Wednesday, February 03, 2016

ट्रेनिंग



प्रथम वर्ष की परीक्षा समाप्त होने के पश्चात दो महीने कोई काम नहीं। मौज मस्ती, खेल-कूद, आराम करना यही दिनचर्या। इंद्रजीत सोचने लगा कि दो महीने ऐसे बिताना बड़ा आसान भी है और मुश्किल भी। दो दिन आराम करने के बाद इंद्रजीत बोर हो गया। रिजल्ट दो महीने बाद आना है। कया करे? यही सोच रहा था इंद्रजीत। पिताजी बैंक अधिकारी थे। पिताजी ने उसे एक कंपनी में दो महीने ट्रेनिंग के लिए भेज दिया। कंपनी का बैंक अकाउंट इंद्रजीत के पिताजी के बैंक में था, लोन और दूसरी बैंक सुविधाओं के कारण उस कंपनी के उच्च अधिकारियों और मालिक से अच्छी जान पहचान थी। इंद्रजीत के पिताजी ने कंपनी में बात की और इंद्रजीत को दो महीने के लिए ट्रेनिंग पर रख लिया। इंद्रजीत का मकसद काम सीखना और दो महीने के समय का सदुपयोग करना था। इंद्रजीत कंपनी जा कर खुश था। एकाउंट्स विभाग में ट्रेनिंग मिल गई और बी.कॉम की पढाई सार्थक लगने लगी। ट्रेनिंग के बिना उसे पढाई कोरी लगने लगी। वह सोचने लगा कि ट्रेनिंग पढाई के साथ क्यों नहीं दी जाती। यदि पढाई के साथ-साथ काम की भी ट्रेनिंग मिले तब कोई शिक्षा का अर्थ हो। आज तो किताबी जानकारी मिलती है, जो कोई नौकरी नही दिला पाती। कॉलेज से निकलते हैं किसी काम के नहीं होते, नौकरी के अपने काम के। खुद का कोई काम भी नहीं कर सकते। किस काम की हैं ये डिग्रियां? पुराने समय के गुरुकुल सही थे। दो महीने की ट्रेनिंग के दौरान इंद्रजीत ने व्यवहारिकता सीखी जिसे कोई कॉलेज या विश्वविद्यालय में नहीं पढ़ाया जाता।

इंद्रजीत को कॉलेज की पढाई से अधिक संतुष्टि ट्रेनिंग से मिली। दो महीने अपने मित्रों से जुदा अपने भविष्य को संवारने में लगा रहा। वो समय मोबाइल फ़ोन का नहीं था। एक दूसरे से मिलने के लिए एक दूसरे के घरों और ऑफिस में जा कर मिलना पड़ता था। एक रविवार को छुट्टी मिलती थी, जब इंद्रजीत सारा दिन लगभग आराम करता था।

दो महीने पश्चात रिजल्ट आया। इंद्रजीत की मेहनत सफल रही और इंद्रजीत प्रथम श्रेणी से कॉलेज में प्रथम रहा। उसके विरोधी जो अंग्रेजी में बात करते थे और अंग्रेजी माध्यम के स्कूल से पढ़ कर आए थे, चारों खाने चिट पाए मिले। कुछ की कम्पार्टमेंट आई और कुछ थर्ड डिवीज़न में पास हो सके। सभी की बोलती बंद हो गई।

इंद्रजीत कॉलेज का हीरो बन गया। दूसरी ख़ुशी उसे ट्रेनिंग के दो महीने काम करने की सैलरी मिलने से हुई।


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