Monday, January 11, 2016

छुट्टी



नई कंपनी बनाने के काम में व्यस्त इंद्रजीत अक्सर घर देर से पहुंचता था। इंद्रजीत को घर का खाना खाने की आदत थी, बहुत कम बाहर होटल या रेस्टॉरेंट में खाना खाता था, इसलिए जब भी घर आने में देर होती, फोन कर देता और उसका खाना गर्म टिफ़िन में रखा होता। इंद्रजीत अपने कमरे में ही खाना खाता, थोड़ी देर म्यूजिक सिस्टम में कुछ देर संगीत सुनता और संगीत सुनते हुए नींद जाती। सुबह जल्दी ऑफिस जाने के चक्कर में परिवार के सदस्यों से अधिक वार्तालाप नहीं हो पा रहा था।

शादी के बाद परिवार पत्नी और बच्चों से बनता है। इंदु से तलाक के बाद इंद्रजीत एकाकी जीवन व्यतीत कर रहा था। बच्चा भी इंदु के पास। दूसरी शादी नहीं की।

गुजरांवाला में ढाई मंजिल की कोठी इंद्रजीत के पिताजी ने बनवाई थी। पहली मंजिल पर इंद्रजीत का छोटा भाई नरेंद्र अपने परिवार के साथ रहता है। नीचे माता-पिता रहते हैं। पहली और दूसरी मंजिल एक जैसे बने हुए है। दो बैडरूम, दो स्नानघर, एक रसोई, बैठक। नीचे के तल पर गेट के सामने दो कारों की पार्किंग, उसके पीछे नौकर के रहने का कमरा। एक कमरे में माता-पिता रह रहे हैं और दूसरा कमरा बहनों के लिए, जब रहने आती। एक बहन इंद्रजीत से बड़ी है और एक छोटी। नरेंद्र सबसे छोटा।

दूसरी मंजिल पर सिर्फ एक कमरा, स्नानघर और छोटी सा स्टोर, बाकी आगे का हिस्सा खाली। छुट्टी के दिन सुबह और शाम इंद्रजीत कमरे के आगे बैठ कर चाय के साथ पुस्तकों को पढ़ना और एफएम रेडियो सुनना इंद्रजीत का शौक है। सर्दियों में उसके माता-पिता धूप सेकने आते हैं। नरेंद्र के बच्चे शाम को बैडमिंटन खेलते हैं।

इंदु से बिछुड़ने के बाद इंद्रजीत ने अपने को छोटे से दायरे में सीमित कर लिया। प्रेम विवाह की असफलता के बाद कभी दुबारा विवाह करने की ठानी और काम की अग्नि में खुद को झोंक दिया। बरसों बाद उसको उसके कर्मो का फल मिला। भगवान के घर देर है, अंधेर नहीं। कामयाबी की सभी सीढ़ियां चढ़ कर शीर्ष पर पहुंच गया।

खुद अकेले के लिए जितने की ज़रूरत थी, उतना ही अपने लिए रखा, इसीलिए ऊपर की मंज़िल पर बने एक कमरे को चुना। जब उसका विवाह हुआ था, तब एक मंजिल का मकान हुआ करता था। उसके पिता ने कभी पुराने समय जमीन का प्लाट सस्ते में ख़रीदा था और रहने के लिए मकान बनवाया था। ढाई मंजिल की कोठी में परिवर्तित इंद्रजीत ने किया। बचपन में अपने पिता से गाना अकसर सुनता था 'इक बंगला बने न्यारा, जिसमें रहे कुनबा सारा' पिताजी ने अपनी हैसियत के मुताबिक दो कमरों का मकान बनाया, बंगला इंद्रजीत ने बनवाया। पिता का सपना तो पूरा हुआ फिर भी उनके दिल में एक बात खटकती थी कि इंद्रजीत का घर नहीं बसा। तलाक के बाद अकेला जीवन ऑफिस में झोंक दिया। माता-पिता ने कोशिश बहुत की कि इंद्रजीत का दुबारा घर बस जाए। शादी के प्रस्ताव भी रखे, परन्तु इंद्रजीत ने हर बार मना कर दिया कि दूसरी शादी नहीं करेगा।

नई कंपनी बनने के बाद अब इंद्रजीत के काम का बोझ कम हुआ। लगभग तीन महीनों की भागदौड़ के बाद इंद्रजीत आज शनिवार की छुट्टी का आनंद उठा रहा है। वैसे तो शनिवार और रविवार ऑफिस की छुट्टी होती है, परन्तु जॉइंट वेंचर और नई कंपनी के बनने पर इंद्रजीत ने बिना नागा शनिवार और रविवार भी काम किया।
आज शनिवार का दिन, हर रोज़ की भांति इंद्रजीत सुबह छः बजे उठ गया। चाय खुद ही बनाता था। दांतों पर ब्रश करके इंद्रजीत ने चाय बनाई और म्यूजिक सिस्टम पर भक्ति संगीत धीमी आवाज में सुनने लगा। लगभग एक घंटे बाद इंद्रजीत नीचे उतरा। माता-पिता दोनों नरेंद्र के तल पर मिले। नरेंद्र की पुत्री अनन्या को तेज ज्वर था। नरेंद्र डॉक्टर से फोन पर दवा पूछ रहा था।

"नरेंद्र कौन सी दवा लानी है, मैं ला देता हूं।" इंद्रजीत को कुर्ते पजामे में देख नरेंद्र ने पूछ लिया "तुम्हे ऑफिस जाने में देर हो जाएगी। मैं ले आता हूं। वैसे अभी केमिस्ट शॉप बंद होगी।"

"नरेंद्र आज शनिवार है, ऑफिस बंद है। बहुत दिनों बाद शनिवार ऑफिस नहीं जा रहा हूं, छुट्टी है। मेन रोड पर केमिस्ट सुबह सात बजे खुल जाता है। मैंने ऑफिस जाते समय अक्सर दवा उससे ली है।"

इंद्रजीत दवा ले आया। शनिवार नरेंद्र की भी छुट्टी होती है। इंद्रजीत नरेंद्र के कमरे में ही बैठ गया। सभी घर के सदस्य मौजूद थे। इंद्रजीत के माता-पिता, नरेंद्र, नीना (नरेंद्र की पत्नी) सभी अनन्या के पास बैठे थे। नरेंद्र का पुत्र अनिरुद्ध हलचल पर उठ गया था, लेकिन फिर उसे नींद गई और सो गया। दवा के असर से अनन्या को भी नींद गई और सब बाहर बैठक में गए।

इंद्रजीत ने भाभी नीना से चाय बनाने के लिए कहा "भाभी बहुत दिन हो गए तुम्हारे हाथ की चाय पिए हुए, एक अच्छी सी चाय पिला दो और साथ में मक्खन टोस्ट।"

नीना चाय और मक्खन टोस्ट सभी के लिए बना लाई। सभी चाय की चुस्कियां ले रहे थे तभी इंद्रजीत ने जॉइंट वेंचर और नई कंपनी के बारे में बताया। सभी उसके डायरेक्टर पद पर नियुक्त होने पर अति प्रसन्न हुए। सभी ने बधाई दी कि इंद्रजीत की मेहनत और लगन सफल हुई।

मां ने कहा कि आज इस ख़ुशी में बादाम का हलवा बनाएगी। इंद्रजीत को मां के हाथ का बादाम का हलवा बेहद पसंद था। इसका एक कारण यह भी था कि बादाम का हलवा बाजार में नहीं मिलता। गाजर और दाल का हलवा तो हर हलवाई बनाता है, पर बादाम का हलवा बनाना हर किसी के बस का नहीं।

"इंद्र सिर्फ मां के हाथ के बने बादाम के हलवे से नहीं मानने वाला। फाइव स्टार की पार्टी बनती है।" नरेंद्र ने मुस्कुराते हुए कहा।

"बिलकुल, कल सन्डे को दिन का लंच फाइव स्टार में। तब तक अनन्या भी ठीक हो जाएगी। कौन से फाइव स्टार में चलना है लंच के लिए, यह तुम चुनो। मैं तो अभी से तैयार हूं।"

ख़ुशी में सभी की हंसी का ठहाका गूंज गया।



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