Tuesday, April 12, 2016

अमरुद का पेड़



महीने का चौथा शनिवार। सुबह के साढ़े छः बज रहे है। राकेश और रीना बालकनी में बैठे चाय पी रहे हैं और समाचारपत्र पढते हुए आपस में मुख्य समाचार पर चर्चा कर रहे है, तभी उनका पौत्र शौर्य बालकनी में आता है और खाली कुर्सी पर बैठ जाता है।

"दादी मैं गया।"
"मेरा, मिट्ठा बॉय गया।"
"हां, दादी चाय पी रहे हो?"
"दूध पीना है?"
"हां दादी।"
"दादू साथ बैठो, मैं दूध लाती हूं।"

रीना शौर्य के लिए दूध लाती है। दूध पीते हुए शौर्य पूछता है।
'दादू आज आप ऑफिस नही गए?"
"आज तो छुट्टी है।"
"किसलिए?"
"आज फोर्थ सैटरडे है, इसलिए आज छुट्टी है।"
"फर्स्ट सैटरडे को?
"ऑफिस जाते हैं। छुट्टी नही होती है।"
"सेकंड सैटरडे को?"
"ऑफिस की छुट्टी होती है।"
"थर्ड सैटरडे को?"
"ऑफिस की छुट्टी नही होती।"
"फोर्थ सैटरडे को?"
"आज फोर्थ सैटरडे है। ऑफिस की छुट्टी है।"
"दादू आज आपकी छुट्टी है?"
"हां आज छुट्टी है।"
"मेरी भी छुट्टी है।"
"वैरी गुड।"
"दादू पार्क चले?"
"चलो, जल्दी से दूध पी लो, फिर पार्क चलते हैं।"

शौर्य दूध पी कर अपने जूते पहन लेता है।
"चलो दादू, पार्क चलो।"
दादा राकेश और पोता शौर्य घर के समीप पार्क जाते है। शौर्य पार्क में प्रवेश करते ही झूले की तरफ भागता है और झूला झूलने लगता है।
"दादू पीछे से धक्का दो, बहुत ऊपर तक झूला झूलूंगा।"
राकेश शौर्य को झूला झुलवाते है। तीन-चार मिनट बाद शौर्य झूले से नीचे आता है और दादा राकेश के साथ पार्क के पैदल पथ पर बातें करते हुए साथ-साथ चलते है। कबूतरों को दाना चुगते देख शौर्य रुक जाता है।

"दादू, देखो कितने सारे कबूतर। दाना चुग रहे हैं और पानी भी पी रहे हैं। मैंने भी पानी पीना है, प्यास लगी है।"

राकेश पानी की बोतल घर से लेकर आए थे। बेंच पर बैठ कर शौर्य पानी पीता है। बच्चों को तो खेल-कूद में आनंद आता है।

"दादू मैं भागता हूं, मुझे पकड़ो।" कह कर शौर्य हंसते हुए भागने लगा और राकेश शौर्य के पीछे। दोनों हंसते हुए भागने लगे। कभी राकेश शौर्य को पकड़ लेता और कभी चपलता से शौर्य राकेश के हाथों से निकल भागता। भागते हुए शौर्य पार्क में बने जिम में चढ़ कर पैरो की कसरत करने लगा और राकेश अपनी पीठ सीधी करने के लिए बेंच पर बैठ गया। दो-तीन जिम की कसरत करने के पश्चात शौर्य दादा के पास बेंच पर बैठ गया।

"चलें शौर्य, घर चले।"

शौर्य थक गया था, वह राकेश के साथ वापिस घर गया। घर के दरवाज़े पर रीना माली के साथ गमलो की गुड़ाई करवा रही थी। पौधों की कटाई और छटाई माली कर रहा था।

"माली भैया, तुम यह अमरुद का पेड़ लगा कर गए थे, इसमें फल कब आएगा। अब तो मेरे सर से भी ऊपर हो गया है।"

माली अमरुद के पेड़ को देख मुस्कुराया। "बीबी जी, आपको हीरा लगा कर दिया है, मैंने। आपकी नज़र नही गई पर पेड़ में फल गए है। वो देखो दो अमरुद तो मुझे नज़र गए।"

रीना ऊपर देखती है। वाकई दो अमरुद लगे हुए थे। रीना राकेश और शौर्य को भी अमरुद दिखाती है।

"दादी मुझे अमरुद दो।"

शौर्य की बात सुन कर माली ने कहा। "कुछ दिन रुक जाओ, थोडा बड़ा होने दो और पकने दो। पके हुए अमरुद तोडना। लाजवाब अमरुद निकलेगा। इलाहाबादी अमरुद आपको लगा कर दिया था। साल में दो बार फल देगा और वो भी मीठे-मीठे। अभी पहला फल लगा है, थोड़े आएंगे, अगली बार पूरा पेड़ फलों से लद जाएगा।"
"माली यह पेड़ कितना ऊंचा जाएगा। अभी तो छः फीट का है।" राकेश ने माली से पूछा।
"बाबू जी, अमरुद का पेड़ पंद्रह बीस फीट तक जाता है। आप पहली मंजिल की बालकनी में खड़े होकर आराम से फल तोड़ सकते हो।"
"माली ऐसा एक पौधा और लगा दो। मुझे फल वाले पेड़ बहुत पसंद हैं।" राकेश ने माली से कहा।
"यह देखिए, अनार का पौधा है। शर्तिया फल आएगा। यह लगवालो।"
"खाने वाले अनार लगेंगे या दिखावटी?" राकेश ने माली से पूछा।
"बिलकुल खाने वाले। इसका पेड़ अमरुद के पेड़ से छोटा होता है और फल देर से आएगा लेकिन मज़ा जाएगा फल देख कर।" माली ने अनार का पौधा अपने रिक्शा से निकाला।
"अमरुद का पौधा लगा, इसमें फल छः आठ महीने में गया और अच्छा ऊंचा भी हो गया।"
"अमरुद अगले सप्ताह के कर आऊंगा। आज मेरे कहने पर अनार का लगवाये।"

राकेश के माली को अनार का पौधा लगाने की अनुमति दी। शौर्य धैर्य से माली को अनार का पौधा लगाते देखता रहा।
"माली भैया इसमें अनार आएंगे?"
"बिल्कुल आएंगे, जैसे अमरुद के पेड़ पर अमरुद गए है। अगले सप्ताह मैं एक और अमरुद का पौधा लगा दूंगा और इस पेड़ से अमरुद तोड़ कर आपको दूंगा।"
"अभी दो।"
"अभी अमरुद के फल छोटे है और कच्चे है। अगले सप्ताह तक बड़े हो जाएंगे और पक भी जाएंगे। बहुत मीठे होंगे।"
"सच्ची में?"
"हां सच्ची में।"

माली अनार का पौधा लगा कर चला गया। शौर्य हर रोज़ रीना से पूछता कि अमरुद कब तोड़ोगे। दादी कहती कि एक सप्ताह बाद रविवार को माली भैया आएंगे और वो तोड़ कर आपको देंगे।
"दादी आप तोड़ लो?"
"अभी नहीं, अगले रविवार को तोड़ेंगे।"

शौर्य पूरे सप्ताह रविवार आने का इंतज़ार करता रहा कि रविवार कब आएगा। आज कौन सा दिन है, शौर्य हर रोज सुबह उठ कर दादी रीना से पूछता। आखिर वो दिन गया, रविवार का दिन, जिसका शौर्य को इंतज़ार था। सुबह उठते ही शौर्य ने अमरुद तोड़ने के लिए कहा।

"राकेश आज तो अमरुद तोड़ ही लो नही तो शौर्य का सब्र टूट जाएगा।"

राकेश स्टूल रख कर उसके ऊपर चढ़ते हैं और अमरुद देखते है। अमरुद बड़े हो गए थे और हाथ लगा कर देखा, अमरुद पक भी गए थे। राकेश ने दोनों अमरुद तोड़े और रीना को दिए। तभी राकेश की नज़र तीन अमरूदों पर पड़ी जो पत्तो में छुपे हुए थे। राकेश ख़ुशी से चिल्लाया।

"शौर्य तीन और अमरुद।"
"दादा दिखाओ।"
"पत्तों में छुपे हुए है। मैं तोड़ कर तुम्हे देता हूं।"

राकेश ने तीनों अमरुद तोड़े और रीना को दिए। राकेश और अमरुद देखने लगा, लेकिन और अमरुद नही थे। राकेश नीचे उतरा।

"शौर्य अमरुद गिनो, कितने हैं।"
शौर्य अमरुद गिनने लगा। वन, टू, थ्री, फोर, फाइव। "दादू फाइव अमरुद है।"

राकेश, रीना और शौर्य घर के अंदर जाते हैं। रीना अमरुद पानी से धो कर काटती है।
"शौर्य, देखो ये बहुत बढ़िया अमरुद है। अंदर से लाल हैं। लाल अमरुद बहुत मीठे होते हैं। अच्छा यह बताओ सबसे पहले किसको भोग लगाएंगे।"
"दादी, भगवान जी को भोग लगाओ।"

रीना दादी और पौत्र शौर्य मंदिर में पहला भोग भगवान जी को देते है फिर शौर्य अमरुद खाता है।

"दादी यम्मी है, बहुत मीठा है।"

रीना और राकेश ने अमरुद मुंह में रखा और खाने के पश्चात अमरुद के मीठेपन की तारीफ करने लगे।

"राकेश मैं अमरुद का पेड़ लगवा नही रही थी। माली किसी और के लिए लाया था, उसने छोटा पौधा देख लगवाया नहीं। राकेश उस समय सिर्फ एक टहनी थी, मुझे भी शक हुआ कि मालूम नही पौधा चलेगा या नही। कहीं दो चार दिन में सड़ जाए। माली ने कहा कि एक इलाहाबादी अमरुद है। शर्तिया चलेगा नही तो पैसे वापिस। मजे की बात यह है कि पौधा लगाने के बाद माली दो महीने तक नज़र नही आया। लेकिन पौधा पक्का निकला और आज छः महीने में फल दे दिया। घर के आगे पेड़ अच्छा लगता है और फल वाले पेड़ एक बार फल देना शुरू कर दें, बस देते रहते हैं।"
"हां रीना, बोला तो है कि एक और ऐसा पेड़ लगा दे। अनार लगा गया है, ज़मीन में सही पकड़ बना ले तब आनंद आएगा।"
"दादी, इसमें और अमरुद लगेंगे?"
"मेरा प्यारा राजा बेटा, ज़रूर लगेंगे। जब भी अमरुद लगेगा। हम तोड़ के आपको देंगे। आपको अमरुद अच्छा लगता है।"
"हां दादी, अमरुद बहुत अच्छा होता है।"

अमरुद के पेड़ में पहले वर्ष सिर्फ पांच अमरुद ही लगे। माली का इंतज़ार राकेश और शौर्य करते रहे कि वो दूसरा अमरुद का पौधा लगा कर जाएगा परंतु माली अगले सप्ताह नही आया। रीना ने हंस कर कहा कि माली की बातों पर विश्वास करो। दो तीन महीने में एक बार आता है। जब आएगा तब बात करेंगे। हो सकता है कि वो खुद भी भूल चुका होगा कि अमरुद लगाना है कि नही।

छः महीने बाद

अमरुद का पेड़ और उंचा हो गया। पहली मंज़िल की बालकनी तक पेड़ की शाखाएं छूने लगी। हलकी-हलकी बूंदे पड़ रही थी। शौर्य बालकनी में खड़ा हो कर कभी तेज होती बरसात तो कभी हलकी बूंदों को पड़ता देख रहा था। बरसात में अमरुद के पेड़ के पत्ते धुल गए और एक पत्ता शौर्य ने तोडा और पत्ते पर पड़ी बूंदे देखने लगा। रीना ने पीछे से कर आवाज दी।
"शौर्य।"
"हां दादी।"
"क्या कर रहे हो?"
"दादी पेड़ का पत्ता तोडा, देखो पानी की बूंदों के साथ बहुत अच्छा लग रहा है।"
"शौर्य, पत्तों को ऐसे नही तोड़ते। देखो पत्तों के बीच अमरुद।" रीना की नज़र गई, कुछ अमरुद के फल नज़र आए।
"दादी मुझे दिखाओ।"
रीना ने पत्तों को हटा कर शौर्य को अमरुद दिखाए।
"दादी अमरुद तोड़े?"
"अभी नही, रविवार दादा की छुट्टी होगी, दादा तोड़ेगें।"

शौर्य रविवार का इंतज़ार करने लगा। रविवार सुबह राकेश, रीना और शौर्य अमरुद के पेड़ के पास खड़े हो गए। पेड़ से सीढ़ी सटा कर राकेश ने पेड़ से पके हुए अमरुद तोड़े। आठ अमरुद राकेश ने तोड़ कर शौर्य और रीना को दिए।

"शौर्य बहुत सारे अमरुद के फल लगे हैं। मुझे लगता है कि पूरा पेड़ फल से लद जाएगा।"
"फिर तो दादू बहुत मजा आएगा।"
"हां शौर्य, अब हर रविवार हम पके हुए अमरुद तोड़ेगें।"

शौर्य ने रीना के साथ अमरुद धोए और एक अमरुद मंदिर में भगवान जी को भोग लगाया और बाकी अमरुद फ्रिज में रखे। अब हर तीन-चार दिन बाद अमरुद के पेड़ से पके फल तोड़े जाते। इस बार अनगिनत अमरुद के फल लगे। पड़ोसियों, रिश्तेदारों को भी अमरुद दिए। शौर्य ने स्कूल में अपने मित्रों और टीचर को भी अमरुद दिए।

आदत के अनुसार माली ने चार महीने बाद कर अमरुद का दूसरा पौधा लगाया। पौधे ने जब पेड़ का रूप लिया तब मीठे, नरम अमरूदों से पेड़ लद गया। इस पेड़ के अमरुद अंदर से सफ़ेद थे किन्तु थे लाजवाब।

समय बीतता गया। वर्ष में दो बार अमरुद का पेड़ फलों से लद जाता। सबसे अधिक ख़ुशी शौर्य को होती। अब शौर्य थोडा बड़ा हो गया, दादा के साथ पेड़ पर चढ़ कर अमरुद तोड़ने लगा।

बढ़ते शौर्य का रुझान बागवानी में हो गया। दादी के साथ गुलाब के पौधों की छटाई करना, तुलसी के पौधों की देख-भाल करना। सुबह स्कूल जाने की जल्दी होती है, शाम के समय सब पौधों में पानी देना शौर्य ने अपने जिम्मे ले लिया। फूलों की प्रदर्शनी में दादी संग जाना और इंटरनेट से जानकारी प्राप्त कर दादी को देना क्योंकि दादी रीना इंटरनेट नही चलाती थी।

कुछ वर्ष बाद

जब पौत्र बड़े हो जाएं, दादा-दादी बूढे हो जाते हैं। राकेश के सर पर से बाल नदारत हो गए और रीना के बाल सफ़ेद हो गए। राकेश ने कार चलाना छोड़ दिया, अब सड़कों पर ट्रैफिक बढ़ गया। दोनों घर के काम में व्यस्त रहते और दोपहर में आराम करते। सुबह और शाम घर के समीप पार्क में चहल-कदमी करते और वापस आते समय सब्जी-फ्रूट खरीदते।

शौर्य का रिश्ता हो गया। रीना ने अपनी होने वाली पौत्रवधु को घर आमंत्रित किया। सुहानी घर आई, शौर्य ने अमरुद के पेड़ दिखाए। फलों से दोनों अमरुद के पेड़ लदे हुए थे। अमरुद बड़े साइज़ के थे। सुहानी अमरुद के पेड़ों को देखती रह गई।

"शौर्य, पेड़ पर अमरुद ही अमरुद नज़र रहे है।"
"तुम गिन सकती हो क्या?"
"बहुत मुश्किल है गिनना।"
"चलो पेड़ पर चढ़ते हैं।"
"पेड़ पर?"
"हां अमरुद तोड़ते हैं। मैंने पांच दिन से अमरुद नही तोड़े। मैंने सोच रखा था कि तुम आओगी, तुमसे तुड़वाऊंगा।"

शौर्य और सुहानी पेड़ पर चढ़ कर अमरुद तोड़ते है और दादी को देते हैं। रीना अमरूदों में से अच्छे और बड़े अमरुद छांट कर एक टोकरी में रख कर सुहानी को देती है।

"सुहानी, तुम पहली बार हमारे घर आई हो। यह घर की सौगात तुम्हारे लिए।"










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