Thursday, January 21, 2016

पुरानी बातें



फाइव स्टार में लंच करने के पश्चात सभी घर वापिस गए। अनन्या और अनिरुद्ध इंडिया गेट की पिकनिक से थक चुके थे और घर आते ही सो गए। इंद्रजीत भी अपने कमरे में आराम करने चला गया। शाम के साढे छः बजे इंद्रजीत अपने कमरे से बाहर आया और छत पर कुर्सी पर बैठ गया। तभी माता-पिता दोनों उसके पास ऊपर गए।

"आज का लंच वाकई लाजवाब था।" पिताजी ने इंद्रजीत के पास खाली कुर्सी पर बैठते हुए कहा। तभी माताजी भी अंदर कमरे में से एक कुर्सी ले आई और इंद्रजीत के पास बैठ गई।

"अनन्या और अनिरुद्ध काफी खुश थे। बोटिंग और इंडिया गेट पर घूम कर दोनों आनंदित थे।" इंद्रजीत ने बात आगे बढाई।

"बच्चों को तो खेलना और घूमना हमेशा से अच्छा लगता है। अपना बचपन याद करो इंद्र, स्कूल से आते ही बैग रख कर खेलने के लिए गली में निकल जाते थे।" माताजी ने कहा और इंद्रजीत को देखने लगी।

"हर उम्र के बच्चों को खेलना अच्छा लगता है।"

अब पिताजी ने वो मुद्दा छेड़ा जिसके लिए वे इंद्रजीत से मिलने ऊपर आए, वरना उसको नीचे ही बुला लेते।

"इंद्र ये गुरुस्वामी इंदु की क्या बात कर रहे थे?"

पिताजी की बात का मतलब इंद्रजीत अच्छी तरह से समझ चुका था और बिना कोई भूमिका के उसने इंदु के बारे में बताया कि वह और इंदु एक कंपनी में डायरेक्टर हैं। वह तो केवल डायरेक्टर है, इंदु तो आधी मालकिन है।

माता जी के माथे पर परेशानी साफ़ नज़र आने लगी। "प्रभु ये तेरी कैसी लीला है, जिसने शादी करके दबाया, जाने के बाद भी पीछा नहीं छोड़ रही है। आज मेरे बेटे के जीवन में ख़ुशी आई है, वो ग्रहण बन कर दुबारा से लौट आई।"

इंद्रजीत ने माता जी की आंखों में आंसू देखे, फिर पिता जी को देखा। वे चुप थे लेकिन माथे की लकीरें परेशानी बता रही थी। माता जी ने तो कह दिया, पर पिता जी अपने जज्बात छुपा गए। वे इंद्रजीत को देख रहे थे।

इंद्रजीत ने कहना शुरू किया।

"पापा जी, मम्मी जी आप परेशान मत होइए। वो पुरानी बातें को याद करके परेशान होने की कोई ज़रूरत नहीं है। उस समय वह अमीर मां-बाप की लड़की थी जिसे उसके परिवार वाले शह देते थे और मेरी आर्थिक स्थिति कमजोर थी। मेरी नौकरी छोटी और आमदनी कम थी, जिसमे वह गुज़ारा नहीं कर सकी और तलाक हो गया परन्तु आज हालात बिलकुल विपरीत हैं। मैं कंपनी का डायरेक्टर हूं और मेरी आर्थिक स्थिति भी अच्छी है। मुझे वो इस लिए नहीं दबा सकती क्योंकि हमारी कंपनी के साथ जॉइंट वेंचर उन्होंने हमारी शर्तों पर किया है और हमारी कंपनी की आर्थिक स्थिति उनसे कम नहीं बल्कि बेहतर है। यहां अब बराबरी की बात है। वह समझ चुकी है कि पहले वाले और अब वाले इंद्रजीत में ज़मीन आसमान का अंतर है और मैं यह भी जानता हूं कि वह हम पर हर बात पर हावी नहीं हो सकती। गुरुस्वामी को मैंने खुद अपने और इंदु के बारे में बताया और उन्होंने मेरे आज को, मेरी क़ाबलियत को देख कर मुझे जिम्मेदारी दी है, वो आप सब ने होटल में देख ही लिया। यह ठीक है कि एक बार इंदु को देख कर मैंने खुद गुरुस्वामी से इस प्रोजेक्ट से हटने के लिए कहा, लेकिन क्योंकि मैंने शुरू से इस प्रोजेक्ट में काम किया, इसलिए उन्होंने मुझे ही इस प्रोजेक्ट में रखा। आप चिंता रखें। इंदु से तो मुझे कोई खतरा है आपको।"

"बेटा हम तो ईश्वर से एक ही प्रार्थना करते हैं कि अब कोई नज़र लगे हमारी खुशियों पर। बहुत तपस्या के बाद अच्छे दिन देखें हैं।" माता जी ने कह कर पल्लू से अपने आंसू पोंछे।

"मम्मी आप मेरे ऊपर भरोसा रखो, कोई गलत काम नहीं होगा। कम से कम इंदु से डरने की कोई आवश्यकता नहीं है।"

इंद्रजीत ने माता-पिता को समझाया और सांत्वना दी। माता-पिता दोनों को इंद्रजीत के विश्वास और गुरुस्वामी के इंद्रजीत पर पूरा ऐतबार होने पर गर्व भी हुआ।

इंद्रजीत ने अपने माता-पिता को तो सांत्वना दे दी और समझाया कि इंदु से कोई डरने की जरुरत नहीं है परन्तु इंद्रजीत पुरानी बातों में उलझ गया। जहां इंद्रजीत ने इस विषय पर कभी नहीं सोचा और कंपनी के हित में काम करता रहा। उसका मन कभी भी विचलित नहीं हुआ। मन तो आज भी उसका स्थिर है। अडिग मन को विचलित नहीं होने दिया। विचलित तो आज भी नहीं है। उसका मन अतीत में भ्रमण करने लगा। रात को डिनर के बाद बिस्तर पर लेटा, रोज़ की भांति म्यूजिक सिस्टम ऑन नहीं किया। नाईट लैंप जलाया। हलकी नीली रोशनी में सामने दीवार को देखते हुए आंखें मूंद ली और अतीत में विचरण करने लगा। लगभग तेईस वर्ष पहले की बातें, सब कुछ याद है। भूली नहीं जाती पुरानी बातें। याद सब कुछ रहता है। बातें दिमाग के एक कोने में दबी रहती हैं, ख़त्म नहीं होती हैं। बीच बीच में हलकी हलकी दस्तक देती रहती है। हम बाहर नहीं आने देते, वापिस एक अंधेरे कोने में धक्का दे कर बिठा देते हैं। समय आने पर रोकने से भी नहीं रूकती यादें और बातें। आज वही हो रहा है। नहीं रुकेंगी यादें, बाहर आने के लिए कोई नहीं रोक सकेगा। आज तो खुद अपने आप बाहर रही हैं। इंद्रजीत नहीं रोक सक रहा है। कहें तो वह रोकने की कोशिश भी नहीं कर रहा है। चाहता है कि आज वो बाहर निकलें, यादों को दबाना भी अधिक अच्छा नहीं।


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