Friday, December 30, 2016

सांझ


"राकेश दो दिन की छुट्टी ले सकते हो?" रीना ने रविवार की सुबह बालकनी में बैठ चाय पीते हुए राकेश से पूछा।
"क्या हुआ?"
"बहुत दिन क्या मुझे लगता है कि सात-आठ वर्ष बीत गए होंगे हमें छुट्टी पर कहीं बाहर गए हुए।"
"हां, एक लंबा समय बीत गया होगा। पहले हम हर छः महीने बाद कहीं न कहीं अवश्य जाते थे। लगभग सभी जगह हमने देखी हैं।"
"राकेश वो तो ठीक है, शादी के बाद पूरा देश घूमे फिर बच्चे हुए तब उनके साथ घूमे लेकिन अब तो सात-आठ वर्ष से कहीं नही गए। घर में बंध गए हैं।"
"रीना अब हम वानप्रस्थ आश्रम में हैं।"
"राकेश इन आश्रमों को छोड़ो। कहीं एकान्त में कम से कम दो दिन बिताना चाहती हूं। गृहस्थी में फंस कर रह गई हूं। तुम तो सुबह ऑफिस के लिए निकलते हो रात में घर वापिस आते हो। रविवार की छुट्टी होती है, दूसरा और चौथा शनिवार भी छुट्टी। मेरी कौन सी छुट्टी होती है, रविवार तुम क्या, बच्चे भी आराम करते हैं और मैं रसोई और घर के बाकी कार्यों में व्यस्त रहती हूं। सोचती हूं कहीं मशीन तो नही बन गई?"
"रीना, ऑफिस की जब छुट्टी होती है, मैं कौन सा आराम करता हूं। घर के सभी काम निबटाता हूं।"
"राकेश तभी कह रही हूं कि कहीं चलो, दो दिन ही सही, कुछ सकून मिले। कुछ हट कर दिनचर्या, जब कोई तनाव नही होगा।"
"अर्थात तनावमुक्त?"
"बिलकुल सही, जहां कोई चिंता न हो।"
"कहां चले?"
"मुझे कहीं घूमना नही है। बस सिर्फ तनावरहित वातावरण में ले चलो। प्रकृति की गोद में।"

राकेश ने कुछ सोच विचार मन ही मन किया और कुछ छणों बाद रीना से कहा। "मैं ऑफिस में काम की प्राथमिकता देख कर दो-तीन दिन में कहीं जाने का कार्यक्रम बनाता हूं।"

राकेश ने अगले दिन ऑफिस में काम की प्राथमिकता देख कर बुद्ध, वीर और शुक्रवार की छुट्टी ले ली और शनिवार चौथा ऑफिस बंद और रविवार भी छुट्टी। कुल पांच दिन रीना और राकेश को एकान्त में बिताने के लिए मिल गए। दोनों ने ऋषिकेश में ये दिन बिताने की सोची।
"ट्रेन की टिकट बुक करवा लो।" रीना ने आग्रह किया।
"जनरल कोच में जाने की अब हिम्मत नही है। एसी कोच में वेटिंग है। कार में चलते है।" राकेश ने कहा।
"लंबी यात्रा हो जाएगी। खुद ड्राइव करोगे थकान होगी। कम से कम छः घंटे की ड्राइव तो हो जाएगी।"
"सुबह चलते है छः बजे। तब सड़कों पर ट्रैफिक नही होता, आराम से ड्राइव होगी। मुझे आंनद आता है लंबी ड्राइव में। मुद्दत हो गई हम दोनों, सिर्फ हम दोनों अकेले लंबी ड्राइव में गए होंगे। कोई बात नही छः घंटे लगें या सात, हमारा कोई व्यापार तो चल नही रहा। छुट्टी पर एकान्त में मन की शांति के लिए जा रहे हैं। बस तुम सूटकेस बनाओ और खाने पीने का थोड़ा सामान भी रख लेना।"

बुधवार सुबह छः बजे राकेश और रीना अपनी कार से ऋषिकेश के लिए रवाना हुए। अक्टूबर महीने की सुबह हल्की ठंडक थी। सड़के खाली, दिल्ली का ट्रैफिक अभी शुरू नही हुआ था। चालीस मिनट में दिल्ली छोड़ उत्तर प्रदेश में प्रवेश किया। मन पसंद गीत सुनते हुए रास्ते में नाश्ते के लिए आधा घंटा रुक कर कुछ आराम किया और हल्का नाश्ता किया। मध्यम रफ़्तार से कार चलाते हुए लंबे सफर का भरपूर आनंद लेते हुए छः घंटे में दोपहर के बारह बजे ऋषिकेश पहुंचे।

कोयल घाटी में एक भवन में रुके। गंगा किनारे बने भवन के कमरे से मनमोहक दृश्य दिख रहा था। बालकनी में कुर्सी पर बैठ कर सफर की थकान दूर करते हुए सामने पर्वत श्रृंखला के नीचे पवित्र गंगा मध्यम गति से कल-कल के स्वर में बहती जा रही थी। दिल्ली में यह कुदरती नजारा देखने को नसीब नही होता। आधे घंटे तक कमरे की बालकनी से कुर्सी पर बैठे हुए प्राकृतिक दृश्य को देख आनंदित होते रहे। फिर दोपहर का खाना खाने नीचे उतरे। भवन में खाना सिर्फ रसोई में बैठ कर खाने की अनुमति थी। डाइनिंग रूम बहुत बड़ा था जहां दस टेबल लगी हैं और हर टेबल पर छः-छः कुर्सियां। आराम से एक साथ साठ व्यक्ति खाना खा सकते हैं। जब राकेश और रीना डाइनिंग रूम में पहुंचे, लगभग बीस व्यक्ति पहले से खाना खा रहे थे। उनके कुर्सी पर बैठते ही थाली आ गई। स्टील की गोल थाली और उसमें चार छोटी कटोरियां। एक दाल, दो सब्जी और रायते के साथ सलाद, पापड़, अचार, चावल और चपाती। बिलकुल घर जैसा हल्का भोजन। कम मात्रा में पहले सब्ज़ियां देते है, मगर जितनी भूख है, बार-बार कटोरियां भर जातें हैं। राकेश और रीना को घर जैसा खाना खा कर आनंद आया।

खाना खाने के बाद दोनों ने आराम किया। सफर की थकान के कारण नींद आ गई। चार बजे उठ कर दोनों फिर से डाइनिंग रूम गए और चाय पी। रात के खाने के लिए रसोई में अपना नाम लिखवा दिया। भवन में खाना रहने वालों और काम करने वाले के लिए ही बनता है। अधिक नही बनाते, जितने लोग, उतना खाना, बात सही है कि अधिक बना कर बर्बाद करने से अच्छा है कि जरुरत के मुताबिक बनाया जाए।
राकेश और रीना भवन के पीछे पैदल पथ पर आ गए। एकदम शांत वातावरण, शाम की सैर के शौकीन ही टहलते नज़र आ रहे थे। कुछ दूर चलने के पश्चात दोनों एक बेंच पर बैठ शांत बहती गंगा को निहारने लगे। धूप ढल रही थी। गंगा के दूसरे छोर पर पर्वत श्रंखला पर सूरज की सुनहरी धूप धीरे-धीरे भूरी छटा में परिवर्तित होने लगी।
"कितना अच्छा लग रहा है। भीनी हवा, मस्त चाल में चलती गंगा कल-कल की मधुर संगीत के साथ, सामने पर्वत श्रृंखला और एकान्त पैदल पथ। इन्ही पलों को तुम्हारे साथ बिताना चाह रही थी।" रीना ने राकेश के हाथों को अपने हाथों में ले कर कहा।

"दिल्ली महानगर की भागती जिंदगी में हम जीवन बस बिता रहे है उसको जीते नही हैं। हर जगह भीड़भाड़, एकान्त को तरस जाते हैं। यहां प्रकृति की गोद में जीवन का भरपूर आनंद उठाया जा रहा है।" राकेश ने पवित्र गंगा को निहारते हुए कहा।
"जितनी पवित्र गंगा यहां है, वैसा ही सुन्दर वातावरण। राकेश क्या हम यहां रह नही सकते?"
"यही विडंबना है रीना, जो यहां रहते हैं वो शहर की ओर भागते है क्योंकि यहां शांति है अधिक पैसा नही। शहर में अधिक पैसा है परन्तु शांति नही। तुम इस भवन के मालिक को देखो, इतना बड़ा भवन बनवाया और अपने लिए कुछ कमरे बंद रखे हुए हैं, जब आते हैं रहते है परन्तु कब आते होंगे। शायद वर्ष या दो वर्ष में एक बार, दो या चार दिन रुक कर वापिस अपने व्यापार में उलझ जाते हैं और हम यहां रहना चाहते हैं पर हमारे पास साधन नही हैं, रह नही सकते।"
"कोशिश कर के देखो कोई भी एक-दो कमरों का छोटा सा मकान, जहां जीवन की सांझ चैन से बीते।"
"अच्छा तो लगता है कि किसी शांत जगह रहें। शांत और स्वच्छ वातावरण में रहने से स्वास्थ्य भी अच्छा रहता है। घर के समीप ऑफिस या दुकान, न तो आने-जाने की चिंता और परिवार के साथ भरपूर समय बिताने का सुनहरी अवसर। दिल्ली की जिन्दगी बस भागदौड़ की है। सुबह उठते ही ऑफिस जाने की चिंता, डेढ़ घंटा ऑफिस जाने के लिए, ऑफिस में काम फिर शाम को डेढ़ घंटे की थकान वाला समय घर वापिस आने के लिए। थकान से चूर सिर्फ मुश्किल से आधा घंटा मैं और तुम आपस में समय बिताते हैं।"
"फिर कुछ सोचो और कुछ करो कि जीवन की सांझ में बूढ़ा-बूढ़ी दिल की कुछ बातें करें और शांत मन से स्वच्छ वातावरण में रहें।"
"बात तुम्हारी सही है परन्तु जैसा हम सोचते हैं वैसा होता नही है।"
"तुम नकारात्मक क्यों सोचते हो?"
"मेरी सोच सकारात्मक है। उनसठ का हो गया हूं। साठ में रिटायरमेंट होनी है। घर का होम लोन है, उसकी क़िस्त में आधी तनख्वा निकल जाती है। सोचा था कि बच्चों का आर्थिक सहयोग मिलेगा इसलिए बड़ा मकान लिया और ऋण भी अधिक ले लिया। घर के दूसरे खर्चे भी करने पड़ते हैं। बच्चे अपनी दुनिया में मस्त रहते हैं। अपने ऊपर खर्च करते हैं, घर के खर्चों में सहयोग मिलता नही। क्या करे? जैसा समय आ रहा है, बिता रहे हैं।" कह कर राकेश गंगा के बहते जल को निहारने लगा।
बस आर्थिक मजबूरियां गिना दी राकेश ने। रीना भी गंगा के बहते जल को निहारने लगी। वास्तविकता उसे मालूम थी, इस कारण चुप रही।

कुछ देर की चुप्पी के पश्चात दोनों उठ कर चुपचाप पैदल पथ पर त्रिवेणी घाट की ओर चलते हैं। धीरे-धीरे चलते-चलते दोनों लगभग बीस मिनट में त्रिवेणी घाट पहुंचते हैं। खामोश कोई बातचीत नही। समय पौने छः बजे का हो रहा था। छः बजे के संध्या आरती की तैयारी हो चुकी थी। घाट पर भजन संध्या हो रही थी। रीना और राकेश भजन सुनने बैठ गए। मधुर, मनमोहक सुर और आवाज में भजन सुन राकेश और रीना मंत्र मुग्ध हो गए। बुझा मन तरोताजा हो गया। दोनों ने एक दूसरे की ओर देखा और मुस्कुरा दिए और भजन सुनने में मग्न हो गए। ठीक छः बजे गंगा आरती आरम्भ हुई। अतुलनीय, दर्शनीय और मनमोहक आरती ने राकेश और रीना को मंत्रमुग्ध कर दिया। आरती में सम्मलित होकर रीना और राकेश अपनी समस्याएं भूल गए और आरती समापन के पश्चात बाजार में घूमते हुए दुकानों को देखते हुए वापस भवन में आ गए। आठ बजे थे, रात का भोजन तैयार था। डाइनिंग रूम में बैठ गए। रसोइए ने थाली परोसी।

खाने के पश्चात कमरे में बिस्तर पर बैठ टीवी देखते हुए दोनों सुखद यात्रा पर चर्चा करने लगे। दिल्ली से ऋषिकेश का लंबा सफर, एक लॉन्ग ड्राइव का आनंद और ऋषिकेश में गंगा का किनारा, मरीन ड्राइव पर सैर का लुत्फ़ और अतुलनीय गंगा आरती में आनंद विभोर होना। दिल्ली की भागमभाग ज़िन्दगी से विपरीत ऋषिकेश का शांत वातावरण रीना और राकेश के ह्रदय को परिवर्तित कर गया। वैसे तो कई बार रीना और राकेश दिल्ली से बाहर छुट्टी मनाने निकले परन्तु एक लंबे अरसे के बाद एक अनोखा सुकून मिला। विवाह के पश्चात दोनों इतने आनंदित हुए थे और आज लगभग पैंतीस वर्ष बाद फिर उतना आनंद लौट कर आया। बीच का समय बच्चों की परवरिश, उनके विवाह फिर पौत्र-पौत्री के लालन पालन में अपने खुद को दोनों भूल चुके थे। आज जीवन की सांझ में फिर एक दूसरे को समझने का एकान्त समय मिला।

कल सुबह आराम से उठेंगे, यह कह कर रीना सोई पर आदत के अनुसार सुबह साढ़े पांच बजे रीना की नींद खुली। राकेश सो रहा था। अपनी दिनचर्या के अनुसार स्नान किया और ध्यान में बैठ गई। ध्यान के बाद रीना भजन गुनगुनाने लगी

ऐ श्याम तेरी मुरली, घायल कर जाती है।
मुस्कान तेरी मीठी, दिल को चुराती है।।

जो होती सोने की तो क्या करते तुम मोहन।
यह बांस की होकर के, इतना तड़पाती है।।
ऐ श्याम तेरी मुरली, घायल कर जाती है।
मुस्कान तेरी मीठी, दिल को चुराती है।।

तुम गोरे होते तो, क्या करते तुम मोहन।
तेरे काले रंग पर भी, दुनिया मर जाती है।।
ऐ श्याम तेरी मुरली, घायल कर जाती है।
मुस्कान तेरी मीठी, दिल को चुराती है।।

तुम जमुना पे आते हो और रास रचाते हो।
राधा को मनाने की, अदा तुमको आती है।।
ऐ श्याम तेरी मुरली, घायल कर जाती है।
मुस्कान तेरी मीठी, दिल को चुराती है।।

तुम माखन चुराते हो, ग्वालों को खिलाते हो।
तुम्हे चोरी करने की, आदत ही पुरानी है।।
ऐ श्याम तेरी मुरली, घायल कर जाती है।
मुस्कान तेरी मीठी, दिल को चुराती है।।

मुरली जब बजती है, सौतन सी लगती है।
मेरा तो दिल यह, छलनी कर जाती है।
ऐ श्याम तेरी मुरली, घायल कर जाती है।
मुस्कान तेरी मीठी, दिल को चुराती है।।

कर्णप्रिय मधुर स्वर राकेश के कानों में पड़े। राकेश ने उठ कर रीना को बांहों में ले लिया।
"प्रभात वेला प्रभु वंदन की होती है, इश्क लड़ाने की नही।" रीना ने अपने को राकेश की बांहों के बंधन से छुड़ाने की कोशिश की लेकिन राकेश ने एक चुम्बन रीना के गालों पर अंकित का दिया।
"प्यार करने की कोई सीमा नही होती और समय का बंधन भी नही होता।" राकेश ने रीना को बांहों के बंधन से मुक्त किया।
"कुछ उम्र का ख्याल करो। दादा बन चुके हो।"
"प्रेम के लिए उम्र नही दिल देखना चाहिए रीना रानी।"
"लगता है सठिया गए हो।"
"अभी डेढ़ साल है सठियाने में। अभी साढ़े अठावन का हूं, जब साठ का हो जाऊंगा, तब साठीयांउंगा।"
"अच्छा यह डेढ़ साल का कारण स्पष्ट कीजिए।"
"देखो साठ की उम्र होती है सठियाने की। साठ और सठियाना। तभी तो रिटायरमेंट की उम्र साठ रखी है। आदमी सठिया जाता है, रिटायर कर दो।"
"छोड़ो मजाक की बात। गंगा किनारे चिंतन करने चलते हो?"
"चलो, दस मिनट दो, फ्रेश हो लूं। दांत ब्रश कर लूं।"

राकेश दस मिनट बाद फ्रेश हो गया और फिर रीना के संग गंगा किनारे सुबह की सैर करने लगे। पैदल पथ पर इक्का-दुक्का सुबह की सैर करने वाले आ जा रहे थे। कुछ तेज गति से तीव्र सैर और कुछ धीरे-धीरे सैर कर रहे थे। हलकी सी ठंडक थी। गंगा के दूसरे छोर की पर्वत श्रृंखला की चोटी के पीछे से लालिमा आने लगी। सूर्य उदय का समय हो रहा था। कुछ दूर सैर करने के बाद दोनों गंगा किनारे एक बेंच पर बैठ गए।
"सुबह हलकी ठंडक है मौसम में।" कहते हुए रीना ने उगते सूर्य को नमस्कार किया।
"स्वच्छ वातावरण, कोई प्रदूषण नही, गंगा का किनारा और दूसरी तट पर पर्वत श्रृंखला के कारण मौसम दिल्ली से बहुत अच्छा है। यहां के स्थानीय लोग तो स्वेटर, जैकेट और शाल पहने हैं और हम बिना गर्म कपड़ो में।" राकेश ने भी सूर्य को नमस्कार किया।
"राकेश उधर सीढ़ियां नीचे उतरने के लिए हैं। चलो गंगा के तट पर बैठते हैं।"
"यहां घाट तो नही है पर गंगा के तट पर बैठने और नहाने के लिए जगह बनी हुई है। चलो नीचे उतरते हैं।"
"हां घाट तो त्रिवेणी घाट है, राम झूला, लक्ष्मण झूला पर हैं। चलो राकेश नीचे उतरते हैं।"
गंगा के किनारे थोड़ी-थोड़ी दूर पर नीचे उतरने की सीढ़ियां थी जहां बड़े पत्थरों से छोटे-छोटे बैठने के स्थान बने हुए है। दस पंद्रह व्यक्ति आराम से बैठ सकते हैं। रीना और राकेश सीढ़ियों से नीचे उतरे। वहां कोई नही था। आंखे बंद करके दोनों ध्यान में बैठ गए। धीरे-धीरे प्राणायाम करने लगे। सूर्य की प्रथम किरणें दोनों पर पड़ी और होठों पर मुस्कान आ गई। मन्द हलकी ठंडी हवा पर सूर्य की किरणें सुकून दे रही थी।

पंद्रह मिनट बाद राकेश ने आंखें खोली। रीना अभी भी ध्यान मुद्रा में मग्न थी। काम की व्यस्तता के कारण राकेश कम ही ध्यान में बैठ पाता था लेकिन रीना को शाम के समय फुर्सत होती है तथानुसार उसने संध्या वंदना और ध्यान का नियम बना रखा था। रीना को ध्यान में मग्न देख राकेश ने गंगा में अपने पैर रखे। पानी बहुत ठंडा था। शरीर में एक झुरझुरी सी उठी। पैर झट से गंगा से निकाले। कुछ क्षण रुक कर धीरे से पैरों को गंगा में किया। आधे मिनट बाद गंगा जल का तापमान सामान्य लगने लगा। राकेश एक सीढ़ी उतर कर गंगा के पानी में खड़ा हो गया। उसने घुटने तक पैर जल में कर लिए। राकेश ने हाथों में जल लेकर मुंह धोया और सूर्य को जल अर्पित कर नमस्कार किया।

रीना अब ध्यान से बाहर आ गई। राकेश को गंगा में खड़े देख उसने भी गंगा में पैर रखे। "आह, बहुत ठंडा जल है। तुमने कैसे रखे हुए है?" रीना ने जल से पैर निकल कर राकेश से पूछा।
"धीरे-धीरे रखो। एक मिनट में तापमान सामान्य लगने लगेगा।"
"हां यह तो है।"
रीना ने भी धीरे-धीरे जल में पैर रखे और राकेश के समीप आ गई और फिर एक सीढ़ी नीचे उतरी। रीना की कमर तक जल आ गया। रीना को देख राकेश भी एक सीढ़ी नीचे उतरा। हाथ पकड़ कर दोनों एक सीढ़ी और उतरे।
"राकेश डुबकी लगाएं?"
"तुम तो नहा चुकी हो?"
"क्या हुआ। गंगा में खड़े होकर गंगा स्नान नही किया तब गंगा का भी अपमान है और हमारी यात्रा भी सफल नही होगी।"
"रीना ठीक कह रही हो, पहले हरिद्वार आते थे तब हर की पौड़ी में गंगा स्नान करते थे। आज पहली बार ऋषिकेश में गंगा स्नान करते हैं।"
दोनों ने एक दूसरे का हाथ पकड़ा और गंगा में डुबकी लगाई। शरीर में कपकपी सी हुई। हाथों में जल लेकर सूर्य को अर्पित कर नमस्कार किया। फिर गंगा का नाम लेकर पांच-: डुबकी लगाई। राकेश और रीना स्नान के पश्चात बैठ गए।
"रीना स्नान तो कर लिया। बदलने के लिए कपडे भी नही उठाये थे और न ही तौलिया बदन सुखाने के लिए।"
"धूप निकल गई है। दस मिनट शांत वातवरण में फिर ध्यान लगाते हैं। अभी कपडे सूख जाएंगे।"
गीले कपड़े तन से चिपक गए थे। रीना और राकेश गंगा की मंद गति और पर्वत श्रृंखला के ऊपर होता सूर्य देखते हुए आपस में वार्तालाप करते रहे। रीना की इच्छा ऋषिकेश में जीवन की सांझ बिताने की थी। राकेश भी कुछ ऐसा ही चाह रहा था परन्तु आर्थिक मज़बूरी के चलते ऋषिकेश रहने की चाहत पूर्ण नही कर सकता था। आधे घंटे बाद हंसते हुए दोनों उठे और एक स्वर में बोले " जो हरी इच्छा।"

गीले कपड़े बहुत हद तक सूख चुके थे। अंग से चिपके वस्त्र ढीले हो गए थे। भवन लौट कर कपडे बदले और फिर नाश्ता किया।
राकेश नाश्ते के पश्चात टीवी पर न्यूज़ चैनल देखने लगा।
"जनाब टीवी देखने ऋषिकेश नही आये हैं। चलो राम झूला और स्वर्ग आश्रम की ओर चले। टीवी दिल्ली में देख लेना।"
"चलते हैं, थोड़ा आराम करने दे, घंटे बाद चलते हैं, लंच वहीँ कर लेंगे।"
"चलो न दिल्ली जाकर आराम करना। कुछ घुमक्कड़ बनो।"
"दिल्ली में आराम कहां। भागमभाग ही होनी है। यहां आई थी आराम करने। यहां भी चैन नही।"
"आराम मन का चाहिए था वह गंगा के स्नान और शांत प्राकृतिक वातावरण से मिल गया। मन शांत हो गया, अब उठो और गृहस्थी के कर्तव्य निभाओ। खाली हाथ जाओगे घर। बच्चों के लिए शॉपिंग तो करनी है।"
"महिला शॉपिंग न करे यह हो ही नही सकता। जंगल में जाएगी, वहां भी शॉपिंग जरूर करेगी।"
"जब करनी है तब करनी है। एक याद होती है कि यह चीज हम ऋषिकेश से उस वर्ष में लाए थे। चलो उठो।"
राम झूला पर कार पार्क की और बोट से गंगा पार स्वर्ग आश्रम गए। लक्ष्मण और राम झूला पर कई बार पैदल गंगा पार की। चलते समय एक हलकी सी कंपन झूले की यात्रा आनंदित करती है। अब तो स्कूटर और बाइक भी झूले पर चलती नजर आई। बोट पर गंगा पार जाने का भी एक अलग आनन्द है। झूले, दोनों छोर के घाट, शांत स्वभाव में बहती पवित्र गंगा और पीछे पर्वत श्रृंखला का नयन लुभावन दृश्य रोमांच देता है। गंगा पार रीना और राकेश छोटे बाजार और मंदिर घूमते रहे। गीता भवन में राकेश ने कुछ धार्मिक पुस्तकें खरीदी और वस्त्र भंडार से रीना ने परिवार के हर सदस्य के लिए खरीदारी की।

शाम के समय फिर त्रिवेणी घाट की गंगा आरती में सम्मलित हुए। रात को भवन की बालकनी में बैठ गंगा को शांत चाल पर मन्त्र मुग्ध हो गए। भवन की लाइट और पैदल पथ की लाइट से गंगा की चाल कलकल के मधुर स्वर से शांत वातावरण चितचोर हो गया। परिंदे सो चुके थे। आसपास के भवनों की रौशनी रात की कालिमा को मिटाने में नाकाम रहने पर भी रीना और राकेश को मदहोश बना गई। शांत वातावरण में शांत गंगा की कलकल सुन रहे थे।
अगले दिन सुबह सूर्य उदय से पहले दोनों गंगा तट पर चटान पर बैठ गए। अभी अंधेरा था, रात की कालिमा कुछ ही पलों में हटने वाली थी। काला आसमान धीरे-धीरे भूरा हो गया। पर्वत श्रृंखला नजर आने लगी। पर्वत श्रृंखला के पीछे से आसमान भूरे से संतरी में परिवर्तित होने लगा। सूर्य उदय हो गया। दिन हो गया। कालिमा पूरी तरह से छट गई। धीरे-धीरे सूर्य पर्वत श्रृंखला के पीछे से ऊपर होने लगा। दोनों ने एक साथ हाथों में गंगा जल लिए और सूर्य को अर्पित करके सूर्य नमस्कार किया।

सूर्य की पहली किरणें ने दोनों के बदन को छुआ। गंगा के ठन्डे जल में डुबकी लगा कर किनारे ध्यान में बैठ गए। मंद हवा के झोकों पर सूर्य की किरणें बदन पर पड़ती हुई सुकून दे रही थी।
एक घंटे बाद दोनों भवन वापस आये।
"राकेश आज वापिस जाना होगा?"
"मज़बूरी है आज रविवार अंतिम छुट्टी है, कल ऑफिस जाना है।"
"फिर कब आना होगा?"
"आना जाना तो लग सकता है। कभी यहां, कभी कहीं और प्रकृति की गोद में।"
"बस यहां बसने की चाह रह गई।"
"अपना घर स्वर्ग है चाहे कितनी कमी हो। इंसान की हर इच्छा पूर्ण नही होती। कुछ मिलता है और कुछ बिछुड़ जाता है। कुछ यहां अच्छा है और कुछ अच्छा अपना घर। कमी हर स्थान में मिल जाएगी।"
"एक वादा करो कि ऐसी हसीन प्रकृति की वादियों में वर्ष में दो बार तो मुझे लेकर आओगे।"
"वादा किया एक बार गर्मी में और एक बार सर्दियों में।"
"वादा निभाओगे, भूलना नही।"
"बच्चे बड़े हो गए हैं। उनकी अपनी दुनिया है। उम्र की सांझ एक मैं और एक तुम।"
"बच्चे अकेला छोड़ेंगे। पौत्र-पौत्री को भी संभालना है।"
"बच्चों की ख़ुशी में अपनी खुशी, उनके साथ रह कर ही सांझ हंसते खेलते बीते, यही तमन्ना है।"
"चलो दार्शनिक महोदय, कार स्टार्ट करो। बच्चे प्रतीक्षा कर रहे होंगे।"
राकेश ने कार स्टार्ट की और अपने घर के लिए दिल्ली की ओर प्रस्थान किया।


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