Monday, February 01, 2016

कॉलेज का प्रथम वर्ष



इंद्रजीत पढ़ाई में साधारण था। बारहवी कक्षा में जम कर पढ़ाई की। अच्छे कॉलेज में दाखिला लेना था। अच्छे कॉलेज से बी.कॉम करने की धुन ने एक साधारण विद्यार्थी को पढ़ाकू की श्रेणी में स्थापित कर दिया। माता-पिता भी हैरान कि इंद्रजीत में यह परिवर्तन कैसे आया। उसके मित्र भी हैरान, खेल-कूद का शौक़ीन इंद्रजीत किताबों में डूब गया। बारहवी की परीक्षा से छः महीने पहले से जो पढ़ाई में अपने को झौंका, परीक्षा तक चैन नहीं लिया।

मेहनत रंग लाई, प्रथम श्रैणी में उत्तीण हुआ और इंद्रजीत को अपने मन पसंद कॉलेज में बी.कॉम के लिए एडमिशन मिल गया। कॉलेज में पहला सप्ताह रैगिंग और मेल जोल में बीत गया, उसके बाद पढ़ाई शुरू हुई। स्कूल में पढ़ाई का माध्यम हिंदी था। कॉलेज में इंग्लिश माध्यम से पढ़ने में दिक्कत आने लगी। धीरे-धीरे उसने इस दिक्कत को काबू में किया। क्लास में हिंदी माध्यम से आए कई विधार्थी थे। उनकी आपस में दोस्ती हुई। कॉलेज में दो तरह के ग्रुप बने हुए थे। एक समूह में हिंदी माध्यम के स्कूल से आए विधार्थी थे और दूसरा समूह इंग्लिश मीडियम के स्कूल से आए स्टूडेंट्स का था, जो अपने को हिंदी माध्यम के स्कूल से पढे विद्यार्थियों से उत्तम और बेहतर मानते थे। हालांकि ऐसा था नहीं, हिंदी माध्यम से पढ़ कर आए छात्र, छात्राएं पढ़ने में अंग्रेजी माध्यम से पढ़े छात्रों को पढाई में पूरी टक्कर देते थे और अधिक होशियार भी थे।

प्रोफेसर अपने अनुभव से इस बात को स्वीकारते थे कि स्कूल में छात्र का कोई भी माध्यम रहा हो पढ़ने के लिए, हिंदी या अंग्रेजी, कोई विशेष प्रभाव नहीं डालती है। इस कारण वे कोई भेद-भाव नहीं करते थे यदि छात्र की पढ़ने में रूचि है। क्लास रूम हो या ट्यूटोरियल, पढ़ने वाले छात्रों को हमेशा प्रोसाहित करते थे।

प्रोफेसर के प्रोत्साहन से इंद्रजीत का रूझान पढाई में अधिक हो गया। बारहवी कक्षा में पढाई के प्रति बनी रूचि और अधिक हो गई। पहले तीन महीने उसके मित्र नहीं बन पाए। क्लास रूम के बाद लाइब्रेरी में पढ़ने के लिए जाने लगा, जहां उसकी पहचान फाइनल इयर में पढ़ने वाले छात्र सुधीर से हुई। लाइब्रेरी में एक टेबल पर साथ साथ बैठ कर पढ़ने के कारण दोनों की मित्रता कुछ ही दिनों में घनी हो गई। कॉलेज में अकेले रहने के कारण इंद्रजीत की दिनचर्या नीरस हो चुकी थी। एक मित्र बनने के पश्चात इंद्रजीत में आत्मविश्वास उत्पन्न हुआ। सुधीर ने उसे गुरु मन्त्र दिया कि जीवन में निराशा को त्याग कर हर समय आशावादी बना रहे। असफलता से डरे नहीं। अंग्रेजी बोलने वालों से भी घबराने की कोई आवश्कयता नहीं है। टूटी-फूटी अंग्रेजी में बात करो। बिना झिझके गुलाबी अंग्रेजी बोल जाओ। डरो मत कि गलत बोली या सही। अपने कहने का अर्थ यदि दूसरा समझ जाता है तो समझो जीत हमारी है। सुधीर का दिया मन्त्र काम कर गया।

इंद्रजीत में स्वयं पर भरोसा, आत्मविश्वास बढ़ने लगा और वह क्लास रूम में प्रोफेसर के साथ प्रश्नो उत्तर के समय बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेने लगा। कुछ अंग्रेजी बोलने वाले छात्र उसका मजाक भी उड़ाने लगे, परन्तु सुधीर के गुरु मन्त्र से लबा-लब सम्पूर्ण आत्मविश्वास ने उसे पीछे मुड़ने नहीं दिया।

इंद्रजीत के पढाई में रूचि देख कर कुछ छात्र उसके मित्र भी बन गए और सभी सीनियर सुधीर के चेले बन गए। सुधीर का मकसद अगले वर्ष मास्टर्स करने पर छात्र संघ के चुनाव लड़ना था और अभी से वह उसकी तैयारी में छात्रों का मसीहा बनता जा रहा था।
अधिकांश छात्र कॉलेज में पढाई कम और मौज मस्ती में अधिक ध्यान दे रहे थे। स्कूल के कठोर अनुसाशन वाले वातावरण से निकल कर एक आजाद वातावरण में विचरण कर रहे थे। पिकनिक में जाना, सिनेमा जाना, कैफेटेरिया में समय छात्रों का अधिक व्यतीत होने लगा। क्लास में छात्रों की उपस्थिति कम रहती। कुछ छात्र केवल अपनी उपस्थिति दर्ज करवा कर पिछले दरवाज़े से निकल जाते। प्रोफेसर पढ़ाने आते, इसलिए उनको पढ़ने वाले छात्रों के साथ आनंद आता। कुछ प्रोफेसर ने छात्रों को साफ़ कह दिया कि यदि पढ़ना हो तब क्लास में आएं, वरना उपस्थिति के लिए महीने के अंत में मिलें।

इंद्रजीत हर क्लास में मौजूद रहता और इस कारण प्रोफेसर भी उसको पसंद करते। इस कारण अंग्रेजी माध्यम के स्कूल वाले छात्र उसको पसंद नहीं करते थे, लेकिन वे उसका अधिक कुछ बिगाड़ नहीं सके क्योंकि इंद्रजीत का सुधीर के साथ उठना-बैठना था। सुधीर और उसके साथियों के रौब के कारण इंद्रजीत को मुंह पर तो कुछ नहीं कहते परंतु पीठ पीछे मजाक उड़ाते थे।

सर्दियों में एक प्रोफेसर कॉलेज के लॉन में धूप में क्लास लेते। इंद्रजीत को धूप में प्रोफेसर के इर्द-गिर्द बैठ कर पढ़ना, चर्चा करना पसंद था। क्लास में प्रोफेसर ब्लैक-बोर्ड पर और छात्र डेस्क पर, पीछे के डेस्क पर बैठे इंद्रजीत की प्रोफेसर से दूरी रहती जो धूप में लॉन पर क्लास में नजदीकी में बदल गई।

सुधीर और दूसरे सीनियर ने कॉलेज की पिकनिक आयोजित की। इंद्रजीत को प्रथम वर्ष के छात्रों को पिकनिक के लिए नियुक्त किया। अंग्रेजी माध्यम से आए छात्रों ने इंद्रजीत का बहिष्कार किया और पिकनिक में नही गए। उन्होंने अपने ग्रुप की अलग पिकनिक आयोजित की। दो पिकनिक एक ही दिन तय हो गई। कॉलेज में हिंदी माध्यम के स्कूल वाले छात्र अधिक थे। सुधीर का दबदबा भी था, अतः उनकी पिकनिक में छात्रों की संख्या अधिक थी और सफल रही। दूसरी ओर विरोधियों की पिकनिक असफल रही। ताव में आकर विरोधियों ने भी पिकनिक उसी दिन और उसी स्थान पर रखी कि इंद्रजीत के ग्रुप को हूटिंग करके चिड़ायेंगे, परंतु कम संख्या के कारण उलटे घिर गए और जल्दी पिकनिक छोड़ कर वापिस भागना पड़ा।

फरवरी का महीना गया और छात्रों में परीक्षा का बुखार चढ़ना आरम्भ होने लगा। अप्रैल में परीक्षा होनी थी। कॉलेज के नोटिस बोर्ड पर परीक्षा की डेट-शीट लग गई। इंद्रजीत ने शुरू से ही पढाई जारी रखी थी, इसलिए उसे कोई चिंता नहीं थी। बाकी छात्र पढ़ने का कार्यक्रम बनाने की सोचने लगे। इंद्रजीत ने निश्चिन्त हो कर अपने हर रोज़ की दिनचर्या में कोई परिवर्तन नहीं किया।

अप्रैल का महीना गया। परीक्षा संपन्न हुई। रिजल्ट जून के अंत में आना था। परीक्षा के बाद हॉस्टल के छात्र अपने घर चले गए। कॉलेज परिसर सूना हो गया।


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