Tuesday, March 14, 2017

सात वचन


अचानक दादाजी की हंसने की आवाज से घर पर बैठे सभी जन आश्चर्यचकित होकर कमरे में आए। टेलीविज़न पर श्वेत श्याम चलचित्र देखते हुए दादाजी ठहाका मार कर हंसे। बच्चे बैठक में शाम का नाश्ता कर रहे थे। उठ कर दादाजी के कमरे में आये।
"पापाजी कौन सी फिल्म देख रहे हो?" पुत्र ने दादाजी को हंसता देख पूछा।

दादाजी की उम्र नब्बे के करीब थी और अपने कमरे में ही सारा दिन रहते थे। सुबह और शाम के समय घर के समीप मंदिर जाते और रात के खाने के समय बच्चों के साथ थोड़ा बैठते।
"पुरानी फिल्म है। अभी टीवी शुरू किया तो रही है। नाम तो नही मालूम लेकिन अच्छी है।"
"दादाजी श्वेत श्याम फिल्म आप कैसे देख लेते हो? हम नही देख सकते। एक दम बोर।" पौत्र ने नाक चिढ़ाते हुए कहा।
"देखो हमारे समय श्वेत श्याम फिल्म बनती थी। आज रंगीन बनती हैं। जमाना बदल गया है और फिल्म बनाने का तरीका भी। पहले धार्मिक और सामाजिक फिल्में बनती थी और अब मार-धाड़ वाली बनती हैं। ज़माने की सोच और तौर तरीके बदल चुके हैं। चलो बैठो एक बात करते हैं।"
"कौन सी?"
"बैठो तो फिर करते हैं।"

पुत्र, पुत्रवधु, पौत्र, पौत्रवधु और पौत्री सब जन दादाजी के इर्दगिर्द बिस्तर पर बैठ जाते हैं।

"हुआ यह कि जिस दृश्य को देख कर हंसी आयी वह यह था कि नायिका की भाभी नायिका के भाई से कह रही थी कि लड़की की शादी कर दो। लड़का उसने देख लिया है उसके रिश्ते में है। ऐसे अच्छे रिश्ते घर बैठे हर रोज नही मिलते। यह सुन नायिका कहती है कि मैं किसी से प्रेम करती हूं। विवाह अपनी पसंद के युवक से करूंगी।"
"उस समय भी प्रेम विवाह होते थे?" पौत्री ने उत्सुकता से पूछा।
"बिलकुल होते थे। प्रेम विवाह की परंपरा युगों पुरानी है। रुक्मणि ने भगवान कृष्ण को सन्देश भेजा। कृष्ण ने रुक्मणि को अपने रथ पर बिठा लिया था।"
"अच्छा दादाजी?"
"कुछ धार्मिक पुस्तकों का भी अध्ययन किया करो। मेरी अलमारी से पुस्तकें लेकर पढ़ा करो।"
"अच्छा दादाजी आप यह बताओ कि किस दृश्य पर आपने ठहाका लगाया?"
"हुआ यह कि जब नायिका ने कहा कि उसे प्रेम है तब उसकी भाभी ने कहा देखो इस की बात, कहती है प्रेम है। यहां हमने चवन्नी के बाप की शक्ल अठन्नी के पैदा होने के बाद देखी थी और इनकी सुनो कि प्रेम हो गया है। इसी दृश्य पर हंसी गई।"
"दादाजी क्या सच में पति पत्नी एक दूसरे की शक्ल बच्चे होने के बाद देखते थे?"
दादाजी थोड़ा हंसते हुए "देखो यह तो केवल एक जुमला है। अपने से पहले जमाने की तो नही कह सकता लेकिन अपने ज़माने की बात जरूर बता सकता हूं।'
"बताओ दादाजी आपने दादी को पहली बार कब देखा था?"
"हमने एक दूसरे को मेले में देखा था। उस समय घर जाकर देखना अच्छा नही समझा जाता था। यदि किसी कारण विवाह की बात नही बनती तब लड़की पर कोई दोष आये। इस कारण किसी ऐसी जगह लड़के और लड़की को दिखाया जाता था जहां दूर से वे एक दूसरे को देख ले। इसी कारण मेले में दूर से देखा था।"
"दादाजी कोई बातचीत नही की थी?"
"बात कोई नही होती थी। वह सब विवाह के बाद।"
"कमाल है दादाजी अगर आदत नही मिलें तब क्या होता था?"
"लड़ते झगड़ते उम्र बीत जाती थी। वैसे तो साल दो साल बाद लड़ झगड़ कर एक दूसरे के हो जाते थे। प्यार मोहब्बत हो जाती थी। फिर आई तुम्हारे पिता-माता के विवाह का जमाना। तब थोड़ा बहुत प्रेम विवाह की प्रथा शुरू हो गई थी। लड़का-लड़की एक दूसरे से मंदिर में, रेस्टॉरेंट में, किसी के विवाह में या होली, बैशाखी, दिवाली मेलों में देखते थे। एक दूसरे से बातचीत करते थे और दोनों की पसंद पर ही विवाह होता था। सगाई के बाद शादी के बीच मिलना और घूमना चलता था और अब तुम्हारा समय है।" दादाजी ने पौत्र और पौत्रवधु की और देखते हुए कहा।
"अब दादाजी आपने दो पीढ़ियों के बारे में बताया अब तीसरी पीढ़ी की बात हो जाये।"
"तीसरी पीढ़ी खुद ही बता दे तो अच्छा है।"

"नही दादाजी आप ही बताये।"

"आज का समय आधुनिक है। बचपन से ही बच्चे एक साथ पढ़ते हैं। कॉलेज के समय से तुम दोनों एक साथ थे। अक्सर पौत्रवधु हमारे पौत्र के संग घर आती थी। हमारा पौत्र भी उसके घर जाता अवश्य होगा। अब जब दस वर्ष से एक दूसरे के साथ मेल मिलाप रहा। पूरे परिवार में घुल मिल गए तब विवाह तो औपचारिकता रह जाती है। मेरी बात को हंसी में टाल देते थे। जब कमाने लगो तब विवाह कर लेना चाहिए।"
"दादाजी आप को हमारी शादी की जल्दी क्यों थी?"

"विवाह की एक उम्र होती है। अधिक उम्र में शादी का आजकल फैशन हो गया है। शादी पच्चीस छब्बीस की उम्र में कर लेनी चाहिए।  चालीस में विवाह करोगे, बच्चे कब पैदा करोगे? साठ में रिटायर हो जाओगे तब बच्चे स्कूल में पढ़ रहे होंगे। कब उनकी परवरिश के दायित्व पूरे होंगे? मैंने अपने बच्चों का विवाह पच्चीस छब्बीस में कर दिया। अब सत्तावन अठावन की उम्र में बेफिक्र हो गए। बच्चों की पढाई पूरी हो गई, विवाह हो गए। अपनी जिम्मेवारी समाप्त। दो चार वर्ष में रिटायर हो जाएंगे। रिटायरमेंट पर कोई चिंता नही होगी। तनावमुक्त ज़िन्दगी कटेगी जैसे मैं जी रहा हूं। ये बातें सबको समझनी चाहिए इसलिए तुम दोनों को विवाह करने को कहता था।"

"दादाजी आपकी बातों में वजन है फिर भी एक बात, विवाह का कौन सा तरीका अच्छा है।"
"सब तरीके अच्छे हैं। प्रेम विवाह भी और माता पिता के द्वारा तय विवाह। प्रेम विवाह भी असफल होते है। सफल विवाह की कुंजी है समर्पण। पति और पत्नी को अपना जीवन एक दूसरे पर समर्पित करना पढता है। मैं को छोड़ हम पर आना पड़ता है। प्यार को बांटना पड़ता है। कठिन समय पर एक दूसरे का हाथ पकड़ कर प्रेम से ज़िन्दगी जीनी होती है। प्रेम से कठिन समय सुगमता से कट जाता है। एक दूसरे में निष्ठा रखनी पड़ती है।"
"दादाजी मान गए आपकी दूरगामी सोच है।"
"बच्चों हिन्दू विवाह रीति रिवाजों से विधिपूर्वक होता है। विवाह के समय पंडित हमें मन्त्रों का अर्थ बताते हैं हम उन्हें अगले पल भूल जाते हैं। सात फेरों और सात वचनों का विशेष महत्त्व है। जब बात निकली है तब विवाह के सात वचन बताता हूं।"

पहला वचन हैसांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक, आध्यात्मिक, धार्मिक आदि जैसे सभी प्रमुख निर्णयों के लिए एक दूसरे से परामर्श करना।
दूसरा वचन हैअच्छे दोस्त बन कर, एक गहरी समझ विकसित करके, एक दूसरे के और परिवार के लिए प्रति दायित्व का निर्वाह करें।
तीसरा वचनएक दूसरे का, एक दूसरे के माता पिता और परिवार का सम्मान करें।
चौथा वचनएक दूसरे के प्रति वफादार रहें।
पांचवा वचन - परिवार और सामाजिक परंपराओं से मार्गदर्शित हो।
छठा वचनउनके परिवारों के बीच सामंजस्य बनाए रखें।
सातवां वचनसंकट और बीमारी के समय के दौरान मजबूत और शांत रहें।
यदि हम इन सात वचनों पर अमल करें तब हर विवाह सफल होगा। तलाक शब्द ढूंढने से भी नही मिलेगा।

अब यह महफ़िल समाप्ति की घोषणा करता हूं। मंदिर जाने का समय हो गया है।
दादाजी मंदिर जाते हैं और बच्चे सात वचनों के महत्त्व पर चर्चा करते हैं।

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