Monday, October 10, 2016

शोक नही करना


पति-पत्नी का रिश्ता जन्मों का है। पहले तन जुड़ते हैं फिर मन इस तरफ से जुड़ते हैं कि जुदा कोई नही कर सकता। अंत समय तक दो तन और एक जान होते हैं। पूरी जिंदगी नौक-झौंक में कटती है फिर भी सुख एक साथ तो दुःख भी एक साथ बांटते है। हौसला देते हर कदम हर दम सिर्फ एक दूसरे के लिए।

पचास वर्ष एक साथ रहने के पश्चात चन्दन अकेला रह गया। चंपा साथ छोड़ गई। आवागमन प्रकृति का नियम है। आएं हैं तो जाना भी है। चंपा पहले चली गई।

चंपा के जाने पर चन्दन उदास हो गया। अंतिम संस्कार के बाद चौथे दिन बिरादरी का उठाला हो गया। अभी दसवें पर हरिद्वार में अस्थि विसर्जन और सत्तरवें दिन ब्राह्मण करने का काम बाकी था। बिरादरी का उठाला घर के समीप मंदिर में चौथे दिन हो गया। बिरादरी रुक्सत हो गई और चन्दन परिवार समेत घर वापस गए।

परिवार में चन्दन के दो बेटे, बहुएं, पौत्र, पौत्रीयां और एक बेटी। बेटी को परिवार समेत विदा करते हुए चन्दन ने कहा।
"बेटियों का मां के साथ संबंध अधिक गहरे होते हैं। मां नही रही लेकिन संबंध वही रहने चाहिए। मैं हूं, मिलने नियमित रूप से आना। भाई और भाभियों के साथ संबंध मजबूत रखना। अब शोक नही रखना, समयानुसार रस्में पूरी करनी है। अपनी दिनचर्या पहले जैसी रखो।"
फिर बेटों से कहा कि कल से अपने ऑफिस जाना शुरू करें। केवल रस्मों को पूरा करने के लिए ही छुट्टी लें। चन्दन ने टीवी ऑन किया। "जिन्दगी पहले जैसी चलनी चाहिए। चंपा के जाने का दुःख है लेकिन शोकाकुल रह कर चंपा की आत्मा को दुःख नही पहुंचाना। जिन्दा दिल इंसान थी, हंसती मुस्कुराती रहती थी। हमें हंसते, मुस्कुराते जिन्दगी बितानी है।"

चंपा को यह गीत बहुत पसंद था। अक्सर गुनगुनाती थी "एक प्यार का नगमा है, मौजों की रवानी है। जिन्दगी और कुछ नही, तेरी-मेरी कहानी है।" गुनगुनाते हुए चन्दन अपने कमरे में चले गए और चंपा की तस्वीर हाथों में लेकर यही गीत फिर से गुनगुनाने लगे।

तिहत्तर वर्ष की उम्र में सेवानिवृति के बाद भी चन्दन काम में डूबे रहते। घर के काम करते और फिर पार्ट टाइम काम करते। बच्चे कहते कि आराम करो परन्तु चन्दन हमेशा कहते "बुरा मानना, काम करने के पीछे तीन कारण हैं।"
पहला - काम करता व्यक्ति बूढ़ा नही होता।
दूसरा - शरीर चलता रहता है और उसमें जंग नही लगता।
तीसरा - काम करते व्यक्ति कमाता रहता है और बच्चों पर मोहताज नही रहता।
"इसलिए बच्चों जब तक हाथ पैर सलामत हैं, काम करने से नही रोको। काम करता बूढ़ा बच्चों पर बोझ नही बनता।"

चन्दन की सोच सत प्रतिशत सही है। खाली व्यक्ति निकम्मे का ख़िताब पाता है और बच्चों की नजर में गिरता है। काम में व्यस्त व्यक्ति अपना खर्च खुद स्वयं निकाल लेता है और अपने पोते-पोतियों को जेब खर्च भी दे देता है। दादा की पोते-पोतियों से नजदीकियां बढ़ती हैं।

चन्दन ने काम पर जाना जारी रखा। उसके साथ काम करने वाले युवा उनको रिटायर हो कर आराम करने की सलाह देते। चन्दन मुस्कुरा कर जवाब देते कि जिन्दगी में कभी रिटायर नही होना। एक काम छूटा तो दूसरा कर लो। अपने को व्यस्त रखो। सबको सलाह देते।

मस्त रहो, व्यस्त रहो पर अस्त-व्यस्त रहो।

शनिवार के दिन चन्दन सुबह समाचारपत्र पढ़ रहे थे और साथ में एफ एम रेडियो पर संगीत सुन रहे थे। चन्दन का मन पसंद गीत बजने लगा "अपने होंठों की बंसी बना ले मुझे" बजने लगा। चन्दन गीत को रेडियो के साथ गुनगुनाने लगे। तभी उनके दो पुराने मित्र मिलने आये। उनको चंपा की मृत्यु का बाद में चला और आते ही हाथ जोड़ कर सांत्वना प्रकट की। चन्दन गीत गुनगुना रहे थे इसलिए हाथ के इशारे से सोफे पर बैठने को कहा। गीत समाप्त होने पर चन्दन ने रेडियो की आवाज कम की और समाचारपत्र को साइड टेबल पर रखा और चाय बनाने के लिए पुत्रवधु को कहा जो रसोई में नाश्ते की तैयारी कर रही थी। उसने चाय नौकर के हाथ भिजवाई। चाय की चुस्कियों के बीच बात होने लगी।

"चन्दन भाभी जी के देहान्त की कोई खबर ही नही मिली। कल चंदू मिला, उसने बताया।"
"हां, कुछ लोगों को उस समय सूचित नही कर सके। तुम समझ सकते हो, वो दिन थोड़ा कठिन होता है और समय भी नही मिलता। दिमाग भी परेशान हो जाता है। अंतिम संस्कार में व्यस्त हो गया। इस कारण तुम्हे भी सूचना नही दे सका।"
"हुआ क्या था?"
"हंसते खेलते चली गई। कोई तकलीफ तो मुझे दी और खुद भी तकलीफ में नही रही। हर सुबह की तरह स्नान के बाद पूजा के लिए बैठी और प्रभु के ध्यान में ही प्रभु के पास चली गई।"
"क्या बात करते हो यार?" दोनों मित्रों ने हैरानी से पूछा।
"जब काफी देर तक पूजा समाप्त नही हुई, तब मैंने आवाज दी किन्तु उसने कोई जवाब नही दिया। हाथ लगाया तब एक तरफ लुड़क गई। इससे अच्छा अंत क्या हो सकता है कि प्रभु की आराधना में प्रभु में लीन हो गई।"
"बहुत किस्मत वाले हो चन्दन तुम।"
"हां यह तो है। पचास वर्ष हंसते खेलते बिताये और अंत में बिना कुछ तकलीफ दिए चली गई।"
"तुम्हे देख कर ऐसा लगता नही कि भाभी जी के जाने का कोई दुःख है?"
"मित्रों जीवन साथी के चले जाने का दुःख तो है। अब अकेले जीवन का बाकी सफर काटना है। पचास वर्ष हंसते हुए काटे। तब रो कर उसकी आत्मा को क्यों तकलीफ दूं। जिस तरह पचास वर्ष बिताये, उसी तरह शेष जीवन बिताना है, यही सोच कर रोता नही हूं। उसको याद ख़ुशी से करता हूं। दिन तो काम में बीत जाता है, रात को नींद खुलती है और याद सताती है। संगीत में प्रति चंपा की विशेष रूचि थी। इसलिए संगीत सुनता हूं और गुनगुनाता हूं। जो चंपा को पसंद था, वह करता हूं। इसलिए उसकी पसंद का गीत जब रेडियो पर बजा तो गुनगुनाने लगा।"
"चन्दन तुम्हारी सोच उत्तम है।"
"मित्रों याद तो रहेगी, पचास वर्ष हम बिस्तर, हम विचार, एक साथ रहे, परन्तु शोक उचित नही है। हंसते हुए जीवन बिताया है और उसी तरह बिताना है।"

कुछ देर चन्दन मित्रों के साथ बात करता रहा। विभिन्न विषयों पर चर्चा हुई और फिर मित्र रुक्सत हुए।

शाम के समय चन्दन मोबाइल फोन में अपने और चंपा की पसन्द के गीत सुन रहा था। चन्दन की पौत्री सुहानी पास कर बैठी।
"दादा जी, मुझे एकाउंट्स में कुछ पूछना है?"

चन्दन ने एकाउंट्स और टैक्स का काम किया और अभी भी कर रहे थे। चीफ अकाउंटेंट की पोस्ट से रिटायर हुए थे चन्दन। चन्दन बच्चों को एकाउंट्स, टैक्स और इकोनॉमिक्स पढ़ा दिया करते थे।
"हां, बताओ, क्या पूछना है?"
थोड़ी देर में सुहानी के दो और मित्र गए और दादा जी के साथ तीन घंटे तक पढ़ते रहे। चन्दन हर उम्र के लोगों के साथ घुलमिल जाते थे। पंद्रह-सोलह वर्ष के पौत्र, पच्चीस-तीस वर्ष के ऑफिस के सहपाठियों से लेकर हम उम्र दोस्तों के साथ खूब बनाती थी और उन्ही के पसन्द के विषयों पर बातचीत और चर्चा करते थे।

रात को चन्दन की नींद दो बजे खुल गई। करवटे बदलते आधा घंटा बीत गया, नींद नही आई तो चन्दन मोबाइल फोन में गीत सुनने लगा। रात के सन्नाटे में आवाज गूंजती है। दूसरे कमरे में सो रहे पुत्र की नींद संगीत की आवाज से खुल गई। पिता को गाने सुनते और साथ-साथ गुनगुनाते देख पूछा।
"पापा तबियत तो ठीक है ?"
"हां तबियत बिलकुल ठीक है। नींद खुल गई और नही रही। बिस्तर पर करवटे बदलने से अच्छा है कि संगीत सुन लिया जाये। गीत सुन कर मन की बेचैनी दूर हो जाती है।"

मुस्कुरा कर पुत्र अपने कमरे में चले गए।

अगली सुबह घर में चर्चा का विषय था चन्दन का रात को उठ कर रेडियो सुनना और लोगों को जगाना।
चन्दन हंसते हुए कहने लगे "देखो बच्चे और बूढ़े एक समान होते हैं। जैसे छोटे बच्चे रात को दो-तीन बार उठ कर मां-बाप को जगाते हैं, उसी तरह बूढे भी रात को दो-तीन बार उठ कर बच्चों को जगाते हैं।"

चन्दन की  व्याख्या सुन सब खिलखिला कर हंस पड़े।

थोड़ी देर बाद चन्दन का मोबाइल फोन हाथ से छूट कर गिर गया और उसका स्क्रीन टूट गया।
"सुहानी मोबाइल ठीक करवाना है। ठीक करने वाले की दुकान बताओ।"
"दादा जी, आपका फोन पुराना हो गया है। जितने रिपेयरिंग में लग जाएंगे, उतने में तो नया फोन जाएगा। वैसे मालूम नही कि इस पुराने मॉडल के स्पेयर पार्ट्स भी मिलेंगे या नही।"
"अच्छा तो नया मोबाइल फोन खरीद लेते हैं।"
"स्मार्ट फोन का जमाना है। दादा जी स्मार्ट फोन लो।"
"स्मार्ट फोन ले लेंगे। मेरे साथ चलो क्योंकि मुझे नही मालूम कौन सा फोन लेना चाहिए।"
दोपहर के खाने के बाद चन्दन सुहानी के साथ फोन खरीदने जाते है और वापस कर सुहानी से स्मार्ट फोन चलाना और इस्तेमाल करना सीखते है। रात को डाइनिंग टेबल पर चन्दन ने कहा।

"आज रात से किसी की नींद ख़राब होगी। सुहानी ने मुझे हेड फोन दिलवा दिया है। अब मैं आराम से हेड फोन में गीतों का आनन्द उठाऊंगा।" कह कर चन्दन ने कानों में हेड फोन लगाया और गीत गुनगुनाते हुए अपने कमरे में चले गए।

परिवार के सदस्य मुस्कुराने लगे।


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