Thursday, March 09, 2017

रोमांच


रात के समय सोने से पहले तृप्ति ने पति तरुण को कहा "सुनो।"
"सुन रहा हूं।" तरुण का पूरा ध्यान टीवी के सीरियल पर था।

पति को टीवी में रमा देख तृप्ति ने झट से रिमोट पर कब्ज़ा किया और टीवी बंद कर दिया। टीवी बंद होते तरुण समझ गया कि कोई बात अवश्य है।
"तो तुम कुछ कह रही थी?" तरुण ने तृप्ति को अपनी बांहों में लेकर कहा।
"नही पहले टीवी देख लो, बातें होती रहेंगी। यह सीरियल अधिक जरुरी है। कल ऑफिस में टीवी सीरियल पर टेस्ट जो होने वाला है।"
"सीरियल वाला टेस्ट तो हर रोज होता है। यह पत्नी वाला टेस्ट आज हो जाए।"
"फुर्सत मिल गई जनाब को?"
"फुर्सत ही फुर्सत है कल सुबह ऑफिस जाने तक। तुम बस आदेश दो, ताबेदार सेवा में हाजिर है।"
"यदि ऐसे होता तो हम कब के पहाड़ों पर घूम आए होते।"
"श्रीमती जी को पहाड़ पर जाना है?"
"सारी दुनिया पहाड़ों पर घूमने जाती है और एक हम हैं कि आज तक नही गए।"
"अरे तुम तो विवाह से पहले पहाड़ पर रहती थी। पच्चीस वर्ष पहाड़ पर रही।" तरुण ने मजाकिया अंदाज में कहते हुए तृप्ति को गालों पर एक चुम्बन अंकित कर दिया।
"यह प्रेमालाप छोड़ कर मुद्दे पर आओ। कब ले चल रहे हो पहाड़ पर?"
"पहाड़गंज रह लो दो-चार दिन।"
"श्रीमान जी आपका सामान्यज्ञान सुधार दूं। मेरा मायका मुल्तानी ढांडा में है।"
"मुल्तानी ढांडा है तो पहाड़गंज में।"
"अब नाम गिनाओ पहाड़ी धीरज, आनंद पर्वत। नाम पहाड़ो वाले और इलाके तंग गलियों वाले। पता नही दिल्ली वालों ने क्या सोच कर नाम रखे हैं पहाड़गंज, पहाड़ी धीरज, आनंद पर्वत। अब मजाक छोड़ो और गंभीर मुद्दे पर जाओ।"
"कहां चलोगी?"
"कहीं भी रोमांटिक जगह, जहां भीड़ हो। सिर्फ मैं और तुम।"
"रोमांस के साथ अगर रोमांच भी हो जाए तो?"
"कहीं भी ले चलो, चलो तो सही।"

तरुण ने ऑफिस में छुट्टियों के लिए आवेदन किया। सहकर्मियों ने सड़क के रास्ते लेह जाने की सलाह दी। प्रकृति का नजारा देखने के लिए सड़क मार्ग से लेह जाएं और वापिस हवाई जहाज से।
छुट्टियां मंजूर हो गई। तरुण और तृप्ति का पहला पड़ाव मनाली था। दो दिन मनाली में रुके। तृप्ति को मनाली बहुत अधिक पसंद आया। सेब के बागों में भी घूमना हो गया। ठंड में धूप का आनंद लेते हुए मनाली का हर पल रोमांस के साथ बिताया।
"तरुण यही रुक जाते हैं। रोमांटिक जगह है, अपना कार्यक्रम बदलो। यहां दिल लग गया है, अब आगे नही जाना। यहां का वातावरण ही रोमांटिक है।"
"मित्रों से लेह की बहुत तारीफ सुनी है। छुट्टियों का पूरा आनंद उठाते है। चलते है रोमांच भी जरुरी है रोमांस के साथ।"

तृप्ति का मन आगे लेह जाने का नही था लेकिन तरुण के उत्साह के आगे झुक गई और तड़के सुबह टैक्सी में बैठ लेह की और रवाना हो गए। ठंड बढ़ती जा रही थी और साथ ही कुदरत का नजारा शानदार होता जा रहा था। तरुण कार की खिड़की से बाहर का नजारा देख कर मुग्ध हो उठा। तृप्ति ने अपना सर तरुण के कंधे पर टिका दिया।
"तृप्ति बाहर के नज़ारे देखो। तुम तो आराम करने लगी हो।"
"थोड़ा चक्कर सा रहा है। पहाड़ों का सफर है, गोल गोल सड़क है। घुमावदार सड़क में चक्कर रहे हैं।" तृप्ति ने बंद आंखों में कहा।
"दवा ले लो। चक्कर ख़त्म हो जाएंगे।"
"नही रहने दो। आंखें बंद करके आराम करती हूं। थोड़ी देर में ठीक हो जाएगा।"

तरुण कुदरत के नज़ारे देख रहा था और तृप्ति आंखें मूंद कर विश्राम कर रही थी। मध्यम गति से टैक्सी सफर में आगे बढ़ती जा रही थी। तीव्र मोड़ आते और तृप्ति की आंखें खुलती और तरुण से पूछती कि लेह कब आएगा।
एक तीव्र मोड़ पर टैक्सी का संतुलन बिगड़ा और खाई की और लुढकने लगी। अचानक से क्या हो गया? तृप्ति की चीख निकली। कितनी ऊंचाई से टैक्सी गिरी और कौन सी जगह है? तृप्ति को नही मालूम। जो तृप्ति आंखें मूंद कर आराम कर रही थी एक झटके से उठी। टैक्सी की सीट के बीच में फंसी हुई थी। बाहर कैसे निकले? तरुण, तरुण की आवाज लगाई पर तो तरुण उसे नजर आया और ही उसके मुख से आवाज निकल पा रही थी। टैक्सी का दरवाजा खुला हुआ था और तरुण नजर नही रहा था। उठने की कोशिश करने लगी। उसकी सारी कोशिशें बेकार गई। ना तो उसके लगे से आवाज निकल रही थी और ना ही वह उठ सक रही थी। मुंह खोल कर चीखना चाह रही थी परंतु चीख नही पा रही थी। उठ कर तरुण को ढूंढना चाह रही थी लेकिन तरुण नजर नही रहा था। तभी टैक्सी का उसकी ओर का दरवाजा खुला। टैक्सी ड्राइवर अपनी सीट से बाहर आया और तृप्ति का हाथ पकड़ा और एक झटके में तृप्ति को टैक्सी से बाहर निकाला और आसमान में उड़ने लगा। तृप्ति नीचे देख तरुण को पुकारती है। अब उसे तरुण टैक्सी की पिछली सीट पर बैठा नजर रहा है। टैक्सी भी सड़क पर चलती नजर रही है। तृप्ति हवा में अपने को उड़ता महसूस कर रही है। एक चीख जोर से मुख से निकलती है।

"तृप्ति क्या हुआ? तबियत तो ठीक है ?" तरुण ने तृप्ति को अपनी बांहों में जकड लिया। ठंड में तृप्ति को पसीने छूट रहे थे। तरुण ने ड्राइवर को टैक्सी एक किनारे रोकने को कहा।
तृप्ति ने आंखे खोली। उसने अपने को तरुण की बांहों में पाया। उसने सब कुछ सामान्य पाया।
"क्या मैं रो रही थी?"
"तृप्ति तुम सुबक रही थी। क्या कोई सपना देखा?"
तृप्ति संभल कर सीट पर बैठती है और टैक्सी के डैशबोर्ड पर रखी शिव की मूर्ति को प्रणाम कर प्रभु वंदना करती हैं।
"तरुण मालूम नही बहुत डरावना सपना था। मैं चिल्ला रही थी पर चीख नही निकल रही थी। बहुत डरावना सपना था। मुझे छोड़ना नही तरुण।"
"पगली सपने कभी सच हुए हैं क्या? बाहर कुदरत की बहार देख। एक अनोखा रोमांच रहा है।"
"मैंने जो देखा वैसा रोमांच किसी को दिखाई दे।"
"क्या देख लिया?"
"उसे भूलना ही बेहतर है।" तृप्ति तरुण से चिपक गई। तरुण तृप्ति को देख रहा था और तृप्ति तरुण की आंखों में डूब गई।



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