Tuesday, March 28, 2017

हौसला


कश्मीर में आतंकवादियों से मुकाबला करते हुए जंगबहादुर घायल हो गया। जंगबहादुर ने आतंकियों का डट का मुकाबला किया और तीन आतंकियों को अकेले ढेर कर दिया। दो दिन तक आतंकियों के साथ मुठभेड़ चली और अंत में छः आतंकियों को मार गिराया। सेना का एक जवान भी शहीद हो गया। छः में से तीन आतंकियों को अकेले जंगबहादुर ने आमने सामने की लड़ाई में ढेर किया। जंगबहादुर को बाएं हाथ और पैर में कई गोलियां लगी। मुठभेड़ समाप्त होने पर जंगबहादुर को तुरन्त सेना के अस्पताल ले जाया गया। बाई ओर पक्षाघात के इलाज के लिये जंगबहादुर को दिल्ली के बेस अस्पताल में लाया गया।

जंगबहादुर के पिता भी सेना में सिपाही थे और अब वे रिटायर ज़िन्दगी अपने गांव में व्यतीत कर रहे थे। जंगबहादुर के घायल होने की खबर सुन माता-पिता दिल्ली गए। जंगबहादुर की बहन और बहनोई दिल्ली में कार्यरत थे और दिल्ली में उनकी रिहाईश थी। माता-पिता वहीँ रुक गए।

अभी एक वर्ष पहले जंगबहादुर का विवाह हुआ था। पत्नी माया मायके रहने गई थी। जंगबहादुर के घायल होने की खबर सुन माया, उसके भाई-बहन, माता-पिता सभी गए। पूरा परिवार चिंता में डूबा तनाव में था।

एक ओर सभी को जंगबहादुर की बहादुरी पर गर्व था। सेना ने जंगबहादुर को कीर्ति चक्र से सम्मानित किया। दूसरी और जंगबहादुर बाई ओर से पक्षापात के कारण बिस्तर पर सिमित हो गया और आवाज भी चली गई। डॉक्टरों के मुताबिक लंबे इलाज के बाद जंगबहादुर ठीक हो जाएंगे। कीर्ति चक्र से सम्मानित जंगबहादुर ज़िन्दगी की लड़ाई से जूझ रहा था।

एक महीने तक सब अस्पताल में डटे रहे फिर काम के बहाने सब धीरे-धीरे अपने स्थानों पर चले गए। बहन वीणा और बहनोई वीरेन्द्र दिल्ली में रहते थे, वे कभी-कभी मिलने अस्पताल चले जाते। माता-पिता भी गांव चले गए। सिर्फ माया रह गई जी वीणा-वीरेन्द्र के घर रुकी हुई थी। वह दिन में अस्पताल में रूकती और रात में घर जाती।

दो महीने बाद एक दिन माया सुबह अस्पताल के लिए निकली परन्तु वह अस्पताल नही गई और अपने मायके चली गई। जब माया रात को घर नही आई तब वीणा ने माया को फोन किया।
"भाभी आप कहां हो। घर कब तक आओगे?"
"दीदी मैं अब नही आऊंगी।"
क्या हुआ?"
"दीदी मैं अपनी मम्मी के घर गई हूं। मैं अब और जंग के साथ नही रह सकती।"
"भाभी क्या हुआ है, किसी ने कुछ कहा क्या?"
"कौन क्या कहेगा? मैं अब सारा दिन एक बेजान लाश के साथ नही गुजार सकती।"
"भाभी तुम क्या कह रही हो? मुझे कुछ समझ नही रहा है?
"दीदी मुझे सब समझ गया है। जंग अब एक लाश बन गया है। दो महीने से बिस्तर पर पड़ा है। कब ठीक होगा, कुछ नही पता। डॉक्टर कुछ ठीक से बताते नही। जब पूछो एक ही जवाब मिलता है समय लगेगा। कितना समय। मैं अब बर्दास्त नही कर सकती।"
माया का यह उत्तर सुन वीणा स्तब्ध रह गई। उसकी समझ में कुछ नही रहा था। उसने वीरेंदर से बात की।
"वीणा मामला गंभीर है। माया का यह निर्णय बहुत दुखद है। हमें उसके साथ और उसके परिवार से बात करनी पड़ेगी।"
"उसकी मां को फोन करुं?"
"ये बातें फोन पर करने की नही हैं। उनके घर जाकर करनी पड़ेगी। अभी तो रात हो गई है। कल ऑफिस से छुट्टी लेकर चलते हैं। जितनी जल्दी हो सके चलेंगे। तीन घंटे का सफर समझ कर चलें।"

वीणा वीरेंदर की बात से सहमत हुई। पूरी रात वीणा माया के बारे में सोचती रही। बेचैनी से रात कटी। सुबह साढ़े पांच बजे वीणा और वीरेंदर कार से माया के मायके के लिए रवाना हो गए। तड़के खाली सड़क पर के बराबर ट्रैफिक होने पर दो घंटे में दूरी तय कर ली।

वीणा और वीरेंदर के आगमन पर माया और उसके मायके वालों ने तो कोई आदर सत्कार किया और ही उन्हें कोई ख़ुशी हुई। उनके रूखे व्यवहार पर वीणा और वीरेंदर को बहुत दुख हुआ। माया उनको देख दूसरे कमरे में चली गई। वीणा माया के पीछे उसके कमरे में गई।
"भाभी आप बिन बातये कल यहां चली आई। क्या हुआ?
"देखो दीदी मैंने कल फोन पर बताया था कि अब मैं जंग के साथ नही रह सकती हूं। वह एक अपाहिज है और मैं पूरी ज़िन्दगी उसके साथ नही रह सकती हूं। वह बिस्तर से हिल नही सकता और मेरी ज़िन्दगी उसके मल मूत्र साफ़ करने के लिए नही है।"
"भाभी जंग ठीक हो जाएगा। डॉक्टर कहते हैं।"
"पता नही कब ठीक होगा? कब अपने पैरों पर खड़ा होगा और कब वैवाहिक दायित्व निभाने लायक होगा? मेरी भी कुछ जरूरतें हैं। सारी ज़िन्दगी मैं एक अपाहिज के साथ नही बंध सकती हूं। जंग की देखभाल के लिए आप किसी नर्स का प्रबंध कर लें।"
"भाभी पति के प्रति कुछ जिम्मेदारी और पत्नी के दायित्व होते हैं।"
"मैं समाज के दकियानूसी विचारों से सहमत नही हूं। कोर्ट भी एक अपाहिज के साथ रहने को मजबूर नही कर सकती। मुझे धर्म और समाज की दुहाई मत दीजिये। पिछले दो महीने से इस विषय पर सोच रही हूं। अब अंतिम निर्णय यही है कि जंग और मेरा तलाक। कीर्ति चक्र आपको मुबारक हो, मेरी मांग और इच्छापूर्ति तो जंग कर सकता है और ही मैडल।"
तलाक सुन कर वीणा और वीरेंदर पर एक पहाड़ गिर पड़ा। उन्होंने माया के माता-पिता से बातचीत की लेकिन कुछ फायदा नही हुआ। सभी की एक राय थी और उनका संयुक्त निर्णय था। एक वीर सेना के जवान की निजी जीवन में भूचाल आएगा इसकी किसी को उम्मीद नही थी।

वीणा और वीरेंदर मायूस घर लौट आये। माया के निर्णय से बूढे माता-पिता भी स्तब्ध रह गए। बेबस परिवार ने आंसू छलकने नही दिए।

आर्मी के अस्पताल में जंग बहादुर का इलाज होता रहा। डॉक्टर और नर्स उसका परिवार बन गया। वीणा ने माता-पिता को अपने पास बुला लिया और बारी बारी से जंग की सेवा में जुट गए।
एक फौजी जिसने तीन आतंकी आमने-सामने की लड़ाई में ढेर कर दिए, वह ज़िन्दगी की लड़ाई कैसे हार सकता है? कदापि नही। उसका हौसला उसे एक दिन अपने पैरों पर फिर से खड़ा करेगा, इस बात पर डॉक्टरों और नर्सों को पूरा यकीन था।

आज एक साल बाद जंग बहादुर ने बोलना शुरू किया। थोड़े-थोड़े टूटे शब्दों से शुरुआत की और शरीर के बाएं हिस्से में हरकत आरम्भ हो गई। जंग बहादुर ने जैसे दुश्मनों को मार गिराया, वैसे ही जीवन की जंग भी जीत ली। अलगे वर्ष जंग बहादुर अस्पताल से घर गया। माया के बारे में उसने किसी से नही पूछा। समझ तो तभी गया था जब माया उसे अंतिम विदाई दे गई थी। "जंग मैं जा रही हूं, अब नही आऊंगी।" उस समय वह उत्तर देने योग्य नही था परंतु पूरा बोध था।

सेना मुख्यालय में अपनी ड्यूटी ज्वाइन करने पर उसके चेहरे पर वैसा ही हर्ष था जब उसने तीन आतंकी ढेर किये थे।

परिवार की आंखों से रुके हुए अश्क अब छलके।



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