Thursday, March 03, 2016

शादी क्यों की



रविवार की सुबह चाय पीने के बाद रीना ने राकेश को घर की सफाई के लिए कहा "देखो, दीवारों पर धूल चमकती है, जब रौशनी पड़ती है और किताबों की अलमारी देखो, मिटटी जमा हो रही है। किताबे आपने बहुत दिनों से नहीं पढ़ी। बस खरीद के रख देते हो।"
"और कुछ।" राकेश ने रीना की ओर देख कर कहा।
"मैं रसोई और फ्रिज साफ़ कर रही हूं। आप बैडरूम, डाइनिंग टेबल और किताबों की अलमारी साफ़ कर दो।"
"सफाई वाली क्या करेगी?"
"श्रीमान जी, वो नीचे की सफाई और बर्तन सफाई करती है। खिड़की के शीशे भी साफ़ करने है। उसके आने से पहले कर दो। हां, पंखे भी, धूल चमक रही है उन पर भी। एक बार उसने पौंछा लगा दिया फिर यह काम रह जाएगा।"
"समाचार पत्र पढ़ कर करता हूं।"
"समाचार पत्र कहीं नहीं भागेगा। आराम से काम कर के पढ़ेंगे। काम जरुरी है। आज नहीं तो फिर एक हफ्ते की छुट्टी हो जाएगी।"
"आज ऐसी क्या जल्दी है?"
"पहले आप अपने आप ये काम करते थे, अब आपने ये काम छोड़ दिए। यह अच्छी बात नहीं है।"
"समय की बात है। पहले ऑफिस घर के नज़दीक था, समय मिलता था, काम करता था, अब ऑफिस दूर हो गया, सुबह-सुबह भागना पड़ता है।"
"इसलिए कह रही हूं कि छुट्टी वाले दिन समय का सदुपयोग करो। छुट्टी का यह मतलब नहीं कि सारा दिन आराम करो।"
"आराम कौन करता है, कल आपके साथ सैर की, पहले पुराना किला, उसके बाद बोटिंग और इंडिया गेट। पूरा दिन आपकी खिदमत में था हज़ूर।"
"तो थोड़ी सी खिदमत आज भी कर दो। चलो उठो, काम करो, बातों में समय बीत जाएगा। एक डेढ़ घंटे में सब निबट जाएगा। उसके बाद आराम से बैठ कर कुछ सोचेंगे।"

राकेश ने समाचार पत्र एक ओर रखा और सफाई अभियान शुरू कर दिया। दो कमरों के फ्लैट को डेढ़ घंटे में रीना और राकेश ने चमका दिया।

कुर्सी पर बैठ कर राकेश ने रीना को आवाज़ दी "सफाई अभियान समाप्त।"

रसोई से बाहर निकल कर एक सरसरी निग़ाह चारों ओर डाल कर बोली "दीवारों के भी दिल होते हैं, जुबान होती है, थोडा अपना बना कर साफ़ कर के देखो।"
"साफ़ कर के देखा, अपना बना लिया। यह शायरी बंद करो। सफाई वाली बर्तन, पोंछा कर जाए तब घर अपना हो जाए।"
सफाई वाली ने आधे घंटे में काम निबटाया। चमकते घर को देख रीना और राकेश दोनों एक दूसरे की देख मुस्कुराये।
"सफाई अभियान में आज लगता है नाश्ता छूट रहा है।"
"दस पंद्रह मिनट दो, अभी तैयार हो जाता है। छोले सुबह उठ कर बना लिए थे। गरमा गरम पूरियां बना लूंगी। जाओ तब तक नहा लो।"

राकेश नहाने के पश्चात देखता है कि डाइनिंग टेबल पर नाश्ता तैयार है।
"सुघड़ गृहणी हो। फटाफट सब काम पूरे कर लेती हो।" राकेश ने डाइनिंग टेबल की कुर्सी खींचते हुए कहा।
"गृहणी होने के कारण मेरा कर्तव्य है कि घर के सभी कार्य समय पर सबसे बढ़िया तरीके से हों, जो मैं हमेशा करती हूं।"
"और करती रहोगी।"
"बेशक, आपको कोई संदेह है क्या?"
"बिल्कुल नहीं। समय पर खाना, ऑफिस के लिए टिफिन, घर की सुरक्षा और हर छोटी से बड़ी चीज़ की देखभाल।"
"बिल्कुल ठीक, जो मेरा कर्तव्य है उसे मैं निभा रही हूं और जो तुम्हारा फर्ज है, उसे हमेशा याद रखना और निभाना।"
"वो क्या?"
"आर्थिक और शारीरिक सुरक्षा।"
"बिल्कुल सही कहा। समझदार हो गई हो तुम।"
"हमेशा से मैं समझदार रही हूं। आपसे अधिक।"
"चलो मान लेते हैं।"
"जो सत्य है, उसको मानना पढता है। मैं समझदार हूं और रहूंगी।"
"छोले बढ़िया और स्वाद से भरपूर बनाती हो। लाजवाब और स्वादिष्ट।"
"पंजाबन हूं तो जाहिर है स्वाद तो होगा ही।"
"नाश्ता तो हो गया लंच में क्या बनाना है?"
"रात के खाने की तुम बताओ, क्या पसंद करोगे। लंच के लिए छोलों के साथ मिक्स वेज पुलाव।"
"रात के डिनर पर क्या बनाया जाए? शाम को सोचते हैं। अभी थोडा आराम कर लूं।"
"आपको तो आराम का बहाना चाहिए।"
"कोई काम हो तो बताओ, करने के बाद आराम कर लेंगे।"
"फिर आराम कर लो। चलो क्या याद करोगे कि आज्ञाकारी पत्नी मिली है।"
"और पति के बारे में क्या ख्याल है।"
"आज्ञा तो वो भी मानता है।"

मस्ती भरी बातों के बीच दोनों आराम करते हैं। आधे घंटे में ही दोनों उठ जाते हैँ।
"क्या हो गया आधे घंटे में ही उठ गए, कह रहे थे कि बहुत आराम करना है।"
"वो तो थोडा सुस्ताने के लिए लेट गया था। रोज़ ऑफिस में काम में समय बीतता है। आराम थोडा-थोडा बीच में ले लिया। स्फूर्ति वापिस जाती है। तुम भी उठ गई।"
"मेरा भी यही हाल है, कोई कुम्भकरण की नींद थोड़े सोनी है।"

राकेश ने एक किताब उठाई। "बहुत दिन हो गए कोई पुस्तक नहीं पढ़ी। खरीद कर ले आता हूं, रोज़ पढ़ने की आदत बनाता हूं। सोने से पहले मैं दो चार पन्ने पढ़ लेता था। फिर से आदत बनाता हूं। आज छुट्टी है, आज से ही शुरुआत की जाए।"
"ठीक है, मैं भी पढ़ती हूं।" कह कर रीना ने भी एक पुस्तक खोली और पढ़ने लगी।
"राकेश एक बात बताओ कि आदमी शादी क्यों करता है?"
"यह क्यों पूछ रही हो?.
"इस उपन्यास की नायिका ने नायक से यह प्रश्न किया जब नायक ने नायिका के सामने विवाह का प्रस्ताव रखा।"

राकेश ने रीना के हाथ में अंग्रेजी का उपन्यास देख कर कहा "अंग्रेजी उपन्यास पढ़ रही हो तभी ऐसा सन्दर्भ आया। हिंदी कहानियों, उपन्यास में ऐसे सन्दर्भ नहीं होते है, क्योंकि भारत और विदेशों की संस्कृति और सभ्यता में बहुत अंतर है।"
"चलो मान लिया कि अंतर है, फिर भी बताओ की आदमी शादी क्यों करता है।" रीना ने प्रश्न पूछ कर किताब रख दी।

राकेश सोचने लगा। राकेश को सोचते देख रीना ने पूछा "चलो यह बताओ कि तुमने क्या सोच कर शादी की। शादी से पहले सोचा तो होगा कि कब किस उम्र में और किस के साथ शादी करनी है।"
"मेरी तो तुमसे शादी हो गई और मैं बहुत खुश हूं और तुम भी हो।"
"बात ख़ुशी की नहीं बल्कि कारण की है। किस कारण, वजह से शादी की।"
"शादी हम दोनों ने की। मेरे से प्रश्न पूछ रही हो, खुद सोच कर बताओ कि किस कारण से की। हम दोनों के कारण एक हो सकते हैं।"
"एक भी हो सकते हैं और अलग भी। भारतीय संस्कृति में विवाह का विशेष महत्व है। इसे पवित्र माना जाता है और अग्नि के फेरे लेकर वचन लिए जाते हैं। साथ फेरे, सात वचन।"
"विवाह पवित्र है, तुम बताओ विवाह की वजह।"
"पहले आप। मर्दों की राय पहले।"

राकेश ने दार्शनिक भाव में कहना शुरू किया। "प्रकृति ने कुछ नियम, सिद्धान्त बनाये है। उसकी के कारण विवाह की परंपरा आरम्भ हुई।"
"जैसे।" कह कर रीना राकेश के समीप गई।
"मेरा मत है कि प्रकृत्या ही मुख्य कारण है। जवान होने पर शारीरिक इच्छा की पूर्ति के लिए विवाह की प्रथा रखी गई, जिससे पुरुष और स्त्री, दोनों की प्राकृतिक इच्छाओं की पूर्ति हो सके और संतान के लालन-पालन और परवरिश का दायित्व संभालें। यदि विवाह की परम्परा नहीं होती तब सोचो कि संतान का दायित्व कौन संभालता और नई पीढ़ी के भविष्य को कौन संवारता।"

"दार्शनिक महोदय तो क्या आपके विवाह का कारण प्रकृत्या था।?
"बिल्कुल सही, मेरे विवाह का कारण तो प्रकृत्या था और तुम्हारे विवाह का कारण भी प्रकृत्या होना चाहिए।"
"अगर मैं बताऊं तो।"
"मेरे प्रश्न का उत्तर मिल गया। जो मेरा कारण वही तुम्हारा कारण।"
"चलो यदि मैं तुम्हारा कारण मान भी लूं तो फिर एक प्रश्न है कि शादी मेरे साथ क्यों की। किसी और से क्यों नहीं? मेरे साथ शादी की हामी क्यों दी कोई तो कारण होगा।"
"रीना, शरीफ आदमी था। कोई गर्ल फ्रेंड नहीं। घर वालों ने कहा यदि मेरी कोई गर्ल फ्रेंड नहीं है तब हमारी पसंद की लड़की देख लो।"
"सच्ची में, कोई गर्ल फ्रेंड नहीं थी?" रीना ने राकेश को खींचते हुए पूछा।
"रीना खींचना बंद करो नहीं तो वार्तालाप बंद।"
"अच्छा अब बताओ।"
"तुम्हारे पिताजी मेरे ताऊ जी के साथ स्कूल में पढ़ा करते थे। बहुत सालों बाद दोनों की मुलाकात हुई जब मेरा और तुम्हारा जिर्क हुआ। ताऊ जी ने कहा कि मेरा भतीजा विवाह योग्य है और तुम्हारे पिता जी ने कहा कि उनकी लड़की विवाह योग्य है। बस बन गया कार्यक्रम कि लड़के और लड़की को एक दूसरे से मिलवाया जाए। ऐसे मैं तुम्हे देखने आया तुम्हारे घर अपने ताऊ जी के साथ। और कोई नहीं था साथ में क्योंकि ताऊ जी चाहते थे कि लड़की को पता चले कि कोई उसे देखने आया है। हम घर में देख लेंगे और यदि मुझे पसंद आई तो बात आगे बढ़ाई जाएगी। उनकी सोच अच्छी थी और समझदारी झलकती थी कि लड़की की नुमाईश नहीं होनी चाहिए। अगर हो जाए तो लड़की का दिल टूट जाता है कि उसमें क्या कमी थी। तुम्हे याद होगा कि में ताऊ जी के साथ आया था और तुम रसोई में थी। तुम्हे आवाज लगा कर चाय बनाने को कहा। तुम चाय और बिस्कुट लेकर आई थी। अपने लकड़पन के अंदाज़ में बेखबर कि मैं तुम्हे किस वजह से देख रहा हूं।"
"किस नज़र से देख रहे थे मुझे?"
"एक होने वाली पत्नी के रूप में। लड़की घर के काम करती है। देखने में ठीक-ठाक है। एक आम हिंदुस्तानी लड़की जैसी नज़र आई तो मैंने शादी के लिए हां कर दी।"
"क्या कभी यह नहीं सोचा कि सुन्दर, मॉडर्न, आधुनिक लड़की से शादी होती तो?"
"नहीं उस तरफ नहीं सोचा, क्योंकि मैं खुद एक आम हिंदुस्तानी लड़का, जो दिखने में साधारण, साधारण नौकरी वाला, साधारण विचार वाला। मेरी धारणा यही थी कि पत्नी हम ख्याल होनी चाहिए। यदि किसी मॉडर्न लड़की का ख्याल रखता तो हो सकता है कि ख्याल नहीं मिलते। उसके नखरे उठाने की हैसियत नहीं होती। इसलिए मैं साधारण था, साधारण लड़की की कामना की।"
"बस इतनी सी बात थी।"
"यह इतनी सी नही, बहुत बड़ी है। सफल विवाह की कुंजी है। अच्छा यह बताओ कि जब तुमसे शादी के के लिए पूछा तब तुमने भी कुछ सोचा होगा।"
"मैं क्या सोचती, घर में सबने तुम्हारी तारीफों के पुल बांध दिए थे, मैंने सोचा कि घर वाले सही होंगे। जब शादी करनी है तब उनकी पारखी नज़र पर भरोसा रखना चाहिए।"
"क्या तुम्हे ज्ञान हो गया था कि मैं किस लिए तुम्हारे घर आया हूं।"
"मेरे विवाह के लिए अक्सर घर पर चर्चा होती रहती थी। एक खटका तो लगा था कि शायद मुझे देखने के लिए आए हो। लेकिन विवाह के लिए हां करने से पहले मुझसे अगल कहीं और मिलने की बात क्यों कही थी?"
"मैं तुम्हारे विचार जानना चाहता था।"
"लेकिन जब मिले तब कुछ खास पूछा तो था नहीं, बस इतना पूछा था कि किस कॉलेज से पढ़ी हो, कौन का कोर्स किया, खाने में क्या पसंद है। यह पूछना तो होता नहीं। विचार तो पूछे नहीं।"
"क्या पूछता। रेस्टॉरेंट में मिलने का कार्यक्रम बना लिया। सारे रिश्तेदार घेरे बैठे थे। सबकी निग़ाहें हमारी तरफ थी। साथ वाली टेबल पर बिठा दिया था। सबकी निग़ाहों के घेरे से निकल नहीं सका। सोचा जो घर वालों ने सोचा, ठीक सोचा। बस हां कर दी। और तुमने?"
"मेरे भी यही हाल थे। सोचा घर वाले सही करेंगे। जब अपनी कोई पसंद नहीं तब घर परिवार की सुनो।"
"ये थे हमारी शादी के कारण और एक दूसरे से शादी की वजह। अब जो उपन्यास पढ़ रही हो, पढ़ कर बताओ कि उपन्यास के पात्र शादी के क्या कारण सोचते है?"
"ये लो उपन्यास और खुद पढ़ लो। मैं चली रसोई पुलाव बनाने।"

रीना रसोई जाती है और राकेश उपन्यास पढ़ने लगता है।
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