Monday, March 06, 2017

आंगन


बचपन के दिन याद आते हैं
घर के आगे का आंगन याद आता है
वो बड़ा सा आंगन याद आता है
आंगन में खेला बचपन याद आता है
आंगन में सजी बड़े बूढ़ों की महफ़िल याद आती है
आंगन में लगे अमरुद के पेड़ याद आते हैं
उछल कर पेड़ पर चढ़ अमरुद तोडना याद आता है
रोज रात चारपाई लगाना याद आता है
रात में बारिश की बूंदें पड़ते बिस्तर समेटना याद आता है
बस अब तो वो आंगन याद आता है
जुदा हुआ आंगन याद आता है
फ्लैट की छोटी सी बालकनी से अतीत याद आता है
खोया हुआ जीवन याद आता है
आंखों से नही हटता वो आंगन है
जिसमें बिताया वो खेलता बचपन है



Post a Comment

हुए हैं जब से शरण तुम्हारी

हुए हैं जब से शरण तुम्हारी , खुशी की घड़ियां मना रहे हैं करें बयां क्या सिफ़त तुम्हारी , जबां में ताले पड़े हैं। सु...