Friday, March 31, 2017

धर्म के ठेकेदार


मैं जानू धर्म क्या है
मैं जानू कर्म क्या है
नहीं देख नेता करता क्या है
देख राह की अड़चन क्या है

निरंतर आगे बढ़ना है
प्रेम की राह पर बढ़ना है

नेता तुम भटकना मत
धर्म को दूषित करना मत
ठेकेदारी से माल कमाना मत
धर्म के ठेकेदार बनना मत



Thursday, March 30, 2017

परदे में रहने दो


पर्दा खुलता है। 
दृश्य एक

एक छोटे से कस्बे के सरकारी स्कूल की कक्षा बारह की क्लास में कुछ बच्चे टूटे फूटे बेंच और कुर्सियों पर बैठे हैं। मास्टर जी अभी नही आये हैं। कुछ बच्चे अलसाई हालात में जम्हाई ले रहे हैं और कुछ आपस में बातें कर रहे हैं। तभी मास्टर जी क्लास में प्रवेश करते हैं।
मास्टर - क्या बात है? कोई नमस्ते नही। अध्यापक क्लास में आया है, किसी को कोई खबर नही।
नरेश - तो क्या आपकी आरती उतारे?
मास्टर - तमीज नही है बड़ो से कैसे बात करते हैं?
सुरेश - कौन सी दुकान पर तमीज मिलती है।
सब बच्चे ठहाका लगा कर हंसते हैं। मास्टर मेज पर छड़ी मारता है।
अलोक - मास्टर जी, बेचारी छड़ी को बक्श दो। टूट जायेगी।
मास्टर - बतममिज की औलादों, स्कूल से निकलवा दूंगा।
आशुतोष - तो कौन सा मैडल मिल जायेगा। चवन्नी तो तनख्वा में बढ़ेगी नही।
सभी बच्चे फिर हंसते हैं। मास्टर ने चुप रहने में ही भलाई समझी।
मास्टर - चलो किताब खोलो। पढ़ना शुरू करो।
सौरभ - पढ़ाओ।
मास्टर - बंदरगाह किसे कहते हैं। सौरभ तुम बताओ।
सौरभ - मास्टर जी बंदरगाह उसे कहते है जहां बहुत से बन्दर एक जगह घास चरते हैं।
मास्टर ने अपना सर पकड़ लिया
मास्टर - सालों पढ़ लो नही तो फेल हो जाओगे।
अलोक - तो पास हो कर कौन से तीर मार लेने हैं। बैठना तो बाप की दुकान पर है।
मास्टर - सालों पढ़ लो, बिना पढ़े दुकानदारी कैसे करोगे।
नरेश - दुकानदारी के लिए पढाई नही हिसाब काम आता है। बिना कैलकुलेटर के एक मिनट में हिसाब कर लेते हैं। साधारण ब्याज लगवाना हो या चक्रवृद्धि ब्याज चुटकी में निकाल लेते हैं।
आशुतोष - वसूली के लिए पढ़ाई नही, गाली गलौच और मारपीट की जरुरत होती है।
मास्टर यह सुन कर अपना माथा पकड़ लेता है और पर्दा गिरता है।

दृश्य दो

स्कूल की छुट्टी के बाद सभी अध्यापक प्रिंसिपल के कमरे में बैठे हैं।
प्रिंसिपल - ऐसे कैसे चलेगा। बोर्ड की परीक्षा में क्या रिजल्ट आयेगा?
झुनझुनवाला - जो हर वर्ष आता है।
अग्रवाल - किस्मत होगी तो दो चार लौंडे पास हो जाएंगे।
प्रिंसिपल - तुम पढ़ाते क्यों नही हो?
मित्तल - किसे पढ़ाएं। यहां कोई बच्चा पढ़ने नही आता। आधे बच्चे तो आते नही और ऊपर से जो आते हैं वो पढ़ते नही।
प्रिंसिपल - कोशिश किया करो।
झुनझुनवाला - खाक कोशिश करें। पढ़ाने बैठो तो जवाब मिलता है कि पढ़ कर कलक्टर तो बन नही जाना। बैठना बाप की दुकान पर है। गल्ले का हिसाब करना आता है वही बहुत है। अनपढ़ नेता देश को चला रहे है। पढ़ कर उनकी चाकरी करने से अच्छा है दुकानदारी करो। कोई उत्तर है आपके पास?
प्रिंसिपल - कोशिश तो किया करो।
मेहता - छोटे से कस्बे में रह रहे हैं। एक तो तनख्वा कम और ऊपर से कोई ट्यूशन भी नही पढता यहां पर। पढ़ाने की इच्छा कहां से हो?
झुनझुनवाला - स्कूल फंड से थोड़ा हमारा भी कल्याण कर दिया करो। सारा अपनी जेब में रख लेते हो।
इस बात पर प्रिंसिपल नाराज हो गया।
प्रिंसिपल - स्कूल का फंड स्कूल के लिए है। तुम क्या कहना चाहते हो?
अग्रवाल - फंड स्कूल में तो लगता नही। टूटी मेज कुर्सियां हैं। सफेदी हुई नही। बाथरूम की सफाई होती नही। इतनी बदबू आती है कि पेशाब करने को दिल नही करता। मजबूरी में जाना पड़ता है।
सभी अध्यापक खीं-खीं करके हंसते है और प्रिंसिपल बगले झांकने लगता है।
प्रिंसिपल - ठीक है यह बात इस कमरे से बाहर नही जानी चाहिए। इस बार फंड आएगा तब तुम सबका ध्यान रखूंगा।
सभी मास्टर एक स्वर में - हम यही चाहते हैं।
प्रिंसिपल - अब असली मुद्दे पर आते हैं। जैसा कि सबको मालूम है, शिक्षा मंत्री बदल गए हैं। बड़े कड़क हैं और सर्कुलर निकाला है कि जिस स्कूल का रिजल्ट ख़राब आएगा उसका अनुदान बंद। जब फंड बंद हो जाएगा तब क्या करेंगे?
मित्तल - मेरी खोपड़ी काम नही कर रही है अब आप ही बताओ।
प्रिंसिपल - दसवीं और बारहवीं बोर्ड परीक्षा में सत प्रतिशत रिजल्ट आना चाहिए।
अग्रवाल - बिना नक़ल के रिजल्ट लाना मुश्किल है।
प्रिंसिपल - नक़ल करने की छूट दे दो। रिजल्ट पूरा आना चाहिए।
झुनझुनवाला - चेकिंग हो गई तो?
प्रिंसिपल - फंड किस काम आएगा। बड़े-बड़ों की आंखें बंद हो जाती हैं। साम, दंड, भेद कुछ भी करो मुझे रिजल्ट चाहिए।
सभी प्रिंसिपल से सहमत होते हैं और प्रस्थान करते हैं।

पर्दा गिरता है।

दृश्य तीन

बोर्ड की परीक्षा हो रही है। पेपर देख बच्चे चिल्लाते हैं कि कुछ नही आता। मास्टरों ने नकल करने की खुली छूट दे दी। किताबे, कुंजियां से बच्चे नकल करने लगे।
निरीक्षक प्रिंसिपल के कमरे में बैठ कर आराम कर रहा है। प्रिंसिपल ने नोटों का एक लिफाफा देकर निरीक्षक का मुंह बंद कर दिया।
निरीक्षक - शिष्टाचार तो कोई आपसे सीखे।
बस इतना सा कह कर निरीक्षक तुरन्त स्कूल से गायब हो गया।
निरीक्षक के जाते ही स्कूल का गेट बंद कर दिया और पेपर समाप्ति से पहले किसी को स्कूल से बाहर नही जाने दिया। पेपर समाप्त होने पर स्कूल के गेट पर प्रिंसिपल ने बच्चों को चेतावनी दी।
प्रिंसिपल - तुमने नक़ल की है और हमने तुम्हे नक़ल करने की खुली छूट दी है। इस बात का जिक्र तुमने स्कूल के दरवाजे से बाहर निकल कर नही करना है। घर में भी नही। तुम्हारे सारे पेपर इसी तरह होंगे चिंता मत करो। हां यदि किसी को नकल की भनक पड़ी तब तुम्हारी खैर नही। संबके पिछवाड़े सुजा दूंगा।
बच्चों को बिना मेहनत उत्तीर्ण होने से अधिक कुछ नही चाहिए। सारे बच्चे आज्ञाकारी निकले और किसी को कानो कान खबर नही लगी।

पर्दा गिरता है।

दृश्य चार

बोर्ड परीक्षा का रिजल्ट गया। स्कूल का रिजल्ट सत प्रतिशत। बच्चे स्कूल के आंगन में नाच कूद रहे हैं। प्रिंसिपल और अध्यापक प्रिंसिपल के कमरे में जश्न मना रहे हैं।
सभी मास्टर एक स्वर में - गुरूजी आप महान हो। आपको पहचाने में गलती हो गई थी हमें।
प्रिंसिपल - ,तभी तो अनुदान का फंड मैं अपने पास रखता हूं।
सभी मास्टर - सर जी कुछ तो बच्चो पर मेहरबानी करो, दया करो। आप नही तो हम कहां जाएं।
प्रिंसिपल - जो दूं रख लेना। चूं चपड़ मत करना।
सभी मास्टर - ठीक है

पर्दा गिरता है।

नाटक तो समाप्त हो गया अब समस्या है शिक्षा में सुधार की? कैसे और कब होगा? आजादी के बाद सत्तर वर्ष गुजर गए। स्तर बढ़ तो नही सका, गिरता अवश्य नजर रहा है। मैं आशावादी नही हूं क्या आप हैं?
चलो परदे में सब कुछ रहने देते हैं।



नाराजगी

हवाई अड्डे पर समय से बहुत पहले पहुंच गया। जहाज के उड़ने में समय था। दुकानों में रखे सामान देखने लगा। चाहिए तो कुछ ...