Saturday, September 10, 2016

एक दूजे के लिए


तीन दिन की छुट्टी, 13 अगस्त दूसरे शनिवार की छुट्टी, 14 अगस्त को रविवार और फिर 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस की छुट्टी। एक दो दिन की और छुट्टी लीजिये और लंबे सफर का आनंद उठाने के लिए ऑफिस में हर दूसरा व्यक्ति पहले से तैयारी में व्यस्त था। छुट्टी मंजूर करवाना, ट्रैन, प्लेन या टैक्सी की बुकिंग, होटल की बुकिंग का चर्चा हर किसी की जुबान पर था, परन्तु अक्षय खामोश अपने काम में व्यस्त रहा। उसका कोई कार्यक्रम नही बना, कहीं भी आने-जाने का। घूमने के लिए रूपए पैसे की आवश्यकता होती है। जिसकी कमी के चलते अक्षय ने घर पर आराम करने की सोची। सोचा क्या, कोई दूसरा रास्ता ही नही। परिवार के साथ एक अच्छा समय बिताने के ऐसे सुनहरे अवसर कम ही आते हैं।

"लगता है कि तीन छुट्टी तुमने बिस्तर पर ही काटनी हैं।" अमृता ने रात को सोने के समय कहा।
"बाहर नही तो दिल्ली में तीन दिन घूम सकते है।" अक्षय ने अमृता के हाथों को अपने हाथों में ले कर कहा।
"बाहर किसी नई जगह जाना अच्छा लगता है। घर की चिंता नही होती। सुबह और शाम सिर्फ प्रफुल्लित मूड में प्रकृति के सुन्दर वातावरण में।"
"यहां भी हम सब चिन्ताएं छोड़ सकते हैं।"
"घर के काम, खाना बनाना तो पड़ेगा। बाहर यह चिंता भी नही होती।"
"चलो दो समय नही तो एक समय तो बाहर का खाना तो होगा ही।"
"मम्मी-पापा और दादाजी उनके लिए तो खाना बनेगा ही। बेफिक्री नही रहती, सुबह समय से उठना ही पड़ेगा नही तो चाय नही मिलेगी आपको। क्या मंजूर है?"
"जो जनाब की इच्छा, वही मंजूर है। अभी तो सोते हैं।"

अगली सुबह अक्षय और अमृता सो रहे थे। अक्षय और अमृता सो रहे थे। मम्मी-पापा सुबह साढ़े पांच बजे उठ गए थे। पापा की भी तीन दिन की छुट्टी थी। पापा बालकनी में समाचार पत्र पढ़ रहे थे। मम्मी पूजा करते हुए भजन गुनगुना रही थी।

जो प्रेम गली में आये नही,
प्रीतम का ठिकाना क्या जाने,
जिसने कभी प्रीत लगाई नही,
वह प्रेम निभाना क्या जाने,
जो प्रेम गली में आये नही,
प्रीतम का ठिकाना क्या जाने।

पूजा समाप्त करने के पश्चात मम्मी पापा के साथ बालकनी में बैठ गई तभी अक्षय-अमृता का पुत्र और उनका पौत्र शौर्य उठ कर गया और दादी के पास कुर्सी पर बैठ गया।
"दादी मैं गया।"
"शौर्य तुम्हे पता है कि दादू क्या कह रहे थे?"
"दादू क्या कह थे? बोलो।" शौर्य ने दादा से प्रश्न किया।
"मैं दादी को कह रहा था कि शौर्य जल्दी उठता तो उसके साथ पार्क जाता।"
"जापानी पार्क चलोगे, दादू?"
"शौर्य, आप कल सुबह जल्दी उठ जाना, फिर जापानी पार्क चलेंगे।"
"दादू, मैं तो आज पापा-मम्मी के साथ चिड़िया घर जा रहा हूं। मैंने वहां शेर देखना है।"

तीन दिन की छुट्टी में अक्षय और अमृता ने पूरी दिल्ली घूमने का कार्यक्रम बना रखा था। पहले दिन शौर्य की पसंद देख कर चिड़िया घर का कार्यक्रम बनाया। घर से दस बजे निकल कर ग्यारह बजे चिड़िया घर पहुंच गए। चिड़िया घर के अंदर घुसते ही शौर्य की प्रसन्नता की कोई सीमा नही थी। अभी तक शौर्य ने सिर्फ तस्वीरों और टीवी में देखे थे, आज सामने देख रहा है। शेर खास तौर पर सफ़ेद शेर देख कर शौर्य अति प्रसन्न हुआ। सफ़ेद शेर और शेरनी अपने दो छोटे बच्चों के साथ खेल रहे थे। शेर के छोटे बच्चे बिल्ली जैसे लगते हैं। शौर्य घर में बिल्लियों को देखता था। घर के बरामदे में अक्सर दो भूरे रंग की बिल्ली आती थी। शौर्य को सफ़ेद शेरों का अपने छोटे बच्चों के साथ खेलते देख बहुत अधिक आनंद रहा था। शेर देख लिया, उसने सब कुछ देख लिया। उसका चिड़िया घर आना सार्थक हो गया। शेर के बाद उसने जिराफ, गैंडा और दरियाई घोडा देखा। उसके बाद शौर्य थकने लगा तो अक्षय और अमृता चिड़िया घर से बाहर आये।

अगला पड़ाव पुराना किला था जो चिड़िया घर से सटा हुआ है। बोटिंग का लुत्फ़ उठाया। शौर्य पानी को अपने छोटे-छोटे हाथों में ले कर पापा-मम्मी पर उछालता। संपूर्ण मस्ती में औत-प्रौत शौर्य की शैतानियां बंद होने का नाम ही नही ले रही थी।

बोटिंग के पश्चात अक्षय और अमृता पुराना किला घूमने लगे। शौर्य की थकान देख दोनों एक स्थान पर बैठ गए। शौर्य को अमृता ने गौद में ले लिया। गौद में सर रखते ही शौर्य सो गया। अमृता ने अपना सर अक्षय के कंधे पर टिका दिया।

"अच्छा लगता है यहां कर। भाग-दौड़ से हट कर यह जगह अच्छी लगती है।" अक्षय ने अमृता के बालों में उंगलियां फिराते हुए कहा।
अमृता ने मुंदी आंखों के साथ जवाब दिया। "हूं शादी के बाद अक्सर आते थे।"
"हां फिर शौर्य के जन्म पर बाहर निकलना बंद हो गया।  छोटे बच्चे के साथ घूमना लगभग बंद हो जाता है।"
"शादी से पहले भी आते थे, यहां?"
"हां, अक्सर आया करते थे। पिकनिक के लिए, कभी लाइट एंड साउंड शो देखने।"
"मुझे तो कभी नही दिखाया?"
"आएंगे देखने।"
"उसके साथ भी आते थे?"
"किसके साथ?"
"उसके साथ, जिसके साथ तुम भाग जाना चाहते थे?"

यह सुन कर अक्षय का सारी आशिकी रफा-दफा हो गई। मोहब्बत का नशा उतर गया।
"अमृता, सारा रोमांटिक मूड खराब कर दिया। कहां से बात तुम्हारे दिमाग में गई।"
"बस गई तो गई।" शरारती अंदाज में अमृता ने कहा।
"शौर्य उठो, इंडिया गेट चलते है।" अक्षय ने हल्का सा शौर्य के गालों पर हाथ लगाया और शौर्य उठ गया।
"चलो पापा इंडिया गेट, मैंने वहां सोल्जर से हैंड शेक करना है।" शौर्य फटाफट खड़ा हो गया।
शौर्य के साथ इंडिया गेट पहले भी आये हुए थे। अमर जवान ज्योति पर खड़े सिपाहियों के साथ हाथ मिला कर बहुत ख़ुशी होती थी।

इंडिया गेट पहुंच कर सबसे पहले अमर जवान ज्योति गए। शौर्य ने जवानों से हाथ मिलाया। फोटो खिंचवाई और समीप चिल्ड्रन पार्क में झूलों का आनंद उठाया।

इंडिया गेट के लंबे लॉन पर हाथ में हाथ डाले अक्षय और अमृता रोमांटिक मूड में शरारती अंदाज में घूमते रहे। उनसे अधिक आनंद शौर्य ले रहा था। पार्क में घूमना, बोटिंग, झूले और सेना के जवानों के साथ फोटो खिंचवा कर सबसे अधिक आनंद शौर्य को आया। रात का खाना रेस्टॉरेंट में करने के पश्चात करीब दस बजे घर वापस आये। पूरे दिन की थकान के कारण तीनों जल्दी सो गए।

अगली सुबह रविवार के दिन अक्षय देर तक सोता रहा। शौर्य भी सो रहा था। अमृता की नींद खुली, सात बजे रहे थे। मन कर रहा था कि कुछ देर और आराम किया जाए परन्तु घडी जता रही थी कि उठने का समय है, अति शीघ्र बिस्तर को छोड़ा जाए। साढ़े सात अमृता उठी। आठ बजे अक्षय भी उठ गया।

चाय पीते हुए दोनों आज पिकनिक और घूमने का कार्यक्रम बना रहे थे कि अमृता की बहन का फोन आया।
"अमृता तूने अच्छा किया जो घर बैठ कर आराम कर रही है। हम तो परेशान हो गए।"
"क्या हो गया, जीजाजी से लड़ाई हो गई क्या?"
"होती हो अच्छा होता। मैं भी तेरी तरह घर पर आराम करती। पूछ मत, लगता है पूरी दिल्ली शिमला पहुंच गई। शिमला से पहले दस किलोमीटर का ट्रैफिक जाम लगा है। कार के पीछे कार। होटल बुक था पर होटल नही पहुंच सके। कार में ही रात गुजारी, अब होटल पहुंचे है। क्या घूमेंगे? सारा कार्यक्रम चौपट हो गया। बुखार चढ़ गया है। अब डॉक्टर को बुलाया है। दोनों की तबियत खराब है। छुटियों का सारा मजा किरकिरा हो गया। अमृता तू तो आराम कर।"

यह सुन अक्षय और अमृता ने अपने सभी दोस्तों और रिश्तेदारों को फोन किया जो छुटियों में पहाड़ों पर गए थे। कोई नैनीताल, कोई मसूरी, धर्मशाला और अन्य पहाड़ो पर गए और सभी दुखी ट्रैफिक के कारण। पहाड़ों की छोटी घुमावदार सड़कों ने दिल्ली की गाड़ियों के आगे घुटने टेक दिए। मुख्य पहाड़ से चार-पांच किलोमीटर दूर होटलों में रुकना पड़ा। हर जगह भीड़-भाड़। खाने के लिए रेस्टॉरेंट में एक-डेढ़ घंटे का इंतज़ार। तो मन पसंद खाना और मन पसंद होटल में जगह। जहां घूमने जाओ वहीँ धक्का-मुक्की। दिल्ली में जहां भीड़ कम रही, पहाड़ों पर बढ़ गई। कहीं चैन नही। सभी मित्रों और रिश्तेदारों ने अक्षय और अमृता के दिल्ली में रुकने के निर्णय को सही ठहराया।

"आज फिर किधर?" अक्षय ने अमृता से पूछा।
"आज वहां ले चलो, जहां उसके साथ जाते थे।

यह सुन कर अक्षय सुस्त पढ़ गया और नाराजगी जाहिर की। "अमृता यह कल से क्या हो गया है। पुराने किले में रोमांटिक पलों को विराम दे दिया और आज फिर से वही कहानी।"

"देखो नाराज मत होना। मैं तुम्हारी मनोदशा समझ सकती हूं। क्या कभी वो लड़की याद आती है?"
अक्षय बिस्तर पर लेट गया। "बैठो क्या सुनना चाहती हो?"
"अक्षय मुझे ये बातें जुबान पर नही लानी चाहिए थी, परन्तु कैसे आई, मैं खुद हैरान हूं। हमारी शादी को आज सात साल हो गए और तुमने थोड़े दिन बाद तुमने खुद ही उस लड़की के बारे में बताया था। किसी और मुख से बात पता चलती तब अवश्य थोड़ी नाराजगी होती कि अतीत छुपाया।"
"मुझे ऐसा लगता है कि तुम्हे इसका पता होना चाहिए था क्योंकि बलबीर चाचा को पूरी बात मालूम थी। बलबीर चाचा हमारे और तुम्हारे परिवार दोनों के रिश्ते में हैं।"
"मुझे लगता है कि बलबीर चाचा ने जरूर मेरे माता-पिता को बताई होगी, परन्तु मुझे कुछ नही बताया था और जब तुमने खुद मुझे बताया था तब मैं नाराज नही हुई थी।"
"फिर यह जिक्र क्यों?"
"अक्षय परसो बलबीर चाचा घर आए थे, उन्होंने पिताजी से इस विषय में बात की थी, इसलिए मैं पूछ बैठी।"
"अमृता लोग सुकून से रहने नही देते। पुरानी बातें को कुरेदते है। जिन बातों को हम भूल जाते हैं, लोग मजे ले कर बार बार जिक्र करते हैं और जीना दूभर कर देते हैं। जिन्हें हम भूलना चाहते है, लोग उतना याद करवाते हैं।"
"छोड़ो इन बातों को अक्षय। आज का कार्यक्रम बनाते है। कहां जाना है? अमृता ने बात संभालते हुए कहा।
"अमृता आज तुम बताओ, कहां जाना पसंद करोगी?"
"अक्षय मूवी देखें?"
"चलो मूवी देखते हैं। कौन सी देखें?"
"नजदीक के सिनेमा हॉल में चलते हैं। आज दूर नही चलते। कल काफी थकान हो गई थी। शाम के शो के बाद बाहर रेस्टॉरेंट में डिनर। दोपहर आराम करते है। आप भी सारा दिन ऑफिस में और छुट्टी वाले दिन घूमना। आज आराम अधिक।"

दोपहर में आराम करने के पश्चात अक्षय और अमृता मूवी देखने घर से निकले। मूवी हॉल पहुंच कर मूवी की टिकट लेने के लिए अक्षय लाइन में खड़ा हुआ। तीन-चार व्यक्ति अक्षय के आगे थे। अमृता और शौर्य अक्षय के समीप खड़े थे। तभी एक मोटी लड़की टिकट खिड़की पर सबसे आगे खड़ी हो कर टिकट लेने लगी तब लाइन में अक्षय के आगे खड़े व्यक्ति ने उस लड़की से कहा "मैडम प्लीज लाइन में आइये।" चिढ़ कर वह लड़की लाइन में खड़ी हो गई। अक्षय ने उस लड़की की तरफ कोई विशेष ध्यान नही दिया। अमृता ने उसको ऊपर से नीचे तक देखा। रंग गोरा, लम्बा कद और मोटी। बड़े बेहूदा से कपडे पहने थे उसने। अमृता के मांप दंड के हिसाब से वह लड़की अपने कपड़ों के हिसाब से बेहूदा लग रही थी। वह लड़की खुद को बहुत खूबसूरत समझ रही थी। बार बार बालों की एक खास अंदाज से झटक रही थी।

टिकट लेने के बाद अक्षय मूवी देखने के लिए अंदर गई। वह लड़की भी अपने साथियों के साथ मूवी देखने अंदर गई। अमृता उस लड़की पर नजर रखे हुए थी और अक्षय को उसे देखने को कहा। अक्षय ने उस पर नजर डाली, कुछ पल देखा और मूवी हॉल के अंदर चलने के लिए अमृता को कहा।

"अमृता, अंदर चलते हैं।"
हॉल के अंदर सीट पर बैठ कर अक्षय ने अमृता को कहा। "यह वही लड़की है जिस की तुम पूछताछ कर रही थी।"
अब अमृता ने उस लड़की तो तलाशा। वह तीन पंक्तिया पीछे बैठी थी।
शौर्य पहली बार मूवी हॉल आया था। वह बहुत अधिक प्रसन्न था। "मम्मी यहां तो बहुत बड़ा टीवी है।" उसकी बात सुन कर साथ की सीट पर बैठा जोड़ा भी हंस दिया।

मूवी देखने के बाद रेस्टॉरेंट में खाना खा रहे थे, उसी रेस्टॉरेंट में वही लड़की भी आई। उसने एक नज़र अक्षय पर डाली और तीन टेबल दूर बैठी। मुड़ मुड़ कर वह अक्षय को देख रही थी।

अक्षय ने आर्डर किया और अमृता और शौर्य से बातें कर रहा था। इतने में वह लड़की अक्षय की टेबल पर आई और अक्षय की ओर हाथ बढ़ाते हुए कहा "हेलो, अक्षय।"

उसका हाथ बड़ा देख अक्षय ने हाथ मिलाया। "हेलो उर्वशी, कैसी हो? इनसे मिलो, मेरी पत्नी अमृता और बेटा शौर्य।"
उर्वशी ने अमृता से हाथ मिलाया और फिर शौर्य से। शौर्य ने उर्वशी से हाथ मिला कर पूछा। "आंटी, आपका क्या नाम है?
"पहले अपना नाम बताओ।"
"आंटी मेरा नाम शौर्य है। अब अपना बताओ।"
"मेरा नाम उर्वशी है।" कह कर उर्वशी ने अपने पति को बुला कर अक्षय से परिचय कराया। उसका पति भी मोटा था। अमीर लग रहा था, बिलकुल लाला की तरह। फ़िलहाल तो दोनों मोटे, जोड़ी बराबर की लग रही थी। उर्वशी ने अक्षय के बारे में अपने पति को बताया कि कॉलेज में एक दम हसीन, खूबसूरत, हैंडसम और पढ़ने में बहुत होशियार था।
"आज भी आप खूबसूरत लग रहे है। उर्वशी जब इतनी तारीफ कर रही है तब तो आप कॉलेज में छाए रहते होंगे।" उसके पति ने अक्षय से हाथ मिलाते हुए कहा।
"उर्वशी कुछ अधिक ही तारीफ कर रही है, ऐसा कुछ भी नही है। बैठिये , क्या लेंगे। अभी आर्डर करते हैं।"
"अक्षय तुम डिनर का आनंद लो। हमने आर्डर किया है। साथ में रिश्तेदार है। कनाडा से आए हैं। रिश्तेदार भी हैं और बिजनेस पार्टनर भी।" बाय कह कर उर्वशी और उसका पति ने रुक्सत ली।
उनके जाने के बाद अमृता ने पूछा। "इस मोटी के पीछे दीवाने थे?"
"कॉलेज में तो एक दम स्लिम ट्रिम थी और साथ में लंबा कद, गोरा रंग, खुद सोचो कि कैसी रही होगी। जो देखता था, देखता रह जाता था। आज लगभग सात-आठ वर्ष बाद मिले, इतनी मोटी हो गई। बिलकुल लाला की लाली बन गई है। अभी डिनर करते हैं। घर चल कर बताता हूं पूरी कहानी, जो तुम दो दिन से पूछ रही थी।"
"वो तो बलबीर अंकल ने बात छेड़ी थी, तभी उत्सुकता हुई।"

डिनर करने के पश्चात अक्षय और अमृता घर जाने के लिए टेबल से उठे। उनको उठते देख उर्वशी उनके पास आई।
"अक्षय, आज मुद्दत के बाद मिले हैं, कहां रह रहे हो।"
"रोहिणी में, और तुम।"
"वसंत कुंज। अच्छा अपना नंबर बताओ।"
अक्षय ने अपना मोबाइल नंबर दिया और पलट कर उर्वशी ने उसके मोबाइल पर मिस काल दी। "मेरा नंबर, बात करते रहा करो।"
"क्या बात है, बड़ी आत्मीयता टपक रही है। लगता है पुराना प्रेम फिर से जागृत हो रहा है?"
"मतलब ही नही। मेरे और उसके बीच रुपए, पैसे की एक पट सकने वाली खाई है। अब इसका तो कोई अर्थ है और बिलकुल नामुमकिन है।"
"फिर फोन नंबर?"
"पड़ा रहेगा फोन में, एक नंबर और सही, चलो घर चलें।"

अक्षय और अमृता डिनर के बाद घर गए। शौर्य के सोने के बाद अक्षय ने अमृता को बताया।
"अमृता बात आरम्भ करता हूं अपने कॉलेज के दिनों से। उर्वशी मेरी क्लास में पड़ती थी। आज की और कॉलेज की उर्वशी में यक़ीनन जमीन-आसमान का अंतर है। ऊंचा कद के साथ गोरा रंग और तीखे नैन-नक्श आज भी है, परन्तु वह बहुत मोटी हो गई है, जिस कारण वह भद्दी लग रही थी। कॉलेज के दिनों में वह बेहद खूबसूरत लगती थी। ऊंचे कद और खूबसूरती के कारण सभी लड़कों की पसंद थी। पहले दो वर्ष तो कोई खास दोस्ती उसके साथ नही थी। उसके साथ दोस्ती कॉलेज के अंतिम वर्ष में हुई। हुआ यूं कि कॉलेज के दूसरे वर्ष मेरे नंबर बहुत अच्छे आये, जिस कारण मेरे मित्रों की संख्या बढ़ गई। मित्रों में उर्वशी भी सम्मलित थी। कब उसके साथ घनिष्ठ मित्रता हुई, मालूम भी नही चला। तुम्हे मालूम है कि हमारा परिवार मध्य-वर्गीय लेकिन उसका परिवार अमीर था।

कॉलेज की पढाई के बाद मेरी नौकरी लग गई। उर्वशी के परिवार ने उसके लिए रिश्ता देखना शुरू किया। उर्वशी ने मेरे साथ विवाह का प्रस्ताव रखा। मेरा परिवार को आपत्ति थी उसके अमीर होने की। माताजी-पिताजी का सोचना था कि अमीर घर की लड़की शादी के बाद परिवार में संतुलन नही बना सकेगी, कहीं मैं घर जवाई बन जाऊं या अलग घर बसा लूं। उसका परिवार भी विवाह को राजी नही हुआ कि विवाह तो हैसियत के मुताबिक होना चाहिए। उर्वशी के परिवार ने उसका रिश्ता पक्का कर दिया एक अमिर परिवार में। हमारे मित्रों ने कोर्ट मैरिज करने की सलाह दी। हमने कोर्ट मैरिज के लिए आवेदन किया, परंतु कोर्ट की तारीख से एक दिन पहले दादाजी की तबियत बहुत बिगाड़ गई। रात के समय अस्पताल ले कर जाना पड़ा। अगले दिन पिताजी के साथ अस्पताल में, डॉक्टरों के आगे-पीछे ही पूरे दो दिन बीत गए। मैं चाह कर भी कोर्ट नहीं जा सका।

इस कारण उर्वशी नाराज हो गई। मैंने उसे दूसरी तारीख पर विवाह की बात कि, परंतु वह नाराज हो गई कि अब यह हालत है तब शादी के बाद भी मैं अपने परिवार की इच्छाओं की पूर्ति करता रहूंगा। क्या उर्वशी के लिए समय निकाल सकूंगा? इस कारण उसने मेरे साथ शादी नही की और उस युवक के साथ सात फेरे लिए जहां उसका परिवार चाहता था।"

कह कर अक्षय चुप हो गया।
"यही लड़का होगा?" अमृता ने पूछा।
"हो सकता है। मुझे इस बारे में अधिक जानकारी नही है।"
"फिर कभी मिले?"
"उस दिन के बाद आज मिले हैं।"

अक्षय और अमृता का वार्तालाप संपन्न हुआ। अमृता सोचती रही कि उसका अक्षय के साथ विवाह परिवार की रजामंदी से हुआ। अक्षय ने पूरा प्यार दिया है अब तक। पति का पूरा कर्तव्य निभाया है। उसे अक्षय से कोई शिकायत नही।

"क्या सोच रही हो?" अक्षय ने अमृता से पूछा।


जवाब में अमृता के होंठ अक्षय के होंठो से जुड़ गए और दोनों आलिंगन में बंध गए। अक्षय और अमृता सिर्फ एक दूजे के लिए।
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जगमग

दिये जलें जगमग दूर करें अंधियारा अमावस की रात बने पूनम रात यह भव्य दिवस देता खुशियां अनेक सबको होता इंतजार ...