Monday, June 06, 2016

धन्य धन्य तुम हो


धन्य धन्य तुम हो वरेण्य प्रणम्य जग वंदन
मेटो कलुष प्रणत जन का प्रभु काटो बंधन
सत्यसार तुम निर्विकार सिरजन के कारण
जीवन-मरण मसान-भवन सब में अवलम्बन
पूरण परम अनादि अनन्त ज्ञान वर लोचन
ओतप्रोत तुम ही में चित, जगती-मरंजन।
अगम दया के सागर दुःख दरिद्रता भंजन।
पापविनाशन प्रभो पवित्र पतित जन पावन।।

परंपरागत भजन


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