Monday, February 08, 2016

जमीन पर



जून का महीना, दोपहर के दो बजे, गर्मी अपने शबाब पर है। सूर्य देव आग बरस रहे हैं। मधुबन चौक पर एक तेईस वर्ष का युवक जो पसीने से लत-पत है, ट्रैफिक को नियंत्रित करने की कोशिश में तत्पर है।

मधुबन चौक के चौराहे पर ऊपर मेट्रो गुजरती है और नीचे अंडरपास है, फिर भी चारों ओर का जबरदस्त ट्रैफिक रहता है। एक बार ट्रैफिक सिग्नल की बत्ती हरी हो जाए, वाहन हॉर्न बजा कर परेशान कर देते हैं क्योंकि दूसरी तरफ का ट्रैफिक लाल बत्ती होने पर भी रुकता नहीं। ऐसे में वह युवक तत्परता के साथ ट्रैफिक को नियंत्रित कर रहा था। जो वाहन उसके इशारे से भी नहीं रुकता, उसका वाहन नंबर अपनी कॉपी में नोट कर लेता, ताकी उसको चालान घर भेजा जा सके।

युवक का नाम ऋषब पिछले एक सप्ताह से गर्मी की दोपहर में ट्रैफिक नियंत्रण का कार्य कर रहा है और अगले एक सप्ताह और करना है। बहुत सख्त ड्यूटी दे कर अपने कर्तव्य का पालन कर रहा है। बीच में जब कभी ट्रैफिक कुछ हल्का होता तब एक छोर पर खम्बे से सट कर आराम कर लेता।

टी-शर्ट और जीन्स पहने युवक ऋषब को वाहन चालक नज़र अंदाज़ कर देते। यदि वर्दी में पुलिस वाला दिखाई देता तब लाल बत्ती पर रुक जाते। बिना वर्दी के ऋषब को कोई भी संजीदगी से नहीं लेता परन्तु वह अपना काम मुस्तैदी से कर रहा है। हर रोज़ सुबह दस बजे से शाम छः बजे तक की पंद्रह दिन की ड्यूटी ऋषब की लगी है। इलाके के ट्रैफिक इंस्पेक्टर को हाज़री देनी पड़ती है।

पंद्रह दिन की ड्यूटी में कोई अवकाश नहीं। ऋषब एक अमीर उद्योगपति की इकलौती संतान है। एयर कंडीशनर घर और ऑफिस में रहने वाला ऋषब अब पूरे दिन ट्रैफिक नियंत्रण करता है। कड़ी धूप में पसीना बहा रहा है। एक अमीर बाप की इकलौती संतान होने की वजह से पूरे लाड़-प्यार में बड़ा हुआ। पैर ज़मीन पर पड़ते नहीं हैं। सातवें आसमान में सदा विचरण करने वाला ऋषब एक रात देर से फाइव स्टार होटल में दोस्तों के संग पार्टी करके घर वापिस रहा था। समय रात के तीन कहें या सुबह के, तेज रफ़्तार से ऑडी कार चलाते हुए घर रहा था। सड़के खाली और तेज रफ़्तार के साथ कार चलाते हुए ऋषब का पीछा पुलिस की जीप ने किया। खतरनाक तरीके से कार चल रही थी, पुलिस ने लगभग पंद्रह मिनट तक पीछा करके रोका। पुलिस की जीप और दो तेज रफ़्तार बाइक्स ने ऋषब की कार पर काबू किया और रोकने में सफल हुए।

ऋषब कार से नहीं उतरा। खिड़की का शीशा नीचे करके पूछा "क्या है?"
सब-इंस्पेक्टर अमित पल्सर बाइक पर पीछा कर रहे थे। उसने ऋषब को कार से लाइसेंस मांगा।
ऋषब ने अकड़ कर पूछा "क्यों?"
सब-इंस्पेक्टर अमित युवा, काम के प्रति निष्ठावान है। पुलिस में उनकी कार्यशैली, काम और कर्मठता की प्रसंशा होती है।
"लाइसेंस और कार के कागज दिखाइए।" अमित ने विन्रमता से कहा।
"क्यों देखने हैं?" ऋषब ने फिर कहा।
"आप कार बहुत तेज और खतरनाक तरीके से चला रहे थे। हमारे कहने पर भी नही रुके। आप बाहर आइए और हमारी जीप में बैठिए।"
"जीप में क्यों बैठें? जो बात करनी है। यही कर ले।"
"एक तो शराब पी कर गाड़ी चला रहे हो और वो भी तेज रफ़्तार, खतरनाक तरीके से। थाने चल कर बात होगी। कल सुबह कोर्ट में पेशी होगी।" कह कर अमित ने कांस्टेबल धर्मेन्द्र को आवाज़ दी। "धर्मेन्द्र तुम राजेन्द्र के साथ कार में बैठो। सबको थाने ले कर आओ और जनाब को जीप में बिठाओ।"

इतना सुन कर ऋषब ने मोबाइल फोन से दो तीन फ़ोन किये। एक फोन उसने पिताजी को किया। पिताजी ने भी फोन किये। एक फ़ोन आया तो ऋषब ने अपना मोबाइल फोन सब-इंस्पेक्टर अमित को देते हुए कहा "बात करो।"
इतना सुन कर अमित ने फोन अपने हाथ में लेकर उसे बंद कर दिया।

"मेरा नाम अमित है, जिसका फोन था उसे कह दियो, थाने कर बात कर लेगा।" इतना कह कर पिस्टल अमित के कान पर लगा दी "खोल कार का गेट या उड़ा दूं।"

पिस्टल देखकर ऋषब घबरा गया और कांपते हुए कार का गेट खोल कर बाहर गया और चुपचाप जैसा अमित कहता गया, वैसे ऋषब करता गया। ऋषब चुपचाप जीप में बैठ गया। कांस्टेबल धर्मेन्द्र और राजेन्द्र कार में बैठ गए। अमित ऋषब और उसके मित्रों को अस्पताल ले गया और मेडिकल चेकअप करवाया। निर्धारित सीमा से कहीं अधिक शराब की रिपोर्ट आई।

पूरी रात थाने में ऋषब और उसके तीन मित्रों को बिठा कर रखा। शराब पी कर कार चलाने, तेज रफ़्तार और खतरनाक तरीके से कार चलाने की धाराएं लगा दी। ऋषब और उसके मित्रों के परिजन थाने गए। उन्होंने अमित को रिश्वत देकर मामला रफा दफा करने की खूब कोशिश की परंतु असफल रहे। कार के कागज़ और ड्राइविंग लाइसेंस रख कर कोर्ट का नोटिस बना दिया। इस मामले में कोर्ट ही फैसला करेगी।

ऋषब के मित्र भी अमीर परिवार से थे। सभी ने एड़ी चोटी का जोड़ लगा लिया। ऊपर से सीनियर अधिकारियों से फोन करवाया परंतु सफलता नही मिली।

कोर्ट की तारीख के लिए ऋषब के पिताजी ने अच्छे वकीलों को नियुक्त किया ताकि पैरवी ढंग से हो सके। ऋषब के पिताजी की पहचान डीसीपी तिवारी से थी। तिवारी ने नेक सलाह दी क्योंकि कोर्ट में केस चलेगा और मजिस्ट्रेट आजकल शराब पीकर कार चलाने और तेज रफ़्तार, खतरनाक तरीके से कार चलाने के मामलों में सख्त फैसला लेते है। ऋषब का केस मजिस्ट्रेट महाजन की अदालत में है, जो बहुत सख्त है। उसने कुछ लोंगों को एक-एक महीने की जेल भी दी है। फाइन के साथ जेल की सजा का भी प्रावधान है। अतः माफ़ी मांग कर कम सजा की विनती की जाए। इसमें कोई एक्सीडेंट नहीं हुआ और किसी की जान को भी नुकसान पहुंचा, इसलिए विन्रमता के साथ हाथ जोड़ कर माफ़ी मांगी जाए कि भविष्य में ऐसी गलती नहीं होगी। तिवारी ने सख्त लहजे में कहा यदि वकीलों की सलाह लेकर बहस की और यदि महाजन चिड़ गया तो दाव उल्टा ही सकता है। डीसीपी तिवारी की बात मान कर सबने बात गांठ बांध ली।

पेशी के दिन सभी सुबह कोर्ट पहुंच गए और चुपके से अदालत में सबसे पीछे कुर्सियों पर बैठ गए। साढ़े ग्यारह बजे केस सुनवाई के लिए लगा। सभी मजिस्ट्रेट महाजन के आगे हाथ जोड़ कर सर झुका कर खड़े हो गए।

"शराब पी कर कार चला रहे थे? मजिस्ट्रेट महाजन ने पूछा।
"जी, गलती हो गई। आगे से कभी नहीं गलती होगी।" चारों ने एक स्वर में झुके सर में कहा।
"और तेज रफ़्तार में खतरनाक तरीके से भी चला रहे थे।"
"जी, आगे से यह गलती कभी नहीं करेंगे।"

अपनी गलती मानने और भविष्य में नहीं दोहराने का वचन देने पर मजिस्ट्रेट महाजन ने शराब पीकर कार चलाने के लिए एक हज़ार रुपये का जुर्माना और तेज रफ़्तार के साथ खतरनाक तरीके से कार चलाने के लिए एक हज़ार रुपये का जुर्माना लगा दिया। क्योंकि किसी की जान या माल को क्षति नहीं पहुंची थी, अतः जेल की सजा नहीं सुनाई।

"ट्रैफिक के नियमों का समझो और भविष्य में पालन करो, इसके लिए पंद्रह दिन की ट्रैफिक नियंत्रण करने का कार्य सौंपता हूं। कल सुबह दस बजे से शाम छः बजे तक तुम्हे भीड़ वाले रास्ते पर ट्रैफिक नियंत्रित करना होगा। हर रोज़ सुबह और शाम को पुलिस स्टेशन में हाज़िरी लगा कर ट्रैफिक नियंत्रित करना होगा।"

मजिस्ट्रेट महाजन पहले भी ऐसी कई सजा सुना चुके थे। ऋषब के पिताजी को चैन आया कि उसके पुत्र को जेल नहीं हुई।

"कोई बात नहीं बेटे, यह झटका प्रभु ने हल्का सा दिया है ताकि किसी बड़ी चोट, समस्या और दुर्घटना से बच सको। आगे से देर रात की पार्टी छोड़ काम में जुट जाओ। पंद्रह दिन की ट्रैफिक ड्यूटी देने के बाद मौज मस्ती बंद और ऑफिस जाना शुरू।" पिताजी ने ऋषब को कहा।

ऋषब के पास विरोध करने का कोई कारण नहीं था। सर झुका कर कहा "जी पापा।"

आज एक सप्ताह बीत गया। हर रोज सुबह साढ़े नौ बजे पुलिस स्टेशन हाज़िरी लगा कर ऋषब दस बजे से ट्रैफिक नियंत्रण में जुट जाता। एक सप्ताह में उसकी जान पहचान क्षेत्र के सभी पुलिस वालों से हो गई। ड्यूटी में तत्परता देख पुलिस वालों का रवैया ऋषब के प्रति नरम हो गया। एक अमीर बाप की बिगड़ी औलाद का ठप्पा एक सप्ताह के बाद उतर गया। पुलिस वालों के संग हंसी मजाक भी होने लगा। पुलिस स्टेशन के हर छोटे बड़े पुलिस अधिकारी से अच्छी दोस्ती हो गई।

आठ घंटे की सख्त ड्यूटी के पश्चात ऋषब थक कर चूर हो जाता। घर पहुंच कर स्नान करता और रात का खाना साढ़े आठ नौ बजे करके जल्दी सो जाता। जल्दी सोने के कारण सुबह जल्दी नींद खुल जाती। सुबह साढ़े पांच बजे उठ जाता और सुबह की सैर करने जापानी पार्क जाता। देर से सोने और देर से उठने की आदत छूट गई। ऋषब में इस अभूतपूर्व परिवर्तन से उसके पिताजी बहुत प्रसन्न हुए। जहां एक समय वे चिंतित रहते थे कि यह लड़का कब अपनी जिम्मेदारी समझेगा, आज सब कुछ बदल गया और गंभीर बन गया। जीवन को गंभीरता से लेने लगा। सभी यार दोस्तों के साथ उठना बैठना बंद कर दिया। मौज मस्ती, यार दोस्तों के साथ ने एक बार तो जेल जाने की नौबत बना दी थी। शुक्र है, प्रभु का जिसने एक हाथ से थप्पड़ मार कर दूसरे हाथ से गिरने से बचा लिया। नसीहत दी प्रभु ने, जिसे ऋषब ने दोनों हाथों से स्वीकार किया। ऋषब ने कान पकड़ कर तौबा की, कि वह कभी आसमान में छलांग नहीं लगाएगा। प्रभु ने मनुष्य को जमीन पर चलने के लिए बनाया है।
आज पंद्रह दिन की ट्रैफिक ड्यूटी का अंतिम दिन है। शाम के छः बजे उसकी ड्यूटी समाप्त हुई। वह पुलिस थाने अपनी अंतिम हाज़िरी लगाने के लिए जा रहा था। कांस्टेबल राजेन्द्र की भी ड्यूटी समाप्त हुई। उसने अपनी बाइक पर बैठने को कहा कि उसे थाने छोड़ देगा। दोनों बाइक से थाने जा रहे थे तभी एक बीएमडब्लू कार खतरनाक तरीके से लहराते हुए तेज रफ़्तार से निकली। उसको देख ऋषब ने राजेन्द्र से पीछा करने को कहा।

"पठ्ठा इस समय कार को लहराते हुए चला रहा है। पीछा करके पकड़ ले। अधिक आगे नहीं जा सकेगा।"

राजेन्द्र ने बाइक की रफ़्तार बढ़ाई और अगली लाल बत्ती पर पकड़ लिया। कार में दो युवक बैठे थे, उसमें से एक ऋषब का मित्र था।

"ऋषब ड्यूटी कर रहा है।" कहने वाले से स्वर में तीखा व्यंग्य था।
"राजेन्द्र इसका लाइसेंस और कागज़ देखो।" ऋषब ने कहा।
"मेरा लाइसेंस देखेगा। चल फूट।" उस युवक ने एक सौ रुपये का नोट दिखाते हुए कहा।
"लगा दे तगड़ी धारा और मजिस्ट्रेट महाजन की कोर्ट का चालान पकड़ा।" ऋषब ने कहा।
ऋषब की बात सुन कर वह युवक अवाक रह गया। कुछ देर रुक कर फिर बोला "अभी एक फ़ोन लगाता हूं।'
"फोन लगाने की गलती मत करना, मेरे पंद्रह दिन अभी समाप्त हुए हैं। तुम्हारे शुरू होंगे। चुपचाप चालान ले ले। बाकी कोर्ट में।"

सब-इंस्पेक्टर अमित ने यह सुन कर ऋषब की पीठ थपथपाई। "शाबास ऋषब, काश हर नागरिक की सोच तुम जैसी हो जाए।" कह कर उस युवक का कोर्ट के लिए चालान काट दिया।

अमित ने ऋषब से कहा। "कल सुबह की चाय साथ पीते है, तभी तुम्हारी पंद्रह की रिपोर्ट बना कर कोर्ट में दाखिल कर देंगे।"

अगले दिन सुबह ऋषब पुलिस स्टेशन पहुंचा। सब-इंस्पेक्टर अमित के साथ चाय पी। अमित ने ऋषब की पंद्रह दिन की रिपोर्ट बना कर कोर्ट में दाखिल की। कोर्ट में अमित ने ऋषब से हाथ मिलाया। मजिस्ट्रेट महाजन के सामने ऋषब की भूरी-भूरी तारीफ की।

कोर्ट के बाद ऋषब सीधे अपने पापा के ऑफिस पहुंचा।
"पापा मैं ऑफिस गया। अब काम दीजिये।"
ऋषब का काम के प्रति समर्पण देख पिताजी की आंखे नम हो गई। आज ऋषब जमीन पर गया था। उसने उड़ना छोड़ दिया।
"चलो तुम्हें काम बताए।" पिताजी ने ऋषब को अपने केबिन से हट कर एक छोर पर एक वर्कस्टेशन काम करने को दिया।
"ऋषब आज से तुम्हारी ज़िन्दगी के नए अध्याय आरम्भ हो रहे हैं।


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कब आ रहे हो

" कब आ रहे हो ?" " अभी तो कुछ कह नही सकता। " " मेरा दिल नही लगता। जल्दी आओ। " " बस...