Wednesday, January 27, 2016

दर मालिक दा



दर मालिक दा मन के मनवा सब दुःख विसारना,
श्याम सुंदर दा पीताम्बर फड़ के भव सागर तर जावणां
मन मंदिर विच श्याम बसेरा, श्याम चरणा विच लावी सदा,
जिस विद्य विच मालिक रखे, उस विच रह जावी सदा,
दर मालिक दा मन के मनवा सब दुःख विसारना,
श्याम सुंदर दा पीताम्बर फड़ के भव सागर तर जावणां

पत्ते-पत्ते विच प्रभु हे वस्या, भगत हेतु अवतार धरे,
युग-युग दे विच प्रीतम आए, प्राणी भवतुं तारे,
दर मालिक दा मन के मनवा सब दुःख विसारना,
श्याम सुंदर दा पीताम्बर फड़ के भव सागर तर जावणां

सब ना जियां दा हिकको दाता, सब जीवां दा सार लवे,
पत्थर अंदर कीड़ा वस्से, अन्न-जल उत्थे जा धरे,
दर मालिक दा मन के मनवा सब दुःख विसारना,
श्याम सुंदर दा पीताम्बर फड़ के भव सागर तर जावणां

सब सुखा दी खान प्यारा, इस कुं कद्दे भुलाविं ,
स्वांश-स्वांश प्रभु यश गावीं, तू कृतः गण अखवाविं ,
दर मालिक दा मन के मनवा सब दुःख विसारना,
श्याम सुंदर दा पीताम्बर फड़ के भव सागर तर जावणां



Post a Comment

हुए हैं जब से शरण तुम्हारी

हुए हैं जब से शरण तुम्हारी , खुशी की घड़ियां मना रहे हैं करें बयां क्या सिफ़त तुम्हारी , जबां में ताले पड़े हैं। सु...