Friday, April 28, 2017

सखा

भीतर है सखा तेरा तू मन टिका के देख
हृदय  में ज्ञान की ज्योति जगा के देख

मन भटक कर जाता है  बाहर की ओर जो
बाहर की ओर से उसे भीतर को मोड़ दो

द्वार बंद करके उसे अपने अंदर खोज के देख
पवित्र साथी है वो उसका सखा बन के देख

खुली आंखों से तू उसकी रचनाएं देख
झूम उठेगा उसकी महिमा को देख

सबसे अच्छा सखा है वो बिगड़ी को बनाए
जीवन को हमेशा रस भक्ति से तू जो सजाए

ईश्वर की वाणी मोहन तू आजमा के देख
भीतर है सखा तेरा तू मन टिका के देख



Thursday, April 27, 2017

मुकद्दर

इधर तू है उधर तू है
जहां देखूं तू ही तू है
मेरे नयन में बसा तू है
मेरे हृदय में समाया तू है
तुझे पाने की चाह है
तुझे अपनाने की चाह है

चाहे दुनिया कहे मुझे दीवाना
तू शमा तो मैं परवाना
तुझ पर मिट जाऊंगा
तेरी आग में जल जाऊंगा
हे ईश्वर रहूं तेरी भक्ति में लीन
मेरा मुकद्दर कुछ ऐसा कर दे


Monday, April 24, 2017

नेता

गली छानी शहर ढूंढा देश विदेश देखा
चाह है मुलाकात हो एक इंसान से
इंसान लुप्त हो गया है शायद
मुलाकात हो गई एक नेता से
लोगों को बांटते अपने स्वार्थ में लिप्त
मुलाकात हो गई अनेक नेताओं से
अभिनय मे माहिर मंत्रमुग्ध करते नेता
सिनेमा के अभिनेता अभिनय सीखते नेताओं से
थूक कर चाटते पल पल स्वार्थ में नेता
हम हास्य सीख रहे हैं नेताओं से


Friday, April 21, 2017

अधिकार


है अधिकार तुझे जीवन संवार दे
सूना है इसे हरा भरा कर दे
तपती दोपहर झुलझता है बदन
बन कर बादल शीतल कर दे
धुंधली है रेत से शाम
फुहार कर उज्जवल कर दे
छोड़ कर जा बेदर्दी
अपनाकर मेरा जीवन बदल दे


Thursday, April 20, 2017

मात पिता

माता तू ही पिता तू ही
सृष्टि का रचयिता तू ही
तू ही हमारा रक्षक है
तू ही हमारा पथपर्दशक है
तू ही जीवन तू ही मृत्यु
तेरी इच्छा से अस्तित्व है
हम हैं खिलौना तेरे हाथ के
भवसागर पार करा सतबुद्धि देके
मात पिता तू सृष्टि का
ईश्वर तेरे चरणों में नमस्तक हम


Monday, April 17, 2017

सत्य है


सत्तारूढ़ दल चुनाव में बुरी तरह से हार गया। इतनी बुरी हार की उम्मीद बिलकुल नही थी। चुनावों से पहले दल के अंदरूनी सर्वेक्षण में दल की स्थिति काफी मजबूत बताई थी। दल के मसीहा छिहत्तर सिंह बौखला गए। सौ सदस्यों की विधान सभा में सिर्फ पंद्रह सीट मिली। मसीहा छिहत्तर सिंह की पुत्रवधू चुनाव हार गई। पुत्रवधु की हार को छिहत्तर सिंह बर्दास्त नही कर सके। परिवार का एक सदस्य हार कैसे हार गया। दल के सदस्यों ने धोखा दिया उसको झूठी रिपोर्ट दी कि जीत पक्की है। मीडिया को विन्रमता से बयान दे दिया कि जनता का आदेश सर आंखों पर और राज्यपाल को इस्तीफा दे दिया।

जो जहाज डूब गया उसमें कौन सवारी करेगा। जहां लोगों का जमावड़ा होता था अब वहां सन्नाटा छाया हुआ था। छिहत्तर सिंह ने सरकारी बंगला छोड़ दिया और शहर से दूर गांव में पुश्तैनी मकान में रहने चले गए। अकेले में हार का अवलोकन करने लगे कि क्यों उसको झूठी रिपोर्ट देकर दिलासा दिलाया? हार-जीत तो होती रहती है। अगला चुनाव चाहे अब पांच वर्ष बाद होंगे, उसमें फिर मौका मिल सकता है परन्तु विश्वासघातियों को नही छोड़ना है। सही रिपोर्ट देते तब कम से कम अपने परिवार की प्रतिष्ठा और साख को मिट्टी में मिलने से बचा लेते। पुत्रवधु की हार अर्थात पूरी प्रतिष्ठा ही पानी में बह गई।

गांव में मीडिया से दूर सिर्फ अपनी पत्नी और दो विश्वासपात्र व्यक्तियों के साथ ख़ामोशी से रह रहे थे। एक महीना बीत गया। छिहत्तर सिंह बस सोचते ही रहते। कुछ संवाद पत्नी से करते।

एक दिन सुबह टहलते हुए अपने दोनों विश्वासपात्रों मुसद्दी लाल और चुन्नी लाल को बुलाया।

"हजूर कुछ तो बोलिये, हमें आपकी ख़ामोशी से डर लगता है। आपको इतना अकेला और खामोश कभी नही देखा।" मुसद्दी लाल ने बहुत धीमी आवाज में कहा।
"मुसद्दी और चुन्नी तुम दोनों मेरे सबसे अधिक विश्वासपात्र हो। मैं तुम्हे अपने परिवार का हिस्सा मानता हूं।" छिहत्तर सिंह ने पत्थर के बेंच पर बैठते हुए कहा।
"हजूर इसमें कोई दो राय नही है। आप हमारे माई बाप हैं। आप के अलावा हमारा इस दुनिया में कोई और नही है।" दोनों ने एक स्वर में कहा।

छिहत्तर सिंह ने उन दोनों को बैठने को कहा। दोनों जमीन पर बैठ गए। छिहत्तर सिंह ने उन्हें कुर्सी पर बैठने को कहा। दोनों कुर्सी पर बैठ गए।

"थोड़ा नजदीक आओ।"

दोनों एक दम सट कर बैठ गए।

"सुनो पुत्रवधु के चुनाव क्षेत्र का प्रभारी कौन था?'
"हजूर मुन्ना था।"
"और दल का रणनीति किसके जिम्मे थी?"
"किशोरी लाल के जिम्मे।"
"ध्यान से सुनो। मुन्ना को यहां लाओ। चुनाव के बाद वह एक बार भी मुझे नही मिला। बड़ा आदमी बन गया है, मिलने का समय भी नही है उसके पास।"
"ठीक है आपके क़दमों में पड़ा होगा अभी घसीट कर लातें हैं।"
"सुनो उसको अकेला ही लाना है। उसके साथ कोई हो और यहां नही हमारी स्टील रोलिंग मिल में। दो दिन बाद मैं वहां मिलूंगा।"

दो दिन बाद मुसद्दी लाल और चुन्नी लाल मुन्ना के संग स्टील रोलिंग मिल पहुंच गए।
"हजूर मुन्ना के संग हम मिल में हैं।"
"मुन्ना की कुछ खातिर करो। हमारा मेहमान है। जो उसको पसंद हो, खिलाओ और पिलाओ। बकरे को मोटा करो। मैं थोड़ी देर में पहुंचता हूं।"

छिहत्तर सिंह की बात सुन कर मुसद्दी और चुन्नी ने मुन्ना के आगे खाने का ढेर लगा दिया। दो घंटे बाद छिहत्तर सिंह मिल पहुंचे।

"मुन्ना कैसे हो?"
"बस आपकी कृपा है।" मुन्ना ने उठ कर छिहत्तर सिंह के पैर छुए।

छिहत्तर सिंह ने उसकी कमीज का कालर पकड़ कर पेट में दो लात जमाई।
"मुन्ना मेरे से गद्दारी क्यों की?"
मुसद्दी और चुन्नी छिहत्तर सिंह का इशारा समझ गए और दोनों मुन्ना के ऊपर पिल गए। दे दना दन लात और घूसों से जम कर पिटाई की। मुन्ना अधमरा हो कर कहराने लगा।
"सर जी माफ़ी मांगता हूं। छोड़ दीजिए। मैंने कुछ नही किया।"
"रकम पानी की तरह बहा दी थी चुनाव में। पिछली विधान सभा में पैंसठ सीट थी और इस बार सिर्फ पंद्रह। कोई बात नही हार गए। मेरी पुत्रवधु हार गई। वो नही हारी है, मैं हारा हूं। मेरी इज्जत, प्रतिष्ठा मिट्टी में मिल गई और तू मुझसे झूठ बोला कि जीत हमारी है।" कह कर फिर दो लात मुन्ना के मुंह पर जमा दी।
"मुझे माफ़ कर दो। मैं वोटरों का मूड नही भांप सका।"
"झूठ क्यों बोल रहा है। पांच चुनावों का अनुभव है। मीडिया को कुछ भी बोले पर अंदर की बात हमें मालूम होती है कि कितनी सीट मिलेंगी। बता कितने पैसे खाएं हैं विरोधियों से? मेरे तो पूरे डकार गया। अब सजा मिलेगी।"
"हुकुम हजूर।" मुसद्दी और चुन्नी एक स्वर में बोले।
"भट्टी में डाल दो।"

नहीं की एक चीख निकली और बेहाल मुन्ना को मुसद्दी और चुन्नी ने दो और मजदूरों की मदद से उठाया और भट्टी में डाल दिया।
"राम नाम सत्य है। सत्य है सत्य है।" कह कर छिहत्तर सिंह मिल से बाहर गए।

चंद मिनटों में मुन्ना की हड्डियों राख में बदल गई। सत्य बोलो सत्य बोलते मुसद्दी लाल और चुन्नी लाल भी गए।
"मुन्ना की कार को नहर में फेंक दो।" छिहत्तर सिंह कह कर अपने घर पहुंचे। थोड़ी देर बाद मुसद्दी और चुन्नी भी गए।
"हजूर काम संपन्न हुआ।"
"ठीक है तुम दोनों फ़िक्र करो। मुन्ना की हड्डी तक नही बची है। सत्तारूढ़ को ढूंढने दो मुन्ना किस दुनिया में है।"
"हजूर आप के होते हमे कोई चिंता नही।"
"अब किशोरी लाल की बारी है। लड़के को समझाया था कि विदेशी दाव-पेंच भारत में काम नही आते है। मति मारी गई थी कि चुनाव रणनीति किशोरी लाल के हवाले कर दी। इतना बेड़ागर्क कभी नही हुआ था। देर नही करनी कल परसों में उसको यही ठिकाने लगा दो। नही तो सब सावधान हो जाएंगे।"

कुटिल मुस्कान के साथ मुसद्दी लाल और चुन्नी लाल एक स्वर में बोले। "राम नाम सत्य है, सत्य बोलो सत्य है।"






बुढापा

कुछ उम्र में बढ़ गया कुछ जिस्म ढल गया कुछ पुराना हो गया कुछ बुढापा आ गया कुछ अनुभव आ गया कुछ कद्र भी पा गया...