Wednesday, March 08, 2017

त्यागपत्र


प्रताप की बैंक मैनेजर से मुलाकात सार्थक रही। प्रताप एक निजी कंपनी में मुख्य वित्त अधिकारी हैं। लगभग पंद्रह वर्ष से इसी कंपनी में कार्यरत हैं। कंपनी का विस्तार होता गया और प्रताप की उन्नति। कंपनी के चेयरमैन मेहता साहब प्रताप को घर का सदस्य ही समझते थे और प्रताप की काम के प्रति लगन, कंपनी के प्रति निष्ठा और समय के साथ वित्त और टैक्स की नवीनतम जानकारी रखने के लिए प्रताप के हमेशा कायल रहते थे। कंपनी का हर कर्मचारी प्रताप को कंपनी का अभिन्न अंग मानता था। पिछले वर्ष मेहता साहब की तबियत थोड़ी ठीली हो गई तब उन्होंने काम की बागडोर अपने बड़े पुत्र साहिल को सौंपी। कंपनी के एक नए प्रोजेक्ट के लिए लोन का आवेदन हेतू प्रताप बैंक गया था। सैद्धांतिक स्वीकृति देने के बाद लोन की अति शीघ्र मंजूरी का वादा किया।

मीटिंग के बाद प्रताप ऑफिस के लिए रवाना हुआ। अभी प्रताप रास्ते में ही था कि साहिल का फोन आया और प्रताप पर बिगड़ पड़ा।
"प्रताप तुमने यह क्या मजाक बना रखा है। मैंने तुम्हे बैंक में लोन की बात करने के लिए कहा था और तुम इतने ढीले ढाले ढंग से काम कर रहे हो, तुम्हारा इरादा क्या है? काम करना है या नही बता दो, मैं दूसरा कोई प्रबंध करुं। मजाक बना कर रखा हुआ है। बारह बज रहे हैं और लाटसाब का कोई अतापता नही। फ़ौरन ऑफिस आओ। तुमसे बात करनी है।" कह कर साहिल ने फोन काट दिया।

प्रताप ने फोन उठा कर सिर्फ हेलो कहा था और दूसरी ओर से साहिल ने कटीजली सुना दी। साहिल की बात सुन प्रताप हतप्रभ हो गया। ऐसा क्यों और कैसे? उसकी समझ में कुछ नही आया।

ऑफिस पहुंच कर प्रताप साहिल से मिलने उसके केबिन में गया। साहिल के केबिन में प्रोजेक्ट पर शीर्ष अधिकारियों से मीटिंग चल रही थी। कंपनी ने अपने परंपरागत काम से हट कर एक नए प्रोजेक्ट पर काम शुरू किया। उस प्रोजेक्ट के लिए बहुत से शीर्ष अधिकारी नियुक्त किये, जिनके साथ साहिल मीटिंग कर रहा था। प्रताप ने जैसे ही केबिन में प्रवेश किया साहिल चिल्ला उठा।
"प्रताप हमने प्रोजेक्ट को अति शीघ्र शुरू करना है और सब काम तैयार है। तुम्हे बैंक लोन की कोई फ़िक्र नही। बारह बज रहे है। लाटसाब की तरह ऑफिस रहे हो, यहां हम सिर्फ तुम्हारे ढीलेपन के कारण निकम्मे बैठे हैं। कब मिलेगा बैंक का लोन?"

आधे घंटे में दूसरी बार साहिल ने बिना किसी कारण उसे डांट दिया। प्रताप फिर हतप्रभ हो गया। उसकी नज़र केबिन में बैठे सहकर्मियों पर पड़ी। सबके चेहरे पर कुटिल मुस्कान थी।
"सर बैंक मैनेजर से बात हो गई है। लोन की मंजूरी बहुत जल्द मिल जाएगी। मेरी आज सुबह बैंक मैनेजर से मीटिंग थी और मैं बैंक से ही रहा हूं।" प्रताप ने स्पष्टीकरण दिया।

प्रताप के स्पष्टीकरण के बाद भी साहिल पर कोई असर नही हुआ। फ़ौरन उसने बैंक मैनेजर से बात की। बैंक मैनेजर ने प्रताप के बैंक आने की पुष्टि की। लोन मंजूरी का आस्वाशन भी दिया परंतु साहिल ने कुछ और ठान रखा था।
"प्रताप मुझे कुछ नही सुनना। यदि लोन मंजूर नही करवा सकते तो नौकरी छोड़ दो। मुझे तुम्हारा जवाब अभी चाहिए।" कुटिल मुस्कान के साथ साहिल ने पूछा।
प्रताप ने एक नजर सब पर डाली। उसने महसूस किया कि सभी ढीठों की तरह उसका उपहास कर रहे थे। प्रताप कुछ नही बोला। उसकी आंखों में आंसू गए। किसी तरह खुद पर काबू रख चुपचाप केबिन से बाहर गया। इस घटना पर उसका कोई बस नही था। आखिर क्यों? बस यही सोचने लगा।

अपनी सीट पर बैठ कर प्रताप सोचने लगा कि आखिर उससे क्या गलती हुई है। आज पंद्रह वर्ष से कंपनी में काम कर रहा है। मेहता साहब ने कभी उससे ऊंचे स्वर में बात नही की। हमेशा उसका मार्गदर्शन किया। जब उसने कंपनी में प्रदार्पण किया था, साहिल स्कूल में पढता था और निक्कर पहन कर ऑफिस में हर दिवाली पूजा पर आता था। पिछले एक वर्ष से मेहता साहब ऑफिस में कम ही रहे थे। पूरा व्यापार साहिल ही संभाल रहा था। प्रताप का चित्त उचाट हो गया। आज की घटना ने प्रताप को झंझोर कर रख दिया। उसने लैपटॉप और बैंक लोन सम्बंधित सभी जरुरी दस्तवेज लिए और मेहता साहब से मिलने उनकी कोठी की तरफ रवानगी की।

मेहता साहब और उनकी धर्मपत्नी दोपहर के खाने के बाद बातचीत कर रहे थे।
"गुड आफ्टरनून सर।" प्रताप ने मेहता साहब को कहा।
"आओ प्रताप और कैसे चल रहा है?"
प्रताप ने मेहता साहब को आज की घटना के विषय में बताया। प्रताप को हैरानी हुई कि साहिल ने मेहता साहब को पहले ही फोन पर सब कुछ बता दिया था।
"प्रताप मुझे साहिल ने बताया। देखो अब मेरी तबियत थोड़ी ढीली रहती है और सब काम साहिल को सौंप दिया है। नए प्रोजेक्ट का काम बहुत ही महत्वपूर्ण है। नई टीम को नियुक्त किया है। जवान और जोशीले लड़के रखे है। साहिल के अनुसार अब पुराने बन्दों को अलविदा कहने का समय गया है।"
"सर मेरे काम में कोई कमी हो तब मुझसे शिकायत करें।"
"प्रताप तुम प्रतिभावान हो। तुम्हारे अंदर काम के प्रति लगन है। तुम्हारी निष्ठा में कोई कमी नही है। तुम ईमानदार हो। मेरी समस्या है कि साहिल नयी टीम चाहता है।"
"सर ऐसी बात है तब मुझसे कह देते। मैं नौकरी छोड़ देता। मुझे अफ़सोस है कि सबके सामने बिना किसी बात के नीचा दिखाया।"
"प्रताप मैं इस बारे में साहिल से बात करूंगा।"

प्रताप सन्देश समझ गया। उसने रुक्सत ली। अगले दिन से प्रताप ऑफिस नही गया। घर से ही लोन की सारी औपचारिकताएं पूरी की। वह सिर्फ बैंक जाता। बीस दिन बाद लोन की मंजूरी मिल गई।

बीस दिन बाद प्रताप बैंक लोन की स्वीकृति लेकर ऑफिस पहुंचा। उसके चेहरे पर आत्मविश्वास छलक रहा था। साहिल के केबिन में मीटिंग चल रही थी। प्रताप दनदनाते हुए केबिन में गया और साहिल की टेबल पर दो लिफाफे रखे।
"क्या है?" तमीज नही है। बिना पूछे केबिन में गए। देख नही रहे जरुरी मीटिंग चल रही है।" साहिल ने झल्ला कर कहा।
"सर एक लिफाफे में बैंक लोन का स्वीकृति पत्र है और दूसरे में मेरा त्यागपत्र।"
कह कर प्रताप केबिन से बाहर गया।



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