Monday, March 28, 2016

गुस्से पर काबू


एक गांव में बालू नाम का किसान रहता था। उसका दस वर्ष का बेटा था, जिसका नाम गोपाल था। गोपाल को बहुत गुस्सा आता था। वह छोटी-छोटी बातों पर मरने मारने पर उतारू हो जाता था। बालू ने गोपाल को बहुत समझाया लेकिन गोपाल का गुस्सा कम नही हुआ।

एक दिन बालू ने गोपाल को एक हथौड़ी और कीलों से भरा थैला दे कर कहा कि जब भी तुम्हे गुस्सा आए तब घर के सामने लगे पेड़ पर एक कील गाड़ देना। जिस दिन तुम्हारा गुस्सा शांत हो जाए और एक कील भी नही ठोक पाओ तब मेरे पास आना।

पहले दिन गोपाल ने पेड़ में तीस कीलें ठोक दी। धीरे-धीरे कीलों की संख्या कम होने लगी। तीस कीलों से कम होती-होती कीलों की संख्या बीस, दस, पांच तक हो गई। एक दिन गोपाल ने कोई कील नही ठोकी उस पेड़ में। वह अपने पिता के पास गया।

"पिताजी आज मैंने कोई कील पेड़ में नही ठोकी। अब मैं सोचता हूं कि मेरा गुस्सा शांत हो गया है और चित विचलित नही होता।"

गोपाल की बात सुन कर पिता बालू ने गोपाल से कहा "बेटा, अब तुम वो सभी कीलों को पेड़ से निकालो जो तुमने पेड़ में ठोकी थी।"

पिता की बात सुन कर गोपाल ने पेड़ से ठोकी हुई कीलों को निकाला। पेड़ से कीलें निकल जाने के बाद बालू ने बेटे गोपाल से कहा।
"तुमने अपने गुस्से पर काबू कर लिया यह बहुत अच्छी बात है। गुस्से को नियंत्रण में रखना चाहिए। तुम देखो कि गुस्सा आने पर जो कीलें पेड़ में तुमने ठोकी, वहां निशान रह गए हैं। तुमने गुस्से में पेड़ में कील ठोकी, उसको निकाला परंतु निशान रह गए। ठीक इसी तरह जब तुम किसी व्यक्ति पर अपना गुस्सा उतारते हो, गुस्से में भला-बुरा कहते हो, गाली देते हो, तब उस व्यक्ति के मन में चोट पहुंचती है। बाद में तुम कितनी ही माफ़ी मांगो, पर घाव रह जाता है। वह व्यक्ति तुम्हारा अपना नही बन सकता, क्योंकि तुम्हारा गुस्सा उसे याद रहता है। इसलिए अपने मन, वचन, कर्म से कभी भी ऐसा काम नहीं करो, जिस के लिए तुम्हे बाद में पछताना पड़े।"



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