Monday, October 24, 2016

अंतिम संस्कार


सुबह के छः बजे कार सफाई वाले कारों को धो रहे थे और साफ़ कर रहे थे। वीणा की कर्कश आवाज गूंजी। " कार को अंदर से साफ़ कर। कल भी अंदर से साफ़ नही की थी।"
उधर से कार साफ़ करने वाले ने जवाब दिया "अंदर से कार सप्ताह में एक बार करते हैं।"
"जबान लड़ाता है। सोसाइटी में रहने नही दूंगी। कार की चाबी ले कर जा।"

कार साफ़ करने वाले ने इनकार कर दिया। वीणा दनदनाती हुई फ्लैट के अंदर गई और पति विकास से उलझ पड़ी। "सारे निकम्मे हैं। सबको सोसाइटी से बाहर करवा दूंगी।"
विकास ने वीणा से भी अधिक गर्मी दिखाई "अभी साले प्रेजिडेंट की खाट खड़ी करता हूं। सारे कार सफाई वालों को सोसाइटी से बाहर करवाता हूं।"

थोड़ी देर में सफाई वाली महरी आई। उस पर भी वीणा भड़क गई। "देर से क्यों आई है। काम करना है या नही?"
आजकल काम करने वाले किसी की धौंस नही सहते। हमें महरी नही मिलती, परन्तु उन्हें काम की कोई कमी नही। एक घर छूटा, दस घर वाले उसके आगे पीछे होते हैं।
तपाक से महरी ने बोल दिया। "बीवी जी, कौन सी देर हुई है, जो इतना बोल रही हो।"
"जबान लड़ाती है मेरे से, सोसाइटी में काम करना है या नही। अभी बाहर करवा दूंगी।" वीणा ने कर्कश आवाज में कहा।

इतना सुनते ही महरी उठ खड़ी हो गई और वीणा से बोली। "मुझे फालतू बात करने की आदत नही है। बता दो, काम करुं या जाऊं? हां एक बात कान खोल कर सुन लो, काम नही करवाना तो तुरन्त हिसाब कर दो। पैसे मेरे हाथ में रखो, ताकि मैं जाऊं।"

वीणा को शायद इस बात की उम्मीद नही थी कि महरी काम छोड़ने को तुरन्त तैयार हो जाएगी। तमतमाती हुई कमरे में चली गई। "चल चल काम कर, बड़ी आई बहस करने वाली।"
"बीबी तुम्हारी बातों से मेरा सर दर्द करने लगा है, पहले कड़क चाय पिलाओ, फिर काम शुरू होगा।"

मोहन का फ्लैट एक दम साथ वाला। सांझी दीवार, ऊंची आवाज में बोलो, पडोसी सब सुनते हैं। सुबह से मोहन बालकनी में बैठा हुआ वीणा की चिकचिक सुन रहा था। मोहन अंदर कमरे में गया, तब तक मीना स्नान करके गई थी और बाल सुखा रही थी।
"मधुर वाणी सुन आए।"
"कौन सी?"
"वीणा की मधुर वाणी और किसकी? बाथरूम में पूरी आवाजें आती है। ढंग से नहाने नही दिया।"
"अखबार नही पढ़ने दिया। रविवार की छुट्टी वाले दिन की सुबह खराब कर दी।"
"मालूम नही दोनों में इतनी कलफ क्यों लगी हुई है कि हर किसी पर धौंस जमाते फिरते हैं।"
"मुझे लगता है कि तेजाब में नहाते है, इसलिए लड़ाई परमो धर्म है इनके लिए।"
"छोड़ो इन बातों को, अपने काम में लगें।'
दस बजे मोहन और मीना नाश्ता कर रहे थे कि फ्लैट के नीचे से शोर सुनाई दिया।
"मोहन देखो इतनी आवाजें कहां से रही हैं।"

मोहन नाश्ते की प्लेट हाथ में लिए बालकनी में गया। नीचे देखा, वहां वीणा और विकास सोसाइटी के पदाधिकारियों के साथ वाद विवाद में उलझे हुए थे। मोहन ने मीना को कहा कि नाश्ता बालकनी में ले आए। नीचे फिल्म चल रही है। मीना भी बालकनी में आती है। दोनों बालकनी में खड़े-खड़े नाश्ता करते हुए नीचे वीणा और विकास के वाद विवाद का आनंद लेने लगे। शोर सुन कर आसपास के फ्लैट में रहने वाले भी अपनी-अपनी बालकनी में खड़े हो कर तमाशा देखने लगे।

हंगामे का मुद्दा था विकास-वीणा की कार के पीछे किसी की कार खड़ी थी और सोसाइटी के गार्ड को नही मालूम था कि वह कार किसकी है। सोसाइटी निवासी की कार नही थी, क्योंकि सोसाइटी में रहने वाले हर व्यक्ति की कार का नंबर रजिस्टर में अंकित है। यह कार बाहर के किसी व्यक्ति की है जो सोसाइटी में किसी से मिलने आया है और गार्ड ने उसकी एंट्री रजिस्टर में नही की है।

विकास और वीणा तेज कर्कश आवाज में बोल रहे थे कि यह सोसाइटी रहने लायक नही है, निकम्मे गार्डों को सैलरी दी जा रही है जो अपनी ड्यूटी नही देते। दिन में सोते रहते हैं। कौन रहा है किसी को नही पता। ऐसे तो कोई चोर, उचक्का, डाकू कोई भी किसी के घर घुस सकता है। मैनेजमेंट क्या कर रही है। हम तो यहां के फंस गए है। आज कोई एक करोड़ रूपए दे, हम तो तुरन्त फ्लैट बेच के चले जाएं।

सोसाइटी के प्रेजिडेंट ने बोल दिया कि विकास जी फ्लैट तो सवा करोड़ के बीच में बिके है। आप रहें या बेचें, यह तो आप की मर्जी है। हम क्या कर सकते हैं।

विकास चिल्लाने लगा कि उसने क्या करना है, उसे पता है, कोई बताए नही। वह आज से मेंटेनेंस नही देगा।
झगड़ा बढ़ने लगा, एकत्रित लोग हटने लगे। मोहन और मीना भी हंसते हुए अंदर कमरे में चले गए।

"मीना इन दोनों की लगता है कि जब तक किसी से उलझे नही, रोटी हजम नही होती।"
"धौंस ऐसी देते हैं कि एक करोड़ कोई दे दे तो फ्लैट बेच देंगे। पिछले महीने सवा करोड़ में फ्लैट बिका है। मना किसने किया है, बेच कर निकल जाएं।"
"मीना इन्होंने कहीं नही जाना। हमारी मुसीबत यह है कि साथ वाला फ्लैट है। दिमाग खराब हो जाता है इनकी हर रोज कर्कश आवाजें सुन कर।"
"मोहन छोड़ो इनकी बातें। अपना रविवार खराब हो जाएगा। चलो थोड़ा आराम कर लें।"

मोहन सुबह छः बजे उठ कर बालकनी में चाय का आनंद हर रोज लेता है। वीणा और विकास नियमित रूप से उसी समय सैर करने पार्क जाते है। सुबह छः बजे विकास सफ़ेद कमीज, सफ़ेद पैंट और सफ़ेद जूते पहन कर सैर पर निकलता था और वीणा काले रंग की सलवार-कमीज के साथ काले रंग के स्पोर्ट्स शूज। विकास सदा चुस्त सफ़ेद परिधान में और वीणा सदा चुस्त काले परिधान में सैर करने जाते। मोहन और मीना उनको देख कर हमेशा सोचते कि वे सैर पर जा रहे है या किसी पार्टी में। वे पीछे पार्क में सैर करने के लिए कार में जाते, यदि गलती से किसी की कार उनकी कार के पीछे लगी होती तब तो किसी की खैर नही होती थी, खास तौर पर उसकी जिसकी कार होती थी। कर्कश आवाज में उसकी मां-बहन एक हो जाती थी।
विकास और वीणा के झगड़ालू स्वभाव के कारण मोहन और मीना के उनके साथ कोई सम्बन्ध नही थे।
"मीना फ्लैट तो अपनी पसंद का ख़रीदा था परन्तु पडोसी मन पसंद के नही मिले।"
"मोहन बस सब संजोगों की बात है।"

मोहन और मीना की तरह दूसरे पड़ोसियों से भी विकास और वीणा की कोई बोलचाल नही थी। विकास का व्यापार बहुत अच्छा था और आमदनी बेशुमार। वीणा घर बैठ ऑनलाइन ट्रेडिंग करती थी। कमाऊ वीणा मीना जैसी गृहिणियों से बात करना अपनी तौहीन समझती थी। विकास और वीणा के तीन बच्चे भी है। मां-बाप की तरह वे भी आस-पड़ोस के बच्चों के साथ किसी किस्म की मित्रता नही रखते थे। उनके पास खानदानी गहने और मंहगी कलाकृतियां थी, जिस कारण वे अपने को दूसरों से श्रेष्ठ मानते थे।

क्योंकि मोहन का फ्लैट विकास के बराबर वाला था और मोहन के बैडरूम की दीवार विकास के बैडरूम से मिलती थी। रात को तेज आवाज में न्यूज़ चैनल विकास और वीणा देखते थे और तेज आवाज में न्यूज़ पर टिपण्णी करते थे। मोहन सुबह आठ बजे ऑफिस के लिये जाता और रात आठ बजे वापस आता। रात को साढ़े दस बजे तक सोने की आदत थी, परन्तु विकास और वीणा की तेज आवाज में न्यूज़ पर बहस के कारण उसकी नींद उखड जाती थी।
एक रात विकास और वीणा अपने बच्चों पर बुरी तरफ से नाराज हो गए और डांटने लगी। बच्चे भी बहस करने लगे। मोहन और मीना बालकनी में खड़े हो गए, उन्होंने देखा कि कुछ और पडोसी भी शोर सुन कर घरों की बालकनी में गए। विकास और वीणा की लगता है कि बच्चों से हाथा पाई हो गई। बहस का मुद्दा निकला कि बच्चे टीवी में बिग बॉस नही देखेंगे। बिग बॉस कार्यक्रम बेहूदा है। लेकिन बच्चे उसे देखने की ज़िद पर थे। उनके क्या, सब के बच्चों की पहली पसन्द ही बिग बॉस कार्यक्रम है। बच्चों के साथ झगड़े में विकास के दिमाग की गर्मी सातवे आसमान पर पहुंच गई। विकास टीवी को बालकनी में ले आया और धड़ाम से नीचे फेंक दिया। टीवी के पुर्जे खुरजे तितर-बितर हो गए। टीवी को फेंकते देख मोहन और मीना फ़ौरन कमरे में गए और एक साथ उनके मुंह से निकला।

"बाप रे बाप बहुत गर्मी है दोनों के दिमाग में। बच्चों से भी झगड़ा। हर बच्चा बिग बॉस देखता है। आराम से बैठ कर बच्चों को समझाया जा सकता है। जब बच्चे कॉलेज जाने लगे तब उन पर अंकुश उचित नही। इस उम्र में उनका मार्ग दर्शन किया जाता है, जोर जबरदस्ती नही।"

दिन बीतते गए। हर व्यक्ति अपने में व्यस्त होता है फिर भी विकास और वीणा का जिक्र मोहन और मीना की वार्तालाप में ही जाता था, क्योंकि हर सुबह मोहन ने छः बजे चाय पीनी है और विकास-वीणा ने सैर पर जाना है। मोहन उनको सैर पर जाता देखता। दोनों किसी किसी से उलझते और मोहन का ध्यान उधर जाता और रात को न्यूज़ के साथ विशेषक विकास-वीणा की टिपण्णी भी सुनने को मिल जाती।

इधर कुछ दिनों से विकास और वीणा का सुबह की सैर पर जाना कम हो गया। मोहन को दोनों सुबह की सैर पर जाते नही दिखाई दिए और रात में टीवी की आवाज भी लगभग बंद हो गई। न्यूज़ पर टिपण्णी भी बंद हो गई।
"मीना आजकल न्यूज़ और टिपण्णी बंद हो गई है। कुछ अजीब सा लग रहा है। रात के खाने को पचाने में चूर्ण का काम करती थी।"
"मोहन मुझे लगता है कि विकास की तबियत ठीक नही है। तीन चार दिन पहले दोपहर के समय मैं मार्किट से घर का सामान खरीद कर वापस रही थी तब विकास कार से उतर रहा था। कमजोर लग रहा था और वीणा का हाथ पकड़ कर धीरे-धीरे चल रहा था।"
मीना की बात सुन कर मोहन ने कहा "झगड़ालू व्यक्ति से उसकी तबियत का हालचाल भी पूछने में भी डर लगता है, कहीं झगड़ा करने बैठ जाए।"

दो दिन बाद मोहन जब ऑफिस से वापिस आया तब विकास और वीणा के फ्लैट के आगे जमघट लगा था। कुछ पड़ोसियों के साथ मीना भी खड़ी थी। बहुत शोर मचा हुआ था। एक बूढ़ी महिला और वीणा के बीच खूब बहस हो रही थी। बूढ़ी महिला फ्लैट के गेट पर बैठी हुई थी, वह अंदर जाना चाहती थी परन्तु वीणा उसे फ्लैट के अंदर नही जाने दे रही थी।
"मेरा बेटा है, मैंने उससे मिलना है। उसे इस हालत में नही छोड़ सकती।" बूढी महिला ने कहा।
"कोई जरुरत नही है मिलने की। आज याद आई है, जब बेटा मर रहा है। पहले क्यों नही आई?" वीणा एक सिपाही की तरह फ्लैट के दरवाजे पर खड़ी थी।
"तू बता कौन सी तेरी मां मिलने आई है?"
"मेरी मां को बीच में मत घसीट।"
मीना मोहन को देख उसके समीप आई।
" गए।"
"हां, क्या बात है। शोर क्यों है?"
"घर चलो। बताती हूं।"

मीना ने मोहन को वहां रुकने नही दिया और दोनों अपने फ्लैट में गए। मीना ने मोहन को बताया कि दो घंटे से तमाशा हो रहा है। बूढ़ी विकास की मां है जो विकास के बड़े भाई के साथ रहती है। विकास की मां के साथ उसका भाई, भाभी, बहन और जीजा भी हैं। वो सब विकास से मिलना चाहते हैं परन्तु वीणा उनको मिलने नही दे रही है। इनके घर के अनेक झगडे और लफड़े हैं। एक दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं। आरोपों के बीच कीचड ही उछल रहा है। मेरा तो सर चकरा रहा है। गन्दी और भद्दी गालियां भी एक दूसरे को निकाल रहे हैं। परन्तु एक बात स्पष्ट है कि विकास को कैंसर है जो बहुत देर से इनको मालूम पड़ा। कैंसर की बीमारी के कारण ही विकास लगभग अधमरा सा हो रखा है। एक दूसरे की शक्ल नही देख सकते।

"मीना यह कैसी ज़िन्दगी है कि उन दोनों की किसी से भी मित्रता नही है, पड़ोसियों से और ही रिश्तेदारों से, लेकिन सब पर अपना दबदबा चाहते हैं। सोसाइटी में किसी से नही बनी और रिश्तेदारों से। हर व्यक्ति कम से कम दो चार दोस्त, रिश्तेदार या पडोसी से घनिष्ठता रखता है।"
"हां मोहन, सुख में तो सब रिश्तेदार एकत्रित हो जाते हैं परन्तु दुःख में सबसे पहले पडोसी काम आता है। मित्र और रिश्तेदार को दुःख के समय पहुंचने में समय चाहिए। पडोसी तो तुरन्त हाज़िर हो जाता है।"

समय बीतता गया। विकास और वीणा की अकड़ वैसी बरक़रार रही। मोहन और मीना अपनी ज़िन्दगी में व्यस्त रहे। विकास कैंसर की बीमारी से लड़ रहा था परन्तु उसकी लड़ाई सफल नही रही। एक रोज़ मौत ने विकास को मात दे दी।

रात के लगभग ढाई बजे थे। मीना ने मोहन को नींद से जगाया। आंखें मलता हुआ मोहन उठा और घडी देखी।
"क्या हुआ, ढाई बजे उठाया। तबियत तो ठीक है?"
"सुनो आवाजे रही हैं। लगता है साथ वाले फ्लैट से रही हैं।"
मोहन उठ कर कमरे की खिड़की खोलता है और खिड़की से सट कर सुनने की कोशिश करता है कि आवाजे कहां से रही हैं।
"मीना आवाजे तो विकास के फ्लैट से आती प्रतीत हो रही हैं। बालकनी में जा कर स्पस्ट होगा।"

मीना और मोहन बालकनी में जाते हैं। आवाज वीणा की थी हो रो रही थी। उसके बच्चे कह रहे थे पापा कुछ तो बोलो।"
इतना सुन कर मोहन और मीना कमरे में वापस आते हैं।
"मीना लगता है कि विकास चल बसा।"
"क्या करें?" मीना ने पूछा।
"इस समय तो हम कुछ नही कर सकते क्योंकि हमारी बोलचाल तो है नही। सुबह चलेंगे।"

दोनों बिस्तर पर लेटते है परन्तु नींद नही आती है। चाहे विकास से कोई बातचीत नही थी फिर भी ऐसे मौके पर उनके साथ होना चाहिए। दुःख की घडी में हौसला देना उनका कर्तव्य बनता है।

सुबह छः बजे मोहन और मीना विकास के फ्लैट पर जाते हैं। जैसा की उनका अनुमान था, विकास परलोक सिधार चुका था। विकास का मृत शरीर पड़ा था। वीणा, उसके तीन बच्चे समीप बैठे थे। रोने के कारण उन सबकी आंखें सूजी हुई थी। मोहन और मीना ने सांत्वना प्रकट की। दस मिनट बाद वीणा की बहन और बहनोई आते हैं। उनके आने पर मोहन और मीना वापस चले जाते हैं।

मोहन ऑफिस जाने की तैयारी कर रहा था और मीना रसोई में मोहन का नाश्ता बना रही थी और लंच का टिफ़िन पैक कर रही थी तभी कॉल बेल बजी। मोहन ने दरवाजा खोला। वीणा के बहनोई दरवाजे पर खड़े थे। मोहन ने उन्हें अंदर आने को कहा।

"भाई साहब मैं तो नोएडा में रहता हूं। मुझे यहां की दुकानों का पता नही। विकास का अंतिम संस्कार करना है। सामान कहां मिलता है?" वीणा के बहनोई ने कहा।
"सेक्टर एक में दुकान है, वहां अंतिम संस्कार का सब सामान मिलता है।" मोहन को दुकान का पता मालूम था। उसने बताया।
"भाई साहब मेरे साथ चलेंगे। सामान ले आते हैं उसके बाद श्मशान घाट भी जाना है।"

मोहन ने मीना की ओर देखा। मीना कुछ नही बोली, सिर्फ सर झुका कर मौन स्वीकृति दी। मोहन सोच रहा है कि जिस पड़ोसी से कभी बात नही हुई इस डर से कहीं कोई झगड़ा हो जाए, आज उसी के अंतिम संस्कार का सामान खरीदने जा रहा है। क्या प्रकृति का नियम है। इस मौके पर मना भी नही किया जा सकता। जाने, आने और सामान खरीदने में एक घंटा लग गया।

वीणा के घर सिर्फ उसकी बहन-बहनोई ही आए। आम तौर में नजदीकी रिश्तेदार एकत्रित हो जाते है। विकास के भाई-बहन और मां भी नदारत थी। मोहन घर जाने लगा तब वीणा ने रोक लिया।
"भाई साहब विकास का अंतिम संस्कार करना है। आप करवा दीजिये।"

मोहन इतना सुन कर सन्न रह गया। कुछ पलों के लिए उसकी सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई। जिस व्यक्ति से दूर रहे उसका अंतिम संस्कार मोहन करे। यह काम तो पुत्र करता है और घर के अन्य सदस्य हाथ बटाते हैं।
"भाभी जी अंतिम संस्कार तो बड़ा पुत्र करता है और गौत्र के अन्य पुरुष साथ देते हैं। मैं यह काम नही कर सकता। इसके लिए तो आपको अपने गौत्र के रिश्तेदारों को बुलाना होगा। विकास के भाई, भतीजे और आपका पुत्र यह काम कर सकते है। जंवाई, जीजा से अंतिम संस्कार नही करवाते।" जितनी आसानी से वीणा ने मोहन को अंतिम संस्कार के लिए कहा, उतनी मुश्किल से मोहन ने वीणा को उत्तर दिया।

कुछ पल रुकने के बाद मोहन चला गया और मीना को बात बताई। यह सुनते ही मीना के हाथ से मोहन के लिए बनाया टिफ़िन छूट गया।
"अंतिम संस्कार, क्या वीणा पागल हो गई है? सनकी तो शुरू से वह थी। दिमाग की खाली होगी, यह आज पता चला। तुमने क्या कहा? मीना ने मोहन से पूछा।
"मैंने मना कर दिया।"
"बिलकुल ठीक किया। शव यात्रा में सम्मलित हो सकते हैं। संस्कार हम नही कर सकते। यह विधि विधान के विरुद्ध है।"

मोहन और मीना इस विषय पर बात कर रहे थे कि वीणा की बहन और बहनोई आए। वीणा शायद कुछ अपने स्वभाव के कारण गलत बोल दें इसलिए वे दोनों आए।

"भाई साहब आप गलत समझे परन्तु हमारी कुछ मजबूरी है, हम अधिक देर तक विकास के मृत्य शरीर को नही रख सकते। विकास का दाह संस्कार करना है, अतः आपकी मदद चाहिए। वीणा अपने ससुराल से किसी को बुलाना नही चाहती क्योंकि उसके सम्बन्ध अच्छे नही है। वीणा और विकास ने एकाकी जीवन व्यतीत किया है, अधिकांश रिश्तेदारों से खटपट है। अंतिम संस्कार विकास का पुत्र करेगा। पुरुषों में सिर्फ मैं और विकास का पुत्र है। अर्थी की तैयारी करनी है, आप की सहायता की आवश्यकता है। अंतिम स्नान के बाद अर्थी तैयार करके शमशान जाना है। अर्थी को कंधा देने के लिए चार जनों की आवश्कयता है। एक आप साथ दीजिये और एक और जन चाहिए।"

मोहन सोचने लगा। मीना ने मोहन को कमरे में ले जा कर कहा। मानवता के आधार पर आप सहायता कर दीजिए।

मोहन ने दो और पड़ोसियों से बात की परन्तु सब ने मना कर दिया। अंत में मोहन और वीणा के बहनोई ने विकास की अर्थी तैयार की। फ्लैट से बाहर अर्थी को कंधा देने के लिए सिर्फ तीन आदमी थे। वीणा का पुत्र, वीणा का बहनोई और मोहन। चौथा व्यक्ति ढूंढने मोहन नीचे आया और कूड़ा उठाने वाले सफाई कर्मचारी मिला, जो राजी हो गया। अर्थी को नीचे लाया गया और शमशान जाने के लिए शव वाहन में रखा।
जिन व्यक्तियों से वीणा घृणा करती थी, कूड़ा उठाने वाले सफाई कर्मचारी जिसको नीच समझती थी और मोहन जो मध्यवर्गीय जिसको वीणा अपनी हैसियत से छोटा समझती थी, वोही वीणा के दुःख की घडी में काम आये। उन्ही दोनों ने विकास की अर्थी को कंधा दिया।

शमशान में अंत्येष्ठि के पश्चात मोहन घर वापस कर सोचने लगा कि सब कहते हैं आदमी अकेला आया है और अकेला जाएगा लेकिन जीवन भर सामाजिक तो रहता है जिस कारण सुख और दुःख में चार व्यक्ति सम्मलित होते है। विकास इतना अकेला कि अंतिम यात्रा के लिए चार आदमियों के हाथ मिले। इतना घमंड और अहंकार किसके लिए जबकि उसने लोगों को स्वयं आगे बढ़ कर अंतिम यात्रा में सम्मलित होते और अर्थी को कंधा देते देखा है लेकिन विकास के लिए चार जने ढूंढने पड़े।






अकेलापन

सुबह के सात बजे सुरिंदर कमरे में समाचारपत्र पढ़ रहे थे उनके पुत्र ने एक वर्षीय पौत्र को सुरिंदर की गोद मे दिया। ...