Tuesday, February 16, 2016

नजदीकी



इंदु भी इंद्रजीत की क्लास में पढ़ती है। वह अंग्रेजी माध्यम के स्कूल से पढ़ी थी और इसलिए वह इंद्रजीत के विरोधी ग्रुप में थी। प्रथम वर्ष की परीक्षा में चार में से दो विषयों में कम्पार्टमेंट आई। विश्वविद्यालय के नियमों के अनुसार कम्पार्टमेंट वाले छात्रों को दूसरे वर्ष में दाखिला मिल गया।

क्लास में इंद्रजीत का कद बढ़ गया और उसके विरोधियों का कोई नामो निशान नहीं रहा। प्रथम वर्ष की मौज मस्ती में पढाई को अधिक महत्त्व नहीं दिया और उसका खामियाजा भुगतना पड़ा।

इंदु ने अपने साथियों से दूर रह कर पढाई में समय के सदुपयोग करने का निर्णय लिया। उसके सभी संगी साथी या तो तृतीय श्रेणी में पास हुए थे या उसके जैसे कम्पार्टमेंट में थे। इंदु ने मेधावी छात्र से नोट्स लेने के लिए सोचा। इंद्रजीत से अधिक मेधावी तो कोई हो नही सकता। वह तो प्रथम रहा। उससे अधिक अच्छे नोट्स किसके हो सकते हैं। किसी के भी नहीं। उससे दोस्ती की जाये। एक पढ़ने वाला मित्र मिलेगा। मौज-मस्ती के लिए तो पूरी ज़िन्दगी है, कॉलेज में अब पढाई करके कुछ जीवन को भी संवारा जाये। कॉलेज की डिग्री भी जरुरी है। कैरियर को भी बनाना है।

इंदु खूबसूरत, रंग गोरा, लंबा कद पांच फुट आठ इंच लंबी और पतला बदन। खूबसूरती और लंबे कद से लड़कियों के झुण्ड में दूर से अलग ही नज़र आती थी। हर लड़के की नज़र इंदु पर टिक जाती थी। इस बात का इंदु को पता था कि हर लड़के की पहली पसंद वह ही है। पूरे कॉलेज में इंदु के सामने एक या दो लड़कियां ही टिकती थी।

इंदु एक अमीर परिवार की नखरैल लड़की थी। पिता का व्यापार देश, विदेश में फैले हुए थे। कार में कॉलेज आती थी। हर रोज़ नये फैशन के कपडे। फिर भी कॉलेज की डिग्री तो लेनी है और उसके लिए पढाई तो करनी है। जब भी किसी से बात करती तब नखरा साफ़ झलकता था।

इंद्रजीत मध्यम वर्ग के परिवार से ताल्लुक रखता था, उसके हिंदी माध्यम के स्कूल से पढाई के कारण कॉलेज के शुरू के दिनों में उसे तंग भी किया था और उस पर मजाक करते, इस कारण वह अंग्रेजी मीडियम से पढ़ कर आये छात्रों से दूर रहता था।

इंदु इंद्रजीत से बात करके उससे नोट्स लेने के लिए आतुर थी। उसने इंद्रजीत पर नज़र रखनी शुरू की और कॉलेज में उसकी दिनचर्या देखने लगी। वह अपने मित्रों और मण्डली से अगल रहने लगी और स्वयं इंद्रजीत के समीप आने के कारण ढूंढने लगी।

इंद्रजीत क्लास के बाद लगभग दो से तीन घंटे लाइब्रेरी में बैठता था और नोट्स बनाता था। इंदु ने उसकी दिनचर्या देखी और एक दिन इंद्रजीत के साथ लाइब्रेरी गई और इंद्रजीत के साथ वाली कुर्सी पर बैठ गई। इंद्रजीत ने कुछ किताबें उठाई और उनको पढ़ कर नोट्स बनाने लगा। इंदु उसके साथ बैठी उसको लगातार देख रही है, इस बात का उसको अहसास था परंतु बिना विचलित हुए वह नोट्स बनाता रहा। जब तक इंद्रजीत लाइब्रेरी में रहा, इंदु भी लाइब्रेरी में रही। वह भी एक किताब उठा कर उसके पन्ने उलटती रही, किन्तु पहले दिन वह इंद्रजीत को कुछ कह नहीं सकी। उसका ध्यान पढाई में नहीं था, परंतु वह इंद्रजीत को दिखाना चाहती थी कि वह पढ़ रही है।
यह सिलसिला चार पांच दिन तक चलता रहा। इंद्रजीत के पीछे इंदु लाइब्रेरी पहुंच जाती और कोशिश करके इंद्रजीत के बराबर वाली कुर्सी पर बैठती या इंद्रजीत के सामने वाली कुर्सी पर बैठती। उसका लक्ष्य था कि इंद्रजीत उसे देखे और बात करे परंतु इंद्रजीत ने इंदु से कोई बात नहीं की और अपने नोट्स बनाता रहता।

एक सप्ताह बाद इंदु ने इंद्रजीत से बात की, क्योंकि उसे अहसास हो गया कि इंद्रजीत खुद उससे बात करने की पहल नहीं करेगा। लाइब्रेरी में उसके साथ वाली कुर्सी पर बैठ इंदु ने इंद्रजीत से हौले से कहा "हैल्लो इंद्रजीत।"

लाइब्रेरी में क्योंकि बात धीरे से की जाती है और सम्पूर्ण शांति रखी जाती है ताकि किसी को पढ़ने में असुविधा हो। इंदु के हैल्लो कहने पर इंद्रजीत ने इंदु की ओर देखा और हलके से मुस्कुरा दिया, उसने कुछ कहा नहीं।

कुछ पल पश्चात जब इंदु ने देखा कि इंद्रजीत ने उसकी बात का कोई जवाब नहीं दिया और मुस्कुरा कर फिर नोट्स बनाने में व्यस्त हो गया। अब इंदु ने कुर्सी थोड़ी नज़दीक करके इंद्रजीत से बोली "नोट्स बना रहे हो?"

"हां, अभी तो बनाने शुरू किये है। जितनी क्लास में पढाई हुई है, उन्ही के बना रहा हूं।" इंद्रजीत ने किताब बंद करते हुए जवाब दिया।

"इंद्रजीत मुझे अपने नोट्स दोगे, मैं कॉपी करके अगले दिन वापिस कर दूंगी।" इंदु ने विनती की।
"अभी तो नोट्स आधे अधूरे है, जब पूरे हो जाएंगे, तब दे दूंगा।"
"मैं बाद में नोट्स ले लूंगी, जब पूरे हो जाएंगे। इंद्रजीत आपके पास फर्स्ट इयर के नोट्स होंगे? इंदु ने इंद्रजीत से पूछा।
"फर्स्ट इयर के नोट्स क्या करने हैं? इंद्रजीत ने कुछ चौंक कर पूछा।
इंदु ने थोडा शरमाते हुए कहा। "वह ऐसे है कि दो विषयों के चाहिए। मेरी कम्पार्टमेंट है, अभी सितम्बर में पेपर देने हैं।"
"घर पर देखने होंगे कहीं रद्दी में बिक गए हों।" इंद्रजीत ने बात टालते हुए कहा। उसे पता था कि नोट्स घर पर पड़े हैं, परंतु वह इंदु को नोट्स नहीं देना चाहता था। इंदु उस समूह का एक अहम सदस्य थी जो अंग्रेजी माध्यम के स्कूल से पढ़ कर आए थे और इंद्रजीत का उसकी अंग्रेजी पर मजाक बनाया करते थे।

"कल ले आना। मैं दो तीन दिन में वापिस कर दूंगी।"
"ठीक है, मैं देख लूंगा।"

इंदु अब क्लास में इंद्रजीत के साथ एक डेस्क पर बैठने लगी। उसके साथी और मित्र इंद्रजीत के प्रति झुकाव से हैरान हो गए।

इंदु हर रोज़ इंद्रजीत से नोट्स के बारे में पूछती और इंद्रजीत टाल जाता कि समय नहीं मिला प्रथम वर्ष के नोट्स ढूंढने के लिए या फिर भूल गया।

चार दिन बाद इंद्रजीत जब लाइब्रेरी के बाद लगभग तीन बजे घर जाने के लिए उठा तो इंदु ने पूछ ही लिया "इंद्रजीत आपका घर कहां है।?"
"गुजरांवाला टाउन।"
"कैसे जाते हो?"
"बस से जाता हूं।"
"चलो मैं तुम्हे कार पर छोड़ देती हूं।"
"मेरा घर समीप है। विश्वविद्यालय से मुश्किल से दो ढाई किलोमीटर है। बस आराम से मिल जाती है।"
"कार में चलते हैं, मुझे नोट्स भी दे देना।"
"नोट्स ढूंढने में समय लग सकता है।"
"मैं इंतज़ार कर लूंगी। मेरी विनती है, तुम्हारे नोट्स से मैं पास हो जाउंगी।"
बात करते हुए दोनों बाहर आए। इंद्रजीत कॉलेज के गेट की ओर जाने लगा तो इंदु ने इंद्रजीत का हाथ पकड़ लिया। "प्लीज, इंद्रजीत कार में जाओ। नोट्स ढूंढने में मैं भी मदद करूंगी।"

जब इंदु ने इंद्रजीत का हाथ पकड़ लिया तब इंद्रजीत थोडा हड़बड़ा गया। वह सोच नहीं सका कि क्या करे। इंद्रजीत अभी सोच में ही था कि इंदु ने कार का दरवाज़ा खोला "आओ इंद्रजीत कार में बैठो।"

इंद्रजीत कार में बैठ गया और इंदु ने कार स्टार्ट की। इंदु की कार में इंद्रजीत को देख कर और उसके साथ जाता देख इंदु की मित्र मण्डली बैचैन हो गई। उसके दोस्तों में खलबली मच गई क्योंकि इंदु पिछले कुछ दिनों से इंद्रजीत के साथ क्लास में बैठ रही थी और लाइब्रेरी में उसके साथ समय व्यतीत करती।

इंदु की कार कॉलेज गेट से बाहर हो गई और सात मिनट में गुजरांवाला टाउन पहुंच गई।




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