Monday, August 01, 2016

समर्पण



हम अपने में इतने व्यस्त रहते हैं कि किसी और के लिये समय ही नही निकालते। बात किसी और की नही, स्वयं की और अपने परिवार की है। परिवार छोटे और एकल हो गए हैं, और हम भी सिमटते जा रहे है।

दोपहर के साढ़े बारह बज गए। रीना ने फ्लैट को ताला लगा कर बंद किया और सोसाइटी के गेट से रिक्शा किया। गेट पर चिर-परिचित रिक्शा वाले खड़े थे। उनको मालूम है कि इस समय रीना अपने पौत्र शौर्य को स्कूल से वापिस लाने के लिए आएगी। शौर्य का स्कूल कोई आधे किलोमीटर की दूरी पर है। रिक्शा में चार-पांच मिनट लगते हैं स्कूल की दूरी तय करने में। शौर्य को स्कूल से लेना और वापिस घर आना, बस पंद्रह मिनट का नियमित कार्यक्रम है। कभी-कभी रीना सोचती है कि उम्र के इस पढ़ाव में बंध गई। सोचा था कि कुछ आजाद ज़िन्दगी रहेगी, परंतु मनुष्य जो सोचता है अक्सर होता नही है। पुत्रवधु नौकरी करती है, अत: पौत्र को दिन में संभालने की ज़िम्मेदारी रीना पर गई। चार वर्ष के छोटे बच्चे को संभालने में कई बार रीना झुंझला जाती थी। अभी नर्सरी में पढ़ रहा है शौर्य। उम्र के हिसाब से शैतानी भी करता है और प्रश्न पूछता है कि यह क्या है और कैसे है, क्यों है?

साठ वर्ष की उम्र में रीना के शरीर में अब उतनी चुस्ती, फुर्ती नही है कि छोटे बच्चे की चपलता की बराबरी कर सके।

सुबह साढ़े पांच बजे उठ कर रीना की दिनचर्या आरम्भ होती है। रीना के साथ राकेश भी बिस्तर छोड़ देता है। नित्य-क्रिया के पश्चात चाय पी कर स्नान करना और उसके बाद रसोई में। सबके नाश्ते के साथ टिफिन भी पैक हो जाते है। पुत्र और पुत्रवधु आठ बजे ऑफिस के लिए प्रस्थान करते हैं। रीना पौत्र शौर्य को स्कूल के लिए तैयार करती है, फिर राकेश साढ़े आठ बजे शौर्य को स्कूल छोड़ कर ऑफिस के लिये प्रस्थान करते है। अब रीना को थोड़ी राहत मिलती है। थोड़ा आराम और थोड़ा काम। समाचारपत्र पढ़ा, थोड़ा टेलीविज़न देखा। बारह बजे सोसाइटी के गेट से रिक्शा किया शौर्य को स्कूल से वापिस लाने के लिए।

रिक्शा स्कूल के गेट पर रुका। रीना शौर्य की क्लास गई और शौर्य के साथ उसी रिक्शे में बैठ कर घर आई। कुल अठारह मिनट लगे। फ्लैट का दरवाजा खोला, शौर्य ने स्कूल बैग सोफे पर पटका और टीवी ऑन किया।

"दादी डोरेमॉन वाला चैनल लगाओ।"

रीना ने चैनल लगाया। शौर्य डोरेमॉन सीरियल देख कर प्रसन्न सोफे पर बैठा हुआ था। शौर्य टीवी में सिर्फ डोरेमॉन ही देखता है। उसके सामने कोई दूसरा चैनल नही देख सकता। रीना ने लंच की प्लेट शौर्य के आगे रखी।

"शौर्य लंच टाइम हो गया। शुरू करो।"
"लंच में क्या बनाया है?"
"देखो, प्लेट आपके आगे रखी है। आप डोरेमॉन देखने में मगन हो, थोड़ी नजर प्लेट में भी डालो।"
"ये कौन सी सब्ज़ी है?
रीना अपनी रोटी लेकर आती है और शौर्य की बगल में बैठ कर शौर्य के गाल सहलाती है।
"आपकी पसंद की भिन्डी और बूंदी वाला रायता।"
"हां दादी, भिन्डी बड़ी स्वादी बनी है।"

शौर्य को भिन्डी बहुत पसंद है इसलिए बिना खाये ही तारीफ कर दी। रीना शौर्य को देख कर मुस्कुरा दी। नन्हे, अबोध बालक की बातें एक सुखद अनुभव की अनुभूति देती है। बिना किसी छल, कपट के प्यारी बातें तन, मन की तमाम थकान को पल भर में मिटा देती है। रीना खुद भी खाना खाती रही और शौर्य को कहती रही कि खाना भी खाता रहे, क्योंकि उसे मालूम है कि शौर्य सुध-बुद्ध खो कर कार्टून ही देखता रहेगा।

"शौर्य दो बज गए हैं, अब टीवी बंद करो और सो जाओ।"
"नही दादी, अभी नींद नही रही है।"
"अभी सो जाओ। शाम को आपके फ्रेंड्स आएंगे, उनके साथ पार्क में खेलने जाना है।"
"अभी टेन मिनट और देख लूं।"
"टेन मिनट बाद सो जाना।"

शौर्य ने दस मिनट बाद टीवी बंद नही किया। डोरेमॉन देखते हुए वह जोर-जोर से हंस रहा था। शौर्य सोने के लिये तैयार नही था। यदि दोपहर को शौर्य नही सोएगा तो शाम को नींद से परेशान होगा। उसके दोस्त जाएंगे और शौर्य नींद में झूमेगा।

"चलो शौर्य, सो जाओ।" रीना की आवाज में तेजी थी।
"दादी, मुझे डांट क्यों रहे हो?"
"कहां डांट रही हूं, सोने को कह रही हूं शौर्य, मैं चिल्ला रही हूं या तुम। इतनी जोर से क्यों बोल रहे हो।"
"मैं नाराज हो गया हूं।" दादी की बात सुन शौर्य ने कहा।
"क्यों नाराज हो गया है?
"आपने डांटा है।"
"मैंने कब डांटा है। सोने के लिए कह रही हूं। अभी नही सोएगा, तब शाम को परेशान करेगा।"
शौर्य बिस्तर छोड़ कर खड़ा हो गया "मैं जा रहा हूं।"
"कहां जा रहे हो?"
"मम्मी के पास।"
"मम्मी तो ऑफिस में है।"
"मैं मम्मी के ऑफिस चला जाऊंगा।"
"आपको मम्मी के ऑफिस का रास्ता नही मालूम।"
"मैंने मम्मी से बात करनी है।"
"फोन मिला दूं?"
"बिना फोन के बात करनी है।"
"बिना फोन के कैसे बात करोगे?"
"जब मम्मी आएगी, तब करंगा।"
"क्या बात करेगा?"
"आपकी शिकायत करनी है।"
"कौन सी?"
"आपने डांटा है।"
"शौर्य चुप कर सो जा। तेरे से बात करना भी डांट हो गई।"

शौर्य थका हुआ था, चिड़चिड़ाहट के अंतर्गत पांच मिनट में सो गया। दादी पोते का दोपहर का डेढ़-दो घंटे का आराम शाम के लिए स्फूर्ति भर देता है।

शाम के समय शौर्य अपने मित्रों के साथ पार्क में झूला झूलने और खेलने जाता है, उस बीच रीना संध्या-पूजा करके रात के डिनर का प्रबंध करती है। सात बजे पुत्रवधु, साढ़े सात आठ बजे पुत्र और सबसे देर से राकेश आते है, कभी साढ़े आठ तो कभी नौ बजे। राकेश का ऑफिस दूर है, अतः उसे आने में देर हो जाती है।

दादू को देखते ही शौर्य राकेश से चिपक जाता है।

"दादू आप देर से क्यों आए?"
"ऑफिस में थोड़ा जरूरी काम था, इसलिए देर हो गई।"
"थोड़ा था , ज्यादा नही था ?"

शौर्य की भोली चुलबुली बातें सुन कर राकेश की सारे दिन की थकान मिट जाती है। दोनों एक साथ डिनर करते है, फिर एक साथ बिस्तर पर लेटते हैं। जब तक दादू को नींद नही आती, तक तक शौर्य दादा से कहानियां सुनता है। पूरे दिन की थकान के कारण राकेश को साढ़े दस बजे नींद आने लगती है, तब शौर्य गुड नाईट कह कर अपने कमरे में जाता है।

"मुस्कुरा क्यों रहे हो? रीना ने पूछा।
"ऑफिस में हम उम्र और युवाओं के साथ माथा-पच्ची होती है और काम में थकान होती है, घर बच्चों के साथ एक घंटे में नई स्फूर्ति जाती है।"
"वो तो ठीक है, परन्तु सारा दिन मैं साथ होती हूं। आगे-पीछे घुमा कर थका देता है। अब सुनता नही है, अपनी बातों को मनवाता है। बात मानो तब रूठ जाता है, कहता है चला जाऊंगा।"
"कहां जाने की बात करता है?"
"मम्मी के ऑफिस जा कर मेरी शिकायत करेगा कि मैं डांटती हूं।"
"रीना छोटे बच्चों की भोली-भाली बातें मन को लुभाती हैं। अभी चार वर्ष का है। दो-तीन साल बाद पढ़ने में व्यस्त हो जाएगा। हमारे साथ कम समय बीतेगा। बच्चे बड़े हो जाते हैं, उनकी एक अगल दुनिया बनती जाती है, हम फिर बूढ़ा-बूढ़ी तनहा हो जाएंगे।"
"क्या करोगे तब?"
"रिटायर हो जाऊंगा, तब। जो प्रभु की इच्छा होगी।"
"क्या सोचा है तब के लिए?"
"क्या सोचे, जैसा समय आएगा, करते चलेंगे।"
"शाम की दहलीज पर मुझे संभाल लोगे।"
"पूरी ज़िन्दगी तुमने मेरे साथ कंधे से कंधे मिला कर साथ दिया है और संकट में, बुरे ख़राब समय में हिम्मत देकर मेरे डगमगाते मन को मजबूती दी और सर उठा कर संकट का सामना करने की राह दिखाई। तुम्हारा साथ है फिर मुझे कोई गम नही।"
"चलो कोई तो मेरी कद्र करता है।"
"हमेशा की है।"
"कोई और तो करता नही, हम एक दूसरे की करते है।"
"पति-पत्नी का प्रेम और समर्पण मझधार में पतवार का काम करता है।"
"इसका यह मतलब हुआ कि तुम मुझे नही संभालोगे। मुझे तुम्हारी सेवा करनी है।"
"यह सेवा नही, प्रेम होता है। पति-पत्नी के बीच आलौकिक प्रेम, जिसे सिर्फ पति पत्नी ही समझ सकते हैं।"
"यह दुनिया नही समझती।"
"दुनिया तो तमाशबीन है। उसे प्रेम, समर्पण नही लड़ाई का मसाला चाहिए। छोड़ो इन बातों को, अपना प्रेम और एक दूसरे के प्रति समर्पण रखना है।"

सांझ में प्रेम अधिक गाड़ा होता है। कह कर दोनों सो गए।
शाम की दहलीज पर पहुंच चुके रीना और राकेश का प्रेम उम्र के साथ बढ़ता गया।



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