होते गुरुस्वामी भी गए। मीटिंग शुरू हुई और दस मिनट में सभी मुद्दों पर सहमति हो गई। बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर में चार डायरेक्टर नियुक्त हुए। विदेशी कंपनी की तरफ से इंदु और स्टीफंस।

"मेरे प्रिय मित्रों, मेरी तरफ से दो डायरेक्टर होंगे कनोडिया और इंद्रजीत।"

अपना नाम सुनकर इंद्रजीत चौंक गया। उसे डायरेक्टर पद की कोई उम्मीद नहीं थी। नई कंपनी के साथ जुड़ने और एक अहम पद की उम्मीद थी परंतु डायरेक्टर का पद कभी नहीं सोचा था। एक हलकी मुस्कान के साथ उसने सबका शुक्रिया अदा किया।

इंदु ने इंद्रजीत की ओर देखा और हाथ बड़ा कर बधाई दी। रात के डिनर के बाद उसे इस बात का अहसास हो गया था कि इंद्रजीत की कंपनी में अहम भूमिका रहेगी।

मीटिंग सौहार्दपूर्ण माहौल में संपन्न हुई। गुरुस्वामी ने मीटिंग पूर्ण होने के बाद शाम के नाश्ते के लिए समीप के होटल में इंतज़ाम पहले ही कर दिया था। होटल में नाश्ते के समय बातों का आदान-प्रदान होता रहा। इंद्रजीत डायरेक्टर पद पा कर अति प्रसन्न था। ऑफिस के सभी साथी उसको बधाइयां दे रहे थे।

गुरुस्वामी ने स्टीफंस की ओर संबोधित करते हुए कहा "स्टीफंस, तुम्हे कहीं बुरा तो नहीं लग रहा कि एक अरसे के बाद इंदु और इंद्रजीत एक साथ काम करेंगे।"

"इसमें बुरा मानने वाली कोई बात नहीं है। अमेरिका में इन बातों को कोई नहीं मानता। हम काम करते और देखते हैं। रिश्ते नहीं देखते। कल क्या था, यह मायने नहीं रखता। महत्वपूर्ण है आज हम क्या हैं और क्या काम कर रहें हैं।"

गुरुस्वामी ने स्टीफंस और इंदु से नाश्ता करते हुए कहा "जब मुझे इंद्रजीत ने तुम्हारे बारे में बताया तब कनोडिया का सुझाव था कि इंद्रजीत को डायरेक्टर बनाया जाए परंतु मैंने यह पहले से ही तय कर लिया था कि इस कंपनी में इंद्रजीत की महत्वपूर्ण भूमिका रहेगी क्योंकि उसने इस कंपनी और प्रोजेक्ट में शुरू से काम किया था और डायरेक्टर बन कर स्वतंत्र निर्णय लेने में झिझक नहीं होगी। मैं सिर्फ दिशा देता हूं बाकी रोज़मर्रा के काम का निर्णय कनोडिया और इंद्रजीत ही लेंगे। आप लोगों को कनोडिया और इंद्रजीत के साथ ही काम करना है। इंद्रजीत काबिल और निष्ठावान इंसान है और उसकी काबिलयत पर मुझे पूरा भरोसा और यकीन है।"

गुरुस्वामी की बात सुन कर इंदु सोचने लगी कि इंद्रजीत ज़िन्दगी में बहुत आगे बढ़ चुका है, जिसकी उसे कभी उम्मीद नहीं थी। एक छोटी सी नौकरी और कम तनख्वाह वाला आदमी इतनी अधिक उन्नति करेगा, उसकी समझ से परे था। इंदु कुछ नहीं कर सकी। उसे संतोष रखना पड़ा क्योंकि स्टीफंस इस कंपनी के साथ जॉइंट वेंचर करने को इच्छुक और आतुर था। चाह कर भी इंद्रजीत के साथ काम करना होगा। कभी वह इंद्रजीत पर निर्णय थोपती थी, अब उसे इंद्रजीत के निर्णय को मानना पड़ेगा।

ऑफिस के सभी सहपाठी इंद्रजीत के अतीत को जान कर अचंभित हो गए कि शांत स्वभाव के मालिक इंद्रजीत जो हमेशा काम में डूबे रहते है, जिसका सिद्धान्त सिर्फ काम ही पूजा है, कभी रोमांटिक दिल के मालिक भी रहे हैं और इंदु से प्रेम विवाह किया। इंदु का यौवन आज भी कायम है। सभी तिरछी निग़ाहों से इंदु को देख रहे थे और मन ही मन उसके रूप और यौवन को तलाशने की कोशिश कर रहे थे, जब वह इंद्रजीत के साथ कॉलेज में पढ़ती होगी और इंद्रजीत और इंदु की शादी हुई होगी। सहपाठी आपस में खुसर पुसर कर रहे थे और मज़ाक के पात्र इंद्रजीत और इंदु थे। सामने दोनों को बधाईयां दे रहे थे।

थोड़ी देर में गुरुस्वामी ने रुक्सत ली और बाकी स्टाफ भी होटल से रवाना होने लगा। इंद्रजीत अंत तक होटल में रुका रहा। बहुत वर्षो के बाद इंद्रजीत को जीत का अहसास हुआ और इंदु युद्ध क्षेत्र में पराजित सी नज़र आई। उसने अपने को संतुलित रखा हुआ था ताकि कोई उसकी कमज़ोरी भांप सके।

रात आठ बजे इंद्रजीत ने इंदु और स्टीफंस से हाथ मिलाया। "अब मुझे जाने की इजाजत दीजिये। अब तो हर रोज़ मिलेंगे।"
"अवश्य। हम भी चलते हैं।"

सभी एक साथ होटल से निकले।
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