Saturday, October 01, 2016

यादें


नाम सावित्री, उम्र लगभग पैंसठ वर्ष। पति जीवन का साथ पहले ही छोड़ गए। दो विवाहित पुत्रियां अपने घरों में सुखी हैं। घर में एकाकी जीवन व्यतीत कर रही है। पुत्र, पुत्रवधु हैं। सबका अपना जीवन है, अपने कार्यों में व्यस्त। दिन घर और रसोई के कामों में व्यस्त रहती है परन्तु अकेले रात काटना भी कठिन कार्य है। कुल मिला कर -सात घंटे ही काम होता है। दोपहर में भी आराम हो जाता है। रात में तीन-चार बार नींद खुलती है। कहा जाए तो दो-ढाई घंटे की नींद के बाद उठना, घडी में समय देखना और फिर सपनों या ख्यालों में गुम हो जाना। अक्सर पुरानी बातें और लोग याद आते हैं। जीवन साथी की याद आती और सताती। उसके साथ की तकरार और नौक-झौंक याद कर मुस्कुरा देती। मन ही मन बातें करती।

रविवार की सुबह सावित्री की आंख लग गई। बच्चे छुट्टी के दिन देर से उठते हैं, इसलिए पांच बजे उसने बिस्तर नही छोड़ा। वैसे तो हर सुबह पांच बजे सावित्री बिस्तर छोड़ देती थी, पर आज बिस्तर में लेते हुए पुरानी बातें याद कर रही थी।

तभी कॉल बेल बजी। सावित्री सोचने लगी कि कौन हो सकता है इतनी सुबह। दूध वाला आठ बजे से पहले आता नही। मरे को लाख बार कहा कि जल्दी आया करे पर कम्बख्त सुनता ही नही। रविवार छुट्टी के दिन इतनी सुबह कौन हो सकता है। इसी सोच में उसे उठने में देर हो गई और तब तक फिर से घंटी बजी। सावित्री ने उठ कर दरवाजा खोला।

दरवाजे पर रमाकांत खड़ा था।
"भाई तुम?"
"हां बहन।" कह कर रमाकांत और सावित्री एक दूसरे के गले मिले।
"भाई आज कितने वर्षों बाद मिले हो। कुछ याद है?"
"बहन यह तो तुम याद करके बताओ। मैं तो याद करता नहीं। छोड़ बहन, दरवाजे पर ही मुझे खड़ा रखना है? घर के अंदर आने की अनुमति है या फिर बाहर से ही वापिस चला जाऊं?"
"कैसी बात करता है रमा, अंदर आ।" कह कर सावित्री दरवाजे के आगे से हटी और रमाकांत ने घर के अंदर प्रवेश किया। रमाकांत के पास एक अटेची और एक हैंडबैग था।

रमाकांत सावित्री का छोटा भाई है। उम्र लगभग पचपन की, सावित्री से दस वर्ष छोटा। आज लगभग पंद्रह वर्ष बाद दोनों मिल रहे हैं। रमाकांत कुंवारा था, उसने विवाह नही किया। मुंबई में एक फैक्ट्री लगाई थी। सावित्री ने सुना था कि घाटा होने पर फैक्ट्री बेच दी थी, इस बात को पंद्रह वर्ष हो गए हैं, फिर रमाकांत की कोई खबर नही। आज रमाकांत से मिल कर बेहद खुशी हुई। रमाकांत सावित्री को बहन पुकारता है और सावित्री उसे रमा।

"चाय पिएगा रमा।" सावित्री ने रमा से पूछा।
"पूछ मत, बना दे और बिस्कुट के साथ पिला दे।"

सावित्री रसोई में चाय बनाने चली और रमाकांत घर का निरीक्षण करने लगा। चाय की चुस्कियों के बीच रमाकांत ने सावित्री से पूछा। "बहन मकान छोटा हो गया है ?"
सावित्री ने मुस्कुरा कर जवाब दिया "भाई तेरा जीजा जल्दी चला गया। तीन छोटे बच्चे छोड़ गया था। कहां से घर खर्च पूरा करती?" पहले दुकान बिकी और फिर आधा मकान बिका। बच्चों की परवरिश की, फिर दोनों लड़कियों की शादी की और अब मन्नू की शादी पिछले साल की।"

"मन्नू कहां है?"
"आज छुट्टी का दिन है, अभी सो रहा है। थोड़ी देर से ही उठेगा।"

सावित्री का मकान का बड़ा हिस्सा बिक चुका था। अब एक तिहाई ही बचा था। नीचे छोटा सा दालान, एक रसोई, एक कमरा, जिसमें सावित्री रह रही है और बाथरूम। ऊपर प्रथम तल में दो कमरे,बाथरूम और छत। दूसरे तल पर सिर्फ छत।

चाय पीने के पश्चात सावित्री ने रमाकांत से पूछा। "रमा आज पंद्रह वर्ष बाद मिल रहे है। कहां रहा इतने वर्ष? कभी कोई खबर नही  भेजी, कोई टेलीफोन नही किया? आज अचानक से गया।"
"बहन मेरा आना पसंद नही क्या?" रमाकांत तन कर बैठ गया।
"आदत नही बदली तेरी नाराज होने की। जरा सा पूछ लिया कि नाराज हो गया।"
"अब क्या नाराज होना। किससे नाराजगी रखें बहन। तू बड़ी है। पंद्रह वर्ष बाद अचानक से टपका। हैरानी भी बनती है और नाराजगी भी बनती है। सब बताऊंगा, धीरे-धीरे। अब समझ कि सदा के लिए तेरे पास गया हूं रहने के लिए।"
"सच्ची, यकीन नही हो रहा है।"
"अब की बार तो पक्का विश्वास कर। नही जाऊंगा कहीं भी। तेरे पास रहूंगा।"
"यह तो सच्ची में बहुत अच्छी बात है। चल अब आराम कर ले। सफर की थकान होगी।"

रमाकांत सावित्री के बिस्तर पर लेटता है और उसे नींद जाती है।
सावित्री अपनी दिनचर्या में लग जाती है। आठ बजे मन्नू और पुत्रवधु मोनिका उठ कर नीचे आते हैं। रसोई से कचोड़ी और सूजी के हलवे की भीनी खुशबू मन्नू को सीधे रसोई में खींच लाई।
"मां, आज सुबह ही रसोई में लग गई। आज तो छुट्टी है।"
"तो क्या हुआ? खाली बैठी थी, सोचा नाश्ते की तैयारी कर लूं। तुम्हारी मन पसंद दाल वाली कचोड़ी और सूजी का हलवा बना रही हूं।"
तभी मोनिका रसोई में आती है। "मम्मी कमरे में कौन सो रहा है?" कह कर उसने गैस पर चाय का पानी रखा।
"मोनिका, तुमने कभी देखा नही न। अंदर कमरे में रमा मामा हैं।"

मोनिका ने कभी रमाकांत के बारे में सुना और ही कभी देखा। अभी एक साल ही हुआ है उसके विवाह को। रमाकांत की चर्चा सावित्री ने कभी नही की। रमाकांत आज पंद्रह साल बाद आया है। मन्नू ने बचपन में रमा मामा को देखा था। ग्यारह साल की उम्र थी, जब उसके पिता का देहांत हुआ था। अंतिम बार रमा मामा को तब देखा था। कभी कभी सावित्री रमाकांत को याद करती थी। मन्नू के मन पटल पर रमा मामा की छवि कोई खास अच्छी नही थी, क्योंकि वह अक्सर मां के मुख से सुनता था कि उसके पिता कम उम्र में चल बसे। ग्यारह वर्ष की खेलने की उसकी उम्र थी कि उसके पिता चले गए। एक भाई, उसने भी मुड़ कर नही देखा। दुःख की घडी में उसने मां को अक्सर रोते देखा था।
चाय मन्नू और मोनिका ने रसोई में ही पी ली। मन्नू चाय पीने के बाद ऊपर अपने कमरे में चला गया। मोनिका सावित्री का हाथ बटाने के लिए वहीँ रुक गई।

नौ बजे के आसपास रमाकांत उठा। सावित्री तब तक नाश्ता बना चुकी थी। रमाकांत ने अपना सामान खोला और कपडे निकाले।
"बहन, नहा लूं।"
"तुम पूछ रहे हो या वाकई नहाना चाहते हो?" सावित्री कहते हुए रसोई से कमरे में गई। "भाई अगर मैं मना कर दूं तो क्या नही नहाओगे?
"बहन मजाक कर रही हो।" कहते हुए रमाकांत नहाने चला गया।

नहाने के बाद रमाकांत मन्नू से मिलने ऊपर की मंजिल गया। रमाकांत उत्साह के साथ मन्नू और मोनिका से मिला। मामा रमाकांत से मिल कर मन्नू को कोई विशेष उत्साह नही था। मोनिका सिर्फ मूक दर्शक बनी रही।

रमाकांत हंसमुख प्रकृति के इंसान थे। सावित्री भाई से मिल कर चहचहाने लगी कि कम से कम कोई तो घर आया, जिससे घडी, दो घडी दिल की बात कर सकेगी।
नाश्ते करते हुए सावित्री बोली " भाई ये दो छोटे बैग लेकर कहां से रहे हो?"
"बहन तेरे हाथ में अभी तक जादू है। लाजवाब स्वाद की कचोड़ी और हलवा बनाया है। एक मुद्दत हो गई घर का खाना खाये हुए।"
नाश्ता समाप्त हुआ और रमाकांत ने बैग से एक डायरी और कुछ लिफाफे निकाले। मोनिका को आशीर्वाद देते हुए शगुन के रुपये दिए और फिर सावित्री के हाथ में एक लिफाफा पकड़ाया।
"क्या है इसमें?"
"कुछ रुपये है। जब तुझे इनकी जरुरत थी, तब मैं काम नही सका, परन्तु अब तेरी सहायता कर सकता हूं।"
सावित्री ने लिफाफा खोल कर देखा उसमे एक लाख रुपये थे। इससे पहले सावित्री कुछ कहती, रमाकांत ने सावित्री का हाथ पकड़ लिया और कुछ कहने से मना किया।
"बहन, कह मत। कुछ बातें कहने की नही बल्कि समझने की होती है।"
सावित्री चुप हो गई।

दोपहर के खाने के समय रमाकांत ने सबको संबोधित करते कहा।
"आप सब सोच रहे होंगे कि मामा अचानक पंद्रह वर्ष बाद कहां से टपक पड़ा। कुछ समय की बात होती है, तुम मजबूर थे और मैं भी मजबूर था जिस कारण मिलना नही हो सका। जीजा की अचानक मौत के बाद मैं वापस मुम्बई लौट गया। मेरा व्यापार बहुत अधिक ऊंचाई पर तो नही था, परन्तु ठीक-ठाक चल रहा था। मैं अकेला था, अपने हिसाब से सब ठीक चल रहा था। अकेले रहते कुछ आदतें भी बिगड़ जाती हैं। मेरा भी वही हाल था। क्लब जाना, यारों-दोस्तों के साथ ताश-जुआ, पीना कुछ अधिक हो गया और व्यापार पर ध्यान कुछ कम। लाभ कम होता गया, बैंक से कर्ज लिया परन्तु बैंक का कर्ज चुकता नही कर सका। दो साल लाभ नही हुआ बल्कि नुकसान हो गया, जिस कारण बैंक का कर्ज तो दूर, ब्याज भी नही भर सका। व्यापार बंद हो गया, सब कुछ बैंक वाले ले गए। पांच वर्ष बीत गए, सब यार-दोस्त छूट गए। पैसे के सब यार होते है, पैसा खत्म, दोस्त खत्म। सेहत पर असर पड़ा और मैं बीमार हो गया। मेरे पास सिर्फ हेल्थ पालिसी ही बची थी, जिसने मुझे दूसरा जीवन दिया। अकेला अस्पताल में पड़ा रहता था। डॉक्टर, नर्स, वार्ड बॉय ही मेरे संगी साथी थे। उनके साथ ही दिल का हाल-चाल बांटता था। कई बार अपने अनुभव बताता। व्यापार का बहुत तजुर्बा रहा था। अपनी कुछ आदतों के कारण व्यापार चौपट हो गया। एक डॉक्टर ने नौकरी छोड़ कर अपना नर्सिंग होम स्थापित किया। मेरी सलाह से उसे लाभ हुआ। थोड़े समय पश्चात तीन डॉक्टरों ने एक साथ नौकरी छोड़ी और एक अस्पताल बनाने की नींव रखी। मेरी दी सलाह से पहले डॉक्टर को लाभ हुआ था, जिसकी सिफारिश पर मुझे सलाहकार नियुक्त किया। तीन वर्ष में अस्पताल बन कर तैयार हुआ। मुझे अस्पताल बनने के बाद भी एडवाइजर के पद पर रखा गया। अब वे डॉक्टर दूसरा अस्पताल इसी शहर में बनाने वाले हैं। सरकार से जमीन मिल गई है और निर्माण थोड़े दिन बाद शुरू होगा। अब जब अपने हैं, तब कहीं ओर क्यों रहूं। यदि तुम्हे कोई आपत्ति हो तब मैं दो चार दिन रह कर चला जाऊंगा।"

"ऐसा क्यों सोचता है रमा? हमारे पास रह। पिछली बातें छोड़।" सावित्री ने मन्नू की ओर देखा। उसने मौन स्वीकृति दे दी।

मन्नू ने जब अस्पताल का नाम सुना, जिस के लिए मामा काम कर रहे है, तब उसका व्यवहार मामा के प्रति बदल गया। अस्पताल की भविष्य की योजनाओं के बारे में उसने समाचारपत्र में पढ़ा था। मोनिका भी नौकरी करती थी। सबसे पहले मामा ने मोनिका की नौकरी अस्पताल में लगवा दी। रमाकांत ने एक फोन किया और बिना किसी इंटरव्यू के मोनिका की नौकरी पहले से बेहतर तनख्वा पर लग गई। मन्नू और मोनिका अब मामा रमाकांत के अधिक नजदीक हो गए। रमाकांत की कर्तव्यनिष्ठा देख कर सावित्री, मन्नू और मोनिका आश्चर्यचकित हो गए क्योंकि उनका अतीत छुपा नही था।

बच्चों और बड़ो के बीच एक स्वाभाविक दूरी होती है। दो पीढ़ियों के बीच अंतर जो होता है, सावित्री का मन्नू और मोनिका के साथ भी था। रमाकांत के साथ खुल कर सुख-दुख की बातें करती।

छुट्टी की एक दोपहर के समय सावित्री को कुछ गुमसुम देख रमाकांत ने पूछा। "क्या सोच रही हो?"
"तेरे जीजे की याद गई, बस दिल उदास हो जाता है, जब याद आती है।"
"हां बहन, रिश्ता ही कुछ ऐसे है कि याद स्वाभाविक है।"
"हर रोज काम में गुज़र जाता है रमा, याद रात को जरूर आती है। क्या करूं? एक बात बता क्या तेरे साथ ऐसा नही होता है, तुझे उसकी याद नही आती क्या?"
"किसकी?"
"तूने तो नही बताया कभी, उड़ती बातें सुनी थी। क्या नाम था, मारिया। घर क्यों नही बसाया उसके साथ?"

कुछ हंस कर रमाकांत ने कहा। "सोचा था परन्तु घर बसने का समय आया तब मेरा व्यापार उजड़ने लगा था। उसने भी मुंह फेर लिया। कुछ डूबते व्यापार का गम था और कुछ उसकी बेवफाई, जिसने मुझे बीमार कर दिया था। याद ऐसी चीज है बहन, ही जाती है। जीजा और तेरा पति-पत्नी का संबंध कभी नही भूला जाता, तभी तुझे जीजा की अधिक याद आती है। मेरा उसके साथ प्यार तो बना, परन्तु संबंध नही बना। याद तो ही जाती है कभी कभार।"
"सुन्दर थी?"
"हां सुन्दर थी। मेरे सभी यार-दोस्त उसके दीवाने थे। मुझसे सभी जलते थे। जब उसने मेरा साथ छोड़ा, मजाक का पात्र भी बना। बहन सभी कुछ पीछे छूट गया।"
"रमा सच तो यही है कि सब रिश्ते रुपये के हैं। जीजा जब था, रौब से रहते थे। दो दुकाने और बड़ा मकान। जीजा गया तब जीने के लिए दुकानें और आधे से अधिक मकान बिका। रिश्तेदारों ने आना ही छोड़ दिया। बस अब तो जीजा की याद आती है।"
"बहन सोलह आने सच कहा तूने। सब रिश्ते रुपये के। बिन रुपये कोई सखा, कोई नाता।"
बातों में दोपहर बीत गई। चार बजे मोनिका ने चाय बनाई। सब ने चाय पी। रमाकांत और सावित्री ने एक दूसरे को देखा और मुस्कुरा दिए। उम्र के इस पड़ाव में भाई-बहन एक दूसरे का सहारा हो गए।
"बहन ताश खेलेगी?"
"भूल गई हूं खेलना। सिखा दे, पहले खेलते थे। तेरे जीजा को बहुत शौंक था ताश का। हर छुट्टी ताश में बीतती थी।"
"बहन जीजा की याद आती है तो उसके शौंक को जिन्दा रखते है। चल ताश खेलते हैं।"
मन्नू ताश लेकर आता है और रमाकांत, सावित्री, मन्नू और मोनिका ताश खेलते है।





Post a Comment

मौसम

कुछ मौसम ने ली करवट दिन सुहाना हो गया रिमझिम बूंदें पड़ने लगी आषाढ़ में सावन आ गया गर्म पानी भाप बन कर उड़ गया ...