Saturday, February 18, 2017

समर्पण ही जीवन


सुबह छः बजे कमल कुमार ने बिस्तर छोड़ दिया और दांत मांजने के पश्चात कमरे से बाहर आए। भवन में एकदम शांति थी, सभी सो रहे थे। सिर्फ रसोइया उठा था और रसोई के बाहर बैठा था, उसने अभी रसोई शुरू नही की थी। कमल भवन के पीछे गए और गंगा किनारे पैदल पथ पर सुबह की सैर की और एक बेंच पर बैठ गए। अक्टूबर के महीने की हलकी ठंड थी। कमल ने शॉल ओढ़ रखी थी। रात की कालिमा छट रही थी। आसमान काले से स्लेटी रंग में परिवर्तित हुआ। गंगा के दूसरे छोर पर पर्वत श्रृंखला के पीछे से सूर्य उदय होने लगा। आसमान स्लेटी से भूरा और नारंगी होने लगा। सूर्य की पहली किरणें कमल के बदन पर आई। कमल ने हाथ जोड़ सूर्य को नमस्कार किया और बेंच से उठ कर सीढ़ी उतर कर गंगा के जल को हाथों में लेकर सूर्य को अर्पित किया। कुछ पल गंगा किनारे ध्यान मुद्रा में बैठ गए। कुछ देर बाद कमल भवन में वापिस गए।

भवन में रसोइया अब काम कर रहा था। अपने सहायक पर झल्ला रहा था। जल्दी हाथ चला, चाय बनानी है, नाश्ता तैयार करना है। कमल ने घडी देखी। साढ़े सात बजे रहे हैं। कमल डेढ़ घंटे बाद आया था। उसने भवन प्रबंधक से समाचारपत्र लिया और पढ़ने लगा। प्रबंधक ने रसोइए को आवाज दी कि कमल साहब की चाय यहीं दे दे। प्रबंधक ने बिस्कुट का डिब्बा खोला। कमल ने एक बिस्कुट लिया और चाय में डुबो कर खाया और चुस्की लेते हुए चाय पी।

"कमल साहब, कोई कुछ भी कहे पर चाय पीने का असली आनंद चुस्की लेकर पीने में आता है और बिस्कुट खाने का मजा चाय में डुबो कर।"
"दिनेश जी, यह तो है। इस मामले में मेरी और आपकी एक राय है।"
"तभी तो आप जब भी आते हैं, आपके साथ कुछ देर बैठने का समय जरूर निकलता हूं।"
"दिनेश जी, जब दिल के तार आपस में मिलते हैं तब समय स्वयं ही निकल आता है।"
"इस बार कितने दिन रुकेंगे?"
"दिनेश जी दो दिन रुक कर आगे देहरादून और मसूरी जाना है। धनोल्टी भी एक दिन रुकूंगा।"
"लंबी छुट्टी लेकर आएं हैं इस बार?"
"अब तो छुट्टियां ही हैं। पिछले महीने रिटायर हो गया।"
"अब कुछ करने का इरादा है या फिर बच्चों के साथ आराम?"
"आराम तो नही करूंगा। दिल्ली वापस जाकर जो भी छोटा मोटा काम मिलेगा, करूंगा। खाली समय काटना मुश्किल होता है। कुछ व्यस्त रहूंगा तो अच्छा है, अपनी जेब खर्च निकल आए तो अच्छा है। बच्चों पर आश्रय कम हो तो अच्छा है।"
"कमल जी आपकी सोच एकदम शानदार है। इसी तरह मैं भी काम करना नही छोड़ रहा।"

प्रबंधक का नाम दिनेश है उनकी बातचीत का सिलसिला तब टूटा जब भवन में रहने कुछ लोग आए और दिनेश उनके साथ व्यस्त हो गया। कमल उठा और कमरे में जाने लगा तभी एक युवती को देख ठिठक गया और कुछ पल तक एक टक उस युवती को देखता रहा। युवती एक ग्रुप का सदस्य थी। जिस कंपनी का वह भवन था, उसी कंपनी के कर्मचारी तीन दिन के आधात्मिक और योग यात्रा पर आए थे। भवन के सभी कमरे उस समूह के लिए आरक्षित थे। सिर्फ दो कमरे, जिसमें से एक में कमल कुमार ठहरे थे और एक कमरा खाली था। समूह में सभी उम्र के छोटे बड़े महिला और पुरुष थे।
उस युवती को देख कर कमल स्तब्ध हो गया। दो मिनट बाद खुद को संभाल कर सीढियां चढ़ते हुए अपने कमरे में चला गया। दो मंजिल के भवन की दूसरी मंजिल पर गंगा के सामने वाला कमरा, जिसमें बालकनी भी थी कमल ठहरा था। कमरे की बालकनी में कुर्सी पर बैठ मंद गति से बहती गंगा को निहारते हुए यादों में खो कर सोचने लगा कि इतनी समानता है दोनों में। यह तो हकीकत है, फिल्मों में जो जुड़वां दिखाये जाते हैं, परन्तु वास्तव में पहली बार देखे हैं। मिलते जुलते चेहरे तो कई बार देखे हैं। जुडवां तो एक जैसे देखे हैं आज अपने सामने एक सी शक्ल जैसी युवती को देखा, उम्र लगभग तीस के करीब होगी।

कमल कमरे में आकर कुर्सी पर बैठ गया और उस युवती के चेहरे की तुलना अपनी पत्नी काम्या से करने लगा। जब काम्या तीस के करीब थी, हूबहू उस युवती जैसी थी। आज काम्या इस दुनिया में नही है लेकिन उसकी यादें हमेशा ताजा हैं। पूरे पैतीस वर्ष का साथ रहा। वैसा चेहरा, वैसा रंग, वैसा कद। विवाह से अंतिम समय तक काम्या कैसी थी, सब कमल के मस्तिष्क के विभिन्न कोनों से निकल रही थी। कमल की उत्सुकता एक बार उसे समीप से देखने को हुई। कमल नीचे उतरा तब तक सभी अपने कमरों में जा चुके थे। कमल ने प्रबंधक दिनेश से पूछताछ की और उस युवती के बारे में पूछा।

"कमल भाई, इतने बड़े समूह में मैंने किसी को ध्यान से नही देखा। जब आप कह रहे हैं तब अवश्य देखूंगा। भाभीजी को मैंने देखा हुआ है। हर वर्ष आप दोनों नियम से यहां रुकते रहे हैं। आज भाभीजी नही हैं मगर मैं उस युवती को पहचान लूंगा। अभी कुछ देर में सब नाश्ता करने आएंगे। नाश्ते के बाद उनका आधात्मिक सत्र है। लॉन में शामियाना लगा दिया है। बहुत बड़े गुरूजी आने वाले हैं। आप भी सत्र में भाग लीजिये। हम सब उसमें शामिल होंगे।"

नाश्ते के समय कमल ने दिनेश को उस युवती की ओर इशारा किया। दिनेश ने ध्यान से युवती को देख कर कहा। "भाई तुम सही हो, बिलकुल भाभीजी।"

कमल और दिनेश को अपनी तरफ एक टक देखते हुए उस युवती को हैरत हुई। फिर उसने सोचा कि दोनों बड़ी उम्र के है, किसी और तरफ भी वो देख सकते हैं। पूरे समूह में यहां हर कोई एक दूसरे से बतिया रहे थे वह युवती अकेली नाश्ता कर रही थी और बीच में कमल और दिनेश को भी देखती रही। दोनों उसे लगातार देखते हुए बहुत धीमी आवाज में बातें कर रहे थे जो यह युवती नही सुन सक रही थी।

नाश्ते के पश्चात सभी आधात्मिक सत्र के लिए भवन के लॉन में बैठ गए। कमल भी कुछ इस तरह बैठा कि उस युवती को देख सके।

आधात्मिक सत्र के बाद दोपहर के खाने पर सब एकत्र हुए। खाना खाने के समय उस युवती ने भवन प्रबंधक दिनेश से बात करके कमल के बारे में पूछा और कहा कि वे उसे अपनी घूरने की हरकत से बाज आएं।

दिनेश ने विनार्मतापूर्वक उस युवती को बताया कि कमल की कोई गलत मंशा नही है। उसकी मृत पत्नी की शक्ल हूबहू तुमसे मिलती है, जैसे तुम जुड़वां हो। जब चाहे वह कमल से मिलवा कर उसकी सारी शंका दूर कर सकता है।

युवती ने रात के खाने के पश्चात मिलने की इच्छा जाहिर की। अभी तो सबने लक्ष्मण झूला, स्वर्ग आश्रम और नील कंठ जाना है।
रात के खाने के पश्चात युवती कमल से मिलने दिनेश के साथ उसके कमरे में गई। दिनेश ने कमल को पहले ही युवती की शंका बता दी थी।

"दिनेश जी मौसम अच्छा है। बालकनी में बैठ कर बात करते है।"

बालकनी में दो कुर्सियां रखी हुई थी। दिनेश ने कमरे में रखी एक और कुर्सी बालकनी में रखी। तीनो कुर्सियों पर बैठते हैं। बालकनी की बत्ती दिनेश ने जलाई। रात की कालिमा दूर तक छाई हुई थी। बालकनी से लॉन की रौशनी नजर रही थी। आसपास के भवन और मकानों की बत्तियां जल रही थी लेकिन वे रात की कालिमा को दूर करने में नाकाम थी। गंगा मंद गति से चल रही थी। गंगा के दूसरे छोर की पर्वत श्रृंखला पर कोई रौशनी नही थी। गंगा किनारे पैदल पथ पर लगे लैंप पोस्ट से छनछन करती हुई गंगा जल पर पड़ रही थी और बहता चलता गंगा जल कलकल की ध्वनि के साथ एकदम शांत वातावरण को रोमांचित कर रहा था।

कुछ पल की चुप्पी के बाद कमल ने कहना शुरू किया।

"दिनेश भाई ने आपकी शंका बताई। आपकी शंका उचित है क्योंकि जब से आपको देखा है आपको एक टक देख रहा हूं। इसका सिर्फ एक कारण है। कारण बताने से पहले मैं आपको अपना परिचय देना चाहता हूं। मेरा नाम कमल कुमार है और उम्र पैंसठ वर्ष। मैं अभी पिछले महीने रिटायर हुआ हूं। मैं और मेरी पत्नी काम्या हर वर्ष यहां ऋषिकेश आते थे और यहीं इस भवन ने तीन-चार दिन रुकते थे। इसी कारण दिनेश जी से मित्रता हो गई। आज मेरी पत्नी मेरे साथ नही है। कैंसर की बीमारी के बाद वह परलोक सिधार गई। रिटायरमेंट के बाद पुरानी यादें मुझे यहां खींच लाई हैं।"

कमल चुप हो गया। तीनों की निगाहें सामने कलकल की ध्वनि के साथ चलती गंगा पर थी। चारों ओर सिर्फ सन्नाटा था।

सन्नाटे को तोड़ते हुए कमल ने उस युवती से नाम पूछा।
"तमन्ना।"
"तमन्ना उम्र आपकी लगभग तीस के करीब होगी?"
"हां।"
कमल ने अपने मोबाइल फोन पर पत्नी काम्या की फोटो दिखाई।
"तमन्ना अब ये फोटो देखो, काम्या और मेरी फोटो जो शादी के बाद की हैं। विवाह के समय काम्या की उम्र बाइस थी। अब तुम ये फोटो देखो कि मैं तमन्ना तुम को क्यों देख रहा था।"

तमन्ना ने फोटो देखी और देखती रह गई। हूबहू कोई अंतर नही था काम्या और तमन्ना में। तमन्ना ने काम्या की सभी फोटो देखी।
" माई गॉड। एकदम एक जैसी। अंकल मुझे मांफ करना कि मैंने आपको गलत समझा।"
"कोई बात नही तमन्ना। अगर कोई भी किसी लड़की को लगातार घूरेगा तब गलत संदेश तो जाएगा।"
"अंकल क्या मैं आंटी की फोटो ले सकती हूं?"
"अवश्य, मोबाइल से फोटो अपने मोबाइल पर ट्रांसफर कर लो।"
तमन्ना ने काम्या की कुछ फोटो अपने मोबाइल में ट्रांसफर की और फिर रुक्सत ली।

तमन्ना अपने कमरे में बहुत देर तक काम्या की फोटो देखती रही। वह अपने और काम्या की तुलना करने की कोशिश में बहुत देर तक जागती रही, फिर कब नींद गई, उसको खुद नही पता।

सुबह अचानक से तमन्ना की नींद खुली। साढ़े छः बजे थे। फ्रेश होकर कमल के कमरे में गई। कमरा बंद था। नीचे दिनेश से पूछा तब पता चला कि कमल भवन के पीछे गंगा किनारे मिलेगा। भवन में साढ़े सात बजे के आसपास कमल वापस आएंगे। तमन्ना पैदल पथ पर कमल को ढूंढा। दस मिनट बाद कमल गंगा तट पर एक बहुत बड़ी सिला पर ध्यान मुद्रा में बैठे मिले। तमन्ना चुपचाप कमल के पास बैठ गई। कुछ देर बाद कमल ध्यान से बाहर आए।

"नमस्ते अंकल।" तमन्ना ने मुस्कुराते हुए कमल से संबोधित हुई।
"नमस्ते तमन्ना कभी पहले यहां आई हो?"
"मैं पहली बार ऋषिकेश आई हूं।"
"तब थोड़ी देर इस तट पर बैठ कर गंगा की मंद रफ़्तार देखो। सूर्य की पहली किरणें गंगा को सुनहरी बना रही हैं। सुबह की भीनी-भीनी हवा तन और मन को एक नई स्फूर्ति दे रही है। कुछ देर बैठ कर शांत वातावरण का आनंद लो। मैं आज पहली बार अकेला बैठा हूं वर्ना काम्या के साथ सुबह के डेढ़ से दो घंटे यहीं बीतते थे।"
"अंकल कोशिश की जब आप ध्यान में थे। मेरा मन विचलित है अभी ध्यान में नही बैठ सकूंगी।"
"फिर गंगा जल से मुंह धो लो। नहाना तो संभव नही है क्योंकि पानी बहुत ठंडा है।" कमल ने झुक कर हाथों में गंगाजल लेकर मुंह को धोया और फिर सूर्य को जल अर्पित किया। " सूर्य नमः"
"तमन्ना सूर्य को जल अर्पण किया करो।"
"कोई लाभ।"
"किसी भी काम करने से पहले लाभ नही सोचना चाहिए। अच्छे काम करने चाहिए, कृष्ण ने अर्जुन को यही उपदेश दिया था।"
"आप कब से सूर्य को जल अर्पण कर रहे हैं?"
"बचपन से। घर में अपने बुजुर्गों को जल देते देखा और आदत बन गईं।"
"अच्छा अंकल अब मैं चलती हूं। आज राफ्टिंग के लिए जाना है।"

कमल और तमन्ना भवन वापस जाते हैं। नाश्ते का समय हो गया था। कमल ने नाश्ता किया और आराम करने कमरे में जाते हैं। तमन्ना अपने समूह के साथ राफ्टिंग के लिए प्रस्थान करती है।

राफ्टिंग के बाद तमन्ना थक जाती है और कमल से मुलाकात नही होती। रात के समय डिनर पर तमन्ना और कमल मिलते हैं।

"कैसा रहा आज का दिन?" कमल ने तमन्ना से पूछा।
"अंकल आज तो थक गए। राफ्टिंग में मजा आया। थकान तो है पर मन प्रफुल्लित हो जाता है। घर और ऑफिस के सारे झंझट पीछे छोड़े हुए हैं। अंकल शरीर की बैटरी रिचार्ज हो गई है।"
"घर से दूर मनुष्य मन को तरोताजा करने के लिए ही जाता है।"
"बस कल वापस जाएंगे, फिर वही झंझट।"
"जीवन को झंझट मत समझो। खुश रहना सीखो।"
"अंकल आपसे मिल सकती हूं। आपके अनुभवों से जीवन को बेहतर कर सकूं, आपको बुरा तो नही लगेगा। मिलें इस रविवार को।" तमन्ना ने कमल से मिलने की इच्छा जाहिर की।
"तमन्ना अभी मैं दो दिन यहां रहूंगा, फिर कुछ मित्रों से और रिश्तेदारों से मिलने जाना है। बीस से पच्चीस दिन मैं भ्रमण पर हूं। उसके बाद मिलूंगा।"
"अंकल एक सेल्फी हो जाए?"
"अवश्य।"
तमन्ना और कमल ने सेल्फी ली और कुछ फोटो भी एक दूसरे के खींचे।

लगभग एक महीने अपने मित्रों, रिश्तेदारों से मिलने के पश्चात कमल वापस घर आए। कमल ने तमन्ना के फोटो अपने पुत्र और पुत्री को ईमेल से भेजे और उससे मुलाकात का जिक्र किया। सभी तमन्ना से मिलना चाहते थे। उधर तमन्ना भी कमल के परिवार से मिलना चाहती थी। दिल्ली वापस आकर कमल ने तमन्ना को फोन किया। रविवार को तमन्ना कमल के घर आई। तमन्ना से मिलने कमल का पूरा परिवार घर में मौजूद था। पुत्र, पुत्रवधु, पुत्री, जंवाई, कमल की बहन, जीजा, भाई, भाभी और बच्चे सभी तमन्ना से मिलने बेताब थे। एक फ्लैट में एक साथ पूरा परिवार एकित्रत था। परिवार अपने आप में एक भीड़ का अहसास दे रहा था। तमन्ना से सभी गले मिल कर मिले। तमन्ना से मिल कर सभी ने यही कहा कि काम्या छोटी बन कर हमसे मिलने आई है।

इतने बड़े परिवार को देख तमन्ना पहले कुछ सकुचाई पर सबने उसे सर आंखों पर बिठाया। कुछ देर बाद सबसे घुलमिल गई। लगभग पूरा दिन परिवार के साथ बिताने के बाद तमन्ना ने रुक्सत ली।

कमल के परिवार में काम्या के बारे में अब अक्सर चर्चा होती। काम्या ने खुद को अविवाहित बताया। वह एक मल्टीनेशनल कंपनी में शीर्ष पद पर थी। इक्कतीस वर्ष की तमन्ना की तनख्वाह भी दो लाख रुपए महीने की थी। कई बार कमल के घर आई और एक हंसते खेलते परिवार से मिल कर उसे आनंद की अनुभूति होती।

रिटायरमेंट के कुछ समय पश्चात कमल को एक कंपनी में काम मिल गया और वह व्यस्त हो गया। तमन्ना से मिले कई दिन हो गए। शनिवार को कमल का आधे दिन का ऑफिस होता था। ऑफिस के बाद कमल शॉपिंग मॉल रुक गया और कुछ कपडे खरीद रहा था तभी तमन्ना मिल गई। कमल बच्चों के लिए कपडे देख रहा था।
"आप किसके लिए कपडे खरीद रहे हैं?"
"बच्चों के लिए। सेल लगी हुई है सोचा कुछ खरीद लूं।"
"आप बच्चों से बहुत प्रेम करते हैं?"
"यह प्रेम ही परिवार को जोड़ता है।"
"कुछ देर बात करनी है कहीं थोड़ी देर बैठ सकते हैं क्या?
"मुझे कोई जल्दी नही है। थोड़ी देर चाहो तो बाहर धूप में बैठ सकते है।"
शॉपिंग के बाद कमल और तमन्ना मॉल के खुले भाग में एक कोने में बैठते हैं। हलकी गुनगुनी ठंड में धूप राहत दे रही थी।
"आप के परिवार में प्रेम बहुत है?" तमन्ना ने बात शुरू करते हुए पूछा।

"बस भगवान की दुआ है। प्रेम बरक़रार रहे।"
"आपने कैसे किया? कुछ मुझे भी बताओ।"
"तमन्ना प्रेम पाने के लिए समर्पण की आवश्कयता होती है। प्रेम दो और प्रेम लो बस यही मूलमंत्र है जिसे अपना कर जीवन को सरल किया।"

तमन्ना कुछ सोचने लगी।

"विवाह करके गृहस्थी बसा कर प्रेम का महत्त्व पता चलेगा और आनंद भी आएगा।"
"डरती हूं कहीं विवाह सफल हुआ तो? आजकल असफल विवाह की संख्या अधिक है। मैंने देखा है कि साल दो साल में ही, कई बार तो चार छः महीने में ही तलाक हो जाते हैं।"
"फिर भी सभी विवाह करते हैं तमन्ना?" कमल ने तमन्ना से ही प्रश्न पूछ लिया।
"हां आपकी बात दुरुस्त है, करते सभी हैं।"
"मालूम है क्यों?"
"बताइएं।"
"क्योंकि उम्र के साथ विवाह का ख्याल स्वयं ही जाता है। प्रकृति ने मनुष्य को कुछ इस तरह बनाया है कि तन की इच्छा के लिए पुरुष और औरत को एक दूसरे का साथ चाहिए। समाज ने विवाह की प्रथा इसलिए बनाई है। प्रकृत्य ही एक कारण है। विवाह के बाद मनुष्य सामाजिक प्राणी बनता है। उसके बाद एक दूसरे की इच्छओं की पूर्ति, सम्मान के लिए एक दूसरे पर समर्पित होते हैं। जब परिवार बढ़ता है तब अपनी इच्छा पूर्ति कम और परिवार के लिए करने की इच्छा होती है और अपने सुख भूल कर परिवार की ख़ुशी में जीता है। आज देखो मैं अपने परिवार के छोटे सदस्य पौत्र और पौत्री के लिए कपडे खरीद रहा हूं। आज मैं अकेला हूं, परिवार के लिए जी रहा हूं। तुम भी विवाह करके देखो, परिवार के प्रति समर्पण स्वयं जाएगा।"

"कभी काम्या आंटी से झगड़ा नही हुआ?"
थोड़ा हंसते हुए कमल ने कहा। "यह तो पूरी ज़िंदगी चलता है। प्यार और तकरार कई बार हुए। रूठना और मनाना वैवाहिक जीवन का एक हिस्सा है। मेरा तो छोड़ो, मैं अपने माता-पिता और सास-ससुर को देखता था वो भी आपस में उलझ जाते थे और हम मुस्कुरा देते थे। मेरा और काम्या का साथ पैंतीस वर्ष तक रहा, कई बार तकरार हुई लेकिन प्यार पूरा रहा क्योंकि कभी मैंने अपनी बात मनवा ली और कभी काम्या की बात मान ली।"
कुछ पल दोनों शांत रहे। धूप ढल गई थी। ठंडक बढ़ने लगी। कमल ने रुक्सत ली।

कुछ दिन बाद फिर शनिवार का दिन, दोपहर के ढाई बजे कमल ऑफिस से निकल कर मेट्रो स्टेशन की ओर जा रहा था, तभी मॉल के बाहर एक युवती और युवक के बीच झगड़ा हुआ। आते-जाते सभी रुक कर देखने लगे। कमल ने देखा वह युवक की नही पहचानता था, युवती की पीठ उसकी ओर थी, वह उसे देख नही सका और आगे बढ़ने लगा। तभी वह युवती युवक का हाथ छुड़ा भागी और कमल से टकरा गई। अचानक से टकराने के कारण कमल अपना संतुलन नही रख सका और गिर गया। उस युवती के साथ कुछ और लोगों ने कमल को सहारा देकर उठाया और समीप के बेंच पर बिठाया। कमल का चश्मा टूट गया।

"अंकल आप ठीक तो हैं?" अचानक एक साथ कई स्वर उठे। एक स्वर तमन्ना का भी था। वह युवती तमन्ना थी। तमन्ना कमल के साथ बेंच पर बैठ गई। कमल ने खुद को देखा, कोई चोट नही लगी थी। हाथों के बल गिरने से हाथों पर खरोंच आई।
"बस हलकी सी खरोंच है बाकी सब ठीक है।"
"आपका चश्मा टूट गया।"
"घर पर दूसरा है। कल एक नया बनवा लूंगा। मेट्रो से जाना है। कोई दिक्कत नही। घर पहुंच जाऊंगा।"
"मैं आपके साथ चलती हूं। बिना चश्मे के आपको दिक्कत होगी।"

मेट्रो में तमन्ना चुप रही। कमल ने उस युवक के बारे में पूछना चाहा पर तमन्ना ने कोई उत्तर नही दिया। सिर्फ इतना ही कहा कि घर चलकर बतायेगी। मेट्रो में उसकी बात सहयात्री सुने, इस कारण वह चुप रही।

घर पहुंच कर तमन्ना ने कमल और परिवार से मांफी मांगी कि उसके कारण कमल को चोट लगी और चश्मा टूट गया।

कमल ने दूसरा चश्मा निकाल कर पहना। तमन्ना ने कमल के हाथों पर डेटॉल से हाथ की खरोंचे साफ़ की।

अब कमल ने उस युवक के बारे में पूछा तब तमन्ना की रुलाई फूट पड़ी और रोते हुए कहा कि वह उस युवक के साथ लिवइन में पिछले दो वर्ष से रह रही है। कमल के जीवन और खुशहाल परिवार को देख उससे विवाह की बात की तो उसने इनकार कर दिया। यह इनकार ही झगडे का कारण था।
"तुम्हारी क्या इच्छा है? कमल ने पूछा।
"मैं आपकी तरह सुखी वैवाहिक जीवन व्यतीत करना चाहती हूं परंतु उसने मना कर दिया। अब कुछ समझ नही रहा।"
"लिवइन में रह रही हो, क्या तुम्हारे परिवार ने कोई आपत्ति नही की?"
"मेरा परिवार दिल्ली में नही रहता। उन्हें यह नही मालूम कि मैं लिवइन में हूं। सिर्फ इतना कहा है कि वह मेरा बॉय फ्रेंड है और उससे विवाह करूंगी क्योंकि परिवार की ओर से विवाह के लिए प्रस्ताव आते हैं और दबाव भी है।"
"कुछ सोच कर लिवइन में रह रही होगी?"
"पहले तो कैरियर में आगे बढ़ने की चाह में विवाह नही किया। जैसा आपने कहा कि इश्क़ इंसान की जरुरत है, उसी जरुरत के कारण लिवइन में गई कि परिवार का कोई झंझट नही। बस अपनी सोचो और मस्त रहो। जब आपसे मिली और आपके परिवार में प्रेम देखा तब प्यार और समर्पण का महत्त्व समझा।"
"तमन्ना मन छोटा मत करो। दुनिया की रीत है जब जागो तभी सवेरा है। पिछली बातों को भूलकर आगे नई दुनिया बसाने की सोचो। अगर अपनी पसंद नही तब परिवार की पसंद से विवाह कर लो। मेरा मूलमंत्र सफल विवाह के लिए यही है कुछ तुम मानो, कुछ हम मानें। अपनी निजी पसंद और ख्वाहिश भूल कर परिवार पर जीवन अर्पित करना पढता है। शारिरिक भूख तो कुछ समय पश्चात कम हो जाती है फिर शुरू होती है परिवार की इच्छा पूर्ति की भूख। यही जीवन है साथी की ख़ुशी ही जीवन है। समर्पण ही जीवन है।"

कमल की बातें सुन कर तमन्ना का चित्त शांत था और आंखें नम।


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