Thursday, March 10, 2016

पढाई की चिंता



रविवार सुबह साढ़े छः बजे राकेश और रीना चाय पी रहे हैं। रीना टीवी ऑन करके भक्ति चैनल पर भजन देखने लगी। रीना को चुपचाप चाय पीता देख राकेश ने उसके चेहरे के भाव पढ़े।

"रीना क्या हुआ, कुछ उदास लग रही हो?"
"राकेश ऐसे कब तक चलेगा?"
"क्या चलने की बात कर रही हो?"
"राहुल की बोर्ड की परीक्षा है, मुझे तो चिंता हो रही है।"
"इसमें चिंता की क्या बात है। बोर्ड की परीक्षा राहुल की है, तुम्हारी थोड़े है जो कि पेपर कैसे दोगी।"
"तभी तो चिंता हो रही है। जैसे वो पढ़ता है, मुझे समझ नही रहा कि नंबर कैसे लाएगा। आगे कॉलेज में एडमिशन कितना मुश्किल से मिलता है। 95 प्रतिशत वाले धक्के खाते है। राहुल के तो कभी सत्तर प्रतिशत भी नही आते हैं।"

राकेश ने देखा कि रीना की आंखे नम हो रही थी।

"रीना इतनी अधिक चिंता मत करो। मुझे राहुल पर पूरा भरोसा है, वह बोर्ड की परीक्षा में उत्तीर्ण होगा।"
"राकेश बात उत्तीर्ण होने की नही है, कम से कम 95 प्रतिशत अंको के साथ उत्तीर्ण होने की है नही तो दिल्ली विश्वविद्यालय के अच्छे कॉलेज में दाखिला नही होगा। भविष्य का प्रश्न है।"
"अच्छे कॉलेज में एडमिशन सबका ख्वाब होता है और इज़्ज़त भी मिलती है, लेकिन यदि एडमिशन हो इसका यह मतलब नही कि ज़िन्दगी में असफल हो गया।"
"छोटे कॉलेज में अच्छी पढाई नही होती है।"
"अब हमारे समय वाली बात नही है जब प्रथम श्रेणी वालों को कैंपस के कॉलेज में एडमिशन मिलता था और बाकी दूसरे कॉलेज में एडमिशन लेते थे। तब प्रोफेसर तो पढ़ाते थे, विद्यार्थी नही पढ़ते थे, जिनके बोर्ड में कम नंबर आए, उनकी रुचि सिर्फ डिग्री लेने तक सीमित होती थी परंतु आज जब 95 प्रतिशत वाले भी कैंपस के बाहर एडमिशन लेते है तब वे पढ़ते हैं। यह तो पढ़ने वाले पर निर्भर रहता है कि कितनी मेहनत करता है। कोई किसी को जबरदस्ती पढ़ा नही सकता। पढ़ने वाले मुश्किल परिस्थितियों में भी पढ़ कर शीर्ष पर पहुंच जाते है। इसलिए रीना तुम राहुल की पढाई की अधिक चिंता मत करो।"

"राकेश वह पढाई को गंभीरता से नही लेता है। मैं दूसरे बच्चों को देखती हूं और सोच में पड जाती हूं।"
"रीना तुमने दो प्रश्न किये हैं। पहला कि राहुल पढाई को गंभीरता से नही लेता। इस पर मेरा मत है कि वह अपनी समस्त ऊर्जा पढाई मैं नही लगाता और मैं तुम्हारी इस बात से सहमत हूं कि और अधिक नंबर राहुल परीक्षा में ला सकता है पर नही लाता, फिर भी वह हर साल उत्तीर्ण हुआ है। कभी भी किसी वर्ष असफल नही रहा, इसलिए चिंता छोड़ दो। मुझे पक्का विश्वास है कि वह उत्तीर्ण होगा, हां कितने नंबर लाएगा, इस पर मैं कुछ यकीन से नही कहता। अब दूसरा प्रश्न है कि दूसरों के बच्चे अधिक पढ़ते हैं और अधिक नंबर लाते हैं। मैं इस पर सहमत नही हूं। एक तो मां-बाप अपने बच्चों के नंबर अधिक बताते हैं क्योंकि हर बच्चा 95 प्रतिशत से उत्तीर्ण नही होता है। मुश्किल से दस प्रतिशत बच्चे 95 प्रतिशत की श्रेणी में आते है। तुम देख लेना जब बोर्ड का परिक्षफल आएगा, सिर्फ यह नज़र रखना कि किस बच्चे का किस कॉलेज में एडमिशन हुआ है, उससे तुम्हे मालूम हो जाएगा कि कौन सच बोल रहा है और कौन कितना झूठ।"
"झूठ क्यों बोलेंगे?"
"रीना इसके पीछे मनोविज्ञानिक कारण है। मैंने बहुत लोगों को देखा है जो बढ़-चढ़ कर बोलते है। अपनी शेखी बखारते हैं। अपनी, अपने परिवार और बच्चों की तारीफों के पुल बांधते है। दस रूपए की बात को सौ रूपए की बताते हैं। अपने दोस्तों को देखा है, ऑफिस में काम करने वाले साथियों को देखा है। दूर कहां जाती हो, अपने रिश्तेदारों को देख लो, होते क्या हैं और बताते क्या है। जब असलियत पता चलती है, तब बगलें झांकते हुए खिसक जाते हैं। इसलिए दूसरों से तुलना मत करो। हर व्यक्ति का स्वभाव, आदतें और क्षमता अलग होती है। हर व्यक्ति की कार्य शैली भी अलग होती है।"

"फिर भी राहुल को अधिक पढ़ना चाहिए।"
"हां हम दोनों उससे बात करते है कि अब अधिक मेहनत करे। अच्छे नंबर अच्छे कॉलेज में एडमिशन में काम आएंगे और मेहनत ही जीवन में आगे भी हर क्षेत्र में काम आएगी। पढाई के बाद नौकरी या व्यवसाय में मेहनत का विशेष महत्व है। जीवन के हर मोड़ पर मेहनत करनी पड़ती है और संघर्ष हर रोज़ करना पड़ता है। हमारा फर्ज है कि राहुल को अच्छे संस्कार देना ताकि वे उसके जीवन में काम आएं। कॉलेज में एडमिशन तो बस एक शुरुआत है, हमारा फर्ज है कि जीवन के कठिन रास्तो पर चलने की प्रेणना दें।"
"राकेश वो तो ठीक है पर इस समय हमें क्या करना चाहिए?"
"मार्गदर्शन। उचित मार्गदर्शन से उसको प्रोत्साहित कर सकते है अधिक नंबर लाने के लिए।"
"राकेश दार्शनिकों की तरह बात मत करो, कुछ व्यवहारिक बात सुझाओ।"

"रीना तुम्हारा भाषा पर अच्छी पकड़ है। हिंदी और इंग्लिश में मदद कर सकती हो। मैं अर्थशास्त्र और कॉमर्स में उसकी सहायता कर सकता हूं। यथासंभव मार्गदर्शन और सहायता उसकी करते है। बाकी तुम घबराओ मत, यदि कम नंबर भी आए तब भी आगे काफी कोर्स हैं जिनमे उसकी रूचि हुई, चुन सकता है। बस इच्छा शक्ति होनी चाहिए, भवसागर पार कर लेगा।"
"देख लो फिर मुझे कुछ मत कहना कि समय रहते मैंने कुछ नही बताया।"
"बात कहने की नही बल्कि समझने की है। हमें अपनी पसंद बच्चों पर नही थोपनी चाहिए कि उसकी रूचि ही समाप्त हो जाए। बच्चों की पसंद भी जाननी चाहिए।"
"इस कच्ची उम्र में बच्चों को इतनी समझ नही होती। कई बार जोश में गलत कोर्स भी चुन लेते हैं।"
"गलत और सही का अंतर बच्चों को समझाना हमारा कर्तव्य है। उनपर नज़र रखनी है कि वे भटके नही। उन पर अपनी पसंद लादनी नही है। अच्छे बुरे की पहचान करानी है।"
"कैसे करेंगे?"
"उनके आचरण को बस देखना है, हमें पता चल जाएगा कि उनकी संगत कैसी है। इश्क़ और मुश्क छुपते नही है। खुद जग जाहिर हो जाते हैं।"
"शायरी मत करो, कुछ सुझाओ।"
"नाश्ते के समय राहुल से बात करता हूं।"

छुट्टी का दिन था, राहुल अपने मित्रों के संग सुबह क्रिकेट खेलने गया था। साढ़े आठ बजे राहुल वापिस आया।
"राहुल नहा लो, मैं नाश्ता बना रही हूं। नाश्ते में क्या लोगे?"
"कुछ भी।" कह कर राहुल नहाने चला गया। नहाने के बाद राहुल नाश्ते के लिए डाइनिंग टेबल पर बैठा। नाश्ता करते हुए राकेश ने चर्चा शुरू की।

"राहुल इस वर्ष बोर्ड के पेपर हैं। तैयारी कैसे चल रही है।"
"ठीक पापा, सही चल रही है। मार्च में पेपर हैं, मैंने तो अभी से हर रोज़ पढाई का नियम बना लिया है। अभी चार महीने हैं, सारा कोर्स पूरा कर लूंगा।"
"आगे क्या करने का इरादा है।?
"कोशिश पूरी है कि अच्छे नंबर आएं। लेकिन आप को निराशा नही होगी।"
"पिछले वर्ष कॉलेज की कट ऑफ बहुत अधिक थी।"
"बी.कॉम करने की सोची है। किसी किसी कॉलेज में एडमिशन हो जाएगा। इवनिंग कॉलेज भी है। बी.कॉम के साथ चार्टर्ड एकाउंटेंसी भी करूंगा। तीन साल कॉलेज में बेकार नही घूमना।"
"वैरी गुड राहुल। कर्म करना तुम्हारा कर्तव्य है। विद्यार्थी होने के नाते पढाई तुम्हारा कर्म है। अपने कर्म की पूर्ति हेतु तुम हमसे भी मदद ले सकते हो। मम्मी से इंग्लिश और हिंदी में और मेरे से अर्थशास्त्र और कॉमर्स में। अब रह गया मैथ्स, राहुल सच तो यह है कि मैं मैथ्स में एकदम जीरो हूं। खुद बड़ी मुश्किल से बोर्ड में मैथ्स पास किया था।"
"वो कोई बात नहीं, पापा हमारे मैथ्स सर बहुत मदद कर रहे हैं। एक्स्ट्रा क्लास भी ले रहे हैं, अगर हुआ तो आपसे ट्यूशन की कहूंगा, लेकिन अभी नहीं। आपसे हेल्प ले लूंगा लेकिन मम्मी से नही।"
"कोई, मम्मी से क्यों नही?"
"बिना बात के गुस्सा हो जाती है।"
"ऐसा नही है, तुम्हारी फ़िक्र करती है।" राकेश ने राहुल को समझाया। "हिंदी और इंग्लिश दोनों भाषाओँ में अच्छी पकड़ है। बहुत ज्ञान है, कम मत समझो अपनी मां को, एम. किया हुआ है, गृहणी है लेकिन किसी नौकरी या बिज़नस करने वाली महिला से कम नही है।"
"ठीक है पापा।" राहुल नाश्ता करके उठ गया और रीना मुंह फुला कर राकेश से बोली "देख लिया, मां को तो कुछ समझता नही। कोई वैल्यू नही।"

"थोडा गुस्सा कम किया करो। सब ठीक है। बच्चों में जवानी का जोश होता है, प्यार से बात करो तभी काबू में रहते हैं। कद में तुमसे बड़ा है, मेरे साइज़ की बनियान पहनता है। मित्र बन कर बच्चों से बात करने का समय हो गया है।"
"पता नही बच्चे आधुनिक हो गए हैं या हम हड़प्पा की खुदाई में से निकले हैं।" कह कर रीना ने टीवी ऑन किया और चैनल बदलने लगी।
राकेश ने गीता खोली और तीसरा अध्याय कर्मयोग पढ़ने लगा।





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