Monday, February 22, 2016

प्रेमालाप



राकेश ने खिड़की का पर्दा हटाया और खिड़की के आगे खड़ा हो कर बाहर देखने लगा। रात की कालिमा छट रही थी और हल्का-हल्का उजाला हो रहा था। खिड़की बंद थी। फरवरी के महीने की ठण्ड थी। सुबह और रात की अच्छी ठण्ड थी। खिड़की पर दो कबूतर बैठे थे। सुबह उठने का समय हो चुका है, आदमी उठे या उठे, पक्षी और पशु कुदरत के नियमों का अनुसरण जरूर करते हैं। उन्हें देर रात तक पार्टी नहीं करनी, चौबीस घंटे आगे बढ़ने की हौड़ नहीं करनी, रातों रात अमीर नहीं बनना। प्रकृति जैसा कहती है, वैसा करते हैं। अंधेरा होते सो जाते हैं, उजाला होने पर उठ जाते हैं। हम उनसे सीखते नहीं।

रीना ने राकेश को खिड़की के आगे खड़ा देखा "क्या हुआ? इतनी जल्दी उठ गए।" अलसाई आवाज़ में पूछा।
"साढ़े छः बज रहे है। तुम कह रही हो कि जल्दी है।"
"ऑफिस जाना है क्या?"
"नहीं, दूसरा शनिवार है। दो दिन की छुट्टी है।"
"फिर उठने की क्या जल्दी है?" रीना ने उठ कर खिड़की पर पर्दा किया और पीछे से राकेश से चिपक गई और हाथों को राकेश की छाती पर रख कर धीरे-धीरे छाती को सहलाने लगी।
राकेश ने रीना का हाथ भींच लिया। रीना ने अपना सिर राकेश की पीठ से सटा दिया। "रीना सुबह के साढ़े छः बज रहे हैं। तुम मूड बना रही हो।"
"बिल्कुल नहीं।"
"फिर उठ जाओ, चिपकने की क्या ज़रूरत है।"
"उठ जाएंगे। जब ऑफिस जाना नहीं, कोई विशेष कार्य है नहीं तब जल्दी क्यों?"
"देखो खिड़की पर दो कबूतर बैठें है, वे भी उठ गए हैं। चिड़ियों की चहकने की आवाज़ रही है और इनके साथ तुम्हारे स्पर्श से जिस्म में जादू का अहसास सा हो रहा है।"

रीना धीरे-धीरे पीछे हुई। राकेश भी पीछे होने लगा। रीना बिस्तर तक गई और लुडक गई। राकेश भी रीना के साथ बिस्तर पर लुडक गया। राकेश ने रीना को बाहों में ले लिया और दोनों खामोश एक दूसरे को देखने लगे।
"ऐसे क्यों देख रहे हो?"
"खूबसूरत लग रही हो।"
"रोज़ नहीं दिखती क्या?"
"रोज़ इन निग़ाहों से नहीं देखता।"
"निग़ाहें क्यों बदल लेते हो?"
"बहुत समय बीत गया, ऐसा एकांत नहीं मिला तुम्हे ऐसे देखे हुए।"
"देखा करो, अच्छा लगता है।"
"मशीनी ज़िन्दगी हो गई है हमारी। सुबह होते ही भाग-दौड़, अच्छी ज़िन्दगी के लिए, स्टेटस, रुतबे, स्तर के लिए पगलाये रहते है। अपने खुद के लिए समय नहीं निकाल पाते।"
"क्यों भाग रहे हो?"
"तुम्हारे लिए, तुम्हे खुशियां देने के लिए।"
"खुशियां कैसे मिलती हैं?"
राकेश ने रीना को अपने से चिपका कर आलिंगन किया। "इसके लिए।"
"इसके लिए तो फुरसत के कुछ पल की ज़रूरत होती है, उसके लिए भाग-दौड़ क्यों? भाग-दौड़ में तो प्यार ही भूल जाते हो।"
"जीने के पैसा भी चाहिए। उसके लिए थोड़ी भाग-दौड़ तो करनी पड़ती है।"
"कितने पैसों की आवश्यकता होती है जो भाग-दौड़ को कम करने के बजाए अधिक कर देती है।"
"इतना जो कि बारिश में छतरी का काम कर सके।"
"यह तो जवाब नहीं हुआ कि आखिर कितना रूपया, पैसा चाहिए।"
"रुपये की लालसा कभी ख़त्म नहीं होती।"
"थोड़ी तो हो सकती है।"
"हां, वो हम कम कर सकते है। अपनी आवश्यकताओं को सीमित रख कर।"
"बस वही तो कह रही हूं, थोडा है, थोड़े की जरुरत है। उसी के लिए काम करो।"
"बाकी समय।"
"प्यार।"
"वही कर रहा हूं।"
फिर दो तन एक हो गए।

साढ़े आठ बजे दोनों उठे। आसमान साफ़ था और सामने की बिल्डिंग पर धूप छाने लगी थी। रीना ने खिड़की का पर्दा खोला।
"चाय पिओगे?"
"रोज़ तो बिना पूछे चाय पिलाती हो, आज पूछ रही हो। यदि मूड नहीं है तो नहीं पीते है।"
"पूछ इसलिए रही हूं कि मैं रसोई में चाय बनाने जा रही हूं और तुम सो रहे हो। कम से कम दांत ब्रश तो कर लो।"
"साढ़े छः बजे उठा था, पकड़ कर सुला दिया, अब नींद नहीं खुल रही है तो उठने को कह रही हो।"
"मेरा तो कोई काम है नहीं, सो जाओ। जब उठोगे तब चाय बना दूंगी।"
"चाय बना लो, अब उठ जाता हूं। जब तक चाय बनती है, मैं दांत ब्रश कर लेता हूं।"
"चाय के साथ कौन से बिस्कुट लोगे?"
"नमकीन बिस्कुट।"
"रोज़ तो मीठे बिस्कुट खाते हो, आज नमकीन बिस्कुट?"
"आज सुबह से नमकीन बातें कर रही हो, इसलिए नमकीन बिस्कुट हो जाये।"

चाय की चुस्कियों लेते हुए राकेश की नज़र खिड़की से बाहर पड़ी "धूप निकल आई है सुबह-सुबह। मौसम खुशनुमा है, घूमने चलते हैं।"
"दोपहर में चलते है। शाम तक वापिस जाएंगे।"
"ठीक है नाश्ता करके चलते है। लंच बाहर करते है।"
"नाश्ते के साथ-साथ लंच बना लूंगी। लंच का टिफिन साथ लेकर चलते हैं।"
"मॉल नहीं घूमना क्या?"
"नहीं घूमना।"
"सिनेमा देखना है।"
"वो भी नहीं, हर रोज़ टीवी में अनगिनित फिल्में आती है। इच्छा नहीं है, वैसे भी कोई खास फ़िल्म लगी भी नहीं। बेकार की फ़िल्म पर पैसे खर्च करना कोई अकलमंदी नहीं लग रही।"
"फिर कहां चलने का इरादा है?"
"पुराना किला चलते है। बोटिंग भी हो जाएगी। शाम तक वापिस जाएगें।"
"पुराना किला और बोटिंग, आज तो पूरा आशिकाना मूड है।"
"खामखाह की खरीदारी करनी नहीं, सब कुछ है। बाजार, मॉल चले जाओ, बिना किसी ज़रूरत के कुछ कुछ ख़रीदा जाता है। कपड़ों की लाइन लगी है। कुछ खरीद लिए, मालूम भी नहीं कि कभी पहने होंगे। आलतू-फालतू का सामान घर में एकत्रित हो जाता है, बाद में फैंकना पड़ता है, इसलिए ऐसी जगह चलो, जहां शॉपिंग हो।"
"ठीक है, चलो जहां तुम कहो, वहीं चलते हैं।"
"शाम के पांच बजे तक घर वापिस जरूर आना है। देर नहीं क्योंकि थोडा आराम करके रात का खाना बनाना है।"
"क्या हो गया है, तबियत तो ठीक है ? बाहर का खाना, कोई शॉपिंग। हर छुट्टी वाले दिन एक समय तो हम बाहर खाना खाते हैं।"
"तबियत ठीक है और आप भी अपनी तबियत मेरे जैसी बना लो। होटल, रेस्टॉरेंट का खाना मंहगा होता है, घर पर उसी दाम में पांच-छः दिन का दोनों समय का खाना बनता है और वो भी बढ़िया।"
"आज बचत अभियान पर अग्रसर हो।"
"अब मैंने प्रण ले लिया है कि जो आवश्यक होगा, वहीँ खर्च करना है नहीं तो बचत। आज की बचत कल हमारे काम आएगी।"
"वैरी गुड।"
"वैरी गुड छोड़ो और नहा कर तैयार हो जाओ। मेरा नाश्ता और लंच एकदम तैयार हैं।"

राकेश नहाने के लिए स्नानघर गया। रीना पहले ही नहा ली थी। डाइनिंग टेबल पर नाश्ते की प्लेट लगा दी। स्नानघर से बाहर आकर राकेश ने पूछा "रीना तुम तैयार नहीं हुई?"
"मैं तैयार हूं।"
"यह घर पहनने का सूट बदला नहीं।"
"कौन सी शादी में जाना है जो सज-संवर लूं। नया सूट है, एकदम सही। यह बात और है कि घर पर अधिक पहनती हूं।"
"ठीक है मैं भी कुर्ता-पजामा पहन लेता हूं।"
दोनों ने नाश्ता किया और ग्यारह बजे घर से पुराने किले की और निकले। राकेश ने कार की चाबी उठाई तब रीना ने बाइक पर चलने को कहा। "पेट्रोल की बचत होगी।"
इंतना सुन कर राकेश ने बाइक की  चाबी उठाई और मुस्कुरा कर रीना को देखा।
"अब देखना छोड़ो और बाइक चलाओ।"
राकेश ने बाइक स्टार्ट की। रीना सट कर पीछे की सीट पर बैठ गई। राकेश बाइक धीरे-धीरे चला रहा था।
"इतना धीरे क्यों चला रहे हो?"
"तुम चिपक कर बैठी हो। थोडा आनंद रहा है।"
"मैंने पेट्रोल बचाने के लिए बाइक चलाने को कहा था। तुम्हे मजे लेने के लिए नहीं।" कह कर रीना राकेश से कुछ और सट गई।
"मैं सब समझ गया। बाइक अब धीरे-धीरे ही चलेगी।"
खाने का टिफिन राकेश ने हेलमेट लॉक में रखा था। रीना के हाथ खाली थे। उसने अपनी चुन्नी को अपने नीचे दबा लिया और एक हाथ राकेश की कमर में डाल कर कस के चिपक गई।
"धीरे चलाना और झटकों का ध्यान रखना। बहुत दिन बाद बाइक पर बैठे हैं, गिरा मत देना। संभल कर बाइक चलाना।"
"ओके हमारी सरकार। आपकी हर आज्ञा का पालन होगा।"

एक घंटे बाद पुराना किला पहुंचे। बाइक से उतर कर दोनों एक दूसरे को देख हंस पड़े। राकेश के बाल हेलमेट के अंदर चिपक गए थे। रीना के बाल हवा में उड़ते हुए बिखरे हुए गालों पर झूल रहे थे। रीना ने बाल बांधे। बाइक को पार्किंग में खड़ा किया और पुराना किला की टिकट लेकर अंदर गए। पुराना किला में दोनों एक साथ हाथों में हाथ डाले घूमते रहे फिर एकांत में बैठ गए।

राकेश पैर फैला कर बैठा तो रीना उसकी जांघो पर सर करके लेट गई और राकेश को देखा। राकेश मुस्कुरा दिया और रीना के गालों पर आए बालों को हटाया और उसके बालों में हाथ घुमाने लगा।
"तुम्हे मैं यहां क्यों लाई?"
"शादी से पहले हम यहां कितनी बार आए है। अब तो एक मुद्दत के बाद यहां आना हुआ।"
"मुझे अब क्यों नहीं लाते?"
"शादी के बाद जीवन की सोच और रहने का तरीका बदल जाता है।"
"क्यों बदल जाता है?" रीना ने राकेश के गालों पर उंगलियां फेरते हुए पूछा।
"यहां हम आते थे एक दूसरे से मिलने और बात करने, प्रेमालाप करने। भीड़ वाली जगह पर डर लगता था कि कोई पहचान वाला देख ले, इसलिए एकांत के स्थान ढूंढते थे कि यहां कौन आएगा। इसके बाद चिड़िया घर भी कई बार जाते थे।"
"शेरों के बीच कभी घूमते, कभी बैठ जाते। वहां निडर होते थे कि शेर कुछ नहीं कहेंगे और कोई परिजन भी नहीं होगा। अब मैं तुम्हे लाई कि वो पुरानी बातें याद करें।"
"विवाह के बाद किसी से डरने की जरुरत नहीं होती। घर अपना, दिन अपना, रात अपनी। जब चाहो बात करो, प्रेमालाप करो। इसलिए कभी यहां आने की नहीं सोची।"
"नहीं सोची कोई बात नहीं, जब मैं तुम्हे ले आई तब बताओ कैसा लग रहा है।"
"सच कहूं, एक सुखद आनंद की अनिभूति हो रही है।" और राकेश ने नीचे झुक कर रीना को चूम लिया।

रीना एकदम झटक कर बैठ गई। "अचानक से क्या हो गया, खुले में, किसी ने देख लिया होगा। बेशर्मी की भी कोई हद होती है।"
"कोई नहीं है दूर दूर तक, एक मैं और एक तुम, दूसरा कोई नहीं।"
"यह फ़िल्मी गीत गाने की कोई जरुरत नहीं। चलो यहां से, यहां नहीं रुकना।"
"कोई नज़र रहा है क्या?"
"अचानक से भी कोई सकता है। घर पर करने की चीज़ को सबके सामने करने की कोई जरुरत नहीं।"
"अच्छा घर पर कर लेंगे, परंतु जब आए हैं तब मूड ख़राब करो। थोडा प्रकृति का और थोडा एकांत का लुत्फ़ उठाते हैं।"
"अब चलते-चलते लुत्फ़ उठाते हैं। बैठ कर दूसरे लुत्फ़ लेंगे। चलते-चलते बात करते हैं और प्रकृति का आनंद उठाते है।"
राकेश और रीना उठे। कपड़ों पर लगी घास और मिटटी झाड़ी और हाथों में हाथ डाले घूमने लगे। बीच-बीच में रीना राकेश को देखती और खिलखिला कर हंसती। रीना को हंसता देख राकेश मुस्कुरा देता। "ठीक है यहां तो आपकी चलेगी जनाब। चलो फोटो खींच कर आज के दिन को कल देखने के लिए रखें।" राकेश को फोटो खींचने का शौक था। मोबाइल से एक दूसरे के खूबसूरत फोटो लिए और वहां घूमने आए दूसरे सैलानियों से अपनी दोनों की संयुक्त फोटो खिंचवाई।

पुरानी बातें और दिन याद करते हुए दोनों पुराना किला से नीचे गए और बोटिंग के लिए बोट ली। पेडल वाली बोट चलाते रीना पेडल मारना बंद कर देती और पानी हाथ में लेकर राकेश के मुंह पर उछालती। रीना पूरे लड़कपन में थी। दोनों बोट कम चला रहे थे और एक दूसरे पर पानी अधिक उछाल रहे थे। दोनों के कपडे भीग गए। बोटिंग के बाद बाइक पर बैठे और इंडिया गेट की ओर रवाना हुए। बाइक पर बैठे हवा लगने से दोनों के कपडे सूख गए। इंडिया गेट के लॉन पर दोनों बैठ गए।

"यह जगह अच्छी है।" रीना ने आसपास नज़र घुमा कर कहा।
"कौन सी खास बात है इस जगह में।"
"आसपास परिवार बैठे है, बच्चे खेल रहे हैं। प्रेमालाप नहीं कर सकोगे।" रीना ने खिलखिला कर कहा।
"कोई बात नहीं। प्रेम घर में और यहां खाना।" कह कर राकेश ने टिफिन खोला। दोनों ने खाना खाया। खाना खाने के पश्चात दोनों घास पर लेट गए। खुला आसमान, खुशनुमा मौसम, हलकी-हलकी हवा के झौंके फ़िज़ा में मस्ती ला रहे थे।
"हम क्यों भूल जाते हैं प्रकृति के समीप रहना?" कह कर रीना ने राकेश की ओर देखा।
"शादी से पहले हम आज़ाद होते हैं, बेफिक्र कोई चिंता नहीं। विवाह के पश्चात हम जिम्मेवारी में बंध जाते हैं। इस कारण हम खुले में आना छोड़ देते हैं। घर की चारदीवारी में ख़ुशी से कैद हो जाते हैं।"
'कभी-कभी तो बाहर निकलना चाहिए।"
"हां, निकलना चाहिए। जैसे आज निकले।"
"चले घर, शाम हो रही है। थोड़ी ठंडक भी होने लगी है।"

राकेश ने बाइक स्टार्ट की। रीना राकेश से सट कर बैठ गई। धीरे-धीरे चलती बाइक के साथ हलके-हलके हवा के झौंके सफ़र को आनंदित कर रहे थे।




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