Thursday, November 10, 2016

अफ़सोस बस यादें


"भाभी यह क्या हो गया!" आते ही अर्चना कल्पना के गले लग गई और दोनों दहाड़े मार कर रोने लगी। "भैया चले गए!"
दो मिनट बाद दोनों सामान्य हो गए।
"बैठ अर्चना।" कल्पना ने अर्चना को कहा।
दोनों बिस्तर पर ही बैठ बातें करने लगी।
"भाभी, चलो अच्छा ही हुआ कि भाई को मुक्ति मिल गई। कितना परेशान थे। छः महीने तो हो गए थे ?"
"हां अर्चना, कमल को पूरे छः महीने हो गए थे कल बिस्तर पकडे। आज सुबह बस उठे ही नही।"
"हां कल्पना भाभी तुमने सेवा में कोई कमी नही रखी थी।"
"अर्चना अपना कर्तव्य पूरा निभाया है बाकी प्रभु की इच्छा। जितनी सांसे लिखी हैं कमल ने ली।"

दोनों बातें कर रही थी कि कल्पना की बहन बिंदु आई और वह भी कल्पना से लिपट गई। दोनों बहनें दहाड़े मार कर रोने लगी। दो मिनट बाद शांत हुई और बिस्तर पर बैठ गई।
"पिछले रविवार को जीजा से मिल कर गई थी। उस दिन तो बहुत खुश थे, रोमांटिक बातें कर रहे थे। गाना भी गाया था 'चांद सी महबूबा हो' मुझे तो लग रहा था जीजू बिलकुल ठीक हो जाएंगे।" बिंदु ने पल्लू से आंखों के आंसू पोंछते हुए कहा।
"लेकिन तुम्हारे जीजू ठीक नही थे। छः महीने से बीमार थे, पिछले एक महीने से तो पेशाब-टट्टी भी बिस्तर पर, बस वहीं दिल छोड़ दिया था। खाना-पीना भी के बराबर था। जीने की इच्छा छोड़ दी थी कमल ने।" कल्पना ने कहा।

तभी कल्पना के पुत्र करण और उसके मामा कमरे में आये।
"दीदी, अर्थी तैयार हो गई है। अंतिम दर्शन कर लो, फिर दाह संस्कार के लिए शमशान चलना है।" कल्पना के छोटे भाई ने कहा।
कल्पना और परिवार के सभी सदस्यों ने कमल को भाव भीनी अंतिम विदाई दी। राम नाम सत्य है की आवाज गूंजी और सबने कमल के शव के साथ शमशान की ओर प्रस्थान किया।

अंत्येष्टि के पश्चात सभी घर गए। शाम के छः बज रहे थे। कमल की मृत्यु सुबह को हुई थी। नियमानुसार चूल्हा नही जला था। पडोसी श्रीवास्तव ने सबके लिए चाय और बिस्कुट भेजे और रात के खाने का इंतज़ाम कल्पना के भाई ने किया। घर के समीप ढाबे से दाल, दो सब्ज़ी, रोटी, चावल और सलाद गए। सुबह के भूखे थे, रात आठ बजे ही सब डिनर पर बैठ गए।

"भाई खाना कहां से मंगवाया है?" कल्पना ने अपने भाई से पूछा।
"बहन करण ने बताया कि मार्किट में ढाबा है, बढ़िया खाना बनाता है, उसी को बोला स्पेशल खाना बनाने को। घर पर दे गया है।" भाई ने उत्तर दिया।
"वाह क्या स्वाद है। आलू-गोभी तो बहुत टेस्टी है। बाजार की आलू-गोभी में कभी स्वाद नही आया पर यह तो लाजवाब है। पहली बार इतनी बढ़िया आलू-गोभी होटल की बनी खाई है।" अर्चना अपनी उंगलियां चाटती हुई बोली।
"अर्चना इस ढाबे की हर सब्ज़ी लाजवाब है। रसोइया एकदम घर जैसा खाना बनाता है। चपातियां देखो, पतली और नरम। कमल तो हर शनिवार और रविवार इस ढाबे में वही बैठ कर गरम-गरम खाना खाते थे।" कल्पना ने अर्चना की प्लेट में एक चपाती डालते हुए कहा।

"दीदी जीजू को बाहर खाना खाने का बहुत शौंक था। हर होटल, ढाबे और यहां तक कि हर खोमचे वाले का पता था कि कहां कौन सी चीज स्वादी मिलती है।" बिंदु ने कहा और सबने मिलकर बिंदु की बात का समर्थन किया।

पूरे दिन के सभी थके हुए थे। रात को जल्दी खाना खा कर सो गए। अगले दिन सुबह कल्पना साढ़े पांच बजे उठ गई। रसोई में चाय बना रही थी। रसोई में बर्तन की आवाज सुन कर बिंदु की नींद खुल गई और रसोई में कर पूछा।

"दीदी चाय बना रही हो?"
"पीनी है?"
"बना दो।"
कल्पना ने चार कप चाय बना दी। कल्पना और बिंदु चाय पी रहे थे तभी अर्चना भी उठ कर गई।
"भाभी चाय बन गई?"
" बैठ, एक कप ले।"
"अभी ब्रश नही किया।"
"शेरनी ने कभी ब्रश किया, जो तू करेगी। चाय पी, ब्रश होता रहेगा।"
तीनों हंस पड़ी और चाय पीने लगी। तभी कॉल बेल बजी।
"कौन होगा इतनी सुबह?" बिंदु ने कहा और उठ कर दरवाजा खोला। कमल के कानपुर वाले चाचाजी आये थे।

चाचाजी के हाथ अटैची थी, उसको पकडे ही कल्पना के आगे खड़े हो कर रोने लगे।
"बेटा यह क्या हुआ?"
"आपको तो मालूम ही है, बीमार तो थे।"
"हां बेटे, वो तो है। अटैची कहां रखूं?"
"चाचाजी अभी तो यही रख दीजिए। फिर करण के कमरे में आपका सामान रख देंगे।"
कह कर कल्पना ने चाय का कप चाचाजी को पकड़ाया। चाय की चुस्की लेकर चाचाजी सोफे पर धम हो गए।
"कल्पना मजा गया चाय पीकर। सफर की सारी थकान मिट गई। सुबह की ट्रेन में यह दिक्कत हो है कि चाय नही मिलती और स्टेशन की चाय तो वैसे भी मशहूर है। घर की लाजवाब चाय मिल गई, आनन्द गया। और अर्चना, कैसी हो। बिंदु तुम्हे तो बरसों बाद देख रहा हुं। मोटी हो गई हो, कल्पना को देखो, एकदम स्लिम-ट्रिम। फिट रहने के नुस्खे कल्पना से लो।"
"नही चाचाजी, कोई मोटी नही हुई, लगता है आपके चश्मे का नंबर बदल गया है।" बिंदु ने चाय की चुस्की लेते हुए कहा।
"तुम मानो या मानो, मोटी तो हो बिंदु।" चाचा भी हार मानने वालों में से नही थे।

चाय का दौर खत्म हुआ, तब तक बाकी जन भी उठ गए। फिर चाय बनी। फिर नाश्ता क्या बनेगा, लंच और डिनर में क्या होगा। मेनू तैयार हुआ और ढाबे में स्पेशल खाने का आर्डर गया। कमल की डेथ कल हुई थी, आज दूसरा दिन। दूसरे और तीसरे दिन घर ही बैठना है। रिश्तेदार सांत्वना और शोक प्रकट करने आएंगे। चौथे दिन सुबह फूल चुनना है और शाम को बिरादरी का उठाला। उठाला होते सब रिश्तेदार अपने घर चले जाएंगे। तब तक घर में रौनक मेला लगा रहेगा। खाना-पीना, बातों का सिलसिला दो दिन तो अब यही होना है। दो बोल बोल कर सांत्वना दी और गपशप शुरू हो जाती है। यही सब कुछ कल्पना के घर हो रहा था। कमल की तबियत पिछले छः महीने से बिगड़ी हुई थी और एक महीने से कमल बिस्तर पर ही था। कल्पना भी जानती थी कि अंत निकट है पर जब तक सांस है, आदमी को आस रहती है। कमल की बीमारी के कारण करण ऑफिस जाने लगा और काफी काम संभाल लिया। अभी उसकी पढाई भी चल रही थी। कल्पना भी काम में सहायता देती थी। कल्पना और करण मानसिक रूप से तैयार थे।

नाश्ता करने के बाद कानपुर वाले चाचाजी अपने काम से निकल गए। जाते हुए कह गए कि लंच पर नही आएंगे। रात के डिनर पर मिलेंगे। स्थानीय रिश्तेदार अपनी सुविधा के अनुसार आते-जाते रहे। अर्चना भी शॉपिंग के लिए चली गई। बिंदु भी अपने घर चली गई। कल्पना अकेला समय पाकर बिस्तर पर लेट गई और नींद गई।
शाम को करण ने कल्पना को जगाया। करण के छोटे मामा ने चाय बनाई। चाय पीने के साथ-साथ कल्पना और करण व्यापार की बातें करने लगे कि अब कैसे क्या करना है।

शाम छः बजे कानपुर वाले चाचाजी गए।
"कल्पना आज का दिन तो पूरा कैसे बीता, पूछो मत। बस भागदौड़, जरा सी भी फुर्सत नही मिली। एक व्यापारी से पेमेंट लेनी थी। पट्ठा छः महीने से नही दे रहा था। आज पकड़ में आया तो मैंने भी छोड़ा नही। सारा दिन भूखा उसके दफ्तर बैठा रहा। एक मिनट भी नही छोड़ा। अगर छोड़ देता तो पट्ठा भाग जाता, मालूम नही फिर कब हाथ आता। पेमेंट देकर राजी नही। मेरी किस्मत अच्छी रही कि पांच बजे एक आदमी उसको पेमेंट दे गया और मैंने उसको धर लिया। अब मना भी नही कर सकता था। करण बेटे, दो लाख लेने थे, अस्सी हजार हाथ आये। चलो कुछ तो आया। इतना सुन कर कल्पना ने कहा।
"चाचाजी खाना खा लो, सुबह से कुछ नही खाया।"
"अगर है तो दे दो, नही तो रात को एक बार खाएंगे।"
"लंच की सब्जी बची है। अभी गर्म कर देती हूं।"
कल्पना ने खाना गर्म कर दिया। खाते हुए चाचाजी करण से बोले। "बेटे तुम्हारे व्यापार में भी पेमेंट की दिक्कत है। हमारे यहां तो लंबी उधार चलती है।"
"चाचाजी, पापा तो हमेशा नकद में काम करते हैं। मुनाफा कम होता है पर पेमेंट मरती नही है।" करण ने कहा।
"यह बात तो माननी पड़ेगी कि कमल ने बुद्धि से काम किया। चाहे थोड़ा करो मगर नकद पेमेंट पर।" चाचाजी ने कमल के काम की सराहना की।

तभी आधे घंटे में एक-एक करके सभी रिश्तेदार एकत्रित हो गए। अर्चना, बिंदु, बड़े मामा, छोटे मामा, मौसा-मौसी, बुआ-फूफा और बच्चे।

बड़े मामाजी ने चाचाजी से पूछा। "चाचाजी आपकी साली की शादी में मैं कानपुर आया था, फिर उसके बाद कभी कानपुर नही आना हुआ। आपकी साली बहुत मोटी थी। जयमाला के समय जब स्टेज पर रही थी तब स्टेज की सीढ़ी टूट गई थी। आपकी साली गिर पड़ी थी और लंगड़ाते हुए चल रही थी। जयमाला फिर नीचे हुई थी।"
"अरे मामा, उस समय तो मेरे ससुर चिंता में पड़ गए थे कि कहीं शादी में कोई विघ्न पड़ जाये। एक तो मोटापे के कारण उसकी शादी नही हो रही थी और ऊपर से स्टेज की सीढ़ी टूट गई और वह लड़खड़ाने लगी। कहीं लंगड़ी लड़की से शादी तोड़ दे।"
"फिर क्या हुआ चाचाजी?" मामाजी ने छेड़ते हुए पूछा।
"मामाजी वो तो दूल्हा काला था उसे भी मुश्किल से लड़की मिली और हमारी साली को भी मोटापे के कारण मुश्किल से लड़का मिला। जब दो मुश्किलें मिल जाएं तब आसानी हो जाती है। इसलिए शादी में कोई विघ्न नही पड़ा। लड़का स्टेज से नीचे उतर आया जयमाला डालने।"
"चाचाजी प्लास्टर चढ़ा था ?"
"मामा डेढ़ महीने का प्लास्टर टांग पर चढ़ गया। दोनों की सोचो, सुहागरात को तरस गए दोनों। डेढ़ के बाद एक और महीने का प्लास्टर चढ़ गया। सुहागरात तीन महीने बाद हुई।"
सभी ठहाके मार कर हंसे। "सुहागरात तीन महीने बाद।"
"आजकल कहां है मुटल्ली?"
"लखनऊ रह रही है। मजे की बात यह है कि उसके बच्चे भी उससे मोटापे में कम नही हैं।"

कुछ बात पलटी। मौसाजी ने बात आगे बढ़ाई।
"जब हमारी शादी हुई, तब घूंघट का रिवाज था। हमारे पिताजी के सामने सब घूंघट करते थे। जब वे दुकान चले जाते थे, तब एक सेकंड में घूंघट गायब हो जाता था। पिताजी को यह मालूम था फिर भी उनकी इच्छा थी कि घर की बहुएं घूंघट करें। शाम को जब दुकान से आते थे, घर के दरवाजे पर एक मिनट रुक कर नकली खांसी करते थे, ताकि सब को मालूम हो जाए कि घूंघट का समय हो गया। हमारी नई-नई शादी हुई थी। तुम्हारी मौसी के साथ फिल्म देखने गया। फिल्म ख़त्म हुई और चाट-पकोड़े खाने के लिये रुके। पिताजी ने देख लिया। किसी काम से वहां से गुजरे थे। उस समय तो कुछ नही कहा, परन्तु जब हम घर पहुंचे तब मेरी खाट खड़ी कर दी कि दुल्हन ने घूंघट क्यों नही किया था। पूरी दुनिया में जिस्म की नुमाईश हो रही थी। क्या करते, डांट खाई। उस दिन के बाद जब भी घर से निकलते, मन में खटका लगा रहता कि कहीं किसी मोड़ पर पिताजी टकर जाएं।"

खाने समय हो गया और ढाबे वाला खाना लेकर गया। अब फूफाजी ने कहना शुरू किया।
"देखो अब खाना गया है। हम सब खाना खाएंगे। दाल मखनी हम सब की पहली पसंद है। हमारे पिताजी चूहले की मध्यम आंच पर दाल बनाते थे। अब तो किसी के भी पास समय नही है। कुकर में फटाफट खाना बनाते हैं हम सब। उस ज़माने में कुकर का चलन भी नही था और कुकिंग गैस भी नई-नई आई थी, लेकिन पिताजी को तो चूहले की मंद आंच पर बनाई दाल ही पसंद थी। हर रविवार को सुबह चूहले पर दाल बनने रखते थे। उसकी खुशबु पड़ोस तक जाती थी। बिलकुल साथ वाले मकान में गुजराती परिवार रहता था। दाल की खुशबु सूंघ कर पिताजी को कहते कि उनके हिस्से की दाल जरूर रखना, क्योंकि जो स्वाद चूहले की मंद आंच पर बनी दाल का आता था, वो किसी होटल, ढाबे या रेस्टॉरेंट में नही मिलती। पिताजी भी कहते कि दाल खानी है तो घर आकर हमारे साथ खाओ। घर नही भेजूंगा। वह गुजराती परिवार हमारे घर ही खाना खाता था। क्या दिन थे जब पूरे परिवार के साथ पडोसी भी मिल कर एक साथ खाना खाते थे।"

इसी तरह हंसी मजाक में दूसरा और तीसरा दिन बीत गया। चौथे दिन बिरादरी का उठाला हो गया और सभी रिश्तेदारों ने विदा ली। शादी हो या मौत, रिश्तेदार एकत्रित होते है, जश्न मनाते है और विदा हो जाते हैं। फर्क सुतली जैसा है कि मौत में नाच-गाना नही होता। बस चंद पलों का अफ़सोस और फिर वही मस्ती।
सब विदा हो गए। कल्पना ने अर्चना और बिंदु को कहा कि आते रहना, हालांकि उसे भी मालूम था कि हर व्यक्ति अपने में व्यस्त है, मिलना तो कभी कभार ही होना है।

करण व्यापार में व्यस्त हो गया और कल्पना घर में अकेली। अब सिर्फ कमल की यादें रह गई। पहले कमल की तीमारदार में व्यस्त रहती थी, अब ऑफिस का थोड़ा बहुत काम देख लेती है और अधिकतम समय खाली। दिन तो गुजर जाते हैं पर कमल की यादें रातों में सताती है। करवटे बदलते रातें कटती हैं।


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