Monday, January 04, 2016

पैंटी चोर



सर्दियों के दिन सूर्य देव रुष्ट हो कर कोप भवन में पूरे एक सप्ताह तक बैठ गए। सभी परेशान, एक तो ठण्ड और ऊपर से कपडे सुखाने की समस्या। गीले कपडे घर में हीटर के आगे ही सूख रहे हैं। बिजली का बिल बढ़ रहा है। क्योंकि कोई समाधान नहीं। धूप निकले तब कपडे अच्छे से सूखेंगे। समस्या अंदर के कपड़ों की होती है, अंडर गारमेंट्स तो सूखे होने चाहिए, गीले पहने नहीं जाते। पैंट, कमीज तो कई होते है, कच्छे, बनियान तो गिनती के होते है, दो चार।

आज रविवार को सूर्य देव मेहरबान हो गए, सुबह ही दर्शन दे दिए। छुट्टी के कारण रविवार को अकसर देर से उठते है लोग, जैसे आंख खुली, सूर्य देव को देख कर सभी के चेहरे ख़ुशी से खिल गए। कपडे धुल गए और तारों, रस्सियों पर सबके कपडे सूखने लगे।

निर्मला ने भी तमाम कपडे धो कर सूखने डाल दिए। नाश्ता करने के बाद बाल सुखाती पतिदेव से कहा। "आज मौसम बहुत अच्छा है। पूरे हफ्ते ठण्ड के कारण बदन जकड़ा हुआ है, आज हफ्ते बाद धूप निकली है। पिकनिक पर चलें।"

पति निर्मल ने तुरन्त हामी भर दी। तय हुआ कि खाना बना कर टिफिन लेकर इंडिया गेट चलते है और शाम तक वहां लॉन में खाना खाते है, धूप का आनन्द लेकर पिकनिक मनाते हैं।

दोपहर एक बजे इंडिया गेट पहुंचे, वहां पूरा रेला पेला था। कड़ाके की ठण्ड में खिली धूप का आनन्द लेने सभी पहुंचे हुए थे। कार पार्क करके हरी घास पर चादर बिछाई और आराम करने लगे। टिफिन थोड़ी देर में खुलना था, तब तक खोमचे वालों से चाट पकोड़ी खाई गई। खिली धूप में खूब धंधा चल रहा है। लोग अपने म्यूजिक सिस्टम ले कर आए हैं। ग्रुप बना कर सभी मस्ती में झूम रहे हैं। बच्चे कहीं क्रिकेट, कहीं बैडमिंटन और कहीं फुटबॉल और फ्रिसबी खेल रहे हैं। निर्मल चादर पर लेट कर धूप सेंकने लगा।

"ये क्या हो रहा है?" पेट के बल लेते निर्मल को निर्मला ने झंझोरा।
"आराम तो करने दे।" झुंझला के निर्मल ने कहा।
"लेटने नहीं आए हो। कुछ पिकनिक वाली बातें करो।" निर्मला ने तुनक कर कहा।

पत्नी को नाराज़ देख निर्मल फ़ौरन तन कर बैठ गया और बात को पलटने के लिए कहा "निर्मला, एक बात है कि इंडिया गेट हमेशा प्रेमियों की पहली पसन्द रहा है और आज भी है। मॉल कल्चर के बाद भी देखो युवा जोड़े पेड़ो और झाड़ियों की ओट में आज भी बैठे है। वो देखो निर्मला।"

"देख रही हूं, तभी तुम्हे सोते हुए उठाया कि कुछ सीखो और अपने पुराने दिन याद करो।" कह कर निर्मला निर्मल से सट कर बैठ गई।

बच्चे कुछ दूर बैडमिंटन खेल रहे थे और निर्मल निर्मला एकान्त में कुछ पिछली बातों को याद करते हुए प्रेमालाप कर रहे थे। उनके प्रेमालाप में विघ्न तब आया, जब बच्चे खेलते हुए थक गए और भूख के कारण दौड़ते हुए आए। मुस्कुराते हुए निर्मला ने टिफिन खोला। सबने खाना खाया।

चार बजे धूप ढल गई और निर्मल परिवार सहित घर वापिस हो लिए।

घर कर कार से उतरते ही निर्मला ने सबसे पहले घर के बाहर की रस्सी से कपडे उतारे। निर्मल ने घर खोला। बच्चों ने टीवी चालू कर दिया। निर्मला ने कपडे सोफे पर डाले और रसोई में चाय बनाने चली गई।

चाय की चुस्कियां लेने के पश्चात निर्मला सूखे कपड़ों को घर में इस्त्री करने और धोबी से इस्त्री करवाने के लिए अगल किया और अंडर गारमेंट्स को अगल किया, क्योंकि उनको बिना इस्त्री के पहनना है।

"अरे, यह क्या, मेरे अंडर गारमेंट्स कहां है, क्या उतारना भूल गई। लाई तो सारे कपडे थे। एक बार फिर से चेक कर लेती हूं।" निर्मला बाहर गई परन्तु वहां कोई कपडा नहीं था।

"कमाल है, कहां गए।"
निर्मला ने अंदर आकर फिर कपडे देखे कि कहीं किसी कमीज़ या पैंट के अंदर रह गए हों। छोटे से तो होते है, कहीं मिक्स हो गए हों।

"सुनो, मेरे अंडर गारमेंट्स देखे हैं, कहां हैं। कहीं तुमने छुपा तो नहीं लिए?"

इतना सुन निर्मल ने तपाक से कहा "मुझे क्या ज़रूरत पड़ी है तुम्हारे अंडर गारमेंट्स छुपाने की। मैंने तो थोड़े पहनने है।"

"बात तो ठीक है, पर गए कहां। तीन पैंटी और दो ब्रा सुखाई थी। सारे कपडे उतारे। वही नहीं हैं। कमाल है। तुम्हारे बनियान, कच्छे तो हैं। मेरी पैंटी, ब्रा नहीं है।"

"कहीं किसी और ने तो नहीं उतार लिए। कभी कभी गलती हो जाती है। पड़ोसियों के कपडे हम उतार लेते हैं, कभी पडोसी हमारे। फिर उसके बाद अदला बदली होती है।"

"सबको अपने अंडर गारमेंट्स की पहचान होती है। हर किसी की फिटिंग्स अगल होती है। कोई किसी और के नहीं पहनता। क्या आप किसी और का कच्छा, बनियान पहन लोगे?
"नहीं मैं तो नहीं पहन सकता।"
"वैसे मैं भी नहीं पहन सकती। आजकल इतने महंगे हो गए है ब्रा और पैंटी। पता नहीं कहां हैं।"

जब गुम हो गए तब क्या कर सकते है। चार दिन बाद निर्मला कपडे सुखा रही थी, पड़ोस की कुछ महिलाएं भी कपडे सुखा रही थी। आपस में बात करते हुए एक पड़ोसन गीता ने पूछा कि कल मेरी पैंटी और ब्रा नहीं मिली, कहीं किसी के कपड़ो में तो नहीं मिक्स हो गई।
इतना सुन कर निर्मला ने कहा "क्या कहा गीता कि तुम्हारी पैंटी और ब्रा जो सूखने के लिए रखे और नहीं मिले।"

"हां निर्मला दो पैंटी और दो ब्रा थे, नहीं मिले। बाकी कपडे अपने स्थान पर थे।"
"कमाल है, रविवार को मेरी तीन पैंटी और दो ब्रा गुम हो गई और आज तुम्हारी गुम हो गई।"

उन दोनों की बातें सुन कर दो तीन पड़ोसन और एकत्रित हो गई और उन्होंने भी बताया कि हफ्ते दस दिन पहले उनकी पैंटी और ब्रा गुम हुए। सभी महिलाएं हैरान और परेशान हो गई कि सिर्फ लेडीज अंडर गारमेंट्स ही गुम हुए। पैंटी और ब्रा ही गायब हुए, बाकि सभी कपडे सलामत हैं। पहले तो शर्म के कारण किसी महिला ने जिर्क नहीं किया, अब आपस में बात करने पर मालूम हुआ कि पड़ोस की लगभग हर महिला की यही शिकायत है कि पैंटी और ब्रा ही गायब होते हैं। पुरुषों के कच्छे, बनियान गायब नहीं होते। कौन हो सकता है इस रहस्य को जानने की जिज्ञासा सभी को थी। रात सभी ने अपने पतियो से बात की और सब हैरान हो गए कि किस का यह काम हो सकता है। सबने तय किया कि रविवार सुबह ग्यारह बजे मीटिंग करते हैं ताकि मिल कर कोई कारगार कदम उठाया जा सके।

रविवार को मीटिंग में आशा से अधिक परिवार एकत्रित हुए। किसी को उम्मीद नहीं थी कि यह एक गंभीर मुद्दा है। यह समस्या आस-पास की पांच छः गालियों की थी। कम से कम पचास परिवार कॉलोनी के पार्क में एकत्रित हो गए। सर्दियों की ख़िली धूप में चर्चा शुरू हुई। किशोरी युवती से जवान स्त्री और प्रौढ़ महिला सबने शिकायत की। हर कोई चुप रहा शर्म के कारण। कुछ ने तो शिकायत कि उनकी कई बार पैंटी ब्रा गुम हुई हैं।

मीटिंग के बीच एक सज्जन जिनका नाम शर्मा था बोलने उठे और उन्होंने चौकाने वाले तथ्य बताये कि यह समस्या इस कॉलोनी की नहीं, बल्कि विदेशों में भी है। उन्होंने इंटरनेट पर शोध किया है कि जो इंसान यह काम करता है, मनोरोगी होता है और महिलाओं की पैंटी ब्रा चुराता है। अमेरिका और यूरोप जहां सोसाइटी एकदम फ्री है, वहां भी ऐसे चोर पुलिस ने पकडे हैं। ऐसे पैंटी चोर अपने घर में ही अलमारी में सजा कर ऐसे रखते हैं जैसे कोई इनाम या ट्राफी हो। यह एक गंभीर समस्या है। शर्मा ने जो बात बताई, सभी चौंक गए कि यह समस्या लोकल नहीं है, अंतर्राष्ट्रीय है। हर जगह पैंटी चोर मिलते हैं, जो बाजार में नहीं बेचते, बल्कि घर में सजा कर रखते हैं। वे चोर इनके जरिये कल्पना की ऊंची उड़ान भरते हैं। ये भोले-भाले दिखने में होते हैं परन्तु दिमाग बहुत शातिर होता है। बहुत सफाई से पैंटी ब्रा चुराते हैं। वे अक्सर कुंवारे होते हैं या तलाकशुदा। शादीशुदा आदमी इसी हरकते नहीं करते।

सभी लोग शर्मा की बुद्धिमता और जानकारी की तारीफें करने लगे। शर्मा ने वाहवाही लूट ली।

मीटिंग में निर्णय लिया गया कि महिलाओं को थोडा सतर्क रहना होगा और महिलाएं ही उस चोर को पकड़ सकती हैं, क्योंकि पुरुष ऑफिस, दुकानों को चले जाते हैं। छोटे बच्चे भी मदद कर सकते है क्योंकि वे बाहर खेलते है और कपड़ो पर नज़र रख सकते हैं कि कोई पुरुष महिला कपडे उतारता है तो उस पर नज़र रखें।

पंद्रह दिन बीत गए कोई अप्रिय घटना नहीं घटी। किसी की पैंटी ब्रा चोरी नहीं हुई। हर महिला सतर्क थी। पंद्रह दिन बाद महिलाओं की चौकसी कुछ ढीली हुई। चौकसी में ज़रा सी लापरवाही से फिर पैंटी ब्रा चोरी होने शुरू हो गए। महिलाओं के माथे की लकीरों में चिंता फिर झकलने लगी।
एक दिन दोपहर में सलोनी अपने स्कूटर से कॉलेज से घर वापिस रही थी। गली के कोने पर स्कूटर की रफ़्तार कम की। अचानक से उसकी नज़र रस्सी पर सूखते कपड़ों पर पड़ी। एक मर्द कपड़ों के समीप नज़र आया। उस आदमी ने तेजी से पैंटी को अपनी जेब में डाल लिया और दूसरी पैंटी पर हाथ साफ़ कर रहा था कि उसकी इस हरकत को सलोनी ने देख लिया। उसने चीख कर कहा "चोर" चोर सुनते ही उस आदमी ने झट से पैंटी को जेब से निकाल कर पास झाड़ी में फैंक दी और आराम से आगे चलने लगा जैसे कुछ हुआ ही नहीं। सलोनी ने स्कूटर की स्पीड तेज की और उस आदमी को टक्कर मारी। स्कूटर की टक्कर से वह आदमी लड़खड़ा कर गिर गया। सलोनी की आवाज़ से दो महिलाएं अपने घरों से बाहर निकली। सबने उस आदमी को दबोच लिया।

सलोनी ने स्कूटर को स्टैंड पर लगाया और कहा "आंटी यही पैंटी चोर है। मैंने इसे पैंटी जेब में डालते देखा। मेरे शोर मचाने से इसने पैंटी झाड़ी में फैंक दी।"

दोनों महिलाओं ने उस आदमी को दो तीन लातें जमा दी। जब उसका चेहरा देखा तो हैरान हो गए। वह शर्मा था जो उस दिन मीटिंग में विदेशों के पैंटी चोरों के किस्से सुना रहा था, वही कॉलोनी का पैंटी चोर निकला।


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