Friday, April 07, 2017

एक वोट


किट्टी पार्टी में सोनिया अपने साथियों के साथ चहक रही थी। पार्टी सोनिया के घर पर हो रही थी। गपशप के बीच हंसी मजाक और टीवी सीरियल पर चर्चा हो रही थी तभी सुकन्या आई।

सोनिया - बहुत देर कर दी। कहां थी? पता नही खाने में क्या बचा है। कहीं सारा चट हो गया हो।
सुकन्या - कुछ नही होता। चाय ही पिला दो।
मोनाली - आजकल तो चर्चा चाय पर होती है।

सभी महिलाएं ठहाका लगाती हैं।

सोनिया - चल सुकन्या तेरी किस्मत में लिखा है। समोसा भी है और कचोड़ी भी।
रीता - सुकन्या तू कहां अटक गई थी?
सुकन्या - पहले चाय पी लूं फिर बताती हूं।

चाय पीने के बाद सुकन्या ने बताया की उसका परिवार आजकल बहुत तनाव है। थोड़े दिनों में नगर निगम के चुनाव होने है और इस बार पार्टी ने निर्णय किया है कि वर्तमान पार्षद और उसके परिवार को टिकट नही मिलेगा।

रीता - फिर तुम्हारे परिवार का पत्ता साफ़ इस बार?
थोड़ी गंभीर मुद्रा में सुकन्या - क्या करे कोई चारा भी नही। काम करें हम और चुनाव में लड़े कोई और? हमने सोच लिया है कि इस बार चुनाव प्रचार नही करना चाहे हमारी पार्टी का प्रतयाशी हार जाए।
सोनिया - दिल छोटा नही करते। यह तो नगर निगम का चुनाव है। आगे बढ़ कर विधान सभा और लोक सभा की ओर देखो। तुम भी सुकन्या दूर की नही सोच रही हो।

सोनिया की बात सुन कर सुकन्या के दिमाग ने तेजी से काम करना शुरू कर दिया जो अभी तक निष्क्रिय था।

सुकन्या - सोनिया तूने बात तो पते की की है। तू सोसाइटी की पदाधिकारी रह चुकी है। इस क्षेत्र की सीट महिला सीट है। तुम सोनिया चुनाव के लिए योग्य उम्मीदवार हो।
सोनिया - मैं और चुनाव। हमारे परिवार का राजनीति से दूर का वास्ता नही। हम तो कला और साहित्य प्रेमी हैं। किसी और को पकड़। कह कर सोनिया हंस पड़ी।

सुकन्या की बात का मोनाली और रीता ने समर्थन किया।

सुकन्या - मैं घर में बात करती हूं। हमें विश्वासपात्र उम्मीदवार चाहिए जो हमारे हितों की रक्षा करे।
सोनिया ने सुकन्या की इस बात को गंभीरता से नही लिया।

तीन दिन बाद रविवार की सुबह सुकन्या अपने पति और ससुर के साथ सोनिया के घर पहुंच कर सोनिया को बधाई देने लगी
सोनिया - किस बात की बधाई?
सुकन्या - पार्टी हाई कमान में बात कर ली है। हमारी सीट पर सोनिया उम्मीदवार है, बस अब कल पर्चा भरना है।
सोनिया ने पति सुनील की ओर देखा। सुनील की कुछ समझ नही आया। सुकन्या ने सारी बात विस्तार में बताई।
सुनील - यह चुनाव हमारे बस की बात नही है। एक बार सोसाइटी के पदाधिकारी बने थे। पूरी मुसीबत मोल ली थी। जैसे तैसे दो वर्ष का कार्यकाल पूरा किया। दो सौ मकानों की इस सोसाइटी में लोगों की ताने, शिकायतें ने जीना दूभर कर दिया था। हम अपनी ज़िन्दगी नही जी सके थे। यह चुनाव आप को मुबारक।

सुनील ने तो मना कर दिया लेकिन सुकन्या का परिवार हार मानने को तैयार नही था। उन्होंने सोनिया को अपनी लच्छेदार बातों से प्रभावित किया और सोनिया ने सहमति दे दी।

सुकन्या - भाई साहब आप तो बिना किसी कारण परेशान हो रहे हैं। काम करने के लिए पार्टी की पूरी टीम है और हमारे परिवार का पूरा सहयोग आपके साथ है। सारा काम हमने करना है। सोनिया का सिर्फ नाम होगा, काम हमारा। हमारा परिवार पिछले तेईस वर्षो से राजनीति में है।
सुनील - नेताओं के प्रति मेरा दृष्टिकोण अच्छा नही है। घोटाले, अपराध में लिप्त नेताओं को मैं अच्छी नजर से नही देखता।

सुकन्या के पति और ससुर ने सुनील को समझाने की कोशिश की। उनका परिवार बेदाग है। कुछ नेताओं ने समस्त राजनीति को बदनाम कर दिया है वर्ना देश सेवा में बहुत अच्छे नेता हैं जिन्होंने अपना जीवन देश की सेवा में न्यौछावर कर दिया है। हमारा व्यापार है हमे रुपये पैसो की कोई आवश्यकता नही है। हमारे ऊपर कोई इल्जाम भी नही है।

खैर सुनील के नजरिये में कोई बदलाव नही आया पर सोनिया प्रभावित हुई और चुनाव लड़ने के लिए तैयार हो गई। पत्नी की इच्छा पूर्ण करने की खातिर सुनील ने सोनिया का साथ दिया। सोनिया को पार्टी का टिकट मिल गया। नामांकन भर दिया और चुनाव प्रचार की खातिर सुनील ने ऑफिस से पंद्रह दिनों की छुट्टी ली। घर-घर जाकर चुनाव प्रचार किया। सुबह से रात तक सुनील ने सोनिया के चुनाव प्रचार में कोई कमी नही छोड़ी। सुकन्या का पूरा परिवार सोनिया के साथ रहा।

वोट दो वोट दो, सोनिया जी को वोट दो के मध्य अंत में चुनाव संपन हुए। वोटों की गिनती दो दिन बाद होनी थी। सुनील और सोनिया चुनाव प्रचार में थक कर चूर हो गए थे। दो दिन दोनों ने आराम किया।

दो दिन बाद सुनील, सोनिया और सुकन्या का पूरा परिवार काउंटिंग सेंटर पर सुबह ही उपस्थित थे। एक के बाद एक वोटिंग मशीन खुलती है और बटन दबाते ही रिजल्ट आने लगा। कांटे का मुकाबला था। कभी सोनिया दो वोट से आगे तो कभी सोनिया की प्रतिद्वंदी तीन वोट से आगे। दो घंटे तक सभी के दिल की धड़कन तेज होती रही। कांटे के मुकाबले में अंत में सोनिया एक वोट से हार गई।

सुनील के मुख से एक वाक्य निकला - सिर्फ एक वोट।
सुकन्या - हां सोनिया एक वोट।
और सुकन्या सोनिया के गले लग कर रोने लगी। दोनों दहाड़े मार रो रही थी। सुनील ने दोनों को सांत्वना दी कि किस्मत का खेल है। दुखी होने से हार जीत में नही बदलेगी। किस्मत का लिखा कोई टाल नही सकता और मिटा भी नही सकता।
सुकन्या - भाई साहब यह किस्मत का खेल नही बल्कि धोखा लगता है। हमारे खास आदमियों ने लगता है वोट हमें नही दिया। अपने पक्के वोटों की मुझे जानकारी थी और जीत की पक्की सम्भावना थी।

इतना सुन कर सोनिया ने सुनील की और देखा।

सोनिया - कहीं तुमने अपना वोट उस काली मुटल्ली को तो नही दिया। मेरे चुनाव के खिलाफ तुम शुरू से थे और वोट भी नही दिया। तुम्हारे एक वोट ने मुझे हरा दिया। तुम्हे मैं नही छोडूंगी। तुम घर चलो।
सुनील - मेरा विश्वास करो। मेरा तन, मन और धन सब तुम्हारा है
सोनिया - पर वोट उस काली मुटल्ली का।


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