Monday, August 01, 2016

कब्ज़ा


मुश्किल से अभी चार महीने भी नही हुए थे चमेली के देहांत को कि चमन पर एक और पहाड़ टूट पड़ा। तीन बच्चे चमन को सौंप कर चमेली इस दुनिया को अलविदा कह गई। छोटे-छोटे तीन बच्चे, छः से दस साल की उम्र के छोटे-छोटे बच्चे, कैसे पलेंगे, इस बात की चिंता पिछले चार मास से चमन को सता रही थी।

चमन रिक्शा चलाता है। पत्नी चमेली कुछ घर में बर्तन, झाड़ू का काम करती थी। दोनों मिल कर पन्द्रह-सोलह हजार रुपये कमा लेते थे। बच्चे सरकारी स्कूल में पढ़ते है, एक समय का खाना स्कूल में मिलता है, पढाई मुफ्त, किताबों, यूनिफार्म का भी खर्च नही। सब कुछ सरकार से मिलता है। पांच-छः हज़ार रुपये आराम से बचा लेते थे। चमन के रिश्तेदार भी आस-पास रहते थे। उन्होंने गाजियाबाद से आगे जमीन खरीदी। गांव तो साल में एक बार जाना होता है। दिल्ली में जमीन, मकानों के दाम आसमान को छू रहे है। गाजियाबाद से थोड़ा आगे सस्ती जमीन बिक रही थी। छोटे-छोटे प्लाट बिक रहे थे, चमन के रिश्तेदारों ने भी प्लाट ख़रीदे तो चमन ने भी एक बहुत छोटा सा प्लाट अपने लिए खरीद लिया। दाम बढेंगे तो बेच कर मुनाफा कमा लेंगे।

मस्त जिंदगी का सफर आराम से कट रहा था कि एक दिन सुन्दर सुहाना सपना टूट गया। चमेली उसे तीन बच्चों को सौंप कर दूसरे लोक चली गई। एक दिन बुखार हुआ, फिर वह उतरा नही। तेज बुखार होता गया, लगभग बेहोश हालात में अस्पताल भर्ती कराया। दिमाग में बुखार चढ़ने की वजह से चमेली चली गई। उन दिनों दिमाग के बुखार ने देश के कई हिस्सों में आफत मचा रखी थी। दिमागी बुखार की भेंट चढ़ गई चमेली।

पुरानी कहावत है, बढ़े बूढ़े सही कहते हैं कि सर मुंडाते ही ओले पड़े।
एक रात चमन सोने की तैयारी में था। बत्ती बुझाने ही वाला था कि उसके चचरे भाई आए।
"चमन तूने बताया ही नही कि प्लाट पर कमरा बनवा रहा है?" छोटे चचरे भाई ने पूछा।
"कहां का कमरा, पैसे ही नही हैं। चमेली के मरने पर काफी रकम खर्च हो गई। अब आमदनी भी आधी रह गई है। समय सोचने का भी नही है। कमरा कहां बनेगा। सोच रहा हूं कि बेच दूं प्लाट को।" चमन ने थोड़े निराशा वाले स्वर में कहा।
"चमन हम आज वहां गए थे अपने प्लाट देखने के लिए। तुम्हारे प्लाट पर चारदीवारी बन रही थी।" बड़े चचेरे भाई ने कहा।
"भाई तुम यह क्या कह रहो हो? मैं कुछ समझा नही। चमन अब परेशान हो गया।
"चमन अब तो रात हो गई है। कल सुबह प्लाट पर चलते हैं। तुम स्वयं देख लेना।" चमन के चचेरे भाइयों ने कहा।

रात में चमन की नींद उड़ गई। उसके दोनों चचेरे भाई तो सोते हुए खर्राटे मार रहे थे, परन्तु चमन सोच में पड़ गया कि क्या किसी ने प्लाट पर कब्ज़ा तो नही कर लिया। मेहनत से कमाया हुआ उसका पैसा है। वह किसी को प्लाट हड़पने नही देगा। इसी सोच में रात के दो बजे तक नींद नही आई, फिर थोड़ी देर के लिए नींद आई। सुबह पांच बजे चमन उठ कर जाने के लिए तैयार हो गया।

छः बजे चमन और उसके चचेरे भाई, तीनों प्लाट के लिए चल पड़े। साढ़े आठ बजे प्लाट पर पहुंचे। चमन ने प्लाट को देख कर माथा पकड़ लिया। प्लाट पर चारदीवारी बन रही थी। इंटे, सीमेंट, बदरपुर और रेता पड़ा था। आस-पास के प्लाट खाली थे। नई बस्ती थी, सभी प्लाट खाली थे। इक्का-दुक्का मकान बन रहे थे। इसलिए किसी को कुछ मालूम नही था कि कौन चमन के प्लाट पर मकान बना रहा है।

थोड़ी देर में मजदूर भी गए। चमन ने उनसे पूछताछ की। मजदूरों ने कहा कि उन्हें कुछ नही मालूम, किसका प्लाट है। ठेकेदार को मालूम होगा। चमन और उसके चचेरे भाइयों ने मजदूरों को काम नही करने दिया। पहले ठेकेदार आएगा कि उसकी हिम्मत कैसे हुई चमन के प्लाट पर कब्ज़ा करने की। उन्होंने मजदूरों को काम नही करने दिया।

जब मजदूरों को काम से रोका गया तब एक मजदूर ठेकेदार को बुला लाया। ठेकेदार ने आते ही मजदूरों पर रौब डालते हुए काम करते हुए कहा।

"कोई नही काम करेगा।" चमन ने चिल्लाते हुए कहा।
"तुम रोकने वाले कौन होते हो?" ठेकेदार ने चमन पर रौब डाला।
"यह मेरा प्लाट है। मेरे प्लाट में बिना मेरे से पूछे काम करने की हिम्मत कैसे हुई।"
"तुम्हारा प्लाट? कह कर ठेकेदार हंसा।
"हंसो मत वर्ना तुम्हारे दांत तोड़ दूंगा।" ठेकेदार को हंसता देख चमन को गुस्सा गया।
"हाथ लगा कर देख।" ठेकेदार ने जवाब दिया।
चमन और ठेकेदार के बीच बहस तेज होता देख चमन के दोनों चचेरे बीच में कूद पड़े। छोटा चचेरा भाई हट्टा-कट्टा पहलवान किस्म का था। उसने ठेकेदार की कमीज का कालर पकड़ लिया तब ठेकेदार शांत हुआ कि कहीं तीनो मिल कर उसे पीट दें। उसने कहा "मार-पीट कर तुम मुझे धमका नही सकते। जमीन का मालिक मैं हूं। मेरे पास सब कागज है।"

यह सुन कर चमन और उसके दोनों चचेरे भाइयों ने एक साथ कहा। "यह कैसे हो सकता है। कागज हमारे पास है। मालिक हम हैं। प्लाट की रजिस्ट्री करा कर रखी है।"
"रजिस्ट्री मेरे पास है।" ठेकेदार ने कहा

यह बात सुन कर चमन और उसके चचेरे भाइयों का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया। उनका गुस्सा देखकर ठेकेदार ने उनसे कहा कि प्लाट के कागज दिखाओ। उसके ऑफिस में जाओ, अभी कागज दिखा दूंगा।
चमन ने कहा "अभी दिखा दूंगा कागज, मेरे घर चल।"
ठेकेदार ने कहा "मेरे पास प्लाट के कागज हैं। मुझे कहीं जाने की जरुरत नहीं है। प्लाट पर कब्जा भी है। तुम्हारे पास जो है, लेकर आओ। दूध का दूध, पानी का पानी हो जाएगा।"

चमन खिन्न और व्याकुल मन से लौटने लगा। उसके छोटे चचेरे भाई ने कहा। "एक बार दलाल से मिलते हैं, जिसकी मार्फ़त हमने प्लाट लिया है। हम सब को उसी ने प्लाट दिलवाये हैं। हम तीन और हमारे मित्र, गांव वालों ने भी प्लाट लिए हैं। कम से कम तीस-पैंतीस प्लाट हम लोगों ने लिए हैं।"

तीनों दलाल के ऑफिस पहुंचे। दलाल का नाम सहरावत। ऑफिस के बाहर बोर्ड लगा था "सहरावत प्रोपर्टी डीलर्स"
ऑफिस में पहुंच कर औपचारिकता की बात हुई। चमन की बात सुन कर दलाल ने स्पष्ट किया कि इस विषय पर वह कुछ नही कर सकता। उसने सबको प्लाट दिलवाये पर अगर तुम प्लाट बेच दो, तब वह क्या कर सकता है।

चमन ने कहा "क्या बात कर रहो हो? प्लाट बेचने का ख्याल तो सपने में भी कभी नही आया। प्लाट बेचने का कोई प्रश्न ही नही उठता।"
"देखो चमन, मेरा काम है जमीन, प्लाट, मकान बिकवाने का। हम तो दलाल आदमी हैं। किसी को प्रॉपर्टी दिलवा देते है और किसी की बिकवा देते है।"
"मैंने प्लाट आपसे ख़रीदा था, बेचता तब आपके पास आता। मैने प्लाट ख़रीदा, अभी बेचा नही है।"
"मेरी मार्फ़त नही बेचा, तो किसी और की मार्फ़त बेचा होगा। मैं अकेला प्रॉपर्टी डीलर तो हूं नही। दर्जनों बैठें है। सभी यह काम करते हैं। मैं तुम्हारी मदद नही कर सकता। मुझे इस बारे में कुछ नही मालूम।" इतना कह कर सेहरावत कुर्सी से उठा और बोला "मुझे काम से जाना है। ऑफिस में कोई नही है। बंद करके जाऊंगा। तुम लोग भी जाओ।"

चमन और उसके चचेरे भाई ऑफिस से बाहर गए और सड़क किनारे बैठ कर सोचने लगे कि अब क्या करें। प्रॉपर्टी डीलर तो साफ़ मुकर गया। कुछ सोच विचार के बाद तीनों वापिस गए। कुछ बड़े-बूढ़े रिश्तेदारों से सलाह विमर्श किया।

एक बुजुर्ग ने बीड़ी का लंबा कश लगाते हुए कहा "चमन मुझे यह धोखा-धड़ी का मामला लगता है। अकसर समाचारपत्र में पढता हूं कि प्रॉपर्टी के मामलों में यह धोखा-धड़ी बहुत होती है। जिस स्थान की तुम लोग बात कर रहे हो, वहां की बहुत ख़बरें रही हैं कि एक प्लाट को दस-दस, बीस-बीस आदमियों को बेच देते हैं। सब प्लाट के कागज लेकर घूमते रहते हैं। जिसका कब्ज़ा, वही मालिक समझा जाता है। कब्ज़ा सच्चा, दावा झूठा। चमन के साथ तो धोखा हो गया, मैं तुम सब से कहता हूं कि अपने प्लाट पर मकान बना लें। कहीं ऐसा हो कि कल उनके प्लाट पर भी कब्ज़ा हो जाए।" बात समाप्त करके उसने फिर एक लंबा बीड़ी का कश लिया।

वृद्ध की बात सुन कर सन्नाटा छा गया। किसी को कुछ नही सूझा कि क्या किया जाए।
चमन ने कहा "चाचा, हमे तो कुछ सूझ नही रहा। आप ही हमारा मार्ग दर्शन करें।"
"देखो, पहले तो तुम सब जिन्होंने वहां प्लाट ले रखे हैं, सब मिल कर पुलिस के पास जाओ। हालांकि ऐसे काम पुलिस की मिली-भगत से होते हैं, फिर भी जब तुम सब मिल कर जाओगे, हो सकता है कि कुछ दबाव पढ़े और समस्या का समाधान मिले। एकता में बल है। यही सोच कर आगे बढ़ो।"

वृद्ध चाचा की बात सबके दिल-दिमाग में बैठ गई। सब एकमत हो गए। कुल छबीस लोगों ने प्लाट लिए थे। अगले दिन सभी छबीस जने पुलिस स्टेशन पहुंच गए। पुलिस उनकी बात सुन कर राजी नही थी। चमन रिपोर्ट लिखवाना चाहता था, परन्तु पुलिस ने उन सबको भगा दिया कि पहले प्लाट के कागज लेकर आएं कि वो नकली हैं या असली। कागजों की जांच होगी कि जो प्लाट पर मकान बना रहा है उसके कागज असली हैं या चमन के। पुलिस ने कह दिया कि यह रोज़ का किस्सा है। एक प्लाट के कागज दस-दस, बीस-बीस आदमी लेकर घूमते रहते हैं। पुलिस ने उनको धमका दिया।

प्रॉपर्टी डीलर सहरावत का ऑफिस बंद। जाएं तो कहां फरियाद करने जाएं। सभी छबीस जन डर गए कि कहीं उनके साथ भी धोखा हुआ हो। निराशा के साथ सभी वापिस गए और वृद्ध चाचा के पास मुंह लटका के बैठ गए।

"लगता है कि खाली हाथ वापिस गए।"

सभी ने व्यथा सुनाई। बात सुन कर वृद्ध चाचा ने कहा "बात गम्भीर है। मेरा शक सही निकला कि गड़बड़ घोटाला है। अभी तो चमन लपेटे में है, कल तुम भी सकते हो। सब कमर कस लो।"
"कुछ सुझाओ।" सभी एक स्वर में बोले।
"बीड़ी दो तुम लोग। मेरा बण्डल खत्म हो गया है।"
"चाचा बीड़ी की दुकान खोल देंगे। कुछ तो मार्ग दर्शन करो।"

चाचा की फरमाईश पर सात-आठ बीड़ी के बण्डल लोगों ने दिए। चाचा ने सभी बण्डल कुर्ते की जेब में डाले और एक बीड़ी सुलगाई। लंबा सा कश लगाया।

"चलो एक हफ्ते की बीड़ी तो हो गई। हां, अब सुनो। तुम सब लोग परिवार समेत, बीवी-बच्चों सहित जाओ। छोटे बच्चों को भी ले जाओ। जब सौ-डेढ़ सौ छोटे-बढे थाने में जाओगे, जरूर सुनवाई होगी। सब मिल कर प्रॉपर्टी डीलर सहरावत के ऑफिस के आगे डेरा जमा दो। उसके घर का पता लगाओ कि कहां है, वहां डेरा जमा कर धरना प्रदर्शन करो। वह परेशान होगा और खुद कुछ रास्ता देगा।"

सभी को वृद्ध चाचा का सुझाव पसंद आया।

"हां एक बात का ध्यान रखना कि इस काम में समय लग सकता है। एक-दो दिन का काम नहीं है।"

अगले दिन सुबह बीवी-बच्चों के साथ सभी प्रॉपर्टी डीलर सहरावत के ऑफिस के आगे धरने में बैठ गए। दस बजे दुकाने, ऑफिस खुलने लगे। सहरावत साढ़े दस के करीब कार से ऑफिस आया। ऑफिस के बाहर लगभग डेढ़ सौ लोगों को देख ठिठक गया। चेहरे जाने-पहचाने लगे। उन सभी को प्लाट बेचे थे। वह कार से उतरा ही नही और कार से कहीं और चला गया। जुटी भीड़ शोर-शराबा करने लगी, जिस कारण आसपास के दुकानदार और ऑफिस वाले परेशान हो गए। उन्होंने उन्हें वहां से जाने को कहा क्योंकि उनकी दुकानदारी ख़राब हो रही थी। सबने अपनी व्यथा सुनाई। सहरावत के घर का पता पड़ोस की दुकानदारों से मिला। अब दो टोलियां बन गई, आधे ऑफिस के बाहर बैठ गए और आधे घर के आगे पहुंच कर हंगामा करने लगे। अड़ोसी-पडोसी एकत्रित हो गए। सहरावत के बीवी-बच्चे लगभग सत्तर लोगों के समूह के आगे बेबस हो गए। महिलाएं और बच्चे घर के दरवाज़े पर आगे जम गए और पुरुष पीछे। एक घन्टे बाद सहरावत की बीवी और उसके बुजुर्ग माता-पिता परेशान हो गए। सहरावत को मज़बूरी में घर आना पढ़ा। ऑफिस और घर में जबरदस्त घिराव पर सहरावत चमन की बात सुनने को तैयार हो गया।

चमन और उसके साथियों के जबरदस्त दबाव पर सहरावत अपनी बीवी, बच्चों और बुजुर्ग माता-पिता के सामने कुछ कह सका कि उसी ने चमन का प्लाट दूसरे कागज तैयार करके बेचा है। उसने चमन और साथियों को मकान के आगे से हटने को कहा लेकिन वे नही हटे। उनकी मांग थी कि पहले समस्या का समाधान हो।  वृद्ध चाचा की बात उन्होंने अपने पल्ले बांध रखी थी कि एकता में बल है। अकेले काम नही करना क्योंकि हो सकता है की दूसरों के प्लाट भी नकली कागज के जरिए बिक सकते हैं।

चमन ने सबके साथ घोषणा की जो बात होगी, सबके सामने होगी। यह सब लोगों के हित की बात है। मेरे अकेले की बात नही है। सहरावत के बार बार अनुरोध पर भी अकेले एकान्त में बात करने के लिए कोई राजी नही हुआ।

सहरावत के प्लाट पर बात करने पर चमन और साथी राजी हो गए। आधे घर पर डटे रहे और आधे चमन के साथ प्लाट पर गए। तब तक प्लाट खरीदने वाली पार्टी भी प्लाट पर पहुंच गई। प्लाट के खरीददार ने पुलिस को फ़ोन किया। पुलिस के दो सिपाही और खरीदार ने चमन को डराने, धमकाने की कोशिश की, परन्तु चालीस आदमियों की एकता के आगे कुछ देर बाद मूक दर्शक बन गए और सुलह की बात करने लगे। चमन और उसके साथी सुलह के पक्ष में नही थे। उन्हें अपने दूसरे प्लॉटों की भी फ़िक्र थी। उन्होंने कह दिया कि कल सुबह से सब अपने प्लाट पर बैठ कर कब्ज़ा करेंगे कि कहीं उनपर भी कोई मकान बना दे।

सहरावत के ऑफिस के बाहर जो जन एकत्रित थे, वे वहां से पुलिस थाने पहुंच गए। पुलिस थाने में लगभग सवा सौ लोगों की भीड़ एकत्रित हो गई। सहरावत के घर पर भी तीस जने थे। पूरा दिन बीत गया, पूरी रात बीत गई। हंगामा समाप्त ही नही हो रहा था। बात कागज दिखाने पर अड़ गई। चमन ने कहा हम सभी छबीस लोग एक साथ कागज दिखाएंगे। पहले खरीदादर के कागज की जांच पड़ताल करो। जब खरीददार इस बात पर तैयार नही हुआ तब सब ने कहा कि एक हाथ लो, एक हाथ दो। कल सुबह सभी एक साथ कागज पुलिस को दिखाएंगे।

अगले दिन चमन का पूरा समूह पुलिस थाने पहुंच गया, परन्तु खरीददार और सहरावत नही आये। तीस लोगों का समूह सहरावत के घर पहुंच गया। हालांकि सहरावत बचने की कोशिश कर रहा था, वह सुबह घर से निकल गया था, परन्तु लोगों के हंगामे पर उसे घर आना पढ़ा। मोहल्ले में इज़्ज़त का सवाल हो गया। सहरावत पुलिस थाने पहुंचा और कबूल किया की चमन और उसके रिश्तेदारों को प्लाट उसी ने दिलवाये और चमन के प्लाट में जो मकान बन रहा है, पुलिस उसका बनना रुकवा सकती है।

थाने से पुलिस के दो सिपाही चमन के समूह के साथ प्लाट पर पहुंचे। वहां का नज़ारा ही अगल था। दो-तीन दिन पहले तक जिस प्लाट पर चार-दिवारी बन रही थी, वहां कुछ भी नही था। जितनी चार-दिवारी बनी थी, रातो-रात गिर चुकी थी। तो वहां कोई मजदूर था, कोई सामान और ही चार दिवारी। प्लाट एमदम सफाचट मैदान बना हुआ था। सब हैरान हो गए कि जहां चार-दिवारी बन रही थी, अब ऐसे लग रहा है कि कुछ हुआ ही नही। चमन के  चेहरे पर मुस्कान छा गई। सभी हर्सोउल्लास से झूम उठे।

"चमन तुम अपना प्लाट संभालो और बाकी लोग भी अपना-अपना प्लाट देख लो। कल से मेरी कोई गारंटी नही होगी। खुद स्वयं प्लाट संभालो।" कह कर सहरावत पुलिस के सिपाहियों के साथ कुछ दूर खड़ा हो गया। उसके चेहरे पर कुटिल मुस्कान थी। सिपाहियों की जेब उसने गर्म कर दी।

प्लाट पर कब्ज़ा करने के बाद चमन सबको कह रहा था "अब हमें थोड़े-थोड़े दिन बाद प्लाट पर नज़र रखनी पड़ेगी। बड़ी मुश्किल से कब्ज़ा मिला है। हर्सोउल्लास के साथ सब वापिस अपने घर लौट गए।

रात के समय सहरवात, खरीददार ठेकेदार  और पुलिस के अफसर क्लब में बैठ कर जाम पर जाम छलका रहे थे।
खरीददार ठेकेदार - "यार सहरावत, पार्टी को भनक कैसे लगी। तुम तो कह रहे थे, छान-बीन के बाद इस प्लाट को चुना था।"
"पक्की खबर थी मेरे पास। चमन की लुगाई मर गई थी और उसे अपना होश नही था। इसलिए उसका प्लाट चुना था कब्ज़े के लिए। साले के भाई ने देख लिया। अपने दूसरे भाई को प्लाट दिलवाने के लिए जगह दिखाने आया था और चमन को बता दिया। कोई बात नही, कभी-कभी हो जाता है। इनके प्लाट तो छोड़ दे, दूसरे पर कब्ज़ा कर लेंगे। चिंता किस बात की है।" सहरवात ने पेग पीते हुए कहा।

खरीददार ठेकेदार - "मुफ्त का खर्चा हो गया। मजदूरी, सामान।"
सहरवात - "छोड़ यार, दस-बीस हजार पर गमगीन हो रहा है। ले पी और गम छोड़।"
पुलिस के अफसर ने कहा "सालों ये तो मैंने बचा लिया कि चार-दिवारी रातों रात तुड़वा दी। अगर टीवी रिपोर्टर कोई जाता तब मुसीबत होती।"
सहरवात - "छोड़ो बात पुरानी। अब नई बात सोचो।"

सभी कुटिल मुस्कान के साथ शराब के पेग उठाते है। चियर्स।








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