Monday, May 30, 2016

मां वापिस आ गई



सुधीर और सीमा अस्पताल में लेबर रूम के बाहर इंतजार कर रहे हैं। दोनों चुपचाप लेबर रूम के बाहर रखे बेंच पर बैठे है। पुत्रवधु लेबर रूम में है। दोनों रुक-रुक कर एक दूसरे को देख कर मुस्कुरा देते परन्तु कुछ बोलते नही। कुछ देर का बस और इंतजार, जैसे ही लेबर रूम का दरवाज़ा खुलता और नर्स बाहर आती, दोनों एक साथ बेंच से उठते। नर्स मुस्कुरा कर कहती, थोडा इंतजार और। ऐसे अवसर पर हर व्यक्ति अधीर हो जाता है, कुछ वैसा ही हाल सुधीर और सीमा का भी हो रहा था।

बेंच पर बैठे हुए, इंतजार करते सुधीर के मस्तिष्क में अनेक विचार उमड़ने लगे। कुछ पल के लिए अतीत में चला गया। पिछले वर्ष सुधीर की माताजी का देहांत हुआ और उसके कुछ दिनों बाद पुत्रवधु के गर्भवती होने का समाचार मिला। सीमा को उसने तुरन्त कह दिया कि देखना मां वापिस आएगी। सीमा मुस्कुरा दी। धर्म और समाज की मान्यता पर सुधीर को उस दिन विश्वास हो गया था कि लड़की का जन्म होगा। उसकी मां उसके बेटे की पुत्री के रूप में जन्म लेगी।

"क्या पक्का विश्वास है, तुम्हे? सीमा ने पूछा।
"सम्पूर्ण, सत प्रतिशत पक्का विश्वास है, लड़की का जन्म होगा। हमारी मां हमारी पौत्री के रूप में फिर से इस घर में आएगी।" उस दिन सुधीर ने यकीन से कहा था।
"तुमसे अधिक प्रेम था, इसलिए कह रहे हो? सीमा ने चुटकी ली।
"कोई बात नहीं, पत्नी का धर्म होता है, पति से नौक-झौंक करने का। मजे ले लो मेरे से, प्रेम कितना था, तुझसे कोई छुपा तो है नही। एक छत के नीचे रहे थे अजनबियों की तरह।" सुधीर ने बात कहते हुए सीमा का हाथ मजबूती से पकड़ लिया था।
"फिर भी पैंतीस वर्ष एक छत के नीचे गुज़ारे।" सीमा ने कहा।
"विवाह के बाद पैतीस वर्ष, बहुत लंबा समय होता है, परन्तु आज देखता हूं तब ऐसा लगता है कि जैसे कल की बात हो, जब हमारी शादी हुई थी और आज दादा-दादी बन चुके हैं।"
"हां, सुधीर समय पंख लगा कर उड़ जाता है। हमारे और उनके विचारों में मतभेद थे।"
"यही ज़िन्दगी है। यह तो माता-पिता के साथ वैचारिक मतभेद थे, पति-पत्नी भी पूरी ज़िन्दगी लड़ते-झगड़ते एक साथ बिता देते हैं।"
"तुम्हारे कहने का अर्थ है कि मैं तुमसे लड़ती हूं।"
"रोज नही, कभी-कभी।" सुधीर ने जब सीमा को कहने के बाद देखा तो उसने मुंह फुला कर विरोध प्रकट किया। सुधीर मुस्कुराता रहा, कुछ बोला नही।

हालांकि यह भी कटु सत्य है, कि हर रोज की नौक-झौंक के बावजूद पति-पत्नी पूरी ज़िन्दगी एक साथ रहते हैं।
माता-पिता के साथ वैचारिक मतभेद के कारण सुधीर का अपने माता-पिता के साथ कम वार्तालाप होता था। एक घर में रह कर भी खास मौकों पर ही बोलचाल होती थी। सुधीर शांत प्रकृति का था, वह अक्सर सोचता था कि उम्र के आखिर पड़ाव में मनुष्य को शांत रहना चाहिए, परन्तु अंतिम सांस तक किसी भी मनुष्य का चरित्र नही बदलता है। वह वैसे का वैसे ही रहता है और स्वभाव नही बदलता। माताजी का हठ पिचासी वर्ष की उम्र में भी बरक़रार था। उनकी चाहत अभी भी यही थी कि घर में सभी उनको सुबह-शाम सलाम करें और हर कार्य की अनुमति ले। परन्तु यह संभव नही है। हर कोई अपनी इच्छा अनुसार जीवन व्यतीत करना चाहता है, चाहे वो खुद हो, उनका पुत्र या पौत्र। सभी को स्वतंत्रता चाहिए।

अभी दो वर्ष पहले की बात है। सुधीर के पौत्र शुभ का मुंडन होना था। मुंडन की तिथि निकलने के बाद सुधीर और सीमा माताजी-पिताजी के पास पड़पौत्र शुभ के मुंडन की बात करने गए।
"अम्मा, शुभ का मुंडन होना है। नवरात्री के शुभ दिनों में उसका मुंडन करवाते हैं।" सुधीर ने कहा।
एक छत के नीचे रहते उनके कानों में यह खबर पहले से थी कि शुभ का मुंडन होना है और उसके लिए तैयारी हो रही है, लेकिन उनको किसी ने कुछ नही बताया। इस बात पर माताजी बहुत नाराज़ थी और सुधीर पर बरस पड़ी।
"मैंने तुझे अपने हाथों में पाला है। आज दादा बन गया है, इसका यह मतलब नही है कि मां को भूल जाएगा। उससे पूछेगा नही। सारे काम अपने आप करने हैं तो मेरे पास आया क्यों है। जवाब दे, पहले तू इसका?"
मां के मुख से नाराजगी के बाण सुधीर के कलेजे में सीधे उतरे परन्तु अपने स्वभाव के कारण चुप रहा।
"अम्मा, सबने मिल कर मुंडन का आयोजन करना है। मैं अकेले नही कर रहा हूं।"
"मुझसे पूछ कर मुंडन कर रहा है?"
"तीसरे वर्ष में मुंडन होता है। शुभ ढाई वर्ष का हो गया है। नवरात्री के शुभ दिनों में मुंडन करवा लेते है।"
"जब सब कुछ पहले से तय है, तब मेरे पास क्यों आया है।"
"अम्मा, बड़ों का आशीर्वाद के साथ ही शुभ कार्य होते है।"
"आशीर्वाद तब होता है जब बूढो से सलाह ली जाती है। मेरे से पूछ कर मुंडन कर रहे हो, जो आशीर्वाद दूं।"

माताजी के कटु वचन सुन कर सुधीर की बोलती बंद हो गई कि मां मुंडन के शुभ अवसर पर रूठ गई और कोप भवन से बाहर लाना तो मुश्किल काम है।
"अम्मा, सब बच्चों ने करना है, हमें तो आश्रीवाद देना है। मैं खुद कुछ नही कर रहा। घर के पास मंदिर में हवन के बाद मुंडन, फिर दोपहर का खाना। छोटा सा कार्यक्रम है।"
"अपनी पार्टियां अपने पास रखो, हमने बहुत पार्टियां खाई है। नही चाहिए तेरी पार्टी। खुद खाओ, सबको खिलाओ, हमने नही खानी तेरी पार्टी।"

सुधीर ने सीमा को चुप रहने का इशारा किया और कमरे से बाहर गया। बच्चों ने भी पूरी बहस सुन ली थी। कोई कुछ नही बोला। सुधीर अपने कमरे में कर सीमा और बच्चों को संबोधित हुआ "तय कार्यक्रम के अनुसार तैयारी रखो। पहले नवरात्र को मुंडन होगा। रविवार का दिन है, दोपहर के समय लंच पर करीबी मित्रों और रिश्तेदारों को आमंत्रण दे दो। माताजी-पिताजी को बाद में देखेगें। अभी शांत रहना है।"

सीमा चिंतित हो गई कि घर के बड़े ही शुभ कार्य में सम्मलित नही होंगे तब कैसे लगेगा और लोग क्या कहेंगे। सुधीर ने सीमा को समझाया कि दुबारा मां के पास उसकी जाने की हिम्मत नही है। वह मां के साथ बहस नही कर सकता। आखिर वह शुभ दिन भी गया। घर के समीप मंदिर में हवन और मुंडन के समय माता-पिता दोनों उपस्थित हुए। सुधीर को अच्छा लगा। माताजी रिश्तेदारों के साथ खूब बतिया रही थी। सुधीर ने चैन की सांस ली कि शुभ कार्य में माताजी ने किसी को कोई कटु वचन नही कहे। शांतिपूर्वक मुंडन सम्पन्न हुआ।

लेबर रूम का दरवाजा खुलते ही सुधीर वर्तमान में गया। नर्स के हाथ में एक नवजात शिशु को देख सीमा और सुधीर दोनों एक साथ बेंच छोड़ उठ खड़े हुए। लड़की है, गोरी-चिट्टी। एक झलक दिखला कर नर्स नवजात शिशु को नर्सरी ले गई।
"मैंने कहा था कि मां वापिस आएगी।" सुधीर ने सीमा की ओर देखते हुए कहा।
"अपनी मां को गोद में खिलाना।" सीमा ने हंसते हुए कहा।
सुधीर और सीमा बेंच से उठ कर कमरे में बैठ गए। थोड़ी देर बाद नर्सरी गए और डॉक्टर से बात की और दूर से पौत्री को देखा। बच्चा तंदरुस्त है। नन्ही के घने बालों को देख सीमा ने कहा।
"मां के अंतिम समय तक घने बाल थे। सुन्दर, गोरी भी थी और हठी भी। बाल सफ़ेद हो गए थे पर मेरे बालों से अधिक घने थे।"
"नन्ही सुन्दर, गोरी है और काले घने बाल। हठी होगी मां की तरह।"
"ज़रूर होगी।"
"बच्चों की हठ अच्छी लगती है।
एक दूसरे की ओर देखते दोनों मुस्कुराते हुए कमरे में गए। पीछे-पीछे नर्स नन्ही को ले कर आई। सीमा ने नन्ही को गोद में लिया।
"सुधीर, नन्ही के नैन-नक्श मां जैसे तीखे है।"
"मुझे तो मां की हू-बहू कापी लग रही है। मां कहती थी कि उसने हमें पाल के बड़ा किया है। अब हम उसे पाल के बड़ा करते है।"

सुधीर नन्ही के रूप में मां को देख रहा था।



अकेलापन

सुबह के सात बजे सुरिंदर कमरे में समाचारपत्र पढ़ रहे थे उनके पुत्र ने एक वर्षीय पौत्र को सुरिंदर की गोद मे दिया। ...