Monday, May 02, 2016

रिश्ता अनजाना सा



रिश्ता क्या था उसके साथ, कोई रिश्तेदारी भी नही थी, दोस्ती भी नही थी। कभी रिश्ता भी नही समझा। मैंने कभी गौर नही किया ना ही कभी सोचा। पत्नी के साथ ही उसका समय व्यतीत होता था। सुबह जल्दी ऑफिस के लिए घर से निकलता था और रात को ही घर वापिसी होती थी। रविवार और दूसरे अवकाश के दिनों में उसको देखता था। मैंने तो कभी उससे बात की होगी, मुझे शायद याद नही।

नाम उसका कम्मो था। घर पर सफाई और बर्तन मांजने का काम करती थी। हमारे घर काम करने मेरे ऑफिस जाने के बाद ही आती थी। बच्चे भी स्कूल चले जाते थे। घर में पत्नी तब तसल्ली से सफाई करवाती थी।

कभी रिश्ते के बारे में इसलिए नही सोचा क्योंकि कई सफाई का काम करने वाली बाई आती और चली जाती। कोई तो महीना भी नही काम करती, कोई छः महीने, कोई एक साल काम करती। गिनती करना भी मुश्किल है कि कितनी बाइयों ने घर में काम किया।

कम्मो कुछ अलग थी दूसरों से। लगभग दस वर्ष तक उसने काम किया। उस पर भरोसा हो गया था। कई बार तो उसके भरोसे घर छोड़ कर बाजार चले जाते थे। खुद तो पढ़ी लिखी नही थी, पर अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में दाखिल कराया। कम्मो का पति रिक्शा चलाता था। कम्मो पांच घरों में काम करती थी। किताबे, वर्दी, दोपहर का खाना सब स्कूल से मिलता था। बच्चे कोई पढ़ने में अधिक होशियार नही थे फिर भी काम चलाऊ पढाई करते थे। कम्मो इसी में प्रसन्न रहती थी।

पत्नी अक्सर फुरसत के पलों में कम्मो का जिक्र करती थी परंतु मैंने कभी अधिक ध्यान दिया नही।
कम्मो पति के साथ रिक्शे में आती थी। उसका पति सोसाइटी के गेट पर रिक्शा लगा देता था। सुबह साढ़े आठ बजे ऑफिस जाने के लिए घर से रवाना होता। कम्मो का पति एक सैलूट मार कर रिक्शे के पास खड़ा हो जाता। मेट्रो स्टेशन तक जाने के लिए उसी के रिक्शे में सफ़र करता। उसके सैलूट का जवाब मैं मुस्कुरा कर देता और रिकशे पर बैठ जाता।

उसका रिक्शा सोसाइटी का रिक्शा बन गया। पत्नी समेत सोसाइटी की हर महिला आस-पास आने जाने, पड़ोस की मार्किट में आने जाने के लिए उसके रिक्शे का प्रयोग करती। बच्चे स्कूल जाने के लिए करते। सवारी छोड़ कर वह तुरन्त सोसाइटी के गेट पर रिक्शा खड़ा कर देता।

पत्नी से कम्मो और उसके पति, बच्चों के बारे में सुनने को मिलता रहता। जब कोई आंख से दूर हो जाए तब दिल से भी उतर जाता है। कुछ यूं हुआ और आज कई वर्ष हो गए उसे दूर गए। मैं तो भूल गया लेकिन पत्नी अक्सर याद कर लेती थी। बातों-बातों में जिक्र जाता था और मैं चुपचाप सुनता था।

कम्मो के चले जाने के बाद कई बाई आई और गई। कोई चार महीने, आठ महीने तो अधिकतम एक वर्ष। इसलिए भी पत्नी कम्मो को याद करती कि काश कोई उसके जैसी मिल जाए।

कम्मो चली गई, उसका पति ने आना छोड़ दिया, सुना कि वह बच्चों के साथ गांव चला गया। सुबह ऑफिस जाने के लिए बहुत रिक्शे मिलते थे, परन्तु सैलूट मार कर रिक्शे में बिठाने वाला कोई नही मिला। पत्नी को बहुत आराम था, उसके पति को सामान की लिस्ट पकड़ा देती थी और वह मार्किट से सब्ज़ी, फ्रूट और किराने का सामान खरीद लाता था। महिलाएं स्वभाव से थोड़ी लापरवाह होती है। कभी चूड़ी बिस्तर पर पड़ी है, कभी कान के टॉप्स, बालियां गिरी हुई मिलती, कम्मो पत्नी को हाथ में थमाती और डांट भी लगाती कि मंहगे जेवर संभाल कर रखा करो, कभी किसी और के हाथ लग गए तब मिलने नही हैं। जब-जब कम्मो ने मेरे सामने पत्नी को डांट लगाई, दिल प्रसन्न हो जाता था पत्नी की मायूसी देख कर, कि कोई तो है, जो उसे भी डांट सकता है, क्योंकि हर पति की तरह मेरी भी कभी हिम्मत नहीं हुई कि पत्नी को डांट लगाऊं। खैर यह तो प्यार की बात होती है कि कोई पति पत्नी की नही डांटता। भला कोई अपनी सबसे अधिक जान से भी प्यारी को डांटता है। हरगिज नही।

घर में कोई भी समारोह होता, पत्नी कम्मो और उसके पति को रोक लेती। सभी रिश्तेदार हंस के कहते कि कम्मो नौकर नही, बल्कि घर का एक सदस्य है।

लखनऊ ऑफिस के टूर से जाना हुआ। दो दिन का कार्यक्रम लंबा हो गया और पूरा सप्ताह रुकना पड़ा। दो दिन के टूर के हिसाब से एक छोटे बैग में कपडे डाले थे। मैले कपड़ो को धोने के लिए होटल की लांड्री में दिए। पूरा दिन काम करने के बाद होटल वापिस आया। रिसेप्शन पर कपड़ो का पूछा।

"सर, आप रूम में चलिए, आपके कपडे अभी कमरे में भेज देते हैं।"
कमरे में टीवी देख रहा था तभी दरवाजे पर दस्तक हुई। दरवाजा खुला था।
" जाओ, दरवाजा खुला है।"
लांड्री से कपडे धुल कर आए थे। कपडे लाने वाले व्यक्ति ने कपडे साइड टेबल पर रखे और मुझे देख कर नमस्ते कहा। मैंने उसको देखा, वह अधेड़ उम्र का छोटे कद का आदमी था। मैं उसे पहचान नही सका, पर वह मुझे पहचानता था, उसका खड़ा रहना शायद यही बतलाता था। मैं खामोश रहा। बहुत समय बाद शायद उसे देखा इसलिए पहचान नही सका। आंख से दूर व्यक्ति दिमाग से भी दूर हो जाता है। मेरी चुप्पी तोड़ते हुए उसके कहा।

"साहब जी, आपने मुझे पहचाना नही, मैं कालू कम्मो का पति।"
कम्मो शब्द सुन कर एक जोर से तगड़ा करंट का झटका लगा। पूरा शरीर कांप गया। लगभग दस वर्ष बीत गए होंगे, कम्मो को गए हुए। आज कालू की जुबान से कम्मो सुन कर ऐसा लगा कि सामने कालू नही कम्मो खड़ी है। कभी ऐसा लगता भी नही था और कभी सोचा भी नही था कि कम्मो ऐसे इतनी जल्दी चली जाएगी।

कालू की नमस्ते भी याद गई। मेरे ऑफिस जाने का समय याद रखता था और उस समय अपने रिक्शे को सिर्फ मेरे लिए खाली रखता था। कई बार मैं देर से ऑफिस जाता तब घर कर पूछता कि साहब कहीं जल्दी तो नही चले गए।

"कालू कैसे हो, मेरे जैसे बूढे हो गए हो।"
कालू मुस्कुरा दिया और हंस कर गर्दन हिला दी, पर कुछ बोला नही।
"बच्चे कैसे हैं?"
"ठीक हैं।"
"अब तो बड़े हो गए होंगे?"
"जी, बड़े हो गए हैं।"
"दिल्ली में रिक्शा चलाते थे, यहां होटल में काम कर रहे हो?"
"साहब जी, जाति से मैं धोबी हूं, दिल्ली में रिक्शा चलाया। कम्मो के गुजर जाने के बाद बच्चे छोटे थे, इसलिए लखनऊ गया। गांव भी पास में है और कई रिश्तेदार लखनऊ में काम करते थे, इसलिए यहां बस गया। दिल्ली में बच्चों की संभालने की चिंता थी। यहां होटल की लांड्री में काम मिल गया और यहीं बस गया।"
"दूसरी शादी की?"
"छोटे बच्चों को संभालने के लिए दूसरी शादी की।"
"खुश हो, कोई चिंता, फ़िक्र।"
"ईश्वर के रचे खेल को कोई नही जानता। जैसे उसने कहा, बस कर रहे हैं।"

बस इन शब्दों में जीवन की सच्चाई कालू ने बता दी। कम्मो ने दस वर्ष तक हमारे घर काम किया। घर का सदस्य बन कर रहती थी। पत्नी के साथ रसोई में हाथ बटाती थी। घर के हर प्रयोजनों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेती थी। छुट्टी भी के बराबर करती थी। अंतिम दो तीन महीनों में कम्मो सर दर्द की शिकायत करती थी। अक्सर दर्द निवारक गोली ले कर खाती थी। आज की भाग-दौड़ की ज़िन्दगी में, तनाव की ज़िन्दगी में सभी को सर दर्द की समस्या रहती है। किसी ने गंभीरता से नही लिया। एक दिन अचानक चक्कर खा कर गिर पड़ी। हल्का-हल्का बुखार रहने लगा। बुखार, सर दर्द और चक्कर के कारण अक्सर कम्मो छुट्टी करने लगी। कम्मो पर पूरी तरह से आश्रित पत्नी भी बैचैन दिखती। एक महीने की बीमारी के बाद एक दिन पत्नी उसे अपने डॉक्टर के पास चेक-अप के लिए ले गई। टेस्ट कराने के बाद दिमाग में सूजन और टीबी की बीमारी सामने आई। डॉक्टर ने कहा था कि दिमाग की सूजन का कम होना जरुरी है। यदि दवा से कम नही हुई तब ऑपरेशन ही एकमात्र इलाज़ है। कालू और उसके कुछ रिश्तेदार झाड़-फूंक और तांत्रिक के चक्कर में पड गए कि किसी ने जादू-टोना कर दिया है तभी दिमाग की बीमारी हुई है। पत्नी ने बहुत डांटा कि बेकार की बातों में मत उलझो, जब बीमारी का पता चल गया है तो डॉक्टर के कहे अनुसार दवा लो। कम्मो बहकी-बहकी सी बातें करने लगी और कालू और उसके रिश्तेदारों को पक्का यकीन हो गया कि कम्मो की ताबियत जादू-टोने से बिगड़ी है। वे तांत्रिक के चक्कर में पढ़ गए। एक रात कम्मो की तबियत बहुत अधिक ख़राब हो गई और उसे घर के पास नर्सिंग होम ले गए।

अगले दिन सुबह कालू रोते-रोते घर आया और कम्मो की बिगड़ती तबियत के बारे में बताया। नर्सिंग होम में कम्मो तड़प रही थी। हमें देख कहने लगी, मैं नही बचूंगी, मैं नही बचूंगी। उसका दर्द और दयनीय हालात देखें नही गए। डॉक्टर से बात की परंतु कोई संतुष्ट जवाब नही मिला। तीन दिन में पचास हज़ार का बिल बना दिया। गरीब आदमी इलाज भी नही करवा सकता। उसने हमारे से आर्थिक मदद के लिए कहा। यथा संभव मदद कर दी, परंतु हमारी भी मजबूरी थी, नौकरी पेशा की आधी तनख्वाह तो किस्तों में निकल जाती है। मकान की क़िस्त, कार की क़िस्त, बच्चों की पढाई। तीन दिन बाद सरकारी अस्पताल में दाखिल करवाया।

जैसे बुझने से पहले चिराग की लौ भड़क जाती है, वैसे कम्मो भी दो दिन खुश नज़र आई, फिर एक रात वह इस दुनिया से कूच कर गई। कालू अंतिम संस्कार के लिए कम्मो को गांव ले गया। उस दिन के बाद आज कालू मिला और सब पुरानी बातें ऐसे याद आई कि जैसे कल की बात हो।

कालू से कुछ देर तक बातें होती रही। बच्चे बड़े हो गए थे। लड़का एक दूसरे होटल में नौकरी कर रहा है। छोटी लड़की की शादी कर दी। दूसरी पत्नी से दो बच्चे अभी छोटे हैं।

रात को पत्नी से फोन पर बात हुई और कालू से हुई मुलाकात बताई। पत्नी फोन पर बात करते-करते अतीत में चली गई। उसकी आंखों के सामने कम्मो का चेहरा गया और आवाज भर गई। एक अनजान रिश्ता आज भी उसके साथ बना हुआ निकला।


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" कब आ रहे हो ?" " अभी तो कुछ कह नही सकता। " " मेरा दिल नही लगता। जल्दी आओ। " " बस...