Wednesday, November 23, 2016

अपमान



रात के साढ़े आठ बजे सुनील ने फ्लैट की घंटी बजाई। वैसे तो हर रोज तुरन्त फ्लैट का दरवाजा खुल जाता है। ऑफिस से सुनील का घर आने का समय यही आठ-साढ़े आठ बजे का है। सुनीता फ्लैट की घंटी बजते ही समझ जाती थी कि सुनील गए हैं। आज ऐसा कुछ नही हुआ। दरवाजा नही खुला, सुनील ने फिर से घंटी बजाई। कुछ देर बाद सुनीता ने दरवाजा खोला और बिना कुछ कहे चुपचाप कमरे में वापिस चली गई। सुनील ने देखा कि बैठक की बत्ती भी नही जली है। घर में अंधेरा है और शयनकक्ष में छोटी बत्ती जल रही थी। सुनील हैरान हो गया। बैठक की बत्ती सुनील ने जलाई। शयनकक्ष में सुनीता की आंखों में आंसू थे।

"क्या हुआ सुनीता, तबियत तो ठीक है ?" सुनील ने सुनीता से पूछते हुए शयनकक्ष की बड़ी बत्ती जलाई।
सुनील के पूछते ही सुनीता फूट-फूट कर रोने लगी। सुनील ने उसे ढाढस दिया। "क्या हुआ, बता तो सही? यूं रोने से कुछ हल नही निकलेगा।" सुनील ने सुनीता को अपने सीने से लगाया। तीन-चार मिनट के बाद सुनीता का रोना बंद हुआ। पल्लू से आंसू पोंछे लेकिन कुछ कहा नही। सुनील ने पीने को पानी दिया। सुनीता ने पानी पिया और फिर रोने लगी। सुनीता को बारंबार रोते देख सुनील चिंतित हो गया। उसे कुछ समझ नही रहा था कि आखिर सुनीता को क्या हो गया है।

"सुनीता कुछ तो बोलो, ऐसे रोने से किसी समस्या का समाधान नही निकलेगा।"
कुछ देर बाद सुनीता से कहना शुरू किया। "आपको मालूम है कि लाली की शादी है?"
"लाली की शादी? मेरे पास तो कोई खबर नही है।"
"मुझे भी शाम को पता चला। सुनील कमाल हो गया कि तुम्हें और मुझे बताया। अगले सप्ताह लाली का विवाह है। छः महीने पहले मंगनी हुई और मुझे किसी ने फोन तक नही किया।"

लाली सुनीता की छोटी बहन है। लाली सब प्यार से बुलाते हैं, घर का नाम। नाम है लवलीन। सुनीता के माता-पिता आर्थिक रूप से संपन्न थे। अमीर श्रेणी में गिनती होती है। कॉलेज में पढ़ते सुनीता का सहपाठी सुनील से प्यार हो गया। सुनील मध्यमवर्ग परिवार से था। सुनीता के परिवार ने विवाह की मंजूरी नही दी थी और सुनीता से सुनील से कोर्ट मैरिज की। समाज में मुंह दिखाने खातिर विवाह को स्वीकार तो कर लिया परन्तु सुनील और सुनीता से दूरी ही रखी। सुनील को जंवाई का दर्जा नही मिला, वो इज़्ज़त और खातिरदारी ससुराल में कभी नही मिली, जिसका वो हकदार था। सुनील ने हकीकत को समझ स्वयं ही अपने ससुराल से दूरी ही रख ली, लेकिन सुनीता का मन नही मानता था, वह अपने मायके जाती थी। उसे इस बात की कभी शंका नही हुई कि उसे मन से भुला दिया गया है, सिर्फ दुनिया को दिखाने के लिए और अपनी बिरादरी में इज्जत की खातिर सुनीता को सम्मान दिया। समय बीता और दूरी रख ली। राखी और भाईदूज के त्योहार भी सिर्फ औपचारिकता ही होकर रह गए। भाइयों का न्योता आना बंद हो गया फिर भी उसका मन नही मानता था और स्वयं ही मायके चली जाती। सुनील ने ससुराल जाना बंद कर दिया क्योंकि वहां उसे साथ अनचाहे मेहमान की भांति व्यवहार किया जाता था जिस कारण वह अपमानित महसूस करता था।

अमीरी और गरीबी ही दो परिवारों के बीच दूरी का कारण बनी। सुनीता का मायका बहुत अमीर है, यह सत्य है परन्तु सुनील गरीब तो नही है, मध्यवर्गीय है। अपनी और सुनीता की हर जरुरत पूरी हो जाती है। यह एक अलग सत्य कि विलासता नही थी। दो कमरों का फ्लैट जहां रहते है, लोन पर लिया, जिसकी मासिक क़िस्त जाती है। कार भी है उसकी भी मासिक क़िस्त जाती है, आवश्कयता की हर सामग्री घर में है परन्तु विलासता की नही।

उसकी साली लाली का रिश्ता किया और अब शादी है। इसकी खबर सुनील और सुनीता को नही दी, सुनीता सदमे में गई, लेकिन सुनील को कोई आश्चर्य नही हुआ।
"सुनीता तुम्हे किसने बताया?"
"बुआजी ने।"
"आग लगाने के लिए बताया। जब छः महीने पहले रिश्ता पक्का हुआ तब क्यों नही बताया। आज भी बताती तो अच्छा होता।" सुनील की आवाज में नाराजगी थी।
"अगर बुआ बताती तो मुझे मालूम भी नही पढता?"
"तुम्हारा दिल भी नही टूटता।"
"मुझे घर का सदस्य नही मान रहे?"
"बिलकुल सच, आज तक मुझे जंवाई नही माना और तुम्हे पुत्री समझना छोड़ दिया।"
"समझने से क्या होगा, उनकी पुत्री हूं, कोई नही झुठला सकता।"
"कानूनी रूप में तुम उनकी पुत्री हो और मैं जंवाई, परन्तु जबरदस्ती तुम उनके मुख से यह बात निकलवा नही सकती। वो रिश्ता नाता तोड़ चुके हैं। तुम्हे इस सत्य को स्वीकार कर लेना चाहिए।"
"ऐसा नही होता सुनील।"
"सुनीता तुम्हे अब हकीकत को समझ जाना चाहिए। आज हमारे साथ नाता नही रखना चाहते, कल नाता फिर से जुड़ भी सकता है। मिलना और बिछुड़ना एक सिक्के के दो पहलू हैं, समयानुसार सिरे बदलते रहते हैं।"
"सुनील तुम क्या कहना चाहते हो?"
"यही कि अधिक मत सोचो। यदि बुलावा आता है तब शादी में शामिल होना और यदि नही बुलाते तब दिल और दिमाग पर अधिक जोर नही देना, शायद नियति को यही मंजूर है। बिन बुलाए शादी में शामिल नही होना।"
"मैं जरूर जाऊंगी।"
"बिन बुलाए?"
"हां, घर की पुत्री हूं, मुझे बुलावे की क्या जरुरत?"
"सुनीता तुम सही कह रही हो कि घर के सदस्यों को किसी आमंत्रण की आवश्कयता नही होती परन्तु जब रिश्तों में खटास हो तब बिन बुलाए हरगिज़ नही जाना चाहिए। सुनीता यह मेरा मत है और सयाने और बुजुर्गों ने भी ऐसा ही कहा है।"
"सुनील मैं जाऊंगी।"
"एक बार फिर से सोच लो, मैं नही जाऊंगा।"
"मेरा साथ नही दोगे?"
"साथ पूरे जीवन में देना है पर मेरी ससुराल में मेरा सम्मान नही होता और जहां स्वयं को अपमानित महसूस करो वहां नही जाना चाहिए।"
"क्या मैं अकेली जाऊं?"
"मैं अब भी यही कहूंगा कि जब तक न्योता नही आए, जाना मत। तुम्हे सती की कथा तो मालूम ही है?"
"कौन सी कथा?"
"जब दक्ष ने यज्ञ आयोजित किया तब उसने अपनी पुत्री सती और जंवाई शिव को आमंत्रित नही किया क्योंकि शिव को कभी मन से सती का पति स्वीकार नही किया। मुझे भी तुम्हारे माता-पिता ने आज तक जंवाई के रूप में स्वीकार नही किया है। सती यज्ञ में जाने की आतुर थी, जैसे तुम हो। शिव ने सती को मना किया, जो मैं कर रहा हूं।"
"मैं जाना चाहती हूं।"
"यदि सती की तरह तुम भी जाना चाहती हो, मैं नही रोकूंगा। दक्ष ने सती और शिव का अपमान किया। सबका सिंघासन रखा था लेकिन शिव के लिए कोई सिंघासन नही था। सती अपमानित हुई और अग्निकुंड में अपनी जान दे दी थी।"

कुछ क्षण के बाद सुनील ने कहा "यदि जाना चाहती हो जरूर जाओ परन्तु यदि अपमानित महसूस करो तब चुपचाप वहां से प्रस्थान करना और घर जाना।"
"आप भी साथ चलो?"
"नही, मुझे आज तक ससुराल में मान नही मिला, मैं शुभ विवाह के अवसर पर अपमानित नही होना चाहता।"

सुनील ने रोका तो बहुत परन्तु सुनीता भावनाओं में बह कर अपनी छोटी बहन लाली के विवाह पर अपने मायके पहुंच गई। घर में विवाह की हलचल चारों ओर थी।

आठ सो गज के क्षेत्र में बनी विशाल और भव्य कोठी के गेट पर ऑटो से सुनीता उतरी। एक नजर कोठी पर डाली, चारों ओर जगमगाती बत्तियों के बीच छटा निराली ही थी। होठों पर हलकी सी मुस्कान आई और ऑटो वाले को किराया दिया। अपना सूटकेस गेट पर रखा और दरबान से गेट खोलने को कहा। दरबान नया था और वह सुनीता को नही पहचानता था। सुनीता लगभग एक साल बाद अपने मायके आई थी।

"किससे मिलना है?"
दरबान के इस प्रश्न पर सुनीता भड़क गई। "क्या मतलब है तुम्हारा? अपने घर में जाने के लिए मुझे किसी से पूछना होगा। चलो सामान अंदर पहुंचाओ और गेट खोलो।"
"मैं आपको नही जानता। अपना नाम बताएं और किससे मिलना है?"

कोठी के दरबान का उसे रोकना और उसका नाम पूछना सुनीता को अपमानित कर गया। उसने स्वयं ही कोठी का गेट खोलने के लिए सांकल खोली और गेट को धकेलने लगी। दरबान ने सुनीता का हाथ पकड़ लिया और गेट नही खोलने दिया। सुनीता दरबान के रवैये पर हैरान हो गई। कुछ पलों तक सुनीता चुपचाप दरबान को घूरती रही फिर सूटकेस हाथों में लिया और दरवाजे को खोल अंदर गई।

उसी समय उसके माता-पिता और बुआ बाहर आए। ऑडी कार जाने के लिए तैयार खड़ी थी। ड्राइवर ने कार का गेट खोला। सुनीता के माता-पिता ने सुनीता को देखा और अनदेखा कर कार में बैठ गए। बुआ सुनीता के समीप आई और तीखे स्वर में बोली।
"सुनीता तुम यहां क्यों आई?"
"बुआ लाली मेरी छोटी बहन है, उसकी शादी में आई हूं।"
"जब तुम्हे बुलाया ही नही तब क्यों आई?"
"आपने ही तो शादी का बताया था।"
"मैंने तुम्हे बताया था कोई आमंत्रण नही दिया था। बिना आमंत्रण किसी के विवाह में सम्मलित नही होते यह तो तुम्हे मालूम होगा।"
"क्या अपनों को भी आमंत्रण की आवश्कयता होती है?"
"सुनीता होती है जब तुम्हारे पापा नही चाहते, अब तुम वापिस चली जाओ।"
"बुआ तुम्हारे कहने से तो नही जाऊंगी। मैं पापा से बात करती हूं।" इतना कह कर सुनीता कार की और बढ़ी।
"सुनीता रुको, आगे आने की कोई जरुरत नही है। जब हमने तुम्हे नही बुलाया तब शादी में आने की कोई जरुरत नही है।"
"पापा क्यों?"
"मुझे पसंद नही कि इस शादी में तुम अपनी गरीबी सबके सामने दिखा कर मेरी नाक कटवाओ। लाली की शादी हमारे से भी ज्यादा अमीर खानदान में हो रही है। शादी के समारोह में शहर के क्या देश के अमीर व्यापारी, उद्योगपति और सरकारी अधिकारी उपस्थित होगें। उनके सामने मैं तुम्हारे फटीचरपने की नुमाईश नही करना चाहता। मैं नही चाहता कि किसी को भी भनक लगे कि मेरी लड़की दो कमरों के टूटेफूटे फ्लैट में रहती है और मेरा जंवाई छोटी-मोटी नौकरी करता है, इसलिए लाली की शादी में कोई जगह नही है।"
"क्या आप की नजरों में सिर्फ रूपया पैसा ही सब कुछ है। रिश्ते भी रुपये के तराजू में तुलते हैं। लड़की भी पराई हो गई?"
"तुम हमारे लिए तभी पराई हो गई थी जब तुमने दो टके के छोकरे से शादी कर हमारे मुंह पर कालिख पोती थी। यह तुम क्या जानो कि हमने अपमान का घूंट कैसे पिया था। जितनी तनख्वा सुनील को मिलती है उससे ज्यादा के नौकर मेरे ऑफिस में धक्के खाते हैं। सुनीता तुम्हारा और हमारा कोई मेल नही अब रास्ते से हट जाओ, हमें लाली की शादी की शॉपिंग पूरी करनी है।" इतना कह कर पापा ने ड्राइवर को कार चलाने को कहा और खिड़की के शीशे बंद कर दिए।

कार चली गई। सुनीता चुपचाप कोठी के बाहर फुटपाथ पर गुमसुम बैठ गई। दरबान ने सुनीता से मांफी मांगी क्योंकि वह पहचान नही सका।
"तुम्हारा कोई कसूर नही। तुम अपना फर्ज निभा रहे थे।"
"कहां जाओगी बहन?
दरबान के मुंह से प्यार भरा बहन शब्द सुन कर सुनीता की आंखें भर गई। माता-पिता ने नाता तोड़ दिया और एक मामूली सा इंसान इंसानियत का आदर्श बन गया।
"ऑटो।" सुनीता ने हलके से सिर्फ इतना ही कहा।
दरबान ने एक खाली जा रहे ऑटो को रोका। सुनीता ऑटो में बैठी। घर पहुंच कर सुनील के सीने पर अपना सर टिका दिया। सुनील ने सुनीता को बांहों में लिया।
"सुनील मैं तुम्हारे साथ रह कर बहुत खुश हूं।" और आंखों से अश्रु बह निकले।


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